बुन्देल खण्ड की लोक संस्कृति का इतिहास

नर्मदा प्रसाद गुप्त

लोकोत्सवता

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किसी भी अंचल के लोकोत्सव लोक के वे उत्सव हैं, जो लोक द्वारा लोकहित के लिए आयोजित होते हैं । सामूहिकता उनकी पहली शर्त है । समूचा लोक एक विशेष कर्म से गतिशील होकर अद्भुत एकता का बानगी पेश करता है और यह एकता बाहर और भीतर, दोनों तरफ से होती है । असल में, लोकोत्सव लोकमन के मनोविज्ञान का जीता-जागता उदाहरण है । अनेक व्यक्ति एक ही भावना और एक ही लक्ष्य से संप्रेरित हो कर्म करते हैं, जिसे देखकर और महसूस कर अकेला व्यक्ति या उसका मन सहजत: वही करने लगता है । इस तरह व्यक्ति का सामाजिक मन सामूहिक संकेत पा लेता है और स्वत: अनुसरण की क्रिया प्रारंभ हो जाती है । इस रुप में भावात्मक और क्रियात्मक एकरसता का सही साक्ष्य खड़ा हो जाता है । एकता का शारीरिक और मानसिक पक्ष लोकोत्सव के दपंण में साफ-साफ दिखाई पड़ता है और किसी को यह कहने में कठिनाई नहीं है कि जातीय या राष्ट्रीय एकता का इतिहास लोकोत्सवों के जन्म से ही शुरु हो गया था । मकरसंक्रांति के पर्व पर जब लाखों-करोड़ों एक ही तिथि और समय पर पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं, तब ऐसा महसूस होता है कि सारा राष्ट्र ही एक संकेत पर जाग गया हो ।

पूजा-पाठ और जप-तप एकांतिक हैं । वे अकेले व्यक्ति के द्वारा किये जा सकते हैं और उनकी साधना व्यक्तिगत हित के लिए होती है । लोकोत्सव एक व्यक्ति के मनाने से नहीं होता, वरन् उसमें अनेक की भागीदारी जरुरी है । हर व्यक्ति में एकदेव और एक दानव पैठा होता है । सामूहिकता के व्यवहारों में उसका दानव छिप जाता है और देवता बाहर आ जाता है । यदि राष्ट्र के नागारिकों का दानवत्व इन लोकोत्सवों से मार्गीकृत होकर बदल जाता है, तो निश्चित ही उनकी उपयोगिता है । उदाहरण के लिए, होली में कीचड़ डालना, मुखों को बदरंग करना और गधे पर सवारी करते हुए गलियों में घूमना, गाली-गलौज करना आदि से पशुप्रवृत्ति तृप्त हो जाती है और व्यक्ति में पारस्परिक प्रेम की सद्वेृत्ति जाग जाती है ।

लोकोत्सव केवल उल्लास और आनन्द की अभिव्यक्ति नहीं हैं, वरन् लोकसंस्कृति के संस्थान भी हैं । उनमें जहाँ रहन-सहन, वेश-भूषा, खान-पान, रीति-रिवाज और चाल-ढाल की झाँकी मिलती है, वहाँ लोकादर्श, लोकधर्म, लोकदर्शन और लोकसंबंधों की सीख भी अनायास प्राप्त हो जाती है । इस दृष्टि से लोकोत्सव आज के मशीनी युग में आस्था और विश्वास के प्रतीक हैं । यदि वर्तमान लोकजीवन में लोकसंस्कृति की तस्वीर देखनी हो, तो वह लोकोत्सवों के समय घरों के भीतर आँगन या पूजागृह में नारियों के अनुष्ठान, व्रत और त्योहार से संबंधित क्रियाकलापों, आलेखनों एवं कथाओं तथा घरों के बाहर पुरुषों के क्षणिक उल्लासमय परम्परा-पालन में ही मिलेगी । सिद्ध है कि आज की इस संकटकालीन स्थिति में लोकोत्सव ही हमारी संस्कृति के आधार-स्तम्भ हैं ।

लोकजीवन की सरिता सुख और दु:ख के दो किनारों के बीच निरंतर बहती रहती है । यह सही है कि लोकोत्सव सुख के तट पर उगे हरे-भरे वृक्ष हैं, जो अपनी खुराक सुख-दु:ख से बँधी जलराशि से ही लेते हैं, लेकिन यह भी असत्य नहीं है कि दु:ख का किनारा टूट जाने पर सरिता की अस्मिता खत्म हो जाती है और फिर वृक्षों के उगने का सवाल ही नहीं उठता । मतलब यह है कि लोकोत्सवों का जन्म जीवन की उन घटनाओं से जुड़ा हुआ है, जो सुख-दु:ख पर निर्भर न होकर उनकी उपयोगिता के महत्त्व से संबद्ध हैं । रामनवमी और जन्माष्टमी राम और कृष्ण के महत्कार्यों और लोकादर्शों को सामने रखकर मनायी जाती हैं । महापुरुषों की जयंतियाँ मृतकों के प्रति श्रद्धा-सम्मान का नैवेद्य है । मृतकों या उनकी स्मृति से जुड़ी दु:ख की अनुभूति धीरे-धीरे उनके कार्यों, आदर्शों और तज्जन्य यश पर केन्द्रित होकर सुखात्मक हो जाती है । फिर इस देश की संस्कृति में मृत्यु मोक्ष का द्वार मानी गयी है । जायसी ने भी 'नाच-नाच जिउ दीजिय' की परम्परा को स्वीकारा था ।

कृषि-युग में फसल बोने, उसकी हरियाली, समृद्धि और घर आने तक की क्रियाओं को प्रधानता देने से विभिन्न लोकोत्सवों का उदय हुआ था । इसी तरह ॠतु-परिवर्तन की घटनाएँ महत्त्वपूर्ण उत्सवों का आधार बनी थीं । धीरे-धीरे धार्मिकता का वैशिष्ट्य बढ़ा और उत्सवों में धार्मिक मूल्यों का प्रवेश हुआ । धार्मिक नेताओं और कार्यों को उत्सवों का प्रमुख आधार स्वीकारा गया । सामाजिक उत्सवों की परम्परा बहुत पुरानी है और आज भी पारिवारिक या सामाजिक घटनाओं को लोकोत्सवों की प्राणशक्ति माना जाता है । वर्तमान भावात्मक और राष्ट्रीय एकता के प्रमुख साधन ये उत्सव ही हैं । लोकोत्सव मनाने की रीतियाँ भी विविधरुपा हैं । उपवास, अनुष्ठान, पूजन, बलिदान, सहभोज, क्रीड़ा, नृत्यगीत, संगीत, काव्यकथा आदि द्वारा मनाना आज भी प्रचलित है ।

वात्स्यायन के कामसूत्र के अनुसार उत्सवों के दो प्रकार थे-एक सार्वजनिक, जैसे-यक्षरात्रि, कौमुदी जागर, सुवसन्तक आदि और दूसरा स्थानीय, जैसे-नवपत्रिका, उदकक्ष्वेड़िका, एकशाल्मली, यवचतुर्थी, आलोल, चतुर्थी, मदनोत्सव, पुष्पावचायिका आदि । सार्वजनिक से आशय राष्ट्रव्यापी समानता से है, जबकि स्थानीय से आंचलिक भिन्नता प्रकट होती है । कुछ उत्सव देश भर में एकरुपता बनाये हुए थे, जबकि कुछ में स्थान के अनुरुप अन्तर रहता था । कभी कुछ उत्सव प्रमुख होकर राष्ट्रीय बन जाते थे और कभी वे गौण होकर विलुप्त हो जाते थे । समय-समय पर उत्सवों के स्वरुप में परिवर्तन भी होता रहता था । उदकक्ष्वेड़िका जैसा स्थानीय उत्सव धीरे-धीरे होली के राष्ट्रीय उत्सव में कैसे परिवर्तित हो गया, उसका अपना एक अलग इतिहास है । हर लोकोत्सव का एक इतिहास है और हर युग के अपने खास लोकोत्सव रहे हैं । दोनों रुपों में किसी भी अंचल के लोकोत्सवों का इतिहास लिखा जा सकता है जो तत्कालीन लोकसंस्कृति का प्रामाणिक साक्ष्य उपस्थित करने में पूर्ण सक्षम है और जिससे लोकसंस्कृति के इतिहास की गतिशील धारा का पता भी चलता है ।

यहाँ लोकोत्सवों के अंतर्गत व्रत, पर्व और त्यौहार लिये गए हैं । व्रत में सम्यक संकल्प से किया गया अनुष्ठान होता है, जो उपवास आदि के रुप में निवृत्तिपरक और विशिष्ट भोजन, पूजन आदि के रुप में प्रवृत्तिपरक कहा जा सकता है । कुछ व्रत सामान्यत: हमेशा रखे जाते हैं क्योंकि उनसे मोक्ष मिलता है, जबकि दूसरे किसी-न-किसी कारण से किये जाते हैं । कुछ विशेष फल या इच्छापूर्ति की आशा से प्रेरित होते हैं और कुछ आत्मशुद्धि या साधना-पूर्व की पवित्रता के उद्देश्य पर बल देते हैं । व्रत के उपवास को शारीरिक और मानसिक शुद्धि का कारण भी माना जाता है । व्रतों के संबंध में बुंदेली का एक लोकगीत देखें-

