बुन्देल खण्ड की लोक संस्कृति का इतिहास

नर्मदा प्रसाद गुप्त

आचरण

लोकाचार


आचार किसी भी संस्कृति के यथार्थ चित्र होते हैं । यदि किसी जनपद की संस्कृति का सही इतिहास खोजना है, तो वह उसके जन के आचार में मिलेगा । जिस युग में जो आचार आचरित होते हैं, वे उस यग की संस्कृति रचते हैं । परिस्थितियों के अनुरुप और समाज के लिए उपयोगी होने पर कुछ आचार आदर्श हो जाते हैं और लोकमूल्य बनकर शास्रों में टँक जाते हैं । शास्रों या पुस्तकों में लिखे आचार दौड़ते घोड़ों के उस चित्र की तरह हैं, जिससे दौड़ने का आभास होता है जबकि वे निष्प्राण हैं । वस्तुत: आचार वही है, जो लोक में प्रचलित है । उसी को लोकाचार कहते हैं । लोक में प्रचलित न होने पर वह आचार मर-सा जाता है, भले ही उसने शास्रों में अपनी जगह बना ली हो और शास्रोक्त बनने की पदवी पा ली हो ।

       किसी भी आचार का जन्म एक विशिष्ट अवधि में एक विशिष्ट परिस्थिति की कोख से होता है, लेकिन लोकोपयोगी होने पर ही लोकगृहीत होकर लोकाचार बनता है । मुश्किल यह है कि एक लोकाचार यदि एक वर्ग, समाज और राष्ट्र के हित का है, तो दूसरे के लिए अहितकर भी हो सकता है । महाभारत के शांतिपर्व (२५९/१७-१८) में कहा गया है कि " ऐसा कोई भी आचार नहीं है, जो सर्वदा सब लोगों के लिए समान हितकर हो । यदि एक आचार को स्वीकार किया जाय, तो दूसरा उससे श्रेष्ठ न आता है और वह किसी तीसरे आचार का विरोध करता है" -

              न हि सर्वहित: कश्चिदाचार: सम्प्रवर्त्तते ।

              तेनैवान्य: प्रभवति सोऽपरं बाधते पुन: ।।

       लोकाचार लोकजीवन के वर्तमान हैं, किंतु उनके इतिहास में अतीत की झाँकी मिलती है और उपयोगिता में भविष्य का संकेत । असल में, लोकाचार लोकसंस्कारों, लोकरीतियों, लोकप्रथाओं और लोकवर्जनाओं के समुच्चय हैं, इसीलिए वे दीर्घजीवी होते हैं । उनका लोप इतनी तेजी से नहीं होता, जितनी तेजी से वेश-भूषा और भोजन-पेय का । बहुत से लोकाचार आज भी रुढ़ीयों के रुप में कई जगह कुण्डली मारे बैठे हैं और कई जगह उनमें परिवर्तन भी आया है, लेकिन इस परिवर्तन को शताब्दियाँ लग गयीं । यहाँ हम लोकाचार के इतिहास की खोज का प्रयत्न कर रहे हैं । वैसे तो यह कार्य बहुत कठिन है, पर यह निश्चित है कि युग के बदलने पर लोकाचार भी बदलता है । किस रुप में और किस सीमा तक, इसकी नाप-जोख का अनुमान उनके इतिहास से ही लग सकता है ।

       विष्णुधर्मोत्तर पुराण सें लिखा है कि सभी लक्षणों से युक्त होने पर भी पुरुष यदि आचाररहित है, तो उसे न तो विद्या की प्राप्ति होती है और न किसी अभीष्ट की (३/२५०/४) । आचारवान् को स्वर्ग, कीर्ति, आयु सम्मान और सभी लौकिक सुख प्राप्त होते हैं (३/२७१/१) । इस प्रकार सदाचार का ग्रहण और कदाचार का त्याग ही व्यक्ति और लोक, दोनों के लिए हितकर है । लोक किसी भी आचार का मूल्यांकन युग की आवश्यकताओं के आधार पर करता है और इस दूष्टि से लोकाचार की ऐतिहासिकता महत्त्वपूर्ण हो जाती है ।

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प्रागैति हासिक युग

इस युग के लोकाचार का अनुमान उन गुहाचित्रों से लग जाता है जो छतरपुर, पन्ना, सागर, नरसिंहपुर, रायसेन, होशंगाबाद आदि जिलों में अधिकतर बेतवा, धसान, केन और नर्मदा तथा उनकी सहायक नदियों के किनारे मिलते हैं । पाषाणकालीन चित्रों में आखेट को केन्द्र में रखकर संस्कार और रीतियों का उदय हुआ था । सामूहिक रुप से शिकार को मारने और आग जलाकर उसे भूनने तथा आनन्दित होकर एक घेरे में नृत्य करने में जिन रीतियों का सहज ही प्रचलन हुआ था, वे ही इस आखेटक संस्कृति की मूलाधार बनी थीं और उन्हीं से संस्कारों, प्रथाओं आदि का जन्म हुआ था । उदाहरण के लिए, एक समूह भुने पशुओं और पक्षियों का माँस खा रहा है और उसी समय दूसरे समूह का भूखा व्यक्ति आकर निराश-सा खड़ा हो जाता है । पहले समूह के पास भोजन इतना अधिक है कि वह पाँच-छ: व्यक्तियों को खिला सकता है । इस कारण उसका मुखिया आगत भुखे व्यक्ति को भोजन देना स्वीकार कर लेगा, भले ही उस समूह का कोई सदस्य विरोध प्रकट करने में अपनी पूरी शक्ति लगा दे । मुखिया दूरदर्शी था और उसका प्रस्ताव इस प्रत्याशा में तुरंत ही फूट पड़ा था कि उसको भी कभी-न-कभी ऐसी विकट और संभावित परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा और तब उसे भी इसी तरह कार व्यवहार मिलेगा । समूह का यह व्यवहार ही विकसित होकर रुढ़ बन गया है और आतिध्य-सत्कार की विशेष परम्परा में परिणत गो गया है । आखेट करने की अनेक विधियाँ एक समूह से दूसरे समूह में प्रचलित होकर आचरण में आयीं । इसी तरह अस्र-शस्र बनाने और उनका प्रयोग करने, वनोपज संग्रह करने, अग्नि जलाने और उसकी पूजा करने उसके चारों ओर घेरा बनाकर नृत्य करने और आनंद मानाने पशु-पंछियों के मांस का भोजन करने आदि में लोकाचार का प्रारंभिक इतिहास छिपा है । फिर प्राकृतिक विपदाओं का सामना करने और दूसरे समूहों से संघर्ष के लिए तैयार होने में भी कुछ रीतियाँ और वर्जनाएँ बनी

थीं । प्राकृतिक आपत्तियों से भयभीत मानव ने उनकी पूजा कर उन्हों प्रसन्न करने की युक्ति सोची थी । संघर्ष में समूह की एकता आवश्यक थी, इसलिए किसी व्यक्ति के सहयोग न देने पर दंड की प्रथा कायम हुई थी ।

       नवपाषाण-काल में जब मानव खेती करने लगा ओर पशुपालन कार दायित्व निभाने लगा, तब समूचा लोकाचार कृषि पर आधारित होने लगा । छोटी-छोटी बस्तियाँ, मिट्टी के बर्तन, मिट्टी के मकान और पशु-पूजा के प्रामाणिक साक्ष्य मिले हैं, जिनसे सिद्ध है कि संस्कारों की नींव इसी काल में पड़ी थी । धातु-युग में ताँबे, पीतल और स्वर्ण का प्रयोग होने लगा था, किंतु लोहा अज्ञात था । धातु के हथियार और आभूषण बनने लगे थे । मनोरंजन के कई साधन अपनाये जाते थे जिनमें प्रमुख थे, पकी मिट्टी के खिलौने, नृत्य, शिकार करना, चौपड़ आदि । श्रृंगार-प्रसाधनों का ज्ञान था । इन सबसे अनुमान लगता है कि इसी समय सभी संस्कार विकसित होने लगे थे । लोकरीतियों, लोकप्रथाओं और वर्जनाओं का 'कोड' तैयार हौ गया था ।

