दक्खिनी हिन्दी

दक्खिनी हिन्दी के आदिकालीन कवि और उनकी रचनाओं का संक्षिप्त विवरण


प्रदीप शर्मा खुसरो

 

आदिकाल (१४००-१५०० ई.)

१. बंदानेवाज
२. शाहमीराँजी
३. अशरफ़
४. फ़ीरोज
५. बुरहानुद्दीन जानम
६. एकनाथ
७. शाह अली
८. वजही दकनी

(१३४३ ई.)
(मृ. १४९६ ई.)
(१५०३ ई.)
(१५६४ ई.)
(ज. १५२२ ई.)
(१५४८-९९ ई.)
(मृ. १५६६ ई.)
(१६०९ ई.)


(१) ख़वाजा बंदानवाज़ (१३४३ ई.)

इनका मूल नाम सैयद मुहम्मद हुसैनी था। दक्षिण भारत के यह ख्वाजा मुईउद्दीन चिश्ती (अजमेर) है। आमतौर से यह ख़वाजा बंदानवाज़ (स्वामी भक्तवत्सल) अथवा लम्बे केश रखने से ख्वाजा बंदानेवाज़गेसू-दराज़ के नाम से ही प्रसिद्ध हैं। इनके पिता सैयद यूसुफ़ शाह एक प्रसिद्ध संत थे, जो दिल्ली के प्रसिद्ध मुस्लिम संत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के ख़लीफ़ा (उत्तराधिकारी) बुरहानुद्दीन गरीब के साथ दक्खिन आये। बंदानवाज़ १३१८ के आसपास दिल्ली में पैदा हुए, और अपने पिता के साथ शैशवावस्था में दक्खिन गये। पिता पांच वर्ष का शिशु छोड़ कर मर गये। उनकी कब्र देवगिरी (दौलताबाद) के पास खुल्दाबाद में आज भी पवित्र मानी जाती है। (खुलदाबाद) (स्वर्गनगरी) में ही पीछे औरंजेब भी दफन किया गया। पिता के मरने पर बंदानेवाज़ अपनी माँ के साथ दिल्ली लौट गये, जहाँ ख़वाजा नसीरुद्दीन चिराग-दिल्ली के शिष्य तथा मरने पर उनके गद्दीनशीन हुए। अपनी विद्वत्ता और संतपन के कारण दिल्ली में इनकी काफी प्रतिष्ठा थी। अस्सी वर्ष के थे, जब मास्को की होली जलानेवाले तैमूरलंग ने १३९८ में दिल्ली में ध्वंस-लीला मचाई। उजड़े दयार को छोड़कर बृद्ध बंदानेवाज़ सपरिवार गुजरात आदि होते हुए दक्खिन (दौलताबाद) आये। इससे आधी शताब्दी पहिले (सन् १३४७ ई.) हसन गंगू अलाउद्दीन हसन बहमन शाह ने बहमनी राज्य स्थापित किया था। हसन के पोते तथा आठवें उत्तराधिकारी फीरोज़शाह (१३९७-१४२२) ने अपने दादा द्वारा स्थापित राजधानी गुलबर्गा में ख़वाजा को बड़े सम्मान के साथ बुलाया, जहाँ ही १०५ वर्ष की दीर्घ आयु (सन् १४२३ ई.) में इनका देहान्त हुआ।

ख़वाजा ने फारसी में कई पुस्तके लिखी हैं। उनकी निम्न पुस्तकें दक्खिनी हिन्दी में है -

१. चक्कीनामा (पद्य)
२. मेराजनामा (गद्य)
३. से: पारा (गद्य)

कविता के नमून हैं

देखो वाजिद तनकी चक्की। पीड चातुर होके सक्की ।।
सौकन इब्लिस खिंच खिंच थक्की। के या विस्मिल्ला अल्ला हो ।।
आलिफ अल्ला उसका दिसता। म्याने मुहम्मद होकर बसता।।
पंछी तलब योंकू दिसता। के या बिस्मिमल्ला।।
बंदानेवाज बंदा हुसेनी । सो बंदगी में रहते के यह बिस्मिल्ला।। १०

