| छत्तीसगढ़ |
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Chhattisgarh |
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आधुनिक युग (1900 ई. से अब तक) |
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छत्तीसगढ़ भाषा साहित्य का आधुनिक युग 1900 " ई. से शुरु होता है। इस युग में साहित्य की अलग-अलग विधाओं का विकास बहुत ही अच्छी तरह से हुआ है।डॉ. सत्यभामा आड़िल अपनी पुस्तक " छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य" में लिखती हैं - "यद्यपि इस आधुनिक युग में गद्य के भी विविध प्रकरों का संवर्धन हुआ है, तथापि काव्य के क्षेत्र में ही महती उपलब्धियाँ दृष्टिगोचर होती हैं।" छत्तीसगढ़ी साहित्य पं. सुन्दरलाल शर्मा पं. सुन्दरलाल शर्मा जो स्वाधीनता संग्रामी थे, वे उच्च कोटी के कवि भी थे। शर्माजी ठेठ छत्तीसगड़ी में काव्य सृजन की थी। पं. सुन्दरलाल शर्मा को महाकवि कहा जाता है। किशोरावस्था से ही सुन्दरलाल शर्मा जी लिखा करते थे। उन्हें छत्तीसगड़ी और हिन्दी के अलावा संस्कृत, मराठी, बगंला, उड़िया एवं अंग्रेजी आती ती। हिन्दी और छत्तीसगड़ी में पं. सुन्दरलाल शर्मा ने 21 ग्रन्थों की रचना की। उनकी लिखी "छत्तीसगड़ी दानलीला" आज क्लासिक के रुप में स्वीकृत है।श्याम से मिलने के लिए गोपियाँ किस तरह व्याकुल हैं, वह निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट होता है- 17 ) पं. सुन्दरलाल शर्मा का जन्म राजिम में सन् 1881 में हुआ था, "छत्तीसगड़ी दानलीला" में वे अंत में लिखते हैं -
पं. सुन्दरलाल शर्मा की प्रकाशित कृतियाँ - 1. छत्तीसगढ़ी दानलीला 2. काव्यामृतवर्षिणी 3. राजीव प्रेम-पियूष 4. सीता परिणय 5. पार्वती परिणय 6. प्रल्हाद चरित्र 7. ध्रुव आख्यान 8. करुणा पच्चीसी 9. श्रीकृष्ण जन्म आख्यान 10. सच्चा सरदार 11. विक्रम शशिकला 12. विक्टोरिया वियोग 13. श्री रघुनाथ गुण कीर्तन 14. प्रताप पदावली 15. सतनामी भजनमाला 16. कंस वध।उनकी छत्तीसगढ़ी रामलीला प्रकाशित नहीं हुई। एक छत्तीसगड़ी मासिक पत्रिका "दुलरुबा" के वे संपादक एवं संचालक थे। छत्तीसगढ़ी दानलीला से उदघृत ॠंगार वर्णन इत्यादि जो डॉ. सत्यभामा आड़िल ने अपनी पुस्तक "छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य" में उल्लेख की है - (पृ. 91 )
इन पंक्तियों में प्रसाधन वर्णन, अलंकार वर्णन बड़े सुन्दर से किये गये हैं। पं. सुन्दरलाल शर्मा का देहान्त सन् 1980 में हुआ था। स्वतन्त्रता सेनानी पं. सुन्दरलाल शर्मा जी देश को आज़ाद नहीं देख पाए।
पं. बंशीधर शर्मा पं. बंशीधर शर्मा जी का जन्म सन् 1892 ई. में हुआ था। छत्तीसगढ़ी भाषा के पहले उपन्यासकरा के रुप में जाने जाते हैं। उस उपन्यास का नाम है "हीरु की कहिनी" जो छत्तीसगढ़ी भाषा में पहला उपन्यास था।सुशील यदु, अपनी पुस्तक " लोकरंग भाग- 2 , छत्तीसगड़ी के साहित्यकार" में लिखते हैं - " जइसे साहित्य में पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी हा तीन कहानी लिखकर हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठित होगे बइसने बंशीधर पाण्डे जी 1926 में एक छत्तीसगढ़ी लघु उपन्यास 'हीरु के कहानी' लिखकर छत्तीसगड़ी साहित्य में अमर होगे। आज उन्हला पहिली छत्तीसगड़ी उपन्यासकार होय के गौरव मिले है।"बंशीधर पांडे जी साहित्यकार पं. मुकुटधर पाण्डेजी के बड़े भाई और पं. लोचन प्रसाद पाण्डेजी के छोटे बाई थे। उनका लिखा हुआ हिन्दी नाटक का नाम है "विश्वास का फल" एवं उड़िया में लिखी गई गद्य काव्य का नाम है "गजेन्द्र मोक्ष" कवि गिरिवरदास वैष्णव कवि गिरिवरदास वैष्णव जी का जन्म 1897 में रायपुर जिला के बलौदाबाजार तहसील के गांव मांचाभाठ में हुआ था। उनके पिता हिन्दी के कवि रहे हैं, और बड़े भाई प्रेमदास वैष्णव भी नियमित रुप से लिखते थे।गिरिवरदास वैष्णव जी सामाजिक क्रांतिकारी कवि थे। अंग्रेजों के शासन के खिलाफ लिखते थे -
उनकी प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह "छत्तीसगढ़ी सुनाज" के नाम से प्रकाशित हुई थी। उनकी कविताओं में समाज के झलकियाँ मिलती है। समाज के अंधविश्वास, जातिगत ऊँत-नीच, छुआछूत, सामंत प्रथा इत्यादि के विरोध में लिखते थे। पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी जी का जन्म सन् 1908 में बिलासपुर में हुआ था।शुरु से ही उन्हें छत्तीसगढ़ के लोक परंपराओं और लोकगीतों में रुची थी। शुरु में ब्रजभाषा और खड़ी बोली में रचना करते थे। बाद में छत्तीसगढ़ी में लिखना शुरु किये। उनकी प्रकाशित पुस्तके हैं - 1. कुछू कांही 2. राम अउ केंवट संग्रह 3. कांग्रेस विजय आल्हा 4. शिव-स्तुति 5. गाँधी गीत 6. फागुन गीत 7. डबकत गीत 8. सुराज गीता 9. क्रांति प्रवेश 10. पंचवर्षीय योजना गीत 11. गोस्वामी तुलसीदास (जीवनी) 12. महाकवि कालिदास कीर्ति 13. छत्तीसगढ़ी साहित्य को डॉ. विनय पाठक की देन।1962 में चल बसे। स्व. प्यारेलाल गुप्त साहित्यकार एवं इतिहासविद् श्री प्यारेलाल गुप्तजी का जन्म सन् 1948 में रतरपुर में हुआ था। गुप्तजी आधुनिक साहित्यकारों के "भीष्म पितामाह" कहे जाते हैं। उनके जैसे इतिहासविद् बहुत कम हुए हैं। उनकी "प्राजीन छत्तीसगढ़" इसकी साक्षी है।साहित्यिक कृतियाँ - 1. प्राचीन छत्तीसगढ़ 2. बिलासपुर वैभव 3. एक दिन 4. रतीराम का भाग्य सुधार 5. पुष्पहार 6. लवंगलता 7. फ्रान्स राज्यक्रान्ति के इतिहास 8. ग्रीस का इतिहास 9. पं. लोचन प्रसाद पाण्डे ।गुप्त जी अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी तीनों भाषाओं में बड़े माहिर थे। गांव से उनका बेहद प्रेम था। निम्नलिखित कविता में ये झलकती है - हमर कतका सुन्दर गांव -
"प्राचीन छत्तीसगढ़" लिखते समय गुप्तजी निरन्तर सात वर्ष तक परिश्रम की थी। इस ग्रन्थ में छत्तीसगढ़ के इतिहास, संस्कृति एवं साहित्य को प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक की भूमिका में श्री प्यारेलाल गुप्त लिखते हैं - "वर्षो की पराधीनता ने हमारे समाज की जीवनशक्ति को नष्ट कर दिया है। फिर भी जो कुछ संभल पाया है, वह हमारे सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक उपादानों के कारण। नये इतिहासकारों को इन जीवन शक्तियों को ढूँढ़ निकालना है। वास्तव में उनके लिए यह एक गंभीर चुनौती है" प्राचीन छत्तीसगढ़ प्यारेलाल गुप्त प्रकाश्क - रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर
हरि ठाकुर हरि ठाकुर का जन्म 1926 में रायपुर में हुआ था। उनकी मृत्यु सन् 2001 में हुई। वे रायपुरवासी थे। न सिर्फ साहित्यकार, गीतगार थे हरि ठाकुर बल्कि छत्तीसगढ़ राज्य के आन्दोलन में डॉ. खूबचन्द बघेल के साथ थे। स्वाधिनता संग्रामी ठाकुर प्यारेलाल सिंह के पुत्र होने के नाते हरिसिंह की परवरिस राजनीतिक संस्कार में हुई थी। छात्रावास में वे छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके थे। उन्होंने बी.ए.एल.एल.बी. की थी। वे हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी, दोनों भाषाओं में लिखते थे। उनके हिन्दी काव्य - 1 ) नये स्वर, 2 ) लोहे का नगर, 3 ) अंधेरे के खिलाफ, 4 ) मुक्ति गीत, 5 ) पौरुष :नए संदर्भ, 6 ) नए विश्वास के बादल छत्तीसगढ़ी काव्य - 1 ) छत्तीसगड़ी गीत अउ कविता, 2 ) जय छत्तीसगढ़, 3 ) सुरता के चंदन, 4 ) शहीद वीर नारायन सिंह, 5 ) धान क कटोरा, 6 ) बानी हे अनमोल, 7 ) छत्तीसगढ़ी के इतिहास पुरुष, 8 ) छत्तीसगढ़ गाथा। हरि ठाकुर सुशील यदु को एक साक्षात्कार में कहते हैं - "छत्तीसगढ़ के नवा पीढ़ी के साहित्यकार मन ला चाही के उन छत्तीसगढ़ के समस्या ला लेके जइसे छत्तीसगढ़ के अस्मिता, शोसन, गरीब, प्रदूषण, अपमान, उपेक्षा जइसे विषय ला लेके अधिक ले अधिक लेखन काम करें। जउन लेखन ले जन-जागरण नइ होवय, जनता के स्वाभिमान नइ जागय, छत्तीसगढ़ के पहिचान नइ बनय, वइसन लेखन हा आज कोनो काम के नइ हे।" पृ. 24 , 'छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार' सुशील यदु प्रकाशक छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति, 2001 । डॉ. सत्यभामा आडिल अपनी पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य' (यू - 132-133 ) में लिखती है - 'गीत में हरि ठाकुर ने प्राकृतिक दृश्यों के माध्यम से मनुष्य के कष्टों और दुखों को चित्रित किये'। हरि ठाकुर की देवारी गीत -
बद्रीविशाल परमानंद बद्रीविशाल परमानंद छत्तीसगढ़ के जाने माने लोक कवि हैं जिनके बारे में हरि ठाकुरजी लिखते हैं - "परमानन्द जी छत्तीसगढ़ के माटी के कवि हैं। छत्तीसगढ़ के माटी ले ओखर भाषा बनथे, ओखर शब्द अउ बिम्ब लोकरंग अउ लोकरस से सनाये हे। ओखर रचना हा गांव लकठा में बोहावत शांत नदिया के समान हे जउन अपने में मस्त हे।" उनका जन्म गांव छतौना में 1917 में हुआ था। रायपुर में उनकी बनाई हुई भजन मंडली 'परमानंद भजन मंडली' के नाम से जाने जाते हैं और करीब 70 भजन मण्डली अभी भी चल रहे हैं। 1942 में आजादी की गीत गागाकर भजन मण्डली, लोगों में नई जोश पैदा करता था। किशान के दुख दर्दों को बद्रीजी इस प्रकार बताते थे -
सुशील यदु 'छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार' पृ. 25 उनके कई सारे गीत अत्याधिक लोकप्रिय हैं। उनकी मृत्यु 1993 में हुआ था, जिन्दगी के आखरी सांस तक वे न जाने कितने कष्ट उठाये और अन्त में हस्पताल में अकेले पड़े रहे और आखरी सांस लिये। कपिलनाथ कश्यप कपिलनाथ कश्यप का जन्म 1906 में बिलासपुर जिले के ग्रामीण अंचल में हुआ था, १९८५ में उनकी मृत्यु हुई है। कपिलनाथजी रामचरितमानस का छत्तीसगढ़ी भाषा में अनुवाद किया। उनकी छत्तीसगढ़ी और हिन्दी भाषा में कई रचनाएं हैं - 1 ) रामकथा, 2 ) अब तो जागौ रे, 3 ) डहर के कांटा, 4 ) श्री कृष्ण कथा, 5 ) सीता के अग्नि परीक्षा, 6 ) डहर के फूल, 7 ) अंधियारी रात, 8 ) गजरा, 9 ) नवा बिहाव, 10 ) न्याय, 11 ) वैदेही-विछोह सीता के अग्नि परिच्छा :
डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा डॉ नरेन्द्र देव वर्मा का जन्म सन् 1939 एवं मत्यु सन् 1979 में हई। उन्होंने 'छत्तीसगढ़ी स्वप्नों और रुपों का उदविकास' पर अपनी पी. एच. डी. की थिसीस लिखी। वे छत्तीसगढ़ी एवं हिन्दी, दोनों में लिखते रहे। उनकी किताब 'छत्तीसगढ़ी भाषा का उदविकास' छत्तीसगढ़ी साहित्य को जानने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। उनकी छत्तीसगढ़ी गीत के संग्रह का नाम है 'अपूर्वा', उनका उपन्यास 'सुबह की तलाश' बहुत ही भावनापूर्ण लेखन है। उनकी अनुदित है मोंगरा, श्री मां की वाणी, श्री कृष्ण की वाणी, श्री राम की वाणी, बुद्ध की वाणी, ईसा मसीह की वाणी, मुहम्मद पैंगबर की वाणी। वे यथार्थ में सेक्युलर थे। उनकी कविता दुनिया अठवारी बजार रे - - - - -
हेमनाथ यदु हेमनाथ यदुजी का जन्म 1924 में रायपुर में हुआ था। छत्तीसगढ़ी बोलचाल की भाषा में वे रचनायें लिखकर गये। उनकी रचनायें तीन भागों में है - 1 ) छत्तीसगढ़ के पुरातन इतिहास से सम्बंधित, 23 ) लोक संस्कृति से संबंधित साहित्य, 3 ) भक्ति रस के साहित्य - छत्तीसगढ़ दरसन उनकी कविताओं में श्रमिकों का चित्रण है - सुनव मोर बोली मा संगी कोन बनिहार कहाथय कारखाना लोहा के बनावय सुध्धर सुध्धर महल उठावय छितका कुरिया मा रहि रहिके, दिन ला जऊन पहाथय सुनव मोर बोली मा संगी कोन बनिहार कहाथय हेमनाथ जी को कैंसर हो गया था, 1976 में देहान्त से कुछ दिन पहले वे महामाया देवी को प्रार्थना करते हुए ये गीत लिखे - दाई कोरा के भर दे दुलार पिया के घर जाना है को न जानत हे अब कब आना है पिया के घर जाना है। भगवती सेन भगवती सेन का जन्म 1930 में धमतरी के देमार गांव में हुआ था । उनकी कवितायें किसान, मजदूर और उपेक्षित लोगों के बारे में है। प्रगतिशील कवि थे। छत्तीसगढ़ी कविताओं का संकलन दो पुस्तकों में की गई है। पहला है - 'नदिया मरै पियास' और दुसरा है - 'देख रे आंखी , सुन रे कान' उनकी कविता
उनकी गीतों को सुनकर लोग स्तब्द रह जाते थे -
1981 में भगवती सेन का देहान्त हो गया है। उनकी कवितायें न जाने कितने लोगों को सच्चाई जानने के लिए प्रेरित करती है। उनकी कवितायें, उनके गीत एक सच्चे इन्सान की देन है। लाला जगदलपुरी लाला जगदलपुरी जी का जन्म 1923 में बस्तर में हुआ था, बस्तर से उनका अगाध प्रेम है। लेखन के साथ-साथ जगदलपुरी जी अध्यापन तथा खेती का काम करते है। लाला जगदलपुरी जी के प्रेरणा से बस्तर में कई साहित्यकार पनपे। उनकी 'हल्बी लोक कथाएँ' के कई संस्करण प्रकाशित हो गये हैं। डॉ. सत्यभामा आडिल अपनी पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य' (पृ. 144 ) में लिखती है - 'आप अपनी छत्तीसगढ़ी कविताओं में नायिकाओं का कलात्मक एवं सुरुचिपूर्ण चित्रण करने के लिए प्रसिद्ध है।'
हल्बी साहित्य में इनका योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण है। हल्बी में जो दूसरे साहित्यकार है उन सबके नाम है भागीरथी महानंदी, योगेनद्र देवांगन, हरिहर वैष्णव, जोगेनद्र महापात्र, रुद्रनारायन पाणिग्रही, सुभाष पान्डेय, रामसिंह ठाकुर। नारायणलाल परमार नारायणलाल परमार का जन्म 1927 में गुजरात में हुआ था। छत्तीसगढ़ में वे आये एवं यहीं वे साहित्य सृजन करने लगे। हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में उनकी रचनायें हैं - उपन्यास - प्यार की लाज, छलना, पुजामयी काव्य संग्रह - काँवर भर धूप, रोशनी का घोषणा पत्र, खोखले शब्दों के खिलाफ, सब कुछ निस्पन्द है, कस्तूरी यादें, विस्मय का वृन्दावन छत्तीसगढ़ी साहित्य - सोन के माली, सुरुज नई मरे, मतवार अउ, दूसर एकांकी प्यारेलाल गुप्त जी का कहना है - 'परमार जी की कविता में उनका अपना व्यक्तित्व रहता है जिसमें कला और कल्पना का अलग-अलग सिलसिला चलते हुए भी दोनों में सबंधसूत्रता बनी रहती है और यही एक शैली बनकर नई धारा बहाती है जिसमें मन और प्राण शीतल हो उठते हैं'- नारायण जी धमतरी महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर करने के बाद साहित्य सृजन करते रहे - उनकी मृत्यु 2003 में हुई है।
डॉ. पालेश्वर शर्मा डॉ. पालेश्वर शर्मा का जन्म 1928 में जांजगीर में हुआ था। वे महाविद्यालय में अध्यापक थे। छत्तीसगढ़ी गद्य और पद्य दोनों में उनका समान अधिकार है। उन्होंने 'छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन की शब्दावली' पर पी.एच.डी. की। प्रकाशित कृतियाँ - 1 ) प्रबंध पाटल 2 ) सुसक मन कुररी सुरताले 3 ) तिरिया जनम झनि देय (छत्तीसगढ़ी कहानियाँ) 4 ) छत्तीसगढ़ का इतिहास एवं परंपरा 5 ) नमस्तेऽस्तु महामाये 6 ) छत्तीसगढ़ के तीज त्योहार 7 ) सुरुज साखी है (छत्तीसगढ़ी कथाएँ) 8 ) छत्तीसगढ़ परिदर्शन 9 ) सासों की दस्तक - इसके अलावा पचास निबंध और 100 कहानियाँ। सुशील यदु अपनी पुरस्तक 'लोकरंग भाग - 2 - छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार' में उनसे छत्तीसगढ़ी साहित्य के भविष्य के बारे में जब पूछते हैं, तो वे कहते हैं - 'कन्हिया कस के - संघर्ष करा खून-पसीना एक करे बर परही त छत्तीसगढ़ी जनभाषा बन पाही। छत्तीसगढिया मन अनदेखना हे तेकर सेती छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास नई होत हे। हिन्दी ले अलग छत्तीसगढ़ी - साहित्य म बने ऊंचा पोथी - सब विधा में लिखे ल परही।' डॉ. पालेश्वर शर्मा ने 'छत्तीसगढ़ी शब्द कोश' की रचना की है। उनका कहना है - 'गावं की आत्मा, उसकी संस्कृति एक ऐसी शकुंतला है, जो ॠषि कन्या है, फिर भी शापित है। किसी की उपक्षिता है।' केयूर भूषण केयूर भूषण का जन्म 1928 में दुर्ग जिले में हुआ था। उन्होंने 11 साल की उम्र से ही आज़ादी की लड़ाई में भाग लेना शुरु कर दिया। सिर्फ 18 साल के थे जब 1942 के आन्दोलन में भाग लेकर नौ महीने के लिये जेल में रहे थे। बाद में किसान मजदूर आन्दोलन में जुड़कर जेल गये थे। केयूर भूषण जी गांधीवादी चिंतक रहे है। हरिजन सेवक संघ के पदाधिकारी रह चुके हैं। रायपुर लोकसभा से दो बार सासंद चुने गए। आजकल वे लखन कार्य में व्यस्त रहते हैं, समाज की उन्नति के लिए लगातार काम कर रहे हैं। उनकी रचनायें हैं - लहर (कविता संकलन) कुल के मरजाद (छत्तीसगढ़ी उपन्यास) कहाँ बिलोगे मोर धान के कटोरा (छत्तीसगढ़ी उपन्यास) कालू भगत (छत्तीसढ़ी कथा संकलन) छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियाँ। केयूर भूषण जी छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़ संदेश साप्ताहिक सम्पादन करते हैं। छत्तीसगढ़ी साहित्य के बारे में उनका कहना है - 'छत्तीसगढ़ी साहित्य अब पोठ होवत हे। सबे किसम के छत्तीसगढ़ी साहित्य उजागर होवत हे। जतेक छत्तीसगढ़ी शब्द वोमा काम आही ओतके छत्तीसगढ़ी भाव सुन्दराही। जब छत्तीसगढ़ी मा हिन्दी शब्द सांझर-मिझंर होय लागथे तो ओखर मिठास मा फरक आये लागथे। जिंहा तक हो सकय मिलावट ले बांचय अउ खोजके छत्तीसगढ़ी शब्द ला अपन लेखन मा शामिल करय।
दानेश्वर शर्मा दानेश्वर शर्मा छत्तीसगढ़ी एवं हिन्दी के लोकप्रिय कवि हैं। दानेश्वर शर्मा जी भिलाई में सामुदायिक विभाग का दायित्व संभालते हुए पाँच दिन तक (1976 ) लोककला महोत्सव की शुरुआत की। दानेश्वर जी कोदुराम दलित जी के प्रेरणा से छत्तीसगढ़ी कविता लिखना शुरु किया। पहली छत्तीसगढ़ी रचना थी 'बेटी के बिदा'। 'छत्तीसगढ़ की मूल आत्मा को सुरक्षित रखते हुये लिखे जा रहे है' - डॉ. सत्यभामा आडिल का कहना है। सुशील यदु से दानेश्वर जी ने कहा - 'दूरदर्शन रायपुर में लोककला के नाम में टूरी-टूरा मन के नाच देखा देना, खेती किसानी देखा देना, बस्तर के लोकनृत्य में हारमोनियम के प्रयोग, सरस्वती वंदना ला माता सेवा धुन में देखाये जाना, विकृत करके दिखाये जावत हे ..... हमर संस्कृति के प्रतिनिधित्व तो पं. मुकुटधर पांडे, पं. सुन्दरलाल शर्मा, ठा. प्यारेलाल सिंह, खूबचंद बघेल, विप्रजी येखर मन के झलक देखाना चाही' - दानेश्वर शर्मा बहुत अच्छे गीतकार है - उनका लेखन - मंड़ई
'नवा लेखक मन ला छत्तीसगढ़ के उन चरित्र मन उपर अपन लेखनी चलाना चाही जउन छत्तीसगढ़ के नायक रहे हें। चाहे वो वैदिक युग के होये, चाहे आधुनिक युग के। रामायण, गीता ला छत्तीसगढ़ी मा लिखे के युग बीतगे। नवा लेखक मन ला छत्तीसगढ़ के नायक के चरित्र ला अध्ययन करना चाही अउ उन्हला केन्द्र-बिन्दु मानके लिखना चाही। डॉ. विमल पाठक डॉ. विमल पाठक को बचपन से एक ऐसा माहौल मिला था जिसमें रहकर भी अगर कोई काव्य सृजन न करे तो आश्चर्य की बात होती। उनके पिता छत्तीसगढ़ी, हिन्दी और संस्कृत में गीत, भजन, श्लोक सुनाते रहे, और उनकी मां भोजली, माता सेवा, बिहाव, गौरी गीत, सुवा गीत बहुत ही सुन्दर गाया करती थी; जब विमल जी को पूछा गया कि उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा को क्यों लेखन का माध्यम बनाये, उनका कहना था - 'मोर घर परिवार, मुहल्ला अउ समाज म पूरा छत्तीसगढ़ी वातावरण रहिस। छत्तीसगढ़ी के बोलबाला रहिस। गोठियाना, गीता गाना, लड़ना-झगड़ना, खेलना-कूदना, जमों छत्तीसगढ़ी मं करत आयेंव, सुनत आयेंव। ठेठ छत्तीसगढ़ी संस्कार तब ले परिस लइकइच ले सामाजिक-पारिवारिक संस्कार मन के एकदम लकठा में आगेंव। छुट्ठी बरही ले लेके बिहाव तक के लोकगीत सुन सुनके धुन मन के मिठास ल सुनके गुनके मैं बिधुन हो जात रहेंव। सोहर ले लेके, चुलभाटी, तेलभाटी, बिहावभाटी, विदा, नेवरात, गौरा, सुवा, भोजली, ददरिया, करमा अउ किसिम-किसिम के गीत सुनना अउ ओमन ल गाना मोर आदत बनगे रहिस।' सुशील यदु 'छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार' छत्तीसगढ़ में और भी अनेक साहित्यकार, गीतकार, कवि पनपें हैं जिनके बारे में संक्षिप्त में निम्नलिखित विवरण है : विद्याभूषण मिश्र - जो छत्तीसगढ़ी और हिन्दी दोनों भाषाओं में लिखते चले आ रहे हैं। उनकी 'छत्तीसगढ़ी गीतमाला' 'फूल भरे अंचरा' तथा हिन्दी में 'सतीसावित्री', 'करुणाजंलि', 'सुधियो के स्वर', 'मन का वृन्दावन जलता है' काव्य कृति के कारण गुरु घासीदास विश्वविद्यालय उन पर शोध कार्य किया है। उनकी रचनायें आकाशवाणी भोपाल, रायपुर, बिलासपुर से नियमित प्रसारित होते हैं। छत्तीसगढ़ी संस्कृति से उन्हें लेखन की प्रेरमा मिली है। वे मुख्यरुप से गीत, कहानी, निबंध, प्रबंध काव्य, व्यंग्य लिखते चले आ रहे हैं। प्रभजंन शास्त्री - भी छत्तीसगढ़ी और हिन्दी दोनो में समान रुप से लिख रहे हैं उन्हें लेखन कार्य में नारायण लाल परमार से बहुत प्रेरणा मिली है। छत्तीसगढ़ी में 'बिन मांड़ी के अंगना', भगवत गीता के अनुवाद तथा " कौसल्यानंदन" उनके प्रमुख लेख हैं। डॉ. विनयकुमार पाठक - को लेखन के लिए प्रेरणा मिली है उनके बड़े भाई डॉ. विमल पाठक से। डॉ. विनय कुमार ने पी.एच.डी. एवं डी. लि करके ख्याति पाये हैं। छत्तीसगढ़ी और हिन्दी, दोनों में लिखते हैं। छत्तीसगढ़ी में कविता, खण्डकाव्य - सीता के दुख तथा छत्तीसगढ़ी साहित्य और साहित्यकार संस्मरण जीवनी, के अलावा अनेक निबंध लिखे हैं। उनकी छत्तीसगढ़ी लोक कथा (1970 ) छत्तीसगढ़ के स्थान-नामों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन (2000 ) बहुत ही महत्वपूर्ण है। उन्हें अनेक सम्मान और पुरस्कार मिल है जैसे लोकभाषा शिखर सम्मान। नंदकिशोर तिवारी - कवि, नाटककार एवं संपादक हैं। बिलासपुर की छत्तीसगढ़ी पत्रिका 'लोकाक्षर' उन्होंने शुरु की है। आकाशवाणी मे उनके अनेक नाटक प्रसारित हुये है। छत्तीसगढ़ी लोक-कला पर मौलिक काम किया है नंदकिशोर जी ने। भरथरी, पंडवानी पर किताबे प्रकाशित हुई हैं। वे रविशंकर विश्वविद्यालय (रायपुर) में सहायक कुल सचिव रहे एवं अभी गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में कुल सचिव हैं। उधोराम झखमार - छत्तीसगढ़ के हास्य कवि थे। कोदूराम दलित के बाद हास्य कवि में उधोरामजी है। उनकी कवितायें सुनकर लोग हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते हैं। कवितायें सुनाकर लोगों को आनन्द देते रहे अपनी आखरी साँस तक पर उनके रहते हुये उनकी कविता संग्रह प्रकाशित नहीं हुई। अभी छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति ने उनकी कवितायें छापी हैं। शाद भंडारवी - छत्तीसगढ़ के शायर है जो छत्तीसगढ़ी, उर्दू और हिन्दी, तीनों भाषाओं में लिखते रहे। उनकी रचना में प्रेम, सहयोग और भाई चारा प्रमुख है। छत्तीसगढ़ के प्रति उनका प्रेम इस गीत में झलकता है -
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