अँगना में ठाँड़ीं सासो हँस पूछें, बहू कौन-कौन ब्रत कीने लाल अति सुंदर हो ।

कातिक अनाये मैंने माँव नहाये रई इतवार उपासी मैं नइँ जानों एइ गुन हो ।

व्रतों के साथ-साथ पर्वों का महत्त्व है । पर्व या परबी पर तीर्थों, गंगा या त्रिवेणी में स्नान करने से पुण्य होता है, वांछित फल की प्राप्ति होती है और मोक्ष मिलता है । जेठ में गंगा दशहरा, क्वाँर में शरद पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, मकरसंक्रांति, सोमवती अमावस्या आदि प्रमुख पर्व हैं । अर्द्ध कुंभ या कुंभी और कुंभ को महापर्व माना गया है । पर्व-स्नान में उपवास और व्रत रखने का विशेष पुण्य होता है । इसी तरह त्योहारों में भी व्रत, उपवास, अनुष्ठान और स्नान को समाविष्ट किया गया है । उदाहरण के लिए, दीपावली महापर्व है, लक्ष्मी का व्रत है और दीपों के प्रकाश का त्योहार है । उसमें यक्षरात्रि के दीपदान से लेकर आज के प्रकाश-पर्व तक न जाने कितने अनुष्ठान, व्रत, पूजन, तंत्र-मंत्र, कथाएँ, नृत्य-गीत, जुआ-क्रीड़ा आदि घुल-मिल गये हैं । इसीलिए लोकोत्सवों में व्रतों, पर्वों और त्योहारों को सम्मिलित करना उचित है ।

बुंदेलखंड में वर्ष भर में ॠतुओं के अनुसार अपने व्रत, पर्व, त्यौहार हैं और उनसे संबंधित लोकगीत, लोककथाएँ, लोककलाएँ, लोकरंजन और लोकरस हैं, जिनसे ॠतुचक्री लोकसंस्कृति का पूरा मानचित्र रेखांकित हो जाता है । उसके गतिशील विकास और इतिहास की खोज से यहाँ के लोक, लोकमन और लोकसंस्कृति के क्रमिक आरोह-अवरोह का रेखाचित्र उभरना सहज-स्वाभाविक है । इस आलेख में यही प्रयत्न किया गया है और यह रसिद्ध किया गया है कि लोकोत्सव किसी अंचल के इतिहास के प्रमुख साधन हैं ।

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लोकोत्सवों की प्राचीनता

गुहा और आखेट युग में लोकोत्सव की चेतना का निश्चय कठिन है । एक समूह का अपने शिकार को अग्नि की ज्वालाओं में रखकर उसके चारों तरफ घेरा बनाकर नाचना-गाना ओर प्रसन्न होना लोकोत्सवों की भूमिकामात्र है, उसे लोकोत्सव नहीं कहा जा सकता । गुहाचित्रों में भी नृत्य के दृश्यों का अंकन हुआ है, लेकिन उनमें उत्सव का संकेत नहीं है । उत्सवी चेतना का उदय कृषि युग में ही हुआ है । बुंदेलखंड में कृषि युग देर में आया, इसलिए दीर्घकाल तक आदिम जातियों का बोलबाला रहा और उनके उत्सव प्रचलित रहे । आदिवासियों के उत्सव आर्यों से भिन्न थे, इसी कारण आर्य उन्हें अन्यव्रत वाले (अन्यव्रता:) कहा करते थे । इतना निश्चित है कि मृतकों के प्रति श्रद्धा बहुत पुरानी है और इस आधार पर 'चैत्यमह' लोकोत्सव बहुत प्राचीन ठहरता है । चिता से संबद्ध होने पर ही 'चैत्य' बना है । शवदाह-स्थल पर मृतक की स्मृति-सुरक्षा हेतु या तो वृक्ष लगाया जाता था या कोई स्तूप अथवा पत्थर खड़ा किया जाता था । पहले को चैत्यवृक्ष और दूसरे को चैत्यस्तूप कहा जाता था । उन्हीं को केन्द्र में रखकर चैत्यमह और स्तूपमह लोकोत्सव मनाये जाते ते । चैत्यवृक्ष से ही वृक्षपूजा और वृक्षमह का प्रारम्भ हुआ था । वृक्षमह से जुड़े वनमह, उद्यानमह, नदीमह, तड़ागमह, कूपमह आदि भी विकसित हुए । चैत्यमह से भूतमह का जन्म हुआ था, जिसमें मृतक की स्मृति का ही आधार लिया गया-था ।

आदिम जातियों में शारीरिक शक्ति की परिक्षा के लिए शस्र-संबंधी उत्सवों का आयोजन प्रचलित था । उनमें धनुर्मह प्रमुख था, जिसमें धनुष के द्वारा वीरों की परिक्षा ली जाती थी । नागमह और यक्षमह-दोनों बहुत पुराने लोकोत्सव हैं । नागदेवता के उत्सव को नागमह कहना सहज है । वह यक्षमह से बी पुराना है । नागमह की प्रधान विशेषता है-उसकी विकसनशीलता । उसमें वैदिक, बौद्ध और जैन मान्यताओं का भी मसन्वय होता गया है । यक्षमह में भी नागमह की तरह व्यापकता है । गोंड़ों के दोवता 'ठाकुर' के बाद 'यक्ष' ही पूरे अंचल में सम्मानित रहे थे । यक्षों के बाद शिव आये, इसलिए रुद्दमह और शिवमह जैसे उत्सवों की नींव पड़ी । 'शक्तिमह' या देवीमह इन सबसे पुराना था ।

सामाजिक उत्सवों में सुरापान कार महोत्सव 'सुरा-नक्खत' और मूर्खता की मस्ती का 'बाल-नक्खत' इसी समय की उपज हैं । नृत्य-गान, पशु-पक्षी और पहलवानी, लड़ाई, दौड़ने की प्रतियोगिता आदि मनोरंजन भी सामूहिक रुप में होते थे, लेकिन उनके नामकरण का पता नहीं चलता ।

कृषियुग में अनेक लोकोत्सव अदित हुए, जो भूमि, जल, फसल और ॠतु से संबंधित थे । भूमि और ॠतु-परक लोकोत्सव संधिकाल के थे । भूदेवी की पूजा उपज या सृजन की देवी के रुप में होती थी, उसके उपरान्त भवानी या शक्ति का अस्तित्व आया । कृषि के चमत्कार से प्रभावित होकर भूदेवी या भुइयाँरानी का पूजन और छेरता का उत्सव सर्वाधिक महत्त्व का था, क्योंकि उससे ही 'देवी' के लोकोत्सवों का स्वरुप बना । भूमि की उपज में ॠतुओं के असर का अनुभव ॠतुपरक उत्सवों का जन्मदाता था । गोंड़ों का बिदरी, भीलों के दिवासा और ढोडी, कत्तिक-नक्खत्त और कौमुदी जागर जैसे लोकोत्सव ॠतु-परिवर्तन से संबंधित थे । होली भी ॠतुपरिवर्तन और फसल का उत्सव था, पर उसका यह नाम बाद में पड़ा । भीलों का 'इंदल' अच्छी वर्षा और समृद्ध फसल के लिए मनाया जाता था । 'वप्प-मंगल दिवस' हल चलाने और फसल बोने का उत्सव था, जबकि 'हरढिली' खरीफ फसल की बोनी के बाद हलों को ढीलने का उत्सव था । बुवाई के बाद पौधे कुछ बड़े होने पर और दाने आने पर भील 'जातर' के उत्सव मनाते हैं । 'जवारा' भी वर्ष में दो बार मनाया जाता था और खरीफ तथा रबी की फसल का उत्सव था, बाद में देवी-पूजा से जुड़ गया था । फसल का ऐसा ही त्यौहार कजरियों या भूजरियों का था, जो बाद में भाई-बहिन के प्रेम का प्रतीक बन गया । गौंड़ों का 'बकबंधी' भी फसल को रोग से और गोधन को किसी भी बाधा या बीमारी से बचाने का उत्सव था, जो आगे चलकर दूसरे रुप में परिवर्तित हो गया । फसल आने पर 'नवई' और 'नवाखानी' उत्सव मनाये जाते थे । एक भीलों का था, दूसरा गोंड़ों का, लेकिन दोनों नयी फसल के उपभोग से संबंधित थे ।

यहाँ इन लोकोत्सवों का उतना ही परिचय देना उचित है, जितना उनका विकास इस युग में हुआ था । कुछ तो पहले लौकिक थे, बाद में धार्मिक प्रभाव से बदल गये और कुछ या तो अदृश्य हो गये या फिर रुपान्तरित होकर नये बन गये ।    