- चक्कीनामा

और गद्य के नमूने ११

(१)
नबी कहे १२ तकहीक खुदा १३ के म्याने सत्तर हज़ार पर्दे उजियाले १४ के हो अंधोरे १५ के। अगर उसमें ते एक पर्दा उठ जावे, तो उसकी आंचते मैं जलूँ। होर एक वDत ऐसा होता है, समझी और देखो बपर्वा अंधेरे के उजियाले के आरिफान १६ पर है। वल १७ वासिलान १८ पर पर्दे नूरानी १९ व बेवासिलान २० का सफा पर्दा होता है। सो मुहम्मद का नूर, ए अज़ीज़ २१ अव्वल २२ खूबियत २३ को पर्दा। सिवाय तन-जमाली २४ जि २५ के पर्दे कूं अंपडे २६ बाज २७ , उस जमाल उलूहियत २८ के पर्दे मुम्किनुल-बजूद २९ कूं अंपड सकूं। उलूहियत के पर्दे अंपडें, आपरिफुल्वज्द ३० कूं अंपड सकें। इस सहुल्कुदम ३१ के पर्दे कूं अंपडे बाज उस किव्रियाई ३२ के पर्दे कूं उजियाले में तारे उचक कर नहीं दिसतें। यों हो दोनों आलम ३३ कूं यों आफताब होकर उसे मालूम हो गया।

-- मेराजनामा

(२)
सवाल-जाती ईमान ३४
कौन सा और सिफाती ३५ ईमान ३६ कौन?

जवाब-अखंड हाल साबिती ३७ है, सो जाती ईमान वह है। साबिती आती और जाती है, सो सिफ़ाती ईमान।

सवाल-ईमान के झाडाँ क्या? और ईमान के डाल्याँ क्या? और ईमान के बात और ईमान का वतन ३८ क्या? और ईमान का बीज क्या? और ईमान को पोस्त ३९ क्या? और ईमान का सिर क्या? और ईमान का जीव क्या?

जवाब-ईमानकी जीव कुरान। ईमानकी जड़ तोबा ४० । ईमानकी डाल्यां सो बन्दग ४१ । ईमानकी बात पहरेजगारी ४२ । ईमानका तुख्म ४३ सो इल्म ४४ । ईमानका पोस्त तो शर्म ४५ । ईमानका वतन सो मोमिन ४६ का दिल है। ४७

- शहपा

१. उचित, विहित, २. सखी, ३. शैतान, ४. भगवानके नामके साथ, हे भगवान!, ५. अरबी का प्रथम अक्षर, ६. बीच में, ७. इच्छा, लोभ, ८. बंदानेवाज़ (कवि), ९. भक्ति सेवा, १०. (पृष्ठ १९-२० डॉ. सैयद मुहीउद्दीन कादिरी ज़ोर) के आधार पर, ११. उर्दू शहपारे (पृष्ठ ३१९-२०), १२. पैगंबर मुहम्मद, १३. भगवान की खोज, १४. प्रकाश, १५. और (कौरवी), १६. ज्ञानी लोग, १७. किन्तु, १८. मुक्त, भगवान को प्राप्त, १९. प्रकाशमान, २०. भगवान को प्राप्त, २१. प्यारे, २२. प्रथम, २३. सौन्दर्य, अच्छाई, २४. प्रकाशमान शरीर, २५. शरीर, २६. पहुंचे, २७. विना, २८. ईश्वरत्व का सौन्दर्य, २९. जिसका अस्तित्व संभव हो, ३०. जिसका ज्ञान होना संभव हो, ३१. पवित्र आत्मा, ३२. महत्ता, ३३. जगह, स्थान, ३४. व्यक्ति-सम्बन्धी श्रद्धा, ३५. गुण-सम्बन्धी श्रद्धा, ३६. श्रद्धा, ३७. पक्कापन, ३८. घर, स्वदेश, ३९. चमड़ा, ४०. पश्चात्ताप, अपराध-क्षमापन, ४१. भक्ति, सेवा, ४२. संयम, ४३. बीज, ४४. ज्ञान, ४५. लज्जा, ४६. श्रद्धालु भक्त, ४७. उर्दू शहपारे, पृष्ठ ३२१।

(२) शाह मीराँ जी (मृ. १४९६ ई.)