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आदि वासी आचार

बुंदलखंड के लोकाचार के इतिहास-लेखन में आदिवासी आचार का सिर्फ ऐतिहासिक महत्त्व नहीं है, वरन् उनकी उपयोगिता नींव के उन पत्थरों जैसी है, जिन पर बहुमंजिला प्रासाद खड़ा होता है । पुलिंद, निषाद, शबर और गोंड़ यहाँ के प्रमुख आदिवासी थे । उनके लोकाचार भले ही वैदिक प्रभाव से संस्कारित या परिवर्तित हुए, पर उनमें आदिम आचारों के संकेत मिलते हैं । इनमें कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं । हर आदिवासी संतान-प्राप्ति पर अत्यधिक प्रसन्न होता है, भले ही वह पुत्र हो या पुत्री । प्रसव-पीड़ा असहनीय होने पर टोटके किये जाते थे । शिशु का जन्म होते ही ढोल या थाली बजाकर सूचना देने का रिवाज है । प्रसव के बाद प्रसूता के सिरहाने चाकू, हँसिया, कटार आदि लोहा रखना और सौरगृह में दिन-रात आग जलना अनिवार्य समझा जाता था । संतति न होने पर सौंरों (शबरों) में गोद लेने की प्रथा का प्रचलन था । शिशु का नामकरण तिथि, वार, महीनों आदि के नाम पर होता था जैसे सोमा, मंगली या मंगला, बुधिया आदि । बड़े होने पर बच्चे के दागने की प्रथा थी, ताकि उसे या उसके कुटुम-कबीला की पहचान हो सके ।

       विवाह-प्रथा के प्रचलन के पूर्व नर-नारी का स्वैराचार ही प्रथा के रुप में वर्तमान था । सुखमय भट्टाचार्य ने 'महाभारतेर समाज' में लिखा है कि महाभारत काल में भी उत्तर कुरु में यह प्रथा काफी समय तक प्रचलित रही थी । इस क्षेत्र के सौंरों (शबरों) में स्रियों को काफी स्वतंत्रता मिली है । वे पति की उपस्थिति में दूसरों से हँसी-मजाक कर लेती हैं । यहाँ तक की विनोद करने वाला उसे पसंद आ जाय, तो वह पति से छिपकर उसके साथ चली जाती है और पति सिवाय हर्जाना पाने के कुछ नहीं कर सकता । सौंर समाज लड़की के 'हरण' करने और फिर उससे विवाह करने की अनुमति देता है । 'कारी' विवाह के अंतर्गत हर तरह का साधन प्रयुक्त किया जा सकता है । इससे स्पष्ट है कि आदिम स्थिति में स्री का स्वैरिणी होना समाज को मान्य था ।

       जनपदीय लोकाचार पर गोंड़ों का प्रभाव अधिक रहा है । उनमें बालविवाह प्रथा थी, जो इस अंचल में दिर्घकाल तक जीवित रही । रजस्वला होने से पूर्व लड़की के हाथ पीले करना उचित माना जाता था । विवाहपूर्व लड़का-लड़की मिलते-जुलते थे, पर विवाह माता-पिता की अनुमति से होता था । गोंड़ परिवार पितृसत्तात्मक था, अतएव परिवार का मुखिया पिता होता था । विवाह की बात लड़केवाले ही शुरु करते थे । लड़के या लड़की के चयन में परिश्रम, शक्ति और कार्यक्षमता की कसौटी रहती थी । गोंड़ों, सौंर और भीलों में खर्ची या वधूमूल्य की प्रथा प्रचलित थी, जिसमें अनाज, मिर्च-मसाला, मुर्गा-बकरा, गाय-बैल या भैंस और निर्धारित रुपये दिये जाते थे । दारु और जातिभोज का रिवाज आम था । भूमि-पूजन और 'भुइ-भाड़ा' के रुप में पैसे चढ़ाना सभी में प्रचलित था । कुलदेवी या कुलदेवता की पूजा सर्वोपरि थी । आज मैहर या मैर भरना एक अनिवार्य र है, वह कुलदेव की पूजा की दृष्टि से ही विकसित हुई है । इसी तरह हल्दी चढ़ाना, तेल चढ़ाना, स्नान, कंगन बाँधना और छोड़ना, कुँवर-कलेवा, परछन, मौंचायना, दोरछिंकाई, दूधाभाती, सेई नापबौ आदि रस्में आदिम और गृह्यसूत्र के विधि-विधान, दोनों के सामंजस्य से विकसित हुई थीं ।

       गोंड़ों में भगेली, बलात्, रखैली और विधवा-विवाह भी प्रचलित थे, जिससे उनके संस्कारों में पर्याप्त स्वतंत्रता के दर्शन होते हैं । भीलों की झेल्याचोली में वहपक्ष वालों की ओर से वधू के लिए लुगड़ा, चोली, नारियल, गुड़, रुपये आदि होते थे, जो आजकल के 'चढ़ाये' के पूर्वरुप हैं । उनका 'बेड़ा भरना' आजकल के 'बेइया के कलश-पूजन' में अवशिष्ट रह गया है । गोंड़ों और सौंरों में एक विशेष अंतर यह है कि गोंड़ों में ददिहाल और ननिहाल परिवारों में विवाह करना नैतिक माना जाता है, जिसे वे दूध लौटाना कहते हैं, जबकि सौंरों में चचेरे, मौसेरे और ममेरे भाई-बहिनों के बीच तथा माता-पिता और नानी-फुआ के गोत्रों में विवाह वर्जित है ।   इस दृष्टि से सौंरों की वर्जना ही दाय के रुप में उपलब्ध हुई है । मृतकों को गाड़ने का रिवाज सौंरों और गौंड़ों, दोनों में रहा है, बाद में अग्निदाह का प्रचलन हुआ था । भूत-प्रेत-बाधा से बचने के लिए कुछ रस्में टोटकों के रुप में आदिम देन ही हैं । इसी तरह मृतक-भोज की प्रथा भी आदिम अवशेष रही है ।

       आदिवासी संस्कृति वनकेन्द्रित रही है, अतएव उनकी मान्यताओं और वर्जनाओं में वन्यता कार बहुत प्रभाव है । गोंड़ों की बनजारिन माई वन की देवी है, जो कष्टहारिणी और फलदायिनी है । सरई के वृक्ष में बड़े देव का वास है । वृक्षों में देवों का वास है, इसलिए उन्हें काटना वर्जित है । वन में रहने वाले पशु-पक्षी भी उनकी वर्जनाओं के आधार रहे हैं । सुअर का मैथुन, कुर्री का सामने बोलना, सियार का फेंकारना, कुत्ते का रोना आदि उनके लिए अशुभ हैं । गर्भवती महिला के वृक्ष की जड़ दिखाने से प्रसव जल्दी हो जाता है । बकबंधी में छेवले (पलाश) की जड़ के रेशे बाँधने से रक्षा होती है । आशय यह है कि आदिम आचार वन्यता के ऐसे अनुभवों से जुड़े थे कि उनका उपयोग परम्परा बन गया है । बकौंड़याई पूनो यानी आषाढ़ मास की पूर्णिमा में बकौंड़ा (पलाश की जड़ का रेशा) बाँधना अभी दो-तीन दशक पहले प्रचलित था । पुण्य और पाप की धारणा भी आदिवासी आचार का अंग रही है । गाय का मारना पापों की कोटि में सम्मिलित था, जो आज तक हमारे जीवन से जुड़ा हुआ है ।

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वैदिक और आदिम आचारों का सम्मिलन