चैत्यमह और स्तूपमह-बताया जा चुका है कि मृतकों की स्मृति में स्थापित चैत्यों और स्तूपों में मनाये जाने वाले लोकोत्सव चैत्य और स्तूप-मह कहे जाते थे । रामायण, महाभारत और जैन-बौद्ध साहित्य में वर्णित चैत्य और स्तूप बड़े प्रासाद और स्तूप थे, पर प्राचीन काल में वे वृक्ष और प्रस्तर के रुप में ते । आज भी बुंदेलखंड के गाँवों में मृतक की स्मृति में वृक्ष लगाने और चबूतरा बनवाने की प्रथा अवशिष्ट है । पहले चैत्य की प्रतिष्ठा में भोजन और वस्र एवं अन्न-दान होते ते । श्रद्धा और पूजा की परम्परा भी इन्हीं उत्सवों से प्रारम्भ हुई थी ।

वृक्षमह- चैत्यमह से ही वृक्षमह का विकास हुआ है । आदिवासियों के लिए वृक्ष जहाँ फल देता था, वहाँ जंगली पशुओं से सुरक्षा के रुप में गुप्त निवास की व्यवस्था करता था । इसीलिए वह लोकजीवन में पहली उपयोगी वस्तु के रुप में लोकप्रिय हुआ था । इसके बाद चैत्यवृक्ष बनकर श्रद्धा और सम्मान पाने से पूजा का पात्र हो गया । महाभारत में 'सुपूजित:' कहकर वृक्ष की लोकप्रतिष्ठा को स्पष्ट कर दिया गया है । निश्चित है कि ऐसे पूज्य वृक्ष की रक्षा करना लोककर्तव्य था । सभी आदिवासी किसी विशिष्ट अवसर पर वृक्ष के नीचे एकत्रिक होकर उत्सव मनाते थे ।

नदीमह-वृक्ष के बाद आदिवासियों कीर आवश्यकता जल थी । जल के बिना जीवन असंभव था और नदी उसी जल से आपूरित थी । इस कारण वह लोक के लिए उपयोगी और पूज्य मानी गयी । नदी की पूजा और उसके उत्सव को नदीमह कहा गया है । नदी की तरह जल के जितने स्रोत थे, उतने सभी पूज्य माने जाने लगे । बाद में नदियों को विश्व की माताएँ कहकर सम्मानित किया गया ।

भूतमह- आदिवासियों का विरश्वास था कि आपत्तियों और व्याधियों को टालने के लिए भूत, प्रेत, पिशाच आदि के सम्मान में भूतोत्सव मनाना लाभप्रद है । भूत का रुष्ट होना गर्भवती स्री और छोटे बच्चों के लिए हानिकर है । इस वजह से आदिवासी पूजन और नृत्य-गीत द्वारा उन्हें प्रसन्न करते थे ।

धनुर्मह -प्रस्तर-शस्रों से लेकर धनुष तक में आदिवासियों का कौशल प्रसिद्ध था । लगभग सभी निष्णात थे, परन्तु श्रेष्ठता के निर्धारण के लिए धनुर्मह के उत्सव का आयोजन होता था, जिसमें शस्रधारी अपने लाघव की परिक्षा देते थे । यह उत्सव एक शस्र-प्रतियोगिता की तरह प्रारम्भ होता था । विजयी वीर के सम्मान में भोज और नृत्य-गीत होते थे । आगे चलकर इसका विकास दूसरी तरह से हुआ, जिसके साक्ष्य रामायण और महाभारत में मिलते हैं ।

शक्तिमह -स्पष्ट किया जा चुका है कि भूदेवी या भुइयाँरानी के महोत्सव से ही भुमानी, भवानी या शक्ति-पूजा का विकास हुआ है । आदिवासी शक्ति के विशेष स्वरुप या विग्रह से परिचित नहीं ते, वरन् उनके मन में लोकदेवी की ऐसी कल्पना थी, जो सृजन या निर्माण की प्रेरणाशक्ति से मेल खाती ती । यह उत्सव एक तरफ फसल की उपज से जुड़ा था, तो दूसरी तरफ देवी-पूजन से । भीलों में यह नवणी या नवरात्रा के रुप में प्रसिद्ध है, क्योंकि यह क्वाँर माह के शुक्ल-पक्ष की नवमी को मनाया जाता है । वैसे यह परमा से प्रारम्भ होकर नवमी तक नौ दिनों का अनुष्ठानिक व्रत भी है, जिसके कारण इसे नवरात्रा भी कहा जाता है । गौंड़ों में यह वर्ष में दो बार-एक क्वाँर में तो दूसरा चैत्र-शुक्ल-पक्ष के प्रारम्भ के नौ दिनों में मनाया जाता है और इसे व्रत एवं त्योहार-दोनों का रुप दिया जाता है । जौ बो कर नवें दिन तक उनको सींचने-पूजने से इसका नाम जवारा त्यौहार पड़ गया है । आदिवासी इसे नौ दिन तक मनाते हैं, इसीलिए उनके लिए यह प्रमुख त्योहार है ।

सुरा-नक्खत्त -सुरा-पान आदिवासियों की उत्सवता का प्रमुख अंग था । किसी प्रसन्नता को व्यक्त करने या दु:ख की पीड़ा पीने के लिए पान-गोष्ठी या उत्सव हुआ करता था । इसके लिए कोई विशिष्ट तिथि निश्चित न थी, किसी सफलता या विजय पर यह उत्सव होता था । शुरु में छोटे-बड़े या धनी-निर्धन का कोई भेदभाव नहीं था, बाद में पानगोष्ठियाँ अलग-अलग वर्गों में बँट गयी थीं । सुरापान के बाद गीतनृत्य, विवाद और बकवास, सब होते ते ।

बाल-नक्खत्त -यह उत्सव आज के मूर्ख-सम्मेलन की तरह होता था । गाँव का लोक किसी एक समूह के वश में हो जाता था, जो गोबर-लपेटे, कीचड़-सने और मुखरँगे वेश में गालियाँ बकता हुआ घूमता था और द्वार-द्वार जाकर इच्छित वस्तु वसूल करता था । उत्सव का यह रुप बाद में होली के त्योहार में सम्मिलित हो गया था ।

रंजनोत्सव -मनोरंजन के लिए पशु-पक्षियों की लड़ाई, मल्लयुद्ध, नृत्यगीत, दौड़-प्रतियोगिता, खेल आदि का एक सामूहिक आयोजन होता था, जिसका नाम ज्ञात न होने से उसे रंजनोत्सव कह दिया गया है और जो भविष्य में समज्ज या समाज के नाम से विख्यात हुआ था । समाज ने ही अखाड़े जैसी मध्ययुगीन सांस्कृतिक संस्था दी और अखाड़ों से ही गोष्ठियों का रुप विकसित हुआ ।

भूदेवी उत्सव -भूमि को देवी मानने का प्रमुख कारण उसकी उर्वरता थी । भिन्न ॠतुओं में वृक्षों से फल, खेतों से अन्न और अपने भीतर से जल देनेवाली भूमि आदिवासियों के लिए सबसे अधिक पूज्य हो गयी थी, अतएव उसके सम्मान और पूजन में उत्सव मनाया जाता था । इसका नाम नहीं मिलता, पर बुंदेलखंड में भुइयाँरानी की पूजा होती है और सभी स्रियाँ अपना भोजन लेकर गोठ करती हैं ।

छेरता -गोड़ों का यह बच्चों का त्योहार आदिकाल की मूल प्रवृत्ति का स्मरण दिलाता है । छेरता का अर्थ है धरती और जब गोंड़ बच्चे एक-एक द्वार पर जाकर जमीन को कुरेदकर बार दुहराते हैं-'छेर छित्ता छेरता' जिसका अर्थ है कि 'धरती हमें अनाज दे', तब वे वस्तुत: आदिवासियों की आदिम आवाज ही लगाते हैं । भले ही बच्चों की आवाज पर घर की स्वामिनी उनकी झोलियाँ अनाज से भर दे, पर धरती से अनाज की माँग बहुत पुरानी है । इसमें भी कोई संदेह नीहं है कि यह माँग बराबर बनी रही और उसके साथ यह त्योहार भी जीवित रहा ।

बिदरी -इस लोकोत्सव में पहले बादल की पूजा होती थी, बाद में भूमि और अन्न की होने लगी । बिदरी का अर्थ बदरी होता है, जिससे गोंड़ किसान अच्छी वर्षा की प्रार्थना करते थे । यह फसल बोने के पहले जेठ के महीने का त्योहार है । सभी किसान मुखिया के आँगन में पूजा का सम्भार करते थे । कभी-कभी गाँव के बाहर किसी विशिष्ट स्थल को चुन लेते थे, जहाँ होम और बलि देकर वर्षा की देवी 'बदरी' को प्रसन्न करते थे । आगे चलकर ठाकुर देव अधिक महत्त्वपूर्ण हो गये, इसलिए उनकी पूजा होने लगी और उसी के साथ भूमि और अन्न की भी जुड़ गयी । बैगा (पुजारी) और मुखिया पूजा की सामग्री के साथ ठाकुर देव के चौरे पर जाते हैं । बैगा पहले जल चढ़ाता है, बाद में रार का होम देकर सफेद मुर्गो की बलि देता है और अन्न के ढेर पर खून का तपंण करता है । धरती माता को भी होम देकर काली पोई (मुर्गी) की बलि चढ़ाता है और अन्न पर खून का तपंण करता है । इसी तरह खेरोदेव को लाल मुर्गे की बलि से प्रसन्न करता है । पूजा के बाद अन्न को किसानों में बाँटा जाता है, जिसे वे बीज में मिला देते हैं । उनका विश्वास है कि इससे फसल अच्छी होती है ।

दिवासा -ॠतुपरक उत्सवों में भीलों का दिवासा भी है, जिसमें वर्षा के देवता बाबदेव की पूजा की जाती है । संध्या-काल में देवता को जल से स्नान कराने के बाद तेल और सिन्दूर का घोल चढ़ाते हैं, जो वस्र का प्रतीक है । दूध में आटा मिलाकर पकाते हैं और उसी प्रसाद को बाँटा जाता है । प्राचीन काल में इतनी ही पूजा से देवता अच्छी वर्षा का आशीर्वाद दे देता था, लेकिन बाद में बड़वा को भार (भाव) आना भी शुरु हो गया । लोककवियों ने गाथा भी रच दी, जो ढाँक और कामड़ी पर गायी जाती है । बकरे की बलि देने की प्रथा और तंत्र-मंत्र भी बाद में जुड़ गये ।

ढोडी- यह उत्सव भी वर्षा से संबंधित है । बच्चों के समूह पर सूप रख और हाथ में जलती लकड़ी रेकर भील द्वार-द्वार जाते हैं और घेरे में घूमते हुए गाते हैं-'ढेढर माता पानी दे, पानी दे । पानी नइँ तो दाना दै, दाना दै ।' गृहस्वामी सूप पर पानी डालता है और अनाज भी देता है ।

गढ़- गढ़ के प्रतीक रुप में रन्दा मारकर चिकनाया और तेल पिलाया लम्बा-मोटा खम्भ मैदान के बीचोबीच गाड़ दिया जाता है । उसके चारों तरफ भील युवतियाँ अपने हाथों में सोंटियाँ और लाठियाँ लेकर खड़ी रहती हैं । जब युवक अपने हाथों में गुड़ की पोटलियाँ लेकर खम्भ में चढ़ने का प्रयत्न करते हैं, तब युवतियाँ उन्हें सोंटियों और लाठियों से रोकती * SEx Jɨ {ɮ ɱx v ni * V ִE Jɨ E Jɮ {ɮ Mc E {] v +i , ɽ Vɪ x Vi + {֮Ei i * |Sx Eɱ {֮Eɮ-ɰ{ IE E֨ɮ Eई BE ɱ Vi l, Vɺ Vi ɪं Sxi l + ɮh Ei l * n ɮh-Jɨ Vɪ-Jɨ x Mɪ + =E xɨ Mढ़ {c *

कत्तिक - नक्खत्त-कार्तिक पूर्णिमा से ॠतु-परिवर्तन होता था और फसल भी आ जाती थी । इसलिए सभी उल्लसित होकर अपने घरों को सजाते थे और रात में दिये जलाते थे । रात्रि के प्रकाश में लोग नये वस्र और आभूषण पहनकर घूमते थे और एक-दूसरे से मिलते थे । रात में यक्षराज की पूजा भी होती थी ।

कौमुदी जागर -क्वाँर की पूर्णिमा के जागरण को 'कौमुदी जागर' कहा गया है ॠतु-परिवर्तन-संबंधी यह उत्सव रात भर मनाया जाता था । घर-घर सजता था । स्वच्छ वस्रों में स्री-पुरुष रात को ज्योत्सना में घूमते थे । नृत्य, गीत और अन्य मनोविनोदों से रात भर चहल-पहल रहती थी ।    

इंदल -वर्षा और फसल में वांछित सफलता पर भील कार्तिक-अगहन के बीच इंदल का आयोजन करते थे । उसमें सबेरे बड़वा (पुजारी) जंगल जाकर कलम वृक्ष की पूजा करता है और उस पर दारु चढ़ाता है । उसमें कच्चा सूत लपेट कर चिहित कर देता है । संध्या-काल में स्री-पुरुष नाचते-गाते उसी वृक्ष की पूजा करते हैं और मुर्गे की बलि देते हैं । वृक्ष की पाँच शाखाओं का तिलक करने के बाद वे उन्हें काटकर समारोह के साथ गाँव के खुले मैदान में ले जाते हैं, जहाँ उन्हें भूमि-पूजन के बाद एक सीध में रोप दिया जाता है । इन शखाओं के आस-पास पुरुष और बच्चे नृत्य करते हैं और स्रियाँ गाती हैं । फिर उनके चारों तरफ बकरों की बलि दी जाती है और भोज होता है । लोग घर से रोटी लाकर स्वयं खाते हैं और अतिथियों का भोजन वहीं बनता है । कहीं-कहीं पर रोपित शाखाओं के सामने पटों पर क्वाँरी लड़कियों द्वारा लायी मिट्टी की टोकरियाँ रख देते हैं और बड़वा (पुजारी) उनमें गेहूँ के या मोटे अनाज के दाने छोड़ता है । इस तरह यह वृक्ष लगाने और फसलें बोने-दोनों का लोकोत्सव सिद्ध होता है ।

वप्प -मंगल और हरढिली-वर्षा के बाद जुताई प्रारम्भ करने के प्रथम दिवस को 'वप्प-मंगल-दिवस' कहा जाता था और बोनी के समापन पर बैलों को हर से ढीलने के कारण 'हरढिली' उत्सव मनाया जाता था । वैसे वप का अर्थ बीज बोना होता है और संस्कृत 'वप' का प्राकृत में 'वप्प' हो जाता है, लेकिन कृषि-उत्सव तो हल चलाने के पहले दिन ही होता है । दोनों में हल और बैलों की पूजा होती है । भोज, नृत्य और गीत होते हैं । पुजारी और बैगा बैलों की रक्षा के लिए ही नहीं, फसल की समृद्धि के लिए भी प्रकृति के प्रतीक हर घर को देते हैं ।

जातर - बीज बोने के बाद फसल (मक्का या अन्य) के पौधे बड़े होने और फसल में दाने भरने पर दो बार 'जातर' उत्सव भीलों द्वारा हर्षोल्लास से मनाया जाता था । गाँव का मुखिया यह आयोजन अपने घर करता था अथवा सार्वजनिक स्थान पर होता था । ढाँक और कामड़ी पर गीत, भजन गाये जाते थे और बकरे या मुर्गे की बलि भी दी जाती थी । फिर सामूहिक भोज होता था । कभी-कभी बड़वा को भार (भाव) आता ता और वह लौकिक उत्सव को धर्म की आस्था से जोड़ने का सार्थक माध्यम था ।

जवारा- जातर की तरह यह भी एक लौकिक उत्सव था, बाद में देवी की पूजा से जुड़कर धार्मिक बन गया था । जवारा क्वाँर और चैत्र के महीनों में वर्ष में दो बार होता था । दोनों बार प्रथम दिन जौ बोये जाते हैं, फिर नौ दिन निरंतर सींचे और पोसे भी जाते हैं तथा नवें दिन संध्या-काल में किसी जलाशय या जलधारा में सिराये जाते हैं । नौ दिन तक उनकी पूजा होती है । इस प्रकार जौ (यव) के इतने सम्मान के कारण ही इसे 'जवारा' कहा जाता है । जै अन्न या फसल का प्रतिनिधित्व करता है । अतएव यह अन्न का ही सम्मान है । पहले तो यह फसल का ही लोकोत्सव था, बाद में उपजाने वाली शक्ति से संबद्ध होकर देवी-पूजा का व्रत और उत्सव हो गया । धीरे-धीरे उसमें कर्मकांड और चमत्कार भी शामिल होते गये, जिनका विवरण कालक्रम के अनुसार दिया जाएगा ।

कजरिया -यह त्योहार भी फसल से संबंधित था । श्रावण-शुक्ल पक्ष की नवमी को गेहूँ-जौ मिलाकर सात या नौ दोनों में बोये जाते थे और सातवें दिन पूर्णिमा को उन्हें किसी सरोवर या नदी में खोंट कर सिरा दिया जाता था । प्राचीन काल में लोग फसल की स्थिति का अनुमान लगाने के लिए ही यह आयोजन करते थे । बाद में अन्य उद्देश्य भी उससे जुड़ गये ।

बकबन्धी -गोंड़ों का बकबन्धी आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जानेवाला रक्षा-तेयौहार है । बैगा छेवले (पलाश) की जड़ से रेशे निकलवाता है और उन्हें हल्दी से रँगवाकर मंत्र पढ़ते हुए अपने जजमानों कीर दायीं कलाइयों में बाँधता है । घरों में रखने या बँधे होने और खेतों में गाड़ने से दोनों सुरक्षित रहते हैं । न तो घर के लोगों और पशुओं को कोई बाधा सताती है और न फसल में कोई बीमारी लगती है । यही विश्वास इस त्योहार का प्रमुख आधार था । बुंदेली में छेवले की जड़ के रेशों को 'बकौंड़ा' कहते हैं और इस त्योहार को 'बकौंड़याऊ' पूनो । निश्चित है कि भाषिक दृष्टि से दोनों शब्दों का स्रोत 'बक' रहा है और यह त्योहार गोंड़ों की देन है ।

नवइ -नयी फसल आने पर भील नवई त्योहार मनाने का दिन निश्चित करते है । स्रियाँ नये अनाज की खीर, पकवान् आदि और सूब्जी तैयार करती हैं, जिन्हें पलाश के पत्तों पर रखकर कुलदेव, गृहदेव और मृत पुरखों को भोग लगाया जाता है । फिर गाँव के लोग गाँव के देवता के स्थान पर जाकर उनकी पूजा करते हैं और भोज्य तथा दारु चढ़ाते हैं । इसके बाद एक-दूसरे के यहाँ जाकर खाते-खिलाते हैं । कहीं-कहीं सामूहिक भोज की प्रथा थी और उसमें दारु और माँस का प्रयोग भी होता था । इस प्रथा के अवशेष आज भी मौजूद हैं ।

नवाखानी -नवई की तरह नाखानी गोंड़ों का नयी फसल का त्योहार है । भादों के शुक्ल पक्ष में कोई दिन इसके आयोजन के लिए निश्चित होता है । रात में घर का मुखिया पीले चावल देकर कुलदेवता और पुरखों को नवाखानी के लिए निमंत्रित करता है । सबेरे घर की पवित्रता के बाद खीर, भात, पकवान् आदि तथा सब्जी बनायी जाती है और उन्हीं का भोग लगाया जाता है । घर का मुखिया स्नानादि के बाद कुलदेवता, अन्य देवी-देवताओं और मृत पुरखों की पूजा करता है, रार का होम करता है और दीप दिखाता है । फिर नये पकवानों का भोग लगने पर घर के सभी लोग प्रसाद रुप में नया भोजन करते हैं । यह सब परिवार तक ही सीमित रहता है ।

रुद्दमह और शिवमह -विद्वानों और पुरातत्त्वविदों का मत है कि रुद्र और शिव की पूजा सबसे प्राचीन है । निषाद जातियों में शिव का भयंकर रुप मान्य था, जो रुद्र की संज्ञा से अभिहित किया जा सकता है और जिसका अवशिष्ट भैरव है । भील शम्भू को अपना पिता और रक्षक बतलाते हैं । गोंड़ों के बड़ा देव ही आगे चलकर महादेव हो गये हैं । सौंरों में भैरव की मान्यता थी । द्रविड़ों के पशपुति शिव के ही रुप थे । आशय यह है कि इस अंचल में भवानी (शक्ति), यक्ष के बाद शिव ही लोकदेव रहे । इस आधार पर शक्तिमह, यक्षमह के साथ शिवमह भी मनाया जाता था, जिसमें शिव के विग्रह की स्थापना, पूजा, नृत्य-गीत, बलि, भोज आदि होता था ।

स्कन्दमह -स्कंद पहले अपदेव ही थे । उनके जन्म के संबंध में एक मत यह है कि वे रुद्र के वीर्य से उत्पन्न हुए थे और दूसरा यह है कि वे अद्भुत (यक्ष) के पुत्र थे । दोनों का अपना औचित्य है, क्योंकि स्कंद की मान्यता रुद्र और यक्ष के बाद हुई थी । स्कंद को रुद्र और यक्ष से जुड़ने पर प्रतिष्ठा मिली थी । फिर अग्नि और इन्द्र के साथ सामंजस्य होने पर वे महिमामंडित हो गये । इस अंचल में स्कंदमह का काई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, पर पिशाच रुप में वे भयंकर पुरुषग्रहों और स्रीग्रहों के अधिपति थे तथा पिशाची प्रवृत्ति आदिवासियों में मिलती है । यह निश्चित है कि स्कन्द जैसे अपदेवता की लोकप्रियता इस भूभाग में थी और इसी कारण आदिवासी उसे महत्त्व देते थे ।

उक्त लोकोत्सवों से विदित है कि वे निम्न वर्गों में बँटे हुए थे-(१) प्रकृतिपरक लोकोत्सव, जैसे-वृक्षमह, नदीमह आदि । (२) ॠतुपरक, जैसै-बिदरी, दिवासा, ढोडी, कत्तिक-नक्खत्त, कौमुदी जागर आदि । (३) कृषिपरक, जैसे-छेरता, वप्पमंगल, हरढिली, जातर, जवारा, कजरिया, नवई, नवाखानी आदि । (४) रंजनपरक, जैसे-धनुर्मह, बाल-नक्खत्त, सुरा-नक्खत्त आदि । (५) श्राद्धपरक, जैसै-चैत्यमह, स्तूपमह आदि । (६) अपदेवतापरक, जैसे-भूतमह, स्कंदमह आदि । (७) देवतापरक, जैसे-शक्तिमह, शिवमह आदि । इन्हीं बिन्दुओं को क्रमिक रुप में रखकर लोकोत्सवों के प्रथम चरण की विकास-रेखा का अध्ययन किया जा सकता है ।

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विकास का द्वितीय चरण

द्वितीय चरण के अंतर्गत महाभारत काल से लेकर हर्ष काल तक का दीर्घकाल आता है, जिसमें लोकोत्सवों के प्रति लोक का दृष्टिकोम भी बदला और उनकी विभिन्न पद्धतियाँ भी विकसित हुईं । चेदि के जनपद बनने से इस अंचल का गौरव बढ़ा और दूसरे अंचलों एवं साम्राज्यों से सम्पर्क होने पर लोकोत्सव व्यापक भूमि पर प्रतिष्ठित होने लगे । बाहर के लोकोत्सवों ने अपना प्रभाव डालना प्रारम्भ कर दिया । नागों और वाकाटकों ने अपने राज्यों को शक्तिशाली बनाया, पर उनके बाद यहाँ की राजनीतिक शक्ति निर्बल पड़ गयी थी । यहाँ के लोकधर्म का विकास भी गतिशील बना रहा । पहले वैदिक धर्म ने अपने आश्रम बनाये, बाद में बौद्ध-धर्म का प्रसार रहा । शुंगों ने भागवत-धर्म और नाग-वाकाटकों ने शैव-धर्म का महत्त्व प्रतिष्ठित किया, जिसके कारण कई लोकोत्सव विशिष्ट हो गये । कर्मकाण्ड की महत्ता भी बढ़ी । धार्मिकता अनिवार्य-सी होती गयी । पुराणकारों ने तो लोकोत्सवों की लोककथाएँ और व्रत-कथाएँ लिखकर उन्हें अमरत्व प्रदान कर दिया । असल में उपयोगी प्रथाएँ, रीतियाँ आदि धर्म के अंतर्गत लोने से उनकी अनिवार्यता बनी रही । इस तरह लोकहित, लोकधर्म और लोकोत्सव का अद्भुत संघटन तैयार हुआ जो आज तक किसी-न-किसी रुप में प्रभावी रहा है ।

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महा भारत काल

रामायण-काल में यज्ञकेन्द्रित उत्सवधर्मिता का प्रवेश इस अंचल के लोकोत्सवी मन के लिए बिल्कुल नया अनुभव था, लेकिन उससे राक्षसी उत्सवों के खिलाफ उठने वाली प्रतिक्रिया को एक नयी दिशा मिली । इस प्रकार इस काल की उतसवी मानसिकता में बदलाव तो आया, पर वह अपूर्ण ही रहा । महाभारत काल में परिवर्तन के सही स्वरुप का पता चलता है । उदाहरण के लिए, महाभारत के पहले इन्द्रमह का आयोजन होने लगा था । आदिवासियों में वर्षा के देव इन्द्र से मिलते-जुलते हैं, फिर भी उन्हें इन्द्र कहना कठिन है । जबकि महाभारत से स्पष्ट है कि चेदिनरेश उपरिचर वसु ने इन्द्रमह लोकोत्सव का श्रीगणेश किया था । इन्द्र ने उन्हें एक वैणवी (बाँस की) यष्टि प्रदान की थी, जो इन्द्र -पूजा की प्रतीक बनी । स घटना-प्रधान कथा का आशय यही है कि इस जनपद में वैदिक देवता इन्द्र और वैदिक उत्सव इन्द्रमह को स्वीकृति मिल चुकी थी । इस प्रकार आदिवासियों के वर्षा-संबंधी उत्सवों में भी इन्द्रदेव के अनुरुपी विग्रह को महत्त्व मिलने लगा था । लेकिन गोचारणी यादवी संस्कृति के प्रतिनिधि कृष्ण ने इन्द्रमह के स्थान पर गिरिमह और गोमह को लोकमान्यता दिला दी । इस रुप में उत्सवी लोकमन के परिवर्तन का एक निश्चित इतिहास मिलता है ।

रामायण में धनुर्मह और सामाज नामक लोकोत्सवों का प्रमाण मिलता है । धनुर्मह में शिव की पूजा का प्रवेश हो गया और वह परीक्षा का माध्यम होकर विवाह से जुड़ गया । रामायण का धनुष शिव या दिव्य-धनु था । महाभारत में वह जहाँ द्रौपदी-स्वयंवर का साधन बना, वहाँ कंस के धनुर्मह में कृष्ण की शक्ति-परीक्षण का शस्र । रामायण में धनुर्मह स्वतंत्र उत्सव है, जबकि महाभारत में समाज का एक अंग है । इसका सीधा अर्थ है कि महाभारत-काल में 'समाज' नामक लोकोत्सव अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया ता । रामायण-काल में समाज लोकप्रिय थे । राक्षस भी समाज मनाते थे । महाभारत-काल में वह दीर्घकालीन उत्सव हो गया था । उसमें न जाने कितने विनोद सम्मिलित हो गये थे । समाज में राजसी, धनी और निर्धन-सभी भागीदार होते थे । सभी के लिए अलग-अलग मंचों की व्यवस्था रहती थी । इन उत्सवों की विशेषता यह थी कि इनकी तिथि, निर्धारित नहीं थी । आवश्यकता होने पर या हर्ष के अवसर पर ये बुलाये जाते थे । जनपद का शासन समाजो का संरक्षक होता था, इसलिए वह अपना समाज भी चलाता था । कभी-कभी समाजोत्सव भिन्न-भिन्न कलाकारों, पहलवानों इन्द्रजालिकों आदि के दलों के जुड़ाव से अपना स्वरुप ग्रहण करता था। इस दृष्टि से धनुर्मह जैसे उत्सवों की अपेक्षा समाजों में सामूहिकता अधिक रहती थी ।

प्रकृतिपरक लोकोत्सव प्रकृतिपरक लोकदेवों से संबद्ध हो गये थे । महाभारत में इन देवों और लोकोत्सवों का संकेत मिलता है । नरवरगढ़ के नरेश नल के अदृश्य हो जानो पर दमयन्ती विलाप करते हुए वनदेवता, गिरिदेवता और नदीदेवता का स्मरण करती है । गिरिमह, रैवतकमह का उल्लेख है, जिससे स्पष्ट है कि प्रकृतिपरक लोकोत्सव विद्यमान थे । ब्रह्ममह या ब्रह्म उत्सव को आदिपर्व में ब्रह्ममहोत्सव भी कहा गया है, जिससे यक्ष-पूजा और उत्सव का पता चलता है । पिशाच, भूत आदि अपदेवताओं की पूजा होती थी, अतएव भूतमह और स्कंदमह जैसे लोकोत्सवों की परम्परा थी । महाभारत के सभा पर्व में लिखा है कि प्रत्येक घर में एक राक्षसी का वास होता है, जो गृहदेवी कहलाती है । सौप्तिक पर्व में काली के लिए कालरात्रिस्वरुपा कहा गया है, जोकि पाश में बँधे प्रेतों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी । रुद्ररुप में महादेव की पूजा अधिक प्रचलित थी । तात्पर्य यह है कि उग्र अपदेवता और देवता ज्यादा पूजित थे । महाभारत में इस तथ्य को स्वीकारा गया है कि ब्रह्मा, विष्णु आदि निरीह समदर्शी दोवताओं की पूजा करना आवश्यक नहीं समझा जाता था (शान्ति पर्व १५/१६-१९) । इस तरह इस युग में अपदेवता का देवता के रुप में विकास स्पष्ट है । इस अंचल का लोक भी यक्ष, स्कंद, काली, रुद्र आदि को देवता के रुप में श्रद्धा देता था और उनसे जुड़े यक्षमह, स्कंदमह, शक्तिमह, रुद्रमह आदि लोकोत्सव मनाता था । ॠतुपरक और कृषिपरक उत्सव भी मनाये जाते थे, पर इस अंचल में उनके स्वरुप का प्रामाणिक वर्णन प्राप्त नहीं है । हत्थिमह जैसै उत्सव भी इस युग में होने लगे थे, क्योंकि चेदिनरेश शिशुपाल एक प्रभावशाली राजा थे और उनके राज्य में हाथियों को पंक्तिबद्ध खड़ा करके उत्सव मनाना कठिन नहीं था ।

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मौय -शुंग काल

इस काल के प्रकृतिपरक उत्सवों में वृक्षमह, गिरिमह, नदीमह, वनमह, तड़ागामह आदि प्रचलन में थे । ॠतुपरक उत्सवों में कत्तिक-नक्खत्त, कौमुदीजागर आदि के साथ बिदरी, दिवासा, ढोडी आदि आदिवासी-परम्परा के उत्सव भी मनाये जाते थे । कृषिपरक उत्सवों में परम्परित उत्सव ही प्रमुख थे । उनमें थोड़ा-बहुत परिवर्तन स्वाभाविक था । उदाहरण के लिए, वप्प-मंगल में हल चलाते समय कुछ मंत्र पढ़े जाने लगे थे । राजा किसान को एक हल सौंपकर उसे प्रोत्साहन देता था । रंजनपरक लोकोत्सवों का विकास निरंतर होता रहा है । सुरा-पान (सुरा-नक्खत्त) की भी प्रसार हो गया था । जातक-काल में सप्ताह-भर मनाने के साक्ष्य मिले हैं । राजा की विजय पर यह उत्सव राज्य की तरफ से होता था । मित्रों, साधु-संतों और राजा को सुरा की भेंट भेजने का चलन था । बालनक्खत्त और अधिक स्वच्छंद होकर मनाया जाने लगा ता । सात दिन तक लोगों का गोबर और कीचड़ लपेटे दूसरों को गाली देना और सिक्के लेना चलता रहता था । वस्तुत: यह होली का पूर्व रुप ही था।

बहुधा मनोविनोद समाजों में आयोजित होते थे । जातकों में कुश्ती, पशुओं की लड़ाई, गौ-क्रीड़ा, पक्षियों की लड़ाई, जुआ और सुरा-पान की गौष्ठियाँ होती थीं । समाज के लिए निमंत्रण भेजे जाते थे और नाटककार, कलाकार, इन्द्रजालिक आदि के अलावा नगर के मान्य नागरिक भी आते थे । एक तरह से यह लोकोत्सव का परिनिष्ठित रुप था । लेकिन परिनिष्ठित स्वरुप में भी कुछ दोष अपने-आप रेंग जाते हैं । अशोक के समय कुछ समाजों में मांस-मदिरादि का अतिरेक हो गया था, इसीलिए उसने उन्हें बंद करने की आज्ञा दी थी । जिन समाजों में हिंसा, मांस-भक्षण आदि नहीं होता था, उन्हें साधु समाज कहा जाता था । फिर भी इतना निश्चित था कि समाजों में निषेधों का पालन कम ही हो पाता था ।

देवताओं और अपदेवताओं को प्रसन्न करने के लिए लोकोत्सव होते थे । अपदेवता तो और भी महत्त्वपूर्ण थे । कार्तिक के कृष्णपक्ष की तेरस को यमदेव प्रसन्न किये जाते थे और अपमृत्यु से बचने के लिए दिये जलाये जाते थे । कार्तिक अमावस्या में भी यक्षों को प्रसन्न करने के लिए जुआ खेलकर रात-जागरण (रतजगा) करना पड़ता था । पहली को यमरात्रि और दूसरी को यक्षरात्रि कहते थे । नाग की पूजा भी इसी कारण होती थी । जातकों की कथाओं में नागकथाएँ भरी पड़ी हैं । जिस तरह कृष्ण ने कालियनाग को नाथकर नागनथैया का विरुद धारण किया था, उसी तरह बुद्ध ने कई नागों को वश में करने के बाद अपने धर्म का प्रसार सफलतापूर्वक किया ता । नागमह इस समय तक बहुत लोकप्रिय हो चुके थे । शक्तिमह की परम्परा में देवी विन्ध्यवासिनी उत्सव भी काफी प्राचीन ता । महाभारत-काल में देवी की प्रसिद्धि हो चुकी थी । युधिष्ठिर ने विन्ध्य पर्वत पर उनका निवास-स्थान बताया था (४/६/१७) । इस तरह विन्ध्यवासिनी और दुर्गा की एकता प्रतिष्ठित की गयी थी । विन्ध्यवासिनी का उत्सव चैत्र के शुक्ल पक्ष में होता था । यह निश्चित है कि पहले देवी अपदेवी थीं, बाद में देवी का स्वरुप धीरे-धीरे बना । चण्डिका पर विचार करते समय इस पर विस्तार से प्रकाश डाला जाएगा ।

वैदिक देवत्व से प्रभावित इन्द्रमह भी लोकप्रचलन में था । यह भादों या क्वाँर में मनाया जाता था, सरोवर जल से भरे हों और धरती हरीतिमा से ढकी हो । बीस-इक्कीस हाथ लम्बा स्तम्भ सजा-धजाकर डोरियों के सहारे खड़ा किया जाता था, जिसके शिखर पर श्वेत छत्र रहता था । उसके कई हिस्सों में ध्वज लहरते रहते थे । यह उत्सव कई दिनों तक इच्छानुसार चलता था । रात में नृत्य, गीत, नाटक, जुआ और मल्ल-युद्ध होते थे । रात्रि-जागरण भी महत्त्व रखता ता । दूसरे तरह का देवत्त्व वासुदेव कृष्ण का था, जो महाभारत-काल में इन्द्र से भी अधिक प्रभावशली हो चुका था और जिनकी वजह से गिरिमह और गोवर्धन उत्सव लोकोत्सव बन चुके थे । वैदिक और अवैदिक देवत्व-दोनों के प्रभाव से लोकोत्सवों में सामंजस्य की स्थिति शुरु हो गयी थी । इस समझौते की मानसिकता से अलग आदिवासियों के परम्परित लोकोत्सव थे । उदाहरण के लिए, शाबरोत्सव प्रचलित था, जिसमें लोग अपने शरीर और मुख में कीचड़, गोबर आदि लपेट कर अंड-बंड बकते हैं और अश्लील क्रियाओं की चिन्ता न करते हुए नृत्यगीत में खो जाते हैं । फिर भी उनमें बदलाव का पुण्य नक्षत्र आता है और तब किसी नयेपन का अवतरण होता है ।

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नाग -वाकाटक काल

नाग-काल में पवायाँ (पद्मावती) यक्ष-पूजा का प्रमुख केन्द्र था । वहाँ के एक खेत में प्राप्त मानवाकार माणिभद्र यक्ष की मूर्ति और उसकी चरण-चौकी पर अंकित अभिलेख से सिद्ध है कि यक्ष-उपासना लोकप्रचलित थी । यक्षों के चैत्य बनाने की प्रथा भी थी, पर अधिकतर उनके चबूतरे ही मिलते हैं । इस अंचल में 'गाँव-गाँव कौ ठाकुर, गाँव-गाँव कौ बीर' की उक्तित प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध रही है । बेसनगर (विदिशा) में वेत्रवती और बेस नदियों के संगम से १२ फुट ऊँची यक्षमूर्ति मिली है । इसी तरह भरहुत में वेदिका-स्तम्भों पर यक्षों की मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गयी हैं । लेकिन यक्षों के चबूतरे ही उनकी व्यापक लोकप्रियता के प्रमाण हैं । स्पष्ट है कि यक्षमह का आयोजन प्रमुख था ।

यक्ष के लिए 'बीर' का प्रयोग शक्तिसम्पन्न के अर्थ में किया गया है । यक्ष 'इन्द्र' की समकक्षता में खड़े हुए थे । अंतर इतना था कि इन्द्र वैदिक देवता थे, जबकि यक्ष अपदेवता थे और उनका संबंध अनार्य जातियों से था । यक्ष ने अपनी शारीरिक और बौद्धिक शक्ति द्वारा इन्द्र को पराभूत कर दिया था । इसी वजह से 'इन्द्रध्वज' का प्रचलन कम हो गया था । हनुमानजी को 'महाबीर' कहा जाता है, जिससे वे महान् बीर (यक्ष) सिद्ध होते हैं । उनके शरीर के महाकार से ही नहीं, उनके रुप बदलने के चमत्कार और अपरिमित शक्ति से वे यक्ष प्रतीत होते हैं । वे पहले अनार्य अपदेवता ही थे, बाद में राम के सान्निध्य में आर्य देवता बन गये थे । इस प्रकार आर्य और अनार्य देवत्व के सामंजस्य से एक ऐसे देवता का उदय हुआ, जो शक्ति और भक्ति-दोनों में अपराजेय था । ऐसे देवत्व की प्रतिष्ठा, पूजा और लोकप्रियता हमेशा आवश्यक बनी रही और उसे केन्द्र में रखकर लोकोत्सव होते रहे ।

भारशिवों और वाकाटकों ने शिव को आराध्य माना था । उनके सभी कार्यों के संचालक शिव थे । खासतौर से संहारकर्ता शिव, जो विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा करने में समर्थ थे । शिव से संबंधित गंगा, गोमाता और वृषभ भी पूज्य बन गये थे । भुमरा और नचना में शिव और पार्वती के मंदिरों का निर्माण और उनमें गंगादि शिव-परिकर की मूर्तियों की प्रधानता से शिव के प्रभाव की व्यापकता सिद्ध होती है । नागों के सिक्कों पर नन्दी और गंगा की मूर्तियाँ यदा-कदा मिलती हैं । वाकाटकों का साम्राज्य-चिन्ह गंगा था । उनके योद्धा शिव-भैरव को सहायक रुप में महत्त्व देते थे-हूणों के आक्रमणों के विरुद्ध लड़नेवालों को प्रेरणा देने के लिए । शायद इसीलिए गणेश और स्कंद को भी आस्था का केन्द्र बनाया गया था । दोनों विध्नकर्ता अपदेवता थे । गणेश विनायक के रुप में विध्नों और बाधाओं को खड़ा करते थे और स्कंद पिशाच के रुप में उपद्रव करते और शिशुओं का मांस खाते थे । बाद में दोनों देवत्व को प्राप्त हुए । उदयगिरि (विदिशा) की गुफा, और देवगढ़ (ललितपुर जिला) के दशावतार मंदिर में गणेश की मूर्तियाँ विद्यमान हैं । भूमरा के शिवमंदिर के मलबे से गणेश की दो मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं । बानपुर में बाईस भुजाओं वाली मूर्ति से शक्तिसम्पन्न गणेश का अभिप्राय मिलता है । इन सब प्रमाणों से इस क्षेत्र में गणेश-पूजा और गणेशव्रत का प्रचलन सिद्ध हो जाता है । स्कंद या कार्तिकेय तो देवसेना के सेनापति के रुप में सम्मान पा जाते हैं, पर उनका यह रुप लोक में स्वीकार्य नहीं हो पाया । लोक तो अपनी समस्याएँ देखता है, उसे देवताओं की समस्याओं से क्या मतलब । स्कंद की पूजा इसलिए शुरु हुई कि वह शिशुओं का मांस न खाए । दूसरे, पिशाच रुप में स्कंद और मातृदेवियों के घनिष्ठ संबंध की कई कथाएँ महाभारत-काल से प्रचलित थीं । इस तरह लोक में कुमार (स्कंद) की पूजा होना एक अलग अभिप्राय से संबद्ध रहा है ।

स्कंद द्वारा मान्य मातृकाएँ दो तरह की थीं-कुछ शिव और कुछ अशिव । डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने अशिव मातृकाओं में शीतवती, पूतना, मुखमण्डिका, जातहारिणी, बहुपुत्रिका और हारीती की चर्चा की है । हारीती राजगृह की लोकदेवी थी, जो बच्चों को अपहृत कर खा जाती थी । भगवान् बुद्ध ने उसके पुत्र को छिपा लिया, जिससे हारीती को पीड़ा हुई । ऐसी स्थिति में बुद्ध ने उसे समझाया और उसका मन ऐसा बदला कि वह बच्चों की रक्षक बन गयी । वस्तुत: यह कथा मन के परिवर्तन का अभिप्राय प्रसुतुत करती है और अपदेवत्व के मनोविज्ञान को स्पष्ट करती है । फिर मूर्तिकला में अपदेवी के साथ हँसते-खेलते बच्चों का अंकन होने लगा और उस अभिप्राय को 'कुमारक्रीड़ितक' कहा गया । कुमार-क्रीड़ा का अंकन भूमरा के शिवमंदिर की जगती के शिलापट्टों पर हुआ है, जिससे स्पष्ट है कि इस अंचल में भी यह अभिप्राय और इससे बुनी कोई कथा लोक में प्रचलित थी । बच्चा पैदा होने पर छठ को छठी (षष्ठी) का 'हाँतो' (थापा) लगना ही इसी अभिप्राय की कथा का अवशिष्ट है । 'बीजासेन' की पूजा भी इसीलिए शुरु हुई और 'स्क्कस' बाबा की भी । नौरता का 'सुआटा' नामक दानव, राक्षस या भूत की पूजा भी इसी का फल है । ये मातृगण (स्रीगण) और पुरुषगण सब स्कंद के रौद्र रुप के गण हैं । अतएव स्कंदमह के लोकप्रिय होने से उससे बहुत छोटे-छोटे घटस फूटकर अलग होते गये और लोकभक्ति एवं लोकोत्सव का अंग बनते गये ।

इतिहासकार काशीप्रसाद जायसवाल ने भारशिव राजाओं के कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित कुछ सिक्कों की चर्चा अपनी पुस्तक "अंधकारयुगीन भारत' में की है । क्रमांक ८, १०, ११, १२, में कठघरे के अंदर एक वृक्ष दर्शाया गया है, जिससे चैत्यवृक्ष और वृक्षमह दोनों के प्रमाण मिल जाते हैं । कई सिक्कों पर सपं के चिह्म अंकित हैं, जिससे नाग-पूजा और नागमह के प्रचलन का पता चलता है । सिक्कों से ऐसी कई बातों का पता चलता है, जो लोकसंस्कृति से संबंधित होती हैं और जिन्हें इतिहासकार नहीं समझ पाते । उदाहरण के लिए, सिक्का क्र. १० में शेर के ऊपर सूर्य-चन्द्र बने हैं। यह अभिप्राय बुंदेली लोकचित्रों और लोकमूर्तियों का है, जो चरज नाग के राज्यकाल (२६०-९० इ.) में प्रचलित था । सती-स्तम्भ में उत्कीर्ण सूर्य-चन्द्र से गलत अर्थ लगाकर हेमवती और चन्द्रमा से चंदेलों का जन्म मान लिया गया है । भूमरा के शिवमंदिर में सूर्य की मूर्ति उँकेरी गयी है । ग्वालियर में सूर्य मंदिर था। पवाया (पद्मावती) में ڪ-iɨ ҹ E JV SE * इx ɤɺ इ Eɱ ڪ-{V E |ɨh ɱ Vi * xM + E]E-nx ɹh{ɮE l * {ɴɪ E ɹh֨ंn, =nMʮ + Bh E ɮɽɴiɮ ɹh uɮ vɮh E =rɮ +n ɹh-{V E |Sɱx ɪंr * इx nx =nɽh BE ɨxɪEɮ vɨ-vx E ɨɮ E {i Sɱi , VɺE +ɮ ɽ E Eiɴ xɺEi {ɮ {c l, CE vɨE Eiɴ vɨE ɽhi Vɰ l *