ख़वाजा बंदानेवाज के द्वितीय उत्तराधिकारी (खलीफ़ा) ख़वाजा कमालुद्दीन बयाबानी के शिष्य शाह मीराँ जी भी दक्खिन के बड़े संतों में हैं। इन्हें शम्शुल्-उश्शाक (प्रेमियों का सूर्य, भक्त-सूर्य) कहा जाता है। वह कोरे भक्त ही नहीं, बल्कि अच्छे विद्वान् भी थे। इन्होंने मदीना में बारह वर्ष बिताये थे, जहाँ से लौटने पर बयाबानी के शिष्य ही बीजापुर के बाहर रहने लगे। १४९६ (९०५ हि.) में मृत्यु के बाद बीजापुर के पास शाहपुर में इनकी समाधि बनाई गई, जहाँ हर साल उर्स लगता है। इनकी पुस्तकें हैं -

१. खुशनामा (पद्य) २. खुशनब्ज (पद्य) ३. शहादतुल्-हकीकत (पद्य) ४. शाह मर्गूबुल-कुलु (गद्य) ५. सबरस (गद्य)

इनके एक शताब्दी बाद वजही ने अपना गद्य-ग्रंथ 'सबरस' लिखा था। मीराँ जी के गद्य का नमूना देखिये ४८ -

जो कोई आशिक कूं इस सात चीजते मना करे, खुदायताले ४९ उसे दुनिया में सों ५० फना ५१ करे। ख़ूबसूरत देख, राग सुन, खुशकर, केफ ख बेपर्वा च और शेर ५२ पर खुदा कूं मौन याद कर। मुहब्बत सों बंधा ५३ अपने काम में मशगूल ५४ रह। किससों नकों ५५ झगड। यहां आराम, या ५६ काम, यां हाल, यां वसाल ५७ यां यो खसरे ५८ बाले। जो कुछ तूं देखेगा जो सुनेगा, सो सब दर्द-सर ५९ है। मुशाहिदी मुराकबे ६० में परखत्या सैर तैर में तू रहेगा। इस ज़माने में किसकूं कश्फे-करामात ६१ हुआ, तो तुझे होयेगा, यो जो कीमिया ६२ करेगा, धंदा नहीं होता और हुआ च का कर दिलपर आता। सीधे बात पकर, घर कूं आ। तूं कूं ६३ , जवान में काई कूं ६४ जाता। अव्वल तुझे जो कोई सिखलाता है, उसे पूछ - 'तूं मुझे सिखलाता, सो तुझ पर खुला है।'

इसका काम उस पर नहीं खुल्या, सो तुझ पर क्या खोलेगा? तूं क्या समझकर भूल्या है? बहुत सिखेगा, तो इधर-उधर कियां चार हिकायतां ६५ । इस हिकायतां सों क्या हासिल ६६ ? तूं दुनिया के धंधे में हिल गया ६७ है और इसकी बात भी आजाद ६८ है। वले ६९ यों खबर है, कि उसकी बिस-रनी में भी उसी का यार है और अपसते अपे ७० आपकूं याद दिलाता है। तूं भी उुसे याद कर। आशिक ७१ है, तो उसे बिसर नको ७२ । उसकी याद सों ७३ दिल कूं शाद ७४ कर और आपसकूं अपे याद दिलाता सो अपसकूं दिखलाता है, कि यों देखो यो मेरी सूरत ही, मुझे देख, काकूं बेदिल होता है। में इता तेरे नजदीक हूं और तू मुझे नहीं देखता।

४८. उर्दू शहपारे, पृष्ठ ३२१, ४९. महामहिम भगवान, ५०. से, ५१. नष्ट, ५२. पद्य, ५३. बढ़ा, ५४. लगा, व्यस्त, ५५. नहीं, ५६. यहाँ, ५७. मिलन, ५८. झगड़े, हानि, ५९. शिर की पीड़ा, ६०. साक्षात्कार, समाधि, ६१. प्रकटन, सिद्धि, ६२. रसायन, पारस, ६३. तुमको, ६४. क्यों, ६५. कथाएं, ६६. प्राप्ति, ६७. फंसा, ६८. स्वतंत्र, ६९. लेकिन, ७०. अपने-आप, ७१. प्रेमी, ७२. नहीं, ७३. स्मरण से, ७४. प्रसन्न।

(३) अशरफ़ (१५०३ ई.)