रामायण-काल में वैदिक आचार ॠषियों-मुनियों के साथ आये थे । इस अंचल की निषाद और शबर जातियों ने उनका स्वागत किया   था । रामायण के निषाद और शबरी प्रसंग इसके प्रामाणिक साक्ष्य हैं । राम के प्रति निश्छल प्रेम और अतिथि-सत्कार से उनके आचरण की बानगी मिलती है । आदिवासियों के धार्मिक आचारों में धरती, जल, वृक्ष, नाग और पशु-पूजा तथा महामाई एवं पशुपति की भक्ति प्रमुख थी । वे कृषि, शिकार और देवों से संबंधित उत्सवों को मनाते थे । नयी ॠतुओं के स्वागत में समारोह करते थे । उनके उत्सव धर्म से बँधे न थे, इसलिए उनके उल्लास में स्वच्छंदता औ लोकत्व की भावना अधिक थी । इसी कारण से वैदिक-काल के आर्यों ने उन्हें 'अन्यव्रता:' कहा थाल । वैदिक प्रभाव से उनके व्रत और उत्सव धार्मिक रीतियों, तंत्रों-मंत्रों, विधियों-निषेधों और पुरोहिती कर्मकांडों से जकड़ लिये जाते हैं । अग्नि के साथ यज्ञों का सिलसिला धीरे-धीरे चल पड़ता है । इस तरह लौकिक और सामाजिक भावना के श्थान पर धार्मिक भावना छाने लगती है ।

       'वाल्मीकि रामायण' में दुर्गा का नाम नहीं मिलता, जिससे स्पष्ट है कि दुर्गा आदिवासियों की देवी थी। शबरों के द्वारा चंडिका देवी की पूजा का उल्लेख 'हर्षचरित' और 'कादम्बरी' दोनों ग्रंथों में है । देवी का रामकथा में प्रवेश और रावण-वध में सहायता बाद में जुड़ा । नाग-पूजन आदिवासियों की देन है, वैदिक ग्रंथों में उसका उल्लेख नहीं है । सूत्रकाल में वह वैदिक धर्म में शामिल   हो गया । रामायण में नाग जाति, नागमाता सुरसा और नागस्रियों के सौंदर्य एवं उनके अपहरण की चर्चा है । ताटका एक सुंदर और बलिष्ठा यक्षिणी थी, जो अंतर्जातीय विवाह-प्रथा के अनुसार राक्षसी बनी थी । राक्षस और वानर जातियाँ धन-वैभव में काफी आगे थीं । अंतर्जातीय विवाह-प्रथा के अनुसार ही राक्षसी सूपंणखा ने राम-लक्ष्मण से विवाह का प्रस्ताव किया था । आर्यों में भी समान कुल और शील के सिवा विवाह-संबंध पर कोई निश्चित अंकुश नहीं था । विवाह का उद्देश्य संतानोत्पत्ति   था, जोकि आदिवासियों और वैदिक आर्यों, दोनों   को मान्य था । वर से शुल्क या धन लेकर कन्या ब्याहने का रिवाज जहाँ आदिवासियों में था, वहाँ वह आर्यों में भी प्रचलित हो गया था और वह 'आसुर विवाह' नाम से वर्गीकृत हुआ । गांधर्व विवाह भी आर्येतर जातियों में अधिक था, परंतु आर्यों ने उसे अपना लिया था । दुष्यंत और शकुंतला ने गांधर्व विवाह किया था ।

       रामायण में वर्णित विवाह-पद्धति वैदिक विधि और यज्ञ पर आधारित थी, जबकि आदिवासियों में स्वच्छंद समझौता से ही विवाह होता था । उनके लिए वह धर्म-बंधन नहीं था, जिसे आर्यों का समर्थन प्राप्त ता । बहुपत्नी-प्रथा का दोनों में प्रचलन था, जिससे परिवार में ईर्ष्या, द्वेष और कलह कार वातावरण रहता था । यही कारण है कि एक पत्नीव्रत की प्रथा का उदाहरण राम ने रखा और वह इस अंचल में भी अनुसरित हुआ । अनार्यों में बहुपतिप्रथा के प्रचलन का संकेत मिलता है, जिसे महाभारत-काल में पांडवों का भी आश्रय प्राप्त हुआ । वैदिक समाज में पत्नी को अनुशासन और आत्मानियंत्रण में रहना अपेक्षित था जबकि आदिवासी नारी अधिक स्वच्छंद थी, क्योंकि वह अधिक श्रमशीला और आत्मनिर्भर थी । दहेज प्रथा नहीं थी, पर वधू-मूल्य के रुप में वर पक्ष को ही पंचों द्वारा निर्धारित सामग्री और धनराशि देनी पड़ती थी । वैदिक संस्कृति में कन्यापक्ष कन्या के लिए जो संपत्ति देता था, वह कन्याधन के रुप में वधू के अधिकार में रहती थी । गर्भवती और सद्यप्रसूता आर्यमाता को शुद्ध आचार-विचार रखने पड़ते थे, क्योंकि आर्यों का विश्वास था कि आचार में अशुद्धि या भूल होने पर अशुभ तत्त्व विशेष रुप में भूत-प्रेत अनेक प्रकार की बाधाएँ पैदा करते हैं । उन बाधाओं के उपचार हेतु विशेष टोने-टोटके और जंत्र-मंत्र किये जाते थे, जो आदिवासियों से आये थे । आदिवासियों में विधवा का पुनर्विवाह प्रचलित था और यह प्रथा उन्हीं से आर्यों में आयी ।

       इन उदाहरणों से सिद्ध है कि जहाँ वैदिक आचारों ने आदिम आचारों पर अपना प्रभाव डाला, वहाँ आदिम आचारों ने भी वैदिक आचारों पर अपनी छाप छोड़ी थी । रामायण-काल में दोनों प्रकार के आचारों का सम्मिलन एक नया आचार-कोड प्रशस्त करने में सार्थक सिद्ध हुआ है ।

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महा भारत-काल

इस युग में लोकाचार के धर्मसम्मत होने से काफी परिवर्तन आ गया था । महाभारत में चेदि जनपद के निवासियों के लिए अंकित कुछ रेखाओं से ही पूरा चित्र उभर आता है । आदि पर्व के तिरसठवें अध्याय में लिखा है-"चेदि के जनपद धर्मशील, संतोषी ओर साधु हैं । यहाँ हास-परिहास में भी कोई झूठ नहीं बोलता, फिर अन्य अवसरों पर तो बोल ही कैसे सकता है । पुत्र सदा गुरुजनों के हित में लगे रहते हैं, पिता अपने जीते-जी उनका बँटवारा नहीं करते । यहाँ के लोग बैलों को भार ढोने में लगाते और दीनों एवं अनाथों का पोषण करते हैं । सब वर्णों के लोग सदा अपने-अपने धर्म में स्थित रहते हैं" (छंद संख्या १०-१२) । स्पष्ट है कि चेदि जनपद के लोग सदाचार को महत्त्व देते थे । महाभारत में ही एक दूसरा उदाहरण चेदिनरेश शिशुपाल का है, जिसने पांडवों के राजसूय यज्ञ में आमंत्रित राजाओं के सामने वासुदेव कृष्ण की अग्रपूजा के विरोध में कटु वचन कहे थे । शिशुपाल के इस प्रसंग के दौरान कदाचार की बानगी में राजा कंस का दास, उनकी गौओं का चरवाहा, कहना कुछ ओर करना कुछ असली रुप को छिपाना, दूसरे की पत्नी या कन्या का अपहरण, यज्ञ में विघ्न डालना, अश्व चुराना आदि को प्रमुखता दी गयी है । इन उदाहरणों से तत्कालीन लोकाचार की झलक मिलती है । आटविक क्षोत्रों के लोकाचार में अधिक स्वच्छंदता थी । वहाँ पुत्र और कन्या के प्रति माता-पिता का एक-सा भाव ही नहीं था, वरन् नारी उतनी परतंत्र नहीं थी, जितनी कि नागर क्षेत्रों में थी । नागर क्षेत्र में वह पिता और पति के अधीन थी । पातिव्रत्य धर्म उसके सदाचरण की कुंजी था । नरवर के राजा नल से संबंधित उपाख्यान में दमयंती का पातिव्रत्य एक लोकमूल्य की तरह प्रतिष्ठित हुआ है । दमयंती की माँ दशार्ण जनपद के राजा सुदामा की पुत्री थी और उसका जन्म अपने नाना के यहाँ हुअ था । अतएव उस पर बुंदेलखंड के संस्कारों की छाप पड़ी थी । उसने सदाचार को ही शक्ति मानकर कहा था-"यदि मैं मन, वाणी एवं क्रिया द्वारा कभी सदाचार से च्युत नहीं हुई हूँ, तो उस सत्य के प्रभाव से देवता लोग मुझे राजा नल की ही प्राप्ति करावें (वनपर्व ५७/१८) ।" नल ने भी स्वीकार किया कि श्रेष्ठ नारियाँ सदाचार रुपी कवच से आवृत प्राणों को धारण करती हैं (वनपर्व ७०/९) ।

       नलोपाख्यान के अनुसार द्यूत में विजयी होने पर जहाँ राजा नल के भाई का आचरण परिवार और समाज की मर्यादा तोड़ देता है, वहाँ राजा नल का भ्रातृप्रेम उसकी रक्षा करता है । भाई पुष्कर का अपनी भाभी दमयंती के प्रति व्यवहार यह सिद्ध करता है कि उस समय देवर भी पति की जगह लेने में सक्षम था । दमयंती के स्वयंवर से पता चलता है कि कन्या अपना वर चुनने में स्वतंत्र थी । पण प्रथा का भी प्रचलन था । लेकिन इसके बावजूद नारी अंत:पुरवासिनी होने लगी थी । अटवी के स्वतंत्र लोकाचार भी वैदिक लोकाचार से प्रभावित हो रहे थे ।

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मौय -शुंग काल

महाभारत-काल के बाद के लोकाचार पर महात्मा बुद्ध के 'शील' का प्रभाव किसी-न-किसी रुप में रहा है । बौद्ध त्रिशरण में शील का स्थान पहला है, क्योंकि उससे मन, वचन और कर्म की शुद्धि होती है । शील मनुष्य को सदाचारी एवं गुणवान् बनाता है और समाज में शांति की प्रतिष्ठा करता है (विनयपिटक, राहुल सांकृत्यायन, प्रथम संस्करण, पृ. २३९) । शीलरहित व्यक्ति अशांत रहता है और उसे सद्गति नहीं प्राप्त होती । भगवान् बुद्ध ने 'धम्मपद' में कहा है कि 'दु:शील और असंयमी होकर राष्ट्र का अन्न खाने से अच्छा है कि आग में तप्त लोहे का गोला खा जाय ।' उनके अनुसार सदाचार ही प्रथम धर्म है और उसका रास्ता आत्मनिरोध, संयम और नियंत्रण से होकर भवबंधन की मुक्ति तक जाता है । शील के द्वारा व्यक्ति और समाज के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाने का काम बौद्ध और जैन-धर्मों ने किया था ।

       एक महत्त्वपूर्ण और क्रांतिकारी न्याय की प्रतिष्ठा, सदाचार और दुराचार का भेद स्पष्ट करने में लक्षित होती है । बुद्ध ने घोषणा की थी कि सदाचारी परिश्रमी होता है और दुराचारी आलसी । उन्होंने लोकाचार को कर्म की महिमा से जोड़ने का महत्कार्य किया था । इसीलिए लोक में साहस और वीरता सदाचार के रत्न माने जाते थे । जूआ,   परस्री-गमन, मदिरा, दिन में सोना, कुसंगति और नृत्य-गीत को बुरा समझा जाता था । कर्म के बाद दूसरा स्तंभ था-त्याग । पूँजी की महिमा बढ़ने और फलस्वरुप शोषण शुरु होने के कारण 'त्याग' के आचरण पर बहुत बल दिया गया था, जिसमें केवल धन का त्याग नहीं था, वरन् बुराइयों या दुर्गुणों एवं बुरे आचरणों का त्याग भी सम्मिलित था ।

       वर्जनाओं के उल्लेख भी यत्र-तत्र मिलते हैं । इस अंचल में बौद्ध-धर्म के फैलाव से बौद्ध वर्जनाएँ भी प्रचलित हो गयी थीं । नशीली वस्तुओं का सेवन, जुआ खेलना, असमय में इधर-उधर घूमना, कुसंगति करना, आलस्य और नाच-तमाशा में रुचि रखना विनाश के कारण हैं ।   प्राणी को मारना, चोरी, व्यभीचार, झूठ बोलना, पीठ पीछे निंदा करना आदि वर्जनाएँ समाज में प्रधान थीं । छोटी-छोटी वर्जनाएँ भी यत्र-तत्र मौजूद थीं, जैसे नीच जाति के सुदर्शन व्यक्ति का विश्वास नहीं करना चाहिए, कुलहीन और संस्कारहीन व्यक्ति को आश्रय नहीं देना चाहिए ।

       कुछ इतिहासकार इस जनपद के सागर संभाग और आस-पास के क्षेत्र पर अशोक के पूर्व पुलिंदों का आधिपत्य मानते हैं । पुलिंद एक वन्य जाति थी, जो अब अदृश्य हो गई है । बौद्ध वर्जनाओं के प्रसार का सीधा अर्थ यह है कि अशोक ने यहाँ सबसे पहले लोकाचार को अहिंसक दर्शन से संबद्ध किया था, जिससे यहाँ की रीतियों और प्रथाओं में भी एक बदलाव आया । उदाहरणस्वरुप, विवाह के अवसर पर मांसाहार के लिए सुअर पालकर पहले से तैयार करने की रीति थी,   जो धीरे-धीरे समाप्त होने लगी थी । इसी तरह बलि की प्रथा में भीं अंतर आना स्वाभाविक था । अतिथि-सत्कार में मांस और मदिरा का प्रयोग बंद हो गया था ।   शुंग-काल में भागवत धर्म और भागवती दृष्टि की प्रतिष्ठा से फिर एक परिवर्तन आया और वैदिक रीतियों एवं प्रथाओं को जड़ जमाने का मौका मिला ।

       महाभारत-काल से ही यक्षों की संस्कृति का प्रभाव फैलने लगा था । यक्षों की पूजा घर-घर में होने का अर्थ इसी प्रभाव-विस्तार का द्योतक है ।   यक्ष-संस्कृति में सदाचार की प्रधानता थी । युधिष्ठिर-यक्षसंवाद से स्पष्ट है कि ब्राह्मण जन्म से   ही श्रेष्ठ नहीं होता, वरन् सदाचार का आश्रय लेकर भी द्विजत्व की प्राप्ति होती है (महाभारत, वन. अ.१३) । आगे चलकर यक्षों ने हर तरफ अपनी शक्ति और गरिमा स्थापित कर ली थी । यक्ष महाशक्तिशाली देवता थे । वे नाराज होने पर बहुत परेशान करते थे । इसी कारण नगर में उत्सव और उल्लास से उनकी पूजा होती थी और चौराहे या राजपथ के किनारे उनके लिए भोज्य और पेय रख दिये जाते थे । आज भी भोज्य पदार्थ निकालकर राजपथ पर रखने की रुढि अनुसरित होती है । यक्षों की पूजा-पद्धति आज तक चली आ रही है । शुंग-काल में भागवत धर्म के पुनरोदय पर पुरोहित का पद फिर से महत्त्वपूर्ण हो गया था और उसकी परम्परा फिर सुदृढ़ हो गयी थी । इस प्रकार भौतिक समृद्धि से पोषित रीतियों   और प्रथाओं के समानान्तर आध्यात्मिक जीवन से संपुष्ट जीवन-पद्धति का विकास इस युग की विशेषता थी । एक तरफ जहाँ बहुपत्नी प्रथा विद्यमान थी, वहाँ नियोग प्रथा भी और दूसरी तरफ जहाँ स्रियों को प्रव्रज्या का अधिकार न था, वहाँ भिक्षुणियाँ भिक्षुओं के संपर्क से वंचित थीं ।

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नाग -वाकाटक-काल

लोकाचार की दृष्टि से पहली शती ई. पू. से ईसा की पाँचवीं शती तक का यह युग इसलिए विशेष महत्त्व का है किर इन छ: सौ वर्षों में आदिवासी और वैदिक लोकाचार एक होकर भारतीय लोकाचार की नींव रख सके और उसी नींव पर लोकाचार का भारतीय प्रासाद निर्मित हुआ । जैनों और बौद्धों का अहिंसक और शाकाहारी लोकाचार भी इसी प्रासाद का अंग बन गया । इस प्रकार इस युग में इस अंचल ने लोकाचार को वह नया रुप दिया, जो भविष्य का आधार बना और जिसे गुप्त-युग में और भी निखार मिला । दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना है-म्लेच्छों का आक्रमण । यह आक्रमण शक और हूणों की सेना का न होकर उनके म्लेच्छ आचारों का था । म्लेच्छ हो जाने के संकट का वर्णन महाभारत के वनपर्व (अध्याय १८८) और गर्गसंहिता में किया गया है, जिससे ज्ञात होता है कि उस समय हिन्दू लोकाचार भ्रष्ट होने लगे थे । लोकसंस्कारों और वर्णाक्षमी प्रथाओं पर खतरे की तलवार लटकने लगी थी । परंतु नागों और वाकाटकों द्वारा स्थापित लोकाचार की दृढ़ता से भयभीत होकर म्लेच्छों को पीछे हटना पड़ा और इस कारण लोकसंस्कृति के इतीहास में उनका प्रदेय सदैव स्मरणीय रहेगा ।

       नाग और वाकाटक शिव के परम भक्त थे, इसलिए राजनीति, साहित्य और कला के विविध क्षेत्रों में धर्म का प्रभाव अधिक था । लोकजीवन और लोकाचार भी धर्म से जुड़ गये थे । प्रसिद्ध इतिहासकार काशीप्रसाद जायसवाल ने 'अंधकारयुगीन भारत' में लिखा है-'हमें भारशिवों के सभी कार्यों के संचालक शिव ही दिखाई देते हैं और वाकाटकों के समय के भारत में भी सर्वत्र उन्हीं का राज्य दिखाई देता है ।'   इसी वजह से कुछ धार्मिक प्रथाएँ पुनर्जीवित हुईं और कुछ बिल्कुल नयी बनीं । अश्वमेघ यज्ञ और गंगा एवं नंदी की पूजा की प्रथा बहुत ही प्रभावी ढंग से फिर स्थापित हुई । गाय को माता मानकर पवित्र श्रद्धा देने की भावना इसी समय उदित हुई । कौटिल्य के ग्रंथ 'अर्थशास्र' में किले के बीचोबीच कुबेर के मंदिर को स्थापित करने की प्रथा का उल्लेख मिलता है । महाभारत के बनपर्व में मणिभद्र के स्मरण करने का स्पष्ट संकेत है । पद्मावती या पवाया में प्राप्त मणिभ्रद की चरण चौकी पर अंकित लेख के अनुसार यह सिद्ध है कि यक्षपूजा की पुरानी प्रथा नागों के राज्य-काल में मान्य थी । इतना ही नहीं, लौकिक रीति-रिवाज भी धर्म से जोड़ दिये गए थे । उदाहरण के लिए, कन्या का विवाह उसके रजस्वला होने से पूर्व न करने पर पिता को नरकगामी बताया गया है ।

       इस युग के लोकसंस्कारों के प्रामाणिक गवाह महाकवि कालिदास के ग्रंथ हैं, पर आलोच्य जनपद के लोकसंस्कारों के संबंध में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिल सकी । एरण के सती-स्तंभ के अभिलेख से पता चलता है कि हूणों से युद्ध करते हुए सेनापति गोपराज के बलिदान होने पर उसकी पतिव्रता पत्नी ने पूर्ण रुप से सहगमन कर उसकी चिता पर आरोहण किया था । सती प्रथा का यह प्रमाण बहुत प्राचीन है (प्लीट कृत कापंस इन्स्कि्रप्शनम् इंडिकेरम्, भाग तृतिय, पृ. ९२) । अधिक उल्लेखों के अभाव के बावजूद यह सत्य है कि इस समय ऐसे सशक्त समाज का निर्माण किया गया था, जो संकटकाल में विदेशी शत्रुओं से टक्कर तेला और यह सब आचरण पर निर्भर करता था ।  

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समन्वय और संरत्क्षण का युग

छठवीं शती के बाद बुंदेलखंड में पुष्यभूति राजवंश के हर्षवर्द्धन का शासन रहा और उसकी मृत्यु के बाद यह प्रदेश कन्नौज के प्रतिहारों, मालवा के परमारों और मान्यखेत के राष्ट्रकूटों का अखाड़ा बन गया । हर्ष अपने जीवन के पूर्वार्द्ध में संपन्न दिग्विजय तक ब्राह्मण धर्म के अनुयायी और शिव के भक्त रहे, बाद में बौद्ध-धर्म के अनुगत हो गए । प्रतिहारों, परमारों और राष्ट्रकूटों के युद्धपरक वातावरण में अशांति का राज्य रहा । सातवीं-आठवीं शती में कुमारिल भट्ट और शंकराचार्य ने अपनी दार्शनिक और धार्मिक क्रांति से इस क्षेत्र को भी प्रभावित किया । गुप्त-काल के बाद पुराणों की रचना से धर्म के प्रति निष्ठा और पौराणिक कथाओं से लोकाचार के व्यावहारिक स्वरुप के प्रति झुकाव इस युग की एक विशेष घटना थी । तात्पर्य यह है कि छठवीं से नौवीं शती तक के इस युग में विश्रृंखलन की स्थितियाँ अवश्य रहीं, पर लोकाचार में विशेष परिवर्तन नहीं हुआ ।

       इस समय के लोकाचार के माक्षी एक तरफ महाकवि बाण के ग्रंथ-हर्षचरित और कादम्बरी हैं, तो दूसरी तकफ भवभूति   के नाटक-मालती माधव और उत्तररामचरित । पुराणों का कथाओं में भी इस क्षेत्र के कई उल्लेख हैं । इन सभी के सहारे इस समय के लोकाचार की रेखाएँ उभरती हैं । हर्ष-काल में भी लोकाचार धर्म से संपोषित रहा । उदाहरणस्वरुप, चंडिका या दुर्गा की पूजा और बलि की प्रथा विंध्याटवी के शबरों में धर्म का अंग थी । कादम्बरी में उल्लिखित मातृभवन और उनमें देवी-मूर्तियों की स्थापना तथा उनकी पूजा, पीपल जैसी वनस्पतियों की पूजा, दही-भात की बलि कौओं को खिलाना, संतान की इच्छा से धार्मिक अनुष्ठान एवं उपवास करना, अभिमंत्रित ताबीजें या मंत्रकरंडक (गड़ा) पहनना, अवतरणकमंगल या उतारौ करना, सूतिकागृह में जातमातृदेवता या आर्यवृद्धा की मूर्ति स्थापित करना (बेइया धराना) आदि धार्मिक लोकाचारों के अंग थे ।