शिव की प्रधानता से शक्ति-पूजा का प्रभाव स्वाभाविक है । नचना का पार्वती मंदिर, उदयगिरि और भुमरा में दुर्गा की मूर्तियाँ तथा विन्ध्यवासिनी और लक्ष्मी के अभिनव उत्थान से भी एक समन्वित शक्ति-पूजन का उदय होता है, जो तत्कालीन विदेशी संस्कृति के आक्रमण के विरुद्ध एक आवश्यक उपादान था । पहले थी शबरों और पुलिंदों (आदिवासियों) की देवी, फिर भवानी और पाशुपति का युग्म प्रचलित हुआ । भूदेवी या भुइयाँरानी जुड़ीं। शिव के साथ शक्ति और पार्वती आयीं, लेकिन दुर्ग असुर को पछाड़कर दुर्गा बनीं और फिर शक्ति के रौद्र रुप में महाकाली, महासरस्वती एवं महालक्ष्मी उदित हुईं । सबका केन्द्र शिव की संगिनी शक्ति थीं । 'विन्ध्ये तब स्थानम्' से इस अंचल की महत्ता बढ़ी और नवरात्रि का व्रत यहीं से प्रारम्भ हुआ 

मदनोत्सव का प्रारम्भ इसी काल में हुआ था । उसे कामसूत्र में 'सुवसंतक' कहा गया है । मूल रुप में यह ॠतु का उत्सव 'ॠतूत्सव' था, जो वसन्त ॠतु के आगमन पर होता था। ॠतु की अगवानी में पुरुष और स्रियाँ गीत-नृत्य करते थे । पुराणों ने 'काम' की पूजा को महत्त्व दिया, अतएव यह 'मदनोत्सव' हो गया । घर में 'काम' की पूजा आम के और टेसू के फूल से की जाती थी और बाहर आयु, रंग एवलं जाति के भेद-भाव को भुलाकर एक-दूसरे से प्रेम दर्शाते और मिलते-जुलते थे । मर्यादाओं को भुलाकर आमोद-प्रमोद में लीन हो जाते थे। कामसूत्र में होलाक नाम के एक उत्सव का उल्लेख है, जिसमें टेसू के फूलों से बना रंग एक-दूसरे पर डालने की प्रथा थी । इसी तरह कार्तिक की तेरस को दीप-दान के बाद अमावस्या को सुरापान और जुआ-क्रीड़ा की छूट थी। लक्ष्मी-पूजन इसी काल से प्रारम्भ हुआ, पर इस अंचल में उसका कोई प्रामाणिक साक्ष्य नहीं मिलता। देवगढ़ के दशावतार मंदिर में विष्णु के चरण चापती लक्ष्मी उत्कीर्ण है, जिससे यह कहना ठीक है कि इस अंचल में विष्णु और लक्ष्मी की भक्ति का प्रसार हो रहा था । कौमुदी जागर अब कौमुदी-उत्सव के रुप में मान्य हो चुका था, जिसका प्रमाण संस्कृत नाटक में मिलता है ('कौमुदी-महोत्सव' नाटक, रचना-काल ३४० ई०)।

उत्सवी सभाएँ भी आयोजित की जाती थीं, जिन्हें उत्सव, समाज और विहार कहा जाता था । इनमें आमोद-प्रमोद के साथ-साथ सहभोज और सुरापान होता था । राजा या समाज का मुखिया उनका आयोजन समय-समय पर करता था । उनमें स्थानीय और बाहर से आये कलाकार भाग लेते थे । गीत, नृत्य और नाटक होते थे । समाज के लिए या तो समाजवाट नाम से स्थायी भवन थे या देवमंदिर।

इस काल में अनुष्ठान और व्रत प्रमुख महत्त्व पा चुके थे । शिव और शिव-परिकर से जुड़े व्रत और उपवास प्रारम्भ हो चुके थे । व्रत प्रमुख रुप में दो प्रकार के थे । एक वे, जो त्योहारों पर अनिवार्य-से थे और दूसरे वे, जो मनौती के रुप में किये जाते थे। शिव और शक्ति से संबद्ध व्रतों में शिवरात्रि और नवरात्रि के व्रत-अनुष्ठान ही थे । गो-सेवा का व्रत भी तत्कालीन जीवन का प्रमुख अंग हो चुका था । लक्ष्मी-पूजन के दिन उपवास किया जाता था । मनौती के रुप में स्रियाँ पति के रुठने या परदेश जाने पर व्रत करती थीं। पहले को प्रियप्रसादन और दूसरे को काकबलि कहा गया है । नाग और उनकी प्रजा योद्धा शिव की आराधना में कठोर व्रत करती थी। एक ही शय्या पर पत्नी के साथ सोकर ब्रह्मचर्य का पालन असिधाराव्रत-सा कठोर था। अन्य व्रत भी प्रचलित थे, पर उनका साक्ष्य उपलब्ध नहीं है ।

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पौरा णिक काल

तीसरी-चौथी शती से पुराण-लेखन प्रारम्भ हुआ और आठवीं-नवीं तक निरंतर चलता रहा, इसलिए इसे पौराणिक काल कहना सर्वथा उचित है। यद्यपि इस दीर्घ काल में गुप्तों का स्वर्ण युग, पुष्यभूतियों का धर्म युग और शक-हूणों के आक्रमण, सब कुछ समा जाता है, तथापि पुराण-इतिहास में सबका लेखा-जोखा है। दूसरे, पुराणों ने लोक को पुन: संस्कारित कर समन्वय स्थापित करने का महत्कार्य किया है । लोकजीवन में जो सिद्धांतत: और व्यवहारत: सत्य है, उसे धर्म, धार्मिक क्रियाओं, व्रत एवं त्योहारों में आत्मसात् करने का काम इतनी कुशलता से हुआ है कि उसकी बराबरी करना बहुत मुश्किल है। विदेशी आक्रमणकारी संस्कृतियों के विरुद्ध भारतीय संस्कृति की रक्षा करने का व्रत हर भारतीय पुरुष और स्री ने ले लिया था । इस सांस्कृतिक संघर्ष के अस्र थे-पुराण, जिन्होंने एक तरफ देवताओं और उनके सम्प्रदायों में सामंजस्य बैठाया था और दूसरी तरफ विभिन्न सांस्कृतिक समवायों में एकता स्थापित कर दी थी। व्रत और त्योहारों का ऐसा ताना-बाना गूँथा गया कि उसमें नाना प्रकार के देवी-देवता अपने-आप फिट हो गये और पारिवारिक एवं सामाजिक विशेषक (च्रद्धठ्ठेत्द्यs) भी उनके साथ जुड़ गये । कुछ इस तरह कि हर व्रत और त्योहार अपनी पहचान अलग बनाये रख सका । इस प्रकार व्रत और त्योहार सामाजिक एवं सांस्कृतिक ढाँचे के प्रमुख अंग बन गये । भले ही वे लौकिक या धार्मिक प्रकृति के रहे हों, पर लोक की सामाजिकता उनकी अनिवार्यता रही है । जब कोई भी लोकोत्सव सामाजिक भूमि से हटा है, तब वह कर्मकांड का प्रदर्शनमात्र रह गया है । इस वजह से लोकोत्सव को गतिशील सामाजिकता के साथ चलना पड़ा है । लोकोत्सवों को ऐसा लचीला और गतिशील गठन देने का काम पुराणों ने ही किया है और यह उनकी विशिष्ट उपलब्धि मानी जाएगी।

पुराणों ने वृक्ष, पर्वत, नदी, भूत-प्रेतादि की पूजा को उचित महत्त्व देकर उसका विस्तृत विधान बना दिया था, जिससे गौण होते उत्सवों को पुन: प्रतिष्ठा मिली । उदाहरण के लिए, स्कंद पुराण में पीपल-पूजा को अधिक मान्यता दी गयी और उसकी विधि निर्धारित की गयी, पर तुलसी, बेल, बरगद, पलाश आदि प्रमुख वृक्षों को पूजने के विर्देश भी दिये गए । वस्तुत: पुराणों ने पुराने वृक्षमह जैसे लोकोत्सवों को किसी-न-किसी धार्मिकता या देवता से जोड़कर उनकी मूल प्रकृति में परिवर्तन कर दिया था । हरिवंश पुराण में गोवर्धन महोत्सव को गिरिमह की तरह मनाने का पूरा विवरण दिया है, पर उसमें गाय, बैल, बछड़ों को अधिक महत्त्व प्रदान किया, जिससे गोमाता ही प्रधान होती गयीं और गिरि एक उपयोगी माध्यम की तरह जुड़े रहे।<