नानक और सूरदास के बीच के काल में शेख शरफुद्दीन अशरफ (कवि अशरफ) हुए। इनके बारे में अधिक मालूम नहीं है। इन्होंने इमाम हुसैन पर पड़ी आफ़तों के सम्बन्ध में अपना काव्य 'नौ सिरहार' ९०९ हिज्री (१५०३ ई.) में लिखा। पंद्रहवीं शताब्दी के आरम्भ के इस कवि ने अपनी भाषा को हिन्दवी कहते हुए लिखा है -

बाचा ७५ कीना ७६ हिन्दवी में। किस्सा मक़तल ७७ शाह हुसैन।।
नज़म ७८   लिखी सब मौजूं आन। यों मैं हिंदवी कर आसान।।
यह यक बोल यह मौजूं ७९ आन। तकरीर हिंदवी सब बखान।।

अपनी कविता की प्रशंसा में लिखते हैं-

नामां कत्या बोल संबार। जानो ८० मोतियां केरा हार।।
सोने की ज्यों धुंटी ८१ धड़। मानिक मोती हीरे जड़।।
यक यक बोल यह मानिक मोल। सीम ८२ तराजू सेंती तोल।।
बंद ८३ पिरोये सोनेतार। सच्चा हुआ नौसिरहार।।

'नौसिरहार' में मंगलाचरण है ८४

अल्ला बाहिद ८५ हक शुभान। जिन यह सिरज्या भुइ-असमान।।
चंदा सूरज तारे रुख। बादल बिजली मेह अचूक।।

खालिक बारी (जो अमीर खुसरो की कृति है) की तरह अशरफ ने बाहिदवारी नामक एक कोश-ग्रंथ लिखा है।

७५. बंचन, ७६. किया (पंजाबी), ७७. कर्बला की कथा, ७८. पद्य, ७९. उचित, ८०. मानो, जैसे, ८१. अंगूठी, ८२. चांदी, ८३. बांध, ८४. ताज़िकरा उर्दू-मख्तूतात् पृष्ठ १८। ८५. अद्वेैत, एक।

(४) फींरोज़ (१५६४ ई.)

फ़ीरोज़ की प्रशंसा वजही और निशाती-जैसे महान् कवियों ने की है। वजही ने अपने कथा-काव्य 'कुतुब-मुश्तरी' में लिखा है ८६ -

कि फिरोज आ ख्वाब ८७ में रातकूं। दुआ देके चूमे मेरे होठ कूं।।
कह्या है तुं यो शेर ऐसा मुसद्स ८८ । कि पढ़नेको आलम करे सब हबस ८९ ।।
इब्न-निशाती ने भी अपने कथा-काव्य 'फूलवन' (१६६५ ई.) में लिखा है ९० -
नहीं वह क्या कर्रूं फीरोज उस्ताद ९१ । जो देते शायरी का कुछ मेरे दाद ९२

गोलकुंडा का पुराना कवि फीरोज, मुहम्मद कुल्ली कुतुब शाह और राजकवि वजही से भी पहिले इब्राहीम कुतुब शाह के समय (सन् १५५० ई.) में हुआ था। कवि ने अपने गुरु बीजापुर के सन्त मख्दूम जी शेख मुहम्मद इब्राहीम (मृत्यु २३ मई, १५६५ ई.) की प्रशंसा में 'तौसीफ नामा' लिखा। ग्रंथारम्भ में वह कहता है-

तू पीरोज खस्ता ९३ (अति) मान दे। मँगूँ दान तुझकने ईमान ९४ दे।।
सों फीरोज सुपने में पाया रतन। रख्या ढांक सो रतन जिउसों रतन।।

गुरु-महिमा के कुछ पद्य हैं-

बराहीम मख्दूमजी ९५ जीवना। कि मैं ९६ सिर्फ ९७ वहदत ९८ सदा पीवना।।
मेरा पीर मख्दूम जी जगमने ९९ । मँगूँ न्यामताँ १०० (में सदा) उसकने।।
करें मुझपर प्यार ये पीब जग १०१ । कि तुझ प्यार ते होय मनधीर १०२ जग।।
पिया जीव ते तो हमन १०३ वास है। तु हम जीव के फूल का बास है।
वही फूल जिस फूल की बास तूं। वही जीव जिस जीवकी आस तूं।।
सो तूं रुख है दीन का बारदार १०४ । जो तुझ छाँब तल जग है पकड्या करार १०५ ।।
अछो १०६ मुझ उपर छांव तेरा जरम १०७ । कि आधार मेरा सो तेरा करम १०८
करीमाँ १०९ की मज्लिस करामत ११० तुझे। अमीना १११ की सफ ११२ मैं अमानत ११३ तुझे।।
सदा मस्त मदहोश ११४ दीदार का। सचा तूं तलबगार ११५ करतार ११६ का।।
मुहीदीन मख्दूम जी जागना। हमें जीव अस ११७ पीवसों लागना।।
अहे पीव मख्दूम जी जाइया। मुहीदीन दूजे पो जम ११८ जाइया।।
तुजे राउ ११९ ने जग्ग राता १२० जनम। मुहीदीन बूजे सो तूं कसाता जनम।।
मुझे दान दे दीनो दिलशाद १२१ कर। दुन्या के गुनाहां ते आज़ाद १२२ कर।।
निगहबान १२३ मेरा तुं मुंज रखे निगाह। मुजे देवे दुश्मन ने मेरा पनाह।।
जिसे पीर मख्दूम जी पाक है। उसे दीनो दुनियां में क्या बाक १२४ है।।