       लौकिक रीतियों में वर-पक्ष द्वारा विवाह करने का प्रस्ताव, वधू के पिता द्वारा सहमति के रुप में कन्यादान का जल गिराना, घर की चूने से पुताई और   मांगलिक आलेखनों से सज्जा, वधू के लिए भेंट का सामान देना, दहेज का सामान इक करना, विवाह की वेदी और मंडप बनना, सौभाग्यवती स्रियों द्वारा मांगलिक गीत गाये जाना, वर का निश्चित लगन पर सजधज कर आना, वर के साथ विवाह (बारात) का जुलूस, द्वार पर वर की अगवानी, वर का कौतुक गृह (विवाहोत्सव-स्थान) में प्रवेश करना, सजी-धजी वधू को देखना, कोहबर के लोकाचार, वर का वधू के साथ वेदिका के पास आना, हवन, भाँवरें, लाजांजलियाँ छोड़ना, सास-ससुर को प्रणाम करना और वास-गृह (शयनकक्ष) में जाना, दस दिन तक ससुराल में रहकर दहेज की सामग्री के साथ लौटना, 'हर्षचरित' में क्रमबद्ध रुप में वर्णित हैं । इसी ग्रंथ में अंत्योष्टि संस्कार का वर्णन है, जिसमें शव को अर्थी पर रखकर और कंधा देकर श्मशान-भूमि पर ले जाना, चिता पर रखकर अग्नि देना, चिता के स्थान पर चैत्य-चिन्ह स्थापित करना, मृतक के फूल तिर्थस्थानों में जलप्रवाह के लिए भेजना, मृतक को जल देना, प्रेत-पिंड खानेवालों (ब्राह्मणों) को भोजन कराना, कुछ दिन अशौच मनाना, ब्राह्मण-भोजन और मृतक की निजी वस्तुएँ शघ्यादान के साथ ब्राह्मणों को देना आदि रीतियाँ बतायी गयी हैं ।

       आटविक राज्यों की लोकसंस्कृति और लोकाचार का वर्णन भी हर्षचरित और कादंबरी में हुआ है । 'हर्षचरित' में शबर युवक के चित्रण में उसकी बाँह पर मोरपित्त से गोदना गुदा होने का उल्लेख गुदना-प्रथा का प्रमाण है । पंखों से शरीर का अंग सजाना, राजा के दर्शन भेंट देकर करना आदि लोकरीतियाँ वन्य जीवन तक में प्रचलित थीं । अग्नि-प्रवेश द्वारा आत्महत्या की प्रथा जीवित थी । भवभूति कृत 'मालती-माधव' नाटक में 'नरबलि' की प्रथा का स्पष्ट संकेत है, जो सातवीं-आठवीं शती का पद्मावती (पवाया) नगरी में अवशिष्ट थी । पद्मावती में प्राप्त मृणमूर्तियों से स्पष्ट है कि अलंकरण, मनोविनोद और क्रीड़ा के लिए मृण्मूर्तियाँ बनाने की प्रथा इस अंचल में बहुत पहले से प्रचलित थी । उनमें केश-प्रसाधन तत्कालीन सामाजिक प्रथा के अनुरुप होता था ।

       बाल-विबाह की प्रथा के प्रचलन का कारण बताते हुए प्रसिद्ध इतिहासकार चिंतामणि विनायक वैद्य ने लिखा है कि "बौद्ध-धर्म को दबाने या उससे बचने के लिए ही बालविवाह की प्रथा प्रचलित हुई ।"   बौद्ध-धर्म में भिक्षुणी के रुप में प्रवेश पाने के लिए अविवाहित होना जरुरी था, इसलिए लोग अपनी कन्याओं का विवाह बाल्यावस्था में ही कर देते थे । पति के निधन पर वैधव्य की और अति वृद्ध हो जाने पर तीर्थ में आत्महत्या करने की प्रथा भी हिन्दू समाज में प्रचलित थी (मध्ययुगीन भारत, भाग २, सं. १९८६, पृ. ३२५-२७)

       अगर गहराई से देखा जाय, ते यह स्पष्ट हो जाता है कि जैन और बौद्ध-धर्मों से कुछ लोकाचार भारतीय लोकाचार के कोश में जमा हो गाए थे । उदाहरण के लिए, व्रतों और उपवासों की अतिशयता उन्हीं से आई ।   तंत्र-मंत्र, बलि आदि में जहाँ आदिवासियों का प्रभाव रहा, वहाँ बौद्ध कापालिकों का अधिक रहा त। लौकिक रीतियों और प्रथाओं के विकास में पुराणों का हाथ रहा । इस प्रकार यह युग लोकाचार के समन्वय और संरक्षण का था । कुमारिल भ और शंकराचार्य के दर्शन ने उसे एक सशक्त आधार   देकर सुरक्षा प्रदान की थी ।

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चंदेल युग

नौवीं शती से चौदहवीं शती तक चंदेल राजाओं की छत्रछाया में यह जनपद समृद्धि और संस्कृति की ऊँचाई पर प्रतिष्ठित रहा, इसलिए इस अवधि में लोकाचारों की युगानुरुप गतिशीलता, दृढ़ता और परिवर्तनशीलता दिखाई पड़ती है । मुसलमानों के आक्रमणों और आक्रमणकारियों की संस्कृति के प्रभाव से लोकाचार में काफीं परिवर्तन हुए, जिनसे उसकी गतिशीलता का पता चलता है ।   साथ ही समाज में कछुआ की तरह सिकुड़ने और कठोर पीठ को ढाल बना लेने की प्रवृत्ति ने लोकाचार की रक्षा के लिए रुढिवादिता को जन्म दिया, जो संरक्षण की प्रतीक कही जा सकती है । इस तरह इस युग में संरक्षण और परिवर्तन दोनों दिशाएँ महत्त्वपूर्ण बनी रहीं ।

       पहली दिशा संरक्षण और सुरक्षा की है, जिसके लिए सबसे पहले पहल की-दर्शन और धर्म के आचार्यों ने । नये धार्मिक ग्रंथों ने धार्मिक लोकाचार का फैलाव किया और उनमें कट्टरता ला दी । संस्कार और कर्मकांड बहुत बढ़ गये । पौराणिक   देवताओं से संबंध रखनेवाले व्रतों-उपवासों और नैमित्तिक संस्कारों एवं क्रियाओं की संख्या इतनी अधिक हो गयी कि आदमी की दिनचर्या उन्हीं में लगकर धर्मोन्मुख बन गयी । अल्बेरुनी ने पंजाब और काश्मीर में प्रचलित उपवासों और उत्सव के दिनों की सूची दी है (मध्ययुगीन भारत, भाग ३, चि. वि. बैद्य, सं. १९८५., पृ. ६८२) । घर-गाँव और शहर में मूर्तिपूजा बढ़ गयी थी, मंदिरों का निर्माण होने लगा था और हर वर्ग में निर्माण की होड़ लग गयी थी । मूर्ति एवं मंदिर बनवाने और दान देने वाले को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था । अतएव दोनों प्रथाएँ रुढ़ हो गयी थीं और दोनों में अनेक रीतियाँ जुड़ने लगी थीं । वर्जनाएँ तो उनसे चिपट ही जाती थीं । विविध धर्मों में विविध रीतियाँ थीं और कुछ विशिष्ट कार्य धर्म से जोड़ दिये गये थे । उदाहरणस्वरुप, 'कृषिकर्म' से संबंधित पहले एक लोकोत्सव-'कृषिवर्ष' होता था, फिर वह अक्षय तृतीया (अकती) के रुप में त्यौहार बन गया । इसी तरह उपयोगी तिथियाँ महत्त्वपूर्ण कार्यों से संबद्ध होकर त्यौहार बन गयीं । इतना ही नहीं, आत्महत्या को पाप और सती होने को पुण्य की तरह समझा जाने लगा (प्रबोधचंद्रोदय, अंक ५, पृ. १८५ एवं रुपकषटकम् (समुद्र.) पृ. १८३) । इन दोनों प्रथाओं की भी अलग-अलग रीतियाँ थीं । एक शिलालेख के अनुसार चंदेलनरेश धंग ने गंगा-यमुना के संगम में अपना जीर्ण शरीर विसर्जित किया था । (ई. आई. भग १, पृ. १४६, श्लोक ५५) । जीवित जल में डूबना या अग्नि में प्रवेश करना-दोनों रीतियाँ प्रचलित रही हैं । करवत लेना अर्थात् काशी, प्रयाग जैसे तीर्थों में विशेष आरे सें कटकर शरीर त्यागना एक विचित्र रीति थी, जो मध्ययुग में प्रचलित रही (जायसीकृत पद्मावत में छंद सं. १००, ११४, १७२, २४६, ३०९, ६०३ देखों) ।

       लौकिक रीतियों में विवाह-संस्कार-संबंधी रीतियों का अंकन वत्सराजकृत 'रुपकषटकम्' में हुआ है । वधू-पक्ष की ओर से प्रस्ताव, पूर्व मांगलिक कृत्य, कन्यागृह में विवाह संपन्न, वर एवं वधू-पक्ष की ओर अपने-अपने संबंधियों को बुलाने हेतु दूत भेजना, मुहूर्त देखकर वर-यात्रा, विवाह में आये व्यक्तियों को ठहराना और वधू पक्ष की ओर से उनका स्वागत-सत्कार, वर के आने पर   मंगलाचार, वाद्यों द्वारा अभ्यागतों का अभिनंदन, बरात की अगवानी हेतु कन्यापक्ष का दूर से लेना, मंगल कौतुक कार्य, कन्यादान, दहेज में अनेक वस्तुएँ भेंट करना आदि रीतियों से विवाह की पूरी पद्धति स्पष्ट हो जाती है (रुपकषटकम्, पृ. १९०, १५७, ५१, ५३, ४९, ५०, ६३, ५८, ६४, ५९, ६२-६५, १९०) । इन रीतियों और 'हर्षचरित' में वर्णित रीतियों में थोड़ा-सा अंतर है । महत्त्व की बात यह है कि 'रुपकषटकम्' में वधू-पक्ष की ओर से प्रस्ताव जाता है, जबकि 'हर्षचरित' में वर-पक्ष की ओर से । यह नवीनता इसी युग से प्रारंभ हुई थी ।

       नारी से संबंधित कुछ प्रथाओं और रीतियों में परिवर्तन और कुछ का नवोदय इस युग के लोकाचार की विशेषता है । पहले अपनी जाति से बाहर विवाह करने की प्रथा थी, जो इस युग में बंद हो गयी और विवाह अपनी जाति ही तक सीमित हो गया । दूसरे, बालविवाह की प्रथा विशेष रुप में शुरु हो गयी थी । इतिहासकार अल्बेरुनी ने लिखा है-"हिंदुओं में विवाह छोटी उम्र में ही हो जाया करते हैं, इसलिए वधू-वरों का चुनाव उनके माता-पिता ही करते हैं (सचाऊ, भाग २, अ. १९, पृ. १५५) । यह तध्य देश के अन्य भागों के लिए लागू जोता, पर बुंदेलखंड में चंदेल इतने सशक्त थे कि कन्याओं को उतना खतरा नहीं था । 'आल्हा' गाथा में किसी अल्पवयस्का के विवाह का संकेत नहीं मिलता, फिर भी आक्रमणकारियों के भय से उत्तर चंदेल-काल में इस प्रथा का प्रचलन असंभव नहीं है । 'रुपकषटकम्' में पर्दा-प्रथा को संकेत मिलता है (पृ. ५९) । नारियाँ उत्सवों और समारोहों को झरोखों या गवाक्षों से देखती थीं । अंत:पुर में परपुरुष का प्रवेश वर्जित था (पृ. १५५-१६०) । कुलबधुएँ जेठों के समक्ष वार्तालाप नहीं करती थीं । (पृ. ६२) । इन वर्जनाओं से भी पर्दा-प्रथा की पुष्टि होती है ।

       'रुपकषटकम्' में बहुविवाह और सती-प्रथा के प्रचलन का प्रमाण मिलता है (पृ. ५६, १८३) । अल्बेरुनी का मत है कि विधवाएँ और राजाओं का विधवाएँ जिनके पुत्र नहीं होते और जो वृद्धा नहीं हैं, अपने पति की चिता पर बैठकर सती हो जाती हैं । डॉ. ए. एस. अल्तेकर का कथन है कि सती-प्रथा का प्रचार जनसाधारण में नहीं था, केवल राजवंशों तक सीमित था । अल्बेरुनी का निर्णय काश्मीर की घटनाओं पर आधारित है । असल में, सती-प्रथा का फैलाव युद्ध में विजयी आक्रमणकारी की संदिग्ध क्रियाओं की प्रतिक्रिया के रुप में हुआ था ।   यही कारण है कि इस जनपद में भी १३वीं शती के उत्तरार्द्ध में सती-स्तंभों की प्रथा का प्रसार दिखाई पड़ता है (दि अर्ली रुलर्स आफ खजुराहो, डॉ. एस. के. मित्र, १९७७ ई., पृ. १३८-१४०) । कन्या-वध की प्रथा के शुरु होने का भी यही कारण था ।

       अन्य प्रथाओं और रीतिरिवाजों में प्रमुख हैं-स्रियों के रजस्वला होने पर चार दिन अस्पृश्य रहना, शिशु का तिसरे वर्ष में मुंडन और सातवें-आठवें वर्ष में कन्छेदन संस्कार करना, शव को जलाने और सूतक मनाने तथा श्राद्ध करने के संस्कार, बच्चे के जन्म पर भी अशौच (सूतक) मानना, अतिथियों का सत्कार करना, खुशी के अवसरों पर बधाई देना, खेती में नकली आदमी (बिजूका) बनाकर खड़ा करना, आश्रयदाता की प्रशस्ति करना, प्रस्थान करते समय मांगलिक होम, कन्या का अपहरण, भिक्षाटन आदि, जो उस समय न्यूनाधिक रुप में प्रचलित थीं ('मध्ययुगीन भारत', भाग ३, चि. वैद्य, पृ. ६११, 'प्रबोध चन्द्रोदय', पृ. ५७-५९; 'रुपकषटकम्', पृ. १२८, ३४, १८, ६३, ५०, ३८) ।

       इसी प्रकार कुछ वर्जनाएँ भी प्रचलित थीं, जैसे अनुलोम-असवर्ण विवाह एवं जाति के बाहर विवाह, अस्पृश्यों की छाया, दूसरा धर्म अपनाने पर अशुद्ध हुए लोगों की शुद्धि, पत्नी का पति के अतिरिक्त अन्य से संबंध रखना, मांस-भक्षण और मद्यपान करना आदि । पुराणों   में कथाओं के माध्यम से निषेधों का संकेत अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ था और उससे भ्रष्ट आचारों का अप्रत्यक्ष उपचार संभव बना था । पुराणों के नये संस्करणों और नयी स्मृतियों में इस समय के रीतिरिवाजों का उल्लेख मिलता है । व्रतों-उपवासों की रीतियों और लोकोत्सवों एवं तेयौहारों की विधियों का वर्णन उनका प्रधान विषय है ही, उनमें वर्जित   कर्म करनेवालों के लिए प्रायश्चित्त करने का विधान भी है । अस्पृश्यों को छूने और उनका छुआ जल पीने या भोजन करने, गो और ब्राह्मण की हत्या करने, श्राद्ध में मांस देने पर न खाने, म्लेच्छों द्वारा छीनी गयी स्रियों की शुद्धि न करने, गोमांस-भक्षण,   शिखा काटने या कटवाने, व्यभिचार करने आदि पर भिन्न-भिन्न प्रायश्चित्तों को समाज की आचारसंहिता में मान्य करवाकर इन ग्रंथों ने महत्कार्य किया था ।

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तोमर युग

तोमर-काल की मुख्य समस्या का संकेत तत्कालीन कविवर विष्णुदास ने अपने 'महाभारत' नामक प्रबंध में कर दिया था- "म्लिच्छ बंस बढि रह्ययौ अपारा, कैसें रहै धरम कौ सारा ।" (पृ. १७१) अर्थात् म्लिच्छों के बढ़ने से धर्म-तत्त्वों के अस्तित्व को संकट उत्पन्न हो गया था । इसी के साथ एक चिंता और जुड़ी थी-"कैसो कलि कैसो आचार, कैसो चलन चल्यो संसार ।' अर्थात् आचार और चलन के बदलने की चिंता । स्पष्ट है कि १५वीं शती में लोकाचार के प्रति एक अतिरिक्त जागरुकता वर्तमान थी । जनता में और प्रबुद्ध कवियों में । इस अंचल के कवियों में जागरुक चेतना की एक लम्बी परम्परा दिखाई पड़ती है । उनके प्रबंधों में कलियुग के ब्याज से तत्कालीन लोकाचार की वास्तविकता और विशेष रुप में वर्जनाएँ अभिव्यक्त हुई हैं । लोकाचार के प्रति इतनी चिंता अन्यत्र दुर्लभ है ।

       सुल्तानों के शासन-काल में लोकाचार के विनाश का खतरा हमेशा बना रहता था, इसीलिए एक तरफ संघर्षशील सिपाही तलवार का धर्म लेकर खड़ा हो गया, तो दूसरी तरफ नीतिनिर्देशक संत पाप-पुण्य के कर्मों का मर्म लेकर अड़ा रहा । 'छिताई कथा' के कवि नि जहाँ 'छत्री खरग धर्म दिढ सूरा' की घोषणा की, वहाँ 'महाभारत' के कवि ने 'बिनसै कला कुठाकुर सेवा' का मंत्र दिया । इस तरह कर्म और धर्म, दोनों लोकाचार की रक्षा में जुटे रहे ।

       'छिताई कथा' में लोकाचार के लिए 'आचार' और 'बिउहारा' -दोनों शब्दों का प्रयोग हुआ है । कवि ने व्यक्ति और वंश, नीच और सज्जन, प्रेम और राजनीति के 'बिउहार' अलग-अलग बताये हैं, जिससे लोकाचारों की विविधताओं का पता चलता है । इस युग में जन्म-संबंधी संस्कारों का पता इन्हीं दोनों ग्रंथों से चलता है । 'छिताईकथा' से ज्ञात होता है कि बच्चे के जन्मते ही पुरोहित को बुलाकर उसके ग्रह-नक्षत्र दिखवाये जाते थे और भविष्य में होने वाली प्रमुख घटना या घटनाओं की भविष्यवाणी पर विचार-विसर्श भी किया जाता था (छंद ९४१) । 'महाभारत' के अनुसार 'अर्जुन' नामकरण 'कोंहाँ' वृक्ष के तले जन्मने के कारण रखा गया ('कोंहाँ रुख तरें अवतारु, तातों अर्जुन नाउ कुँवारु ।' (आदि पर्व, छंद २/८७) । इस तरह का नामकरण आदिम प्रतीत होता है, क्योंकि वृक्षों के नाम पर नामकरण की प्रथा आदिवासियों में प्रचलित थी । जन्म पर बधाये होना, बाजे बजना और नृत्य होना भी परम्परागत था । इस ग्रंथ में विवाह के अंतर्गत, बरात, टीका, जनवासा देना, चढ़ाए कौ साज, भोजन, प्रात: भाँवर, दायजौ सौंपना, शिष्टाचार और विदा का उल्लेख है, जबकि 'छिताई कथा' में वर का खोज के लिए ब्राह्मण भेजना, तिलक, लगन, वैवाहिक निमंत्रण, बरात की यात्रा, बारत की अगवानी, दोनों वंशों की परम्परा के अनुसार सभी 'आचार' करना, मंडप में बरात का बैठना, मंडप की गारियाँ, ज्योंनार (भोजन), मंगलाचार, दायजा और पालकी में विदा को क्रमिक रुप दिया गया है (महाभारत, विराट् पर्व, छंद ६/३३-३७ एवं 'छिताई कथा' छंद १५७, १६३, १६७-१७०, १७३, १७६) । मृत्यु-संस्कार को 'महाभारत' में 'किरिजा-काज' कहा गया है (आदिपर्व, २/१०२) । गया जाकर पुरखों को पिंडदान करने की प्रथा भी थी (छिताई कथा, छंद ६२२) ।

       इस युग में 'बहुविवाह प्रथा' प्रचलित थी, जिसका संकेत 'छिताई कथा' (छंद १६) से मिलता है ।   सुल्तानों के हरम में भी मलिकाओं की भीड़ थी । विवाह को राजनीति का हथियार बनाकर प्रयोग करने का एक सस्ता नुस्खा मिल गया था, जिसे राजा और बादशाह, दोनों पसंद करते थे । इस समस्या के समाधान के लिए 'एकपत्नी-प्रथा' को आदर्श के रुप में खुब जोर-शोर से प्रचारित किया गया और इसी के निमित्त कविवर विष्णुदास ने 'रामायन कथा' में लोकभाषा वाली सहज और बोधगम्य शैली का प्रयोग करते हुए सीता और राम के एकनिष्ठ प्रेम को सर्वोपरि महत्ता दी । 'छिताई कथा' के कवि ने तो उसे 'साधना' की कोटि में रखकर प्रेम की पवित्रता की विजय मानी (जैसे जती जोग अभ्यास, त्यों पतिब्रता कंत की दास ।) । कथा का नायक समरसिंह राजनीति के सभी गुणों का व्यावहारिक ज्ञान रखता है, पर पराई स्री की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखता (सब गुन राजनीत ब्यौपरई, पर तीया पर दिष्ट न धरई ।) इस प्रकार समरसिंह की विजय का मंत्र 'एकपत्नी व्रत' था । ठीक उसी तरह, जैसे राम का । तत्कालीन समाज में भी इसी मंत्र से विजय की घोषणा कवियों ने की थी ।

       वस्तुत: इस युग का सांस्कृतिक संघर्ष ' एक पत्नी-प्रथा जैसे अस्रों से जीता गया था । अतएव कथाओं के माध्यम से उसे जन-जन तक पहुँचाना कवियों का काम था और इन कथाओं को सुनना इसलिए ज रुरी था कि सुनने से गंगास्नान का फल घर बैठे प्राप्त होता था (जो यह कथा सुनइ दै काना , ता फल गंगा होइ असनाना) । इन्हीं संबंधों ओर उद्देश्यों को ध्यान में रखकर कथा सुनाने की परम्परा प्रारंभ हुई थी ।

       दूसरी प्रथाओं और रीतियों में पर्दा, तमाशा, जात्रा, मकरसंक्रांति पर प्रयाग में व्रत रखना, किसी काम के लिए बीड़ा (पान का बीड़ा) देना, गृह-प्रवेश का उल्लेख 'छिताई कथा' में है । पर्दा-प्रथा मुसलमानों में थी और उसका प्रसार हिन्दू राजाओं तथा सामंतों में भी हो गया था । तमाशा, जात्रा आदि और व्रतोपवास धार्मिकता से बँधे थे ।   गृह-प्रवेश की रीति बहुत पुरानी और वैदिक कही गयी है (छिताई कथा, छंद १५६), जबकि बीड़ा देना या बीड़ा उठाने की परम्परा राजपूत युग की ही है, 'आल्हा' गाथा में उसे काफी महत्त्व मिला है ।

       विष्णुदासकृत ' महाभारत' में वर्जनाओं