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हिन्दी में कम्प्यूटरीकरण

प्रस्तावना

पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश के विभिन्न क्षेत्रों में कम्प्यूटर के प्रयोग में भारी वृद्धि हुई है । आज शायद ही कोई ऐसा संगठन है, चाहे वह कोई सरकारी अथवा निजी कार्यालय या शैक्षिक संस्थान हो अथवा फैक्टरी या फिर बैंकिंग आदि जैसी सेवाएँ, जो कम्प्यूटर के प्रयोग से अछूता रह गया है । आज का समाज तो सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति के दौर से गुजर रहा है । इसलिए आज कम्प्यूटर प्रणालियों का विनिर्माण भी भारी मात्रा में हो रहा है । समूचे विश्व में इस क्षेत्र में किए जा रहे अनुसंधान के फलस्वरूप विशेष रूप से वैयक्तिक कम्प्यूटर के क्षेत्र में जहाँ इसका आकार छोटे से छोटा होता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके संसाधन की क्षमता में वृद्धि हो रही है । अब तो लैप टॉप (नोट बुक) तथा मेसेज पैड जैसे छोटे आकार के कम्प्यूटर भी बन गए हैं और सरकार द्वारा इसके प्रसार की दिशा में किए गए प्रयासों के फलस्वरूप इनकी कीमतों में भी पहले की तुलना में भारी गिरावट आई है । वह दिन शायद दूर नहीं जब टाइपराइटर विलुप्त हो जाएंगे ।

भारत एक बहुभाषी देश है और संविधान के आठवें अनुच्छेद में 18 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है । हिन्दी को केन्द्रीय सरकार की राजभाषा के रूप में अपनाया गया है । अतः सत्तर के दशक में यह महसूस किया गया कि भारत को ऐसी सुविधाओं का विकास करना चाहिए जिससे कम्प्यूटरों का इस्तेमाल हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में भी इनपुट/आउटपुट के लिए किया जा सके । इलेक्ट्रॉनिकी विभाग द्वारा इस दिशा में की गई पहल के फलस्वरूप हमारे ही देश के विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा विकसित बुद्धिपरक हार्डवेयर चिप जैसेकि जिस्ट कार्ड तथा अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर के विभिन्न पैकेज आज बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से हिन्दी तथा सभी प्रांतीय भाषाओं में काम करना संभव हो गया है।

कम्प्यूटर और भाषा

यह तो सर्वविदित है कि कम्प्यूटर एक मशीन है । किसी भी मशीन का निर्माण किसी विशिष्ट प्रयोजन से होता है और उस मशीन की अपेक्षाओं के अनुसार उससे काम लिया जाता है । लेकिन कम्प्यूटर एक गूँगी मशीन होने के साथ ही साथ बुद्धिमान भी है, हालाँकि मनुष्य के मस्तिष्क का मुकाबला करना किसी के लिए संभव नहीं है । कम्प्यूटर में कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence)के चिप लगाए जाते हैं और उसे कम्प्यूटर की भाषा में प्रोग्राम अर्थात क्रमानुदेश दिए जाते हैं, जिनके आधार पर वह प्रयोगकर्ता के साथ लिखित रूप में बातचीत करता है । कम्प्यूटर वस्तुतः न तो अंग्रेजी समझता है और न ही हिन्दी या अन्य कोई भाषा; इसकी अपनी भाषाएँ हैं और यह द्विआधारी अंकों (binary)अर्थात '0' तथा '1' अंकों पर कार्य करता है । पास्कल, कोबॉल, सी, डीबेस आदि कम्प्यूटर भाषाएँ हैं और इन भाषाओं के माध्यम से ही कम्प्यूटर प्रोग्राम तैयार किए जाते हैं । इस प्रकार, कम्प्यूटर भाषा की दृष्टि से स्वतंत्र है बल्कि कम्प्यूटर का प्रोग्राम जिस भाषा के लिए तैयार किया जाएगा वह उसी भाषा में कम्प्यूटर में लगे कम्पाइलर (अनुवादक) के माध्यम से काम करेगा । एक समूची कम्प्यूटर प्रणाली के मुख्यतः तीन अंग होते हैं 1) हार्डवेयर, 2) प्रणाली सॉफ्टवेयर तथा, 3) अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर ।

हार्डवेयर

एक कम्प्यूटर प्रणाली के रूप में जिन उपस्करों की आवश्यकता होती है और जो हमें बाहर दिखाई देते हैं, उन्हें हार्डवेयर कहा जाता है । हार्डवेयर के अंग निम्नलिखित हैं :
i) केन्द्रीय संसाधन एकक ( CPU) तथा मानीटर ( VDU) चीन
समूची कम्प्यूटर प्रणाली के साथ जो एक बॉक्स रूपी यंत्र दिखाई देता है उसे केन्द्रीय संसाधन एकक और टीवी जैसा जो दृश्यपटल दिखाई देता है उसे मानीटर कहते हैं । कुंजीपटल पर हम जो कुछ भी टाइप करते हैं वह CPU में पहुँचता है और उसमें लगे विभिन्न प्रकार के संघटक-पुर्जों के माध्यम से उसी क्षण VDU पर दिखाई देता है । जैसा ऊपर बताया गया है, कम्प्यूटर न तो अंग्रेजी समझता है और न ही हिन्दी या अन्य कोई भाषा; इसकी अपनी भाषाएँ हैं और यह द्विआधारी अंकों (binary) अर्थात '0' तथा '1' अंकों पर कार्य करता है । कुंजीपटल के माध्यम से टाइप किए गए सभी आँकड़ों को क्घ्छ में लगा 'कम्पाइलर' कम्प्यूटर भाषा से संसाधन की भाषा में अनूदित करता है और तब हम उसे ज्क़्छ पर पढ़ सकते हैं । इसलिए कम्प्यूटर का इस्तेमाल किसी भी भाषा में करने में कोई कठिनाई नहीं है । इस प्रकार, क्घ्छ तथा ज्क़्छ भाषा की दृष्टि से स्वतंत्र हैं ।
ii) कुंजीपटल
कम्प्यूटर से बातचीत करने में कुंजीपटल का स्थान सबसे महत्वपूर्ण होता है । जिस भाषा में संसाधन के लिए कुंजीपटल का प्रोग्रामन किया जाता है, वह उसी भाषा में कार्य करेगा । अतः यह अंग भी भाषा की दृष्टि से स्वतंत्र होता है। जहाँ तक इस समय भारतीय भाषाओं में काम करने का संबंध है, सॉफ्टवेयर विक्रेताओं द्वारा अपने पैकेज के साथ कुंजीपटल के डिज़ाइन के अनुसार स्टिकर भी दिए जाते हैं, जिन्हें स्ांबंधित कुंजियों पर लगा देने मात्र से वे द्विभाषी या बहुभाषी कुंजीपटल बन जाते हैं । खुदाई किए हुए द्विभाषी कुंजीपटल भी इस समय कुछ विनिर्माताओं द्वारा बनाए जा रहे हैं।
iii) प्रिन्टर
कम्प्यूटर पर तैयार किए गए दस्तावेज का मुद्रण करने के लिए प्रिंटर की आवश्यकता होती है । संसाधन के प्रयोजन से कम्प्यूटर के लिए तैयार किए जाने वाले प्रोग्राम में प्रिंटर की संगतता के भी प्रोग्राम होते हैं और किसी दस्तावेज का संसाधन जिस भाषा में किया जाएगा, प्रिंटर से मुद्रित प्रतियाँ भी उसी भाषा में प्राप्त होंगी । इस प्रकार, यह अंग भी भाषा की दृष्टि से स्वतंत्र है । साधारणतया निम्नलिखित किस्म के प्र्टरों का इस्तेमाल किया जाता है :
(क) डॉट मैट्रिक्स
इस किस्म के प्रिंटरों का इस्तेमाल सर्वाधिक होता है क्योंकि ये अपेक्षाकृत सस्ते होने के साथ ही साथ इनमें मुद्रण की लागत भी काफी कम आती है। आमतौर पर दो किस्म के डॉट मैट्रिक्स प्रटरों का प्रयोग किया जाता है - 9 पिन तथा 24 पिन, प्रयोगकर्ता द्वारा अपेक्षित अक्षर की क्वालिटी तथा गति पर निर्भर करता है । इनका विनिर्माण विभिन्न कम्पनियों द्वारा किया जाता है ।
(ख) लेज़र
बढ़िया क्वालिटी का आउटपुट तैयार करने तथा मुद्रण की गति में वृद्धि करने के लिए लेज़र प्रिंटर का इस्तेमाल किया जाता है । डेस्क टॉप प्रकाशन के प्रयोजन से इस किस्म के प्रिंटरों का ही सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है क्योंकि एक ओर जहाँ इससे मुद्रण की गति बढ़ जाती है वहीं दूसरी ओर इसके मुद्रण की क्वालिटी की तुलना व्यावसायिक प्रेस के मुद्रण की क्वालिटी से की जा सकती है । डॉस मैट्रिक्स प्रिंटरों की तुलना में ये काफी मँहगे होते हैं और इनकी विशेषताओं के कारण इनमें प्रति पृष्ठ मुद्रण की लागत भी अधिक आती है ।
(ग) इंक जेट
यह प्रिंटर लेज़र प्रिंटर से कुछ सस्ता होता है लेकिन इसके मुद्रण की क्वालिटी भी काफी अच्छी होती है और इसका प्रयोग भी अधिकांशतः DTP के प्रयोजन से किया जाता है ।
(घ) लाइन मैट्रिक्स
तीव्र गति से और अधिक मात्रा में काम करने के लिए लाइन मैट्रिक्स प्रिंटर बहुत उपयोगी सिद्ध होता है । बिजली के बिल, टेलीफोन बिल आदि तैयार करने में इस प्रिंटर का इस्तेमाल करने से व्यय और समय दोनों की काफी बचत हो सकती है ।
(iv) माउस
यह एक प्वाइंटर युक्ति है और इसका इस्तेमाल डेस्क टॉप प्रकाशन के प्रयोजन से होता है ।

प्रणाली सॉफ्टवेयर

ऊपर बताया गया कोई भी हार्डवेयर तब तक कोई काम नहीं कर सकता जब तक उनके लिए प्रणाली सॉफ्टेयर नहीं तैयार किया जाए । डॉस, विंडोज़ '95 आदि जैसे लोकप्रिय सॉफ्टवेयर इस श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं । ये सॉफ्टवेयर कम्प्यूटर भाषाओं में प्रोग्राम लिखकर तैयार किए जाते हैं । इन्हें मूलतः अंग्रेजी में तैयार किया जाता है और अंग्रेजी तथा हिन्दी/भारतीय भाषाओं में काम करने वाले कम्प्यूटरों में भी इनका इस्तेमाल किया जाता है । इसी कारण जब हम हिन्दी अथवा किसी भारतीय भाषा में इनपुट/आउटपुट के लिए कम्प्यूटर का प्रयोग करते हैं तब कमाण्ड अंग्रेजी में ही दिए जाते हैं और कम्प्यूटर से प्राप्त होने वाले संदेश (error messages) भी अंग्रेज़ी में होते हैं।

अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर

प्रणाली सॉफ्टवेयर तो कम्प्यूटर हार्डवेयर को काम करने योग्य बना देते हैं लेकिन इन सॉफ्टवेयरों से किसी दस्तावेज का निर्माण होना संभव नहीं है । दस्तावेज तैयार करने के लिए विशिष्ट अनुप्रयोग के सॉफ्टवेयर पैकेज तैयार किए जाते हैं । वर्डस्टार, डीबेस, लोटस 1-2-3, पेज मेकर आदि जैसे विभिन्न प्रकार के पैकेज इस श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं । संक्षेप में, नीचे दिए गए चित्र से एक समूची कम्प्यूटर प्रणाली की अवधारणा स्पष्ट हो जाएगी ।

कम्प्यूटर

हार्डवेयर सॉफ्टवेयर

सीपीयू मॉनीटर कुंजीपटल माउस प्रिंटर कार्ड प्रणाली सॉफ्टवेयर अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर
डॉस, विंडोज़, यूनिक्स शब्द संसाधन,डेटा संसाधन, स्प्रेड शीट, डेस्क टॉप प्रकाशन, लेखांकन, आदि
द्विभाषी कम्प्यूटर

जैसाकि ऊपर बताया गया है, कम्प्यूटर भाषा की दृष्टि से स्वतंत्र है । अतः किसी भी कम्प्यूटर प्रणाली को अंग्रेजी कम्प्यूटर या हिन्दी कम्प्यूटर आदि के रूप में संबोधित किया जाना उचित नहीं होगा । कम्प्यूटर प्ार काम करने के प्रयोजन से प्रोग्रामन भाषाओं का प्रयोग करते हुए अनुप्रयोग सॉफ्टवेयरों का विकास किया जाता है और प्रयोगकर्ता उन सॉफ्टवेयरों में उपलब्ध कराई गई सुविधा के अनुसार कम्प्यूटर के माध्यम से अपना वांछित दस्तावेज तैयार कर सकता है । वर्डस्टार, लोटस 1-2-3 आदि जैसे सॉफ्टवेयर अंग्रेजी भाषा में संसाधन के लिए बने हैं जिनके माध्यम से कम्प्यूटर पर अंग्रेजी भाषा में इनपुट/आउटपुट करना संभव है । हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भी सरकारी तथा निजी क्षेत्र के विभिन्न संगठनों द्वारा इनपुट/आउटपुट (अनुप्रयोग) सॉफ्टवेयर तैयार कर लिए गए हैं ।

कोड तथा मानकीकरण

किसी भी भाषा में संसाधन के प्रयोजन से कम्प्यूटर के लिए कोड निर्धारित किए जाते हैं और कम्प्यूटर उन्हीं कोडों के अनुसार संसाधन करता है । भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटर के प्रयोग के लिए सुविधाओं का विकास करने के उद्देश्य से इलेक्ट्रॉनिकी विभाग ने अनुसंधान तथा विकास के कार्यक्रम चलाए और निजी क्षेत्रों को भी प्रोत्साहित किया । इसके फलस्वरूप, विभिन्न संगठनों द्वारा विभिन्न सॉफ्टवेयर पैकेजों का विकास किया गया । अनबंध क्ष् में दी गई सूची से यह देखा जा सकता है कि अधिकांश सॉफ्टवेयर शब्द संसाधन तथा डेस्क टॉप प्रकाशन से संबंधित हैं । इनके लिए विनिर्माता द्वारा तैयार किए गए साहित्य से पाया गया कि जबकि इनकी अलग-अलग विशेषताएँ हैं, जैसा एक ही प्रयोजन के विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं के मामले में पाया जाता है, इनके कुंजीपटल के ढाँचे का डिजाइन भी एक-दूसरे से भिन्न हैं । इसका मुख्य कारण यह है कि प्रत्येक कम्पनी या विनिर्माता ने अपने उत्पाद के लिए स्वयं कोड निर्धारित किए । इसके परिणामस्वरूप, वास्तविक प्रयोगकर्ता के लिए कम्प्यूटर पर हिन्दी या किसी भारतीय भाषा में काम करना कठिन हो गया और देवनागरी टाइपराइटर पर काम करने वाला व्यक्ति कम्प्यूटर में काम करने में असुविधा महसूस करने लगा । इन व्यावहारिक असुविधाओं को ध्यान में रखते हुए इलेक्ट्रॉनिकी विभाग ने इस क्षेत्र में निम्नलिखित मूलभूत परियोजनाएँ शुरू कीं :

1. देवनागरी/भारतीय लिपियाँ दर्शाने के लिए कम्प्यूटरों के आन्तरिक कोड का विकास
2. देवनागरी/भारतीय लिपियों के लिए मानक कुंजी पटल के ढाँचे का डिजाइन

उपर्युक्त परियोजनाओं के फलस्वरूप 'इस्की' कोडिंग योजना का विकास हुआ, जो 'आस्की' कोड का सुपर सेट है और यह 8 बिट पर कार्य करता है । इसके साथ ही ध्वनि पर आधारित एक कुंजीपटल के ढाँचे (INSCRIPT) का भी डिजाइन किया गया, जिसका इस्तेमाल सभी भारतीय भाषाओं के लिए किया जा सकता है । भारतीय मानक ब्यूरो के सहयोग से नवम्बर, 1991 में इन्हें भारतीय मानक संख्या क्ष्च् 13194 : 1991के अन्तर्गत 'सूचना के आदान प्रदान के लिए भारतीय लिपि कोड' के रूप में प्रकाशित किया गया ।
इन दो विकास कार्यों से कम्प्यूटरों पर भारतीय भाषाओं में संसाधन की क्षमता उपलब्ध कराने के लिए विकास संबंधी कार्यकलापों का आधार प्राप्त हुआ । इन परियोजनाओं का मूल उद्देश्य यह था कि उत्पाद में किसी प्रकार का परिवर्तन किए बिना ही भारतीय लिपि संसाधन के लिए मानक कम्पाइलरों तथा विद्यमान कम्प्यूटरों में उपलब्ध अन्य उत्पादों का इस्तेमाल किया जा सके । 8 बिट 'इस्की' कोड से कई सॉफ्टवेयर उत्पादों में देवनागरी में इनपुट/आउटपुट इन्टरफेस करना संभव हो गया है । हालाँकि कुछ सॉफ्टवेयर विनिर्माताओं ने अपने उत्पादों में इन मानकों को शामिल कर लिया है और कुछ विनिर्माताओं ने ध्वन्यात्मक तथा टाइपराइटर दोनों ही ढाँचों का विकल्प दिया है, लेकिन कुछ विनिर्माताओं नें अभी तक इन्हें नहीं अपनाया है । जब तक सभी सॉफ्टवेयरों का आन्तरिक कोड एक समान नहीं होगा, तब तक एक सॉफ्टवेयर से दूसरे सॉफ्टवेयर में डेटा अन्तरण संभव नहीं होगा और इस कारण सबसे अधिक असुविधा प्रयोगकर्ताओं को होगी तथा दोहरा काम करना पड़ेगा । अंग्रेजी सॉफ्टवेयरों में जब ऐसी कोई भिन्नता नहीं है तब भारतीय भाषाओं के सॉफ्टवेयरों में ऐसा होना अपेक्षित नहीं है ।

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Website Last Updated on : 26 July 2017