जिसे पीर मख्दूम जी सांइयां।...ब

८६. उ. श. पृष्ठ ८७, ८७. स्वप्न, ८८. अष्टपदी, ८९. लालच, ९०. त. उ. म. पृष्ठ १४५, ९१. गुरु, ९२. न्याय, ९३. भग्न, परेशान, ९४. श्रद्धा, भक्ति, ९५. स्वामी, सेव्य, ९६. शराब, ९७. केवल, ९८. अद्वेैत, ९९. जग में, १००. न्यामते, सर्वोत्तम पदार्थ, १०१. दुनिया के प्यारे, १०२. मन्दिर, मनधीर, १०३. हमारा, १०४. फलदार, १०५. धैर्य, १०६. रहो, १०७. सदा, १०८. कृपा, १०९. कृपालु, ११०. सिद्धि, १११. अमानत, ११२. पांती, ११३. अमीनपद, ११४. मतवाला, ११५. चाहतवाला, प्रेमी, ११६. भगवान्, ११७. ऐसे, ११८. सदा, ११९. राजा, १२०. प्रिय, १२१. प्रसन्न, १२२. मुक्त, १२३. रक्षक, १२४. डर।

(५) बुरहानुद्दीन जानम् (१५२२ ई.)

बीजापुर के सन्त मीरा जी शम्सुल-उश्शाक के यह पुत्र और उत्तराधिकारी थे। इनका जन्म १५४३ ई. (१५० हि.) में हुआ था, इस प्रकार यह सूरदास से भी पहिले हुए थे। बुरहानुद्दीन अपने पिता की भांति गम्भीर विद्वान् तथा प्रसिद्ध सन्त थे। इन्होंने कलाम और सूफ़ी ज्ञान पर कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें 'सुखसुहेला' और 'इरशादनामा' सुन्दर पद्यों में हैं। 'इरशादनामा' अशरफ़ के 'नौसिरहार' से इक्कासी वर्ष बाद लिखा गया। जानम् अपनी भाषा को हिन्दी कहते हैं-

यह बोल हिन्दी बोल। पन तूं अनभौ सेती खोल।।
ऐब १२५ न राखें हिन्दी बोल। माने तूं चख देखें खोल।।
हिन्दी बोलो किया बखान। जेकर फसाद अथा मुं ज्ञान।।

शाह बुरहान ने दोहे भी लिखे हैं। इस प्रकार वह दक्खिनी के उन कवियों में हैं, जिन्हें देश के साहित्य का परिचय था।

'इरशादनामा' में पुस्तक के बारे में लिखते हैं-

नाम किताब इस आख्या १२६ होय। खातिर १२७ लिया इस राख्या होय।।
'इरशादनामा' इसका नाम। लोडे १२८ फिकर १२९ इसे मुदाम १३० ।।
यह सब बोल्या है अनजान। आबिद १३१ आज़िज़ १३२ है बुरहान।।
हिजरत नुह सह नकद १३३ मान। 'इरशादनामा' लिख्या जान।।

अपने गुरु तथा पिता मीरा जी शाह की प्रशंसा में लिखते हैं १३४ -

सिफत १३५ कर्रूं कुछ अपना पीर १३६ । जिसते रोशन १३७ होय ज़मीर १३८ ।।
जिन मुंज लीता १३९   कर उपदेश। बाई १४० इस चख १४१ लेउं गबेस।।
धौ. जगमें मुंज बैत १४२ वही। सिमरु ले मन नेत वही।।
तिसकूं सिमरे तन मन शाद १४३ । जिसका हें मुंज पर शाद १४४ ।।
जग में अहैं तूं ही रतन। पदै में ले कर्रूं जतन।।
राख्या कोंदन कर इस ढांव। तिल १४५ सिमर्रूं ले उस नांव।।
पीर की राजी शम्स उशाक १४६ । धौं जग रब १४७ नुज किया कशाक १४८ ।।

आरम्भ में अल्ला की स्तुति की है:-

अल्ला सिमर्रूं १४९ पहले आज। कोना १५०   जिन यह धौं जग काज।।
जगतर करो तूं करतार। समूंकेरा सिरजन हार।।
अस्तुत ओर्रूं १५१ करने चख। फुर्सत १५२ं पा बोलने मुखा।।
कुदरत १५३ तू तुज अंत न पार। अगनित कीना हो परकार।।

''इरशादनामा'' में शिक्षा दी गई है:-

जो कोई पढ़कर करें सवाद १५४ । राहे-हकीक़त १५५ पर होय शाद।।
बनकी तू न होवे बाड़। गफ़लत केरे खुलें किंवाड़।।
इसमें कीता कर सकलाव १५६ । ल्या ल्या रच-रच स्वालों-जवाब १५७ ।।

कल्मतुल-हक़ायक़ (सत्यवाणी) को शाहबुरहान ने १५८२ ई. (९९० हि.) में लिखा था।
इस प्रकार यह अकबर कालीन गद्य का सुन्दर नमूना है, जिसमें जहां-तहां पद्य भी हैं। ग्रंथ की भाषा लेखक ने गुजरी कही, जिसका अर्थ गुजराती नहीं, बल्कि गुजरात में बसे मुसलमानों में प्रचलित हिन्दी है, जैसा कि निम्न उद्धारम से मालूम होगा-

''यो गुजरी ज़बान। नाम ई किताब कल्मतुल-हक़ायक़''। इसकी भाषा अरबी-फ़ारसी से लदी है।

''इन्शाअल्ला-ताला कि खुदाय-ताला कदीमुल्कदीम क्यों था? ज़ात व सिफ़ात व कुल्ले मख्लूक़ात इब्तदा-ब-इन्तहा, वाली व फ़ानी, कदीम व जदीद, बा-हमा व बे-हमा बदी सबब सवाल-व-जवाब रोशन कर कर देखाया है।

पद्यों में से कुछ हैं:-

''तू'' ने देख्या आपस आप। जे धड्या यह तुज पाप।।
आरे १५८ तूं इस सफा १५९ में नूर। कि जैसा आकाश में सूर।।
अरे तूँ अपसे आपस देख। जहूर १६० कूँ करता लेखालेख।।
व खाली दिसता ठाँव। वह कइया १६१ अपना नाँव।।
यो गफ़लत मेरी टूटी। जे न ऐसी फूटी।।
यह सदके १६२ मुर्शिद १६३ छूटा। यह धोर अंधारा फूटा।।
जैसा खाली फूल। या देखें जैसा डोल।।

१२५. दोष, १२६. कहा, १२७. दिल, मन, १२८. चाहे, १२९. चिन्ता, १३०. सदा, १३१. भक्त, पूजक, १३२. हैरान, परेशान, १३३. नौ सौ नब्बे ९९०, १३४. त. उ. म. पृष्ठ १९, १३५. गुण, १३६. गुरु, १३७. प्रकाशमान, १३८. आत्मा, १३९. लिया, १४०. वापी, कुआँ, १४१. चक्षु, आँख, १४२. पद्य, १४३. प्रसन्न, १४४. प्रसन्नता, १४५. पल-पल, क्षण-क्षण, १४६. प्रेमियों के सूर्य, १४७. भगवान, १४८. प्रकट, १४९. सुमिरन कर्रूं, १५०. किया, १५१. चाहूँ, १५२. छुट्टी, १५३. भगवान की माया, १५४. आस्वाद लेना, १५५. सच्चा मार्ग, १५६. लाभ, १५७. प्रश्नोत्तर, १५८. हाँ, १५९. स्वच्छता, १६०. प्रकाश, १६१. कहा गया, १६२. नौछावर, १६३. गुरु।

(६) एकनाथ (१५४८-९९ ई.)

यह महाराष्ट्र में पैठन (प्राचीन प्रतिष्ठान), जिला औरंगाबाद में ब्राह्मण-वंश में पैदा हुए। इनके दादा भानुदास मराठी के प्रसिद्ध कवि षे। एