दक्खिनी हिन्दी

दक्खिनी हिन्दी की भौगोलिक सीमा एवं इसका विस्तार


प्रदीप शर्मा खुसरो

दक्खिनी हिन्दी का सम्बन्ध विशेष रुप से दक्खिनी राज्यों से था जिसके अन्तर्गत बीजापुर, गोलकुण्डा, अहमदनगर, मुख्य थे। इसी आधार पर इसका नाम दक्खिनी पड़ा है। इस भाषा को उत्तर के शासक, सैनिक तथा सूफी फकीर ही विशेष रुप से बोलते थे। इसके अतिरिक्त इन क्षेत्रों में दक्षिण भारत की द्रविड़ भाषायें भी बोली जाती थीं।

इस भाषा का क्षेत्र समय-समय पर परिवर्तित होता रहा है। सामान्य रुप से यह दकन की भाषा कही जाती है। अत: दकन की सीमा ही इस भाषा की सीमा मानी जा सकती है। प्राय: लोग दकन को दक्षिण कह दिया करते हैं। इसकी भौगोलिक सीमा लगभग चौदह उत्तरी अक्षांश से कर्क रेखा तक है। प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार इसमें भारत का दक्षिणी त्रिभुजाकर प्रायद्वीप सम्मिलित है जो नर्मदा नदी अथवा विन्ध्याचल पर्वत के दक्षिण में स्थित है। कुछ विद्वान इसमें महाराष्ट्र को भी सम्मिलित करते हैं और कुछ लोग इसकी सीमा कुमारी अन्तरीप तक मानते हैं।

दक्षिण भारत को समय-समय पर नष्ट-भ्रष्ट करने अथवा यहां परिवर्तन लाने में केवल मानवीय शक्तियों ने ही नहीं बल्कि विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों ने भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इसी भ्रंश के कारण इस क्षेत्र में अनेक दर्रों एवं घाटियों का निर्माण होता रहा है जिसमें कालान्तर में विभिन्न स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना हुई है। आज भी घिसे-पिटे पर्वत एवं उनकी श्रृंखला अवशिष्ट दिखाई पड़ती है।

वर्तमान दकन प्राचीन भारतीय धर्मग्रन्थों का दक्षिण पथ ही है और इसी को दक्षिण देश कहा जाता था। पालि, प्राकृत में इसे दक्खिण पथ और दक्खिन कहा जाता था। इस दक्षिण देश की सीमा में परिवर्तन होता रहा है। कभी नर्मदा और विन्ध्य के दक्षिण का मध्य भाग, कभी नर्मदा और तापती के दक्षिण भाग से सुदूर नीचे भाग तक इसमें सम्मिलित था। आजकल विन्ध्य से कृष्णा के उत्तरी किनारे तक पश्चिम में पश्चिमी घाट तक और पूर्व में आन्ध्र के उत्तरी पश्चिमी जनपदों तक ही सीमित है। इसका अधिकांश भाग महाराष्ट्र में मिल गया है किन्तु उसमें सुदूर दक्षिण सम्मिलित नहीं किया जाता है।

उत्तरी भारत की आर्य जातियों ने दक्षिण पथ होते हुए दक्षिण में जाकर अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का प्रचार किया था। चन्द्रवंशी राजाओं में कौरवों-पाण्डवों, अगस्त्य, सूतीक्ष्ण, शरभंग आदि अग्रदूतों, सूर्यवंशी रामचन्द्र जी आदि के दक्षिण में अभियान का पर्याप्त प्रमाण मिलता है। दक्षिण भारतीयों का भी उत्तर में शासन स्थापित हुआ था। आन्ध्र के सातवाहनों ने उत्तर में कुछ समय तक राज्य किया था। उत्तर भारत की जातियों से उनका भयंकर संघर्ष हुआ था। इस प्रकार उत्तर एवं दक्षिण के पालों, प्रतिहारों तथा राष्ट्रकुटों में निरन्तर अधिकार के लिये संघर्ष होता रहा है। मुसलमानों का भारत में अधिकार हो जाने के पश्चात् यह परम्परा समाप्त हो गयी।

मुसलमानों में सर्वप्रथम अलाउद्दीन खिलजी ने सन् १२९७ ई. में गुजरात पर अधिकार किया। उसके सेनापति मलिक काफूर ने १३०४ ई. में महाराष्ट्र और १३०७ ई. में आन्ध्र और १३०८ में कर्नाटक पर विजय प्राप्त की। इसके बाद ये क्षेत्र दिल्ली शासन के अंग माने जाने लगे। उस समय तक यही भाग दकन कहा जाता था। बाद में मोहम्मद तुगलक ने दौलताबाद को अपनी राजधानी बनानी चाही। सन् १३४७ ई. में दक्षिण में एक नया परिवर्तन हुआ। फिरोजशाह तुगलक के शक्तिहीन हो जाने पर दक्खिन स्वतन्त्र हो गया। वहां हसन गंगों बहमनी ने गुलबर्गा में बहमनी राज्य की स्थापना की। गुजरात भी स्वतन्त्र हो गया। सन् १३३६ में विजयनगर राज्य की स्थापना हुई। आगे चलकर बहमनी राज्य कई भागों में विभाजित हो गया। बीजापुर, गोलकुण्डा, बरार, अहमदनगर, बीदर पांच स्वतन्त्र मुसलमानी राज्यों की स्थापना हुई।

अनेक मुगल सम्राटों ने उन्हें समाप्त करना चाहा था किन्तु अन्त में औरंगजेब ही उसमें सफल हो सका। उसकी मृत्यु के बाद वे सब पुन: स्वतन्त्र हो गये। भारतीय स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भाषा के आधार पर राज्यों का पुन: संगठन हुआ है। दक्षिण में गुजरात, महाराष्ट्र, आन्ध्र कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल की रचना हुई है। इस प्रकार दकन की सीमा में निरन्तर परिवर्तन होता रहा है।

डॉ. ग्रियर्सन ने व्यक्त किया है कि यद्यपि कोई सीमा नहीं खींची जा सकती फिर भी सतपुड़ा की श्रृंखलाओं और उससे संबंधित पहाड़ियों को परिनिष्ठित हिन्दुस्तानी और दक्खिनी की सीमा मान सकते हैं। उनके अनुसार उसकी दक्षिणी और पश्चिमी सीमा समुद्रतट तक मानी जा सकती है। यह सीमा बम्बई और मद्रास तक चली गयी है।

दक्खिनी आज भी आंशिक रुप में गुजरात, महाराष्ट्र और आन्ध्र में उत्तर भारत से आये हुए मुसलमानों और हिन्दुओं के बोलचाल की भाषा है।

१.

दक्खिनी हिन्दी, पृष्ठ १७

२.

हिन्दी साहित्य कोश, पृष्ठ ३३३

३.

हिन्दी विश्वकोश, खण्ड ५, पृष्ठ ४९२

४.

हिन्दी विश्वकोश, खण्ड ५, पृष्ठ ४९५

५.

हिन्दी विश्वकोश, भाग ५, पृष्ठ ४९४

६.

हिन्दी विश्वकोश, भाग ५, पृष्ठ ४९४

७.

दक्खिनी हिन्दी, पृष्ठ २६

८.

दक्खिनी हिन्दी, का उद्भव और विकास, पृष्ठ २१

 


Top

::  अनुक्रम   ::

Copyright IGNCA© 2004

All rights reserved. No part of this may be reproduced or transmitted in any form or by any means, electronic or mechanical, including photocopy, recording or by any information storage and retrieval system, without prior permission in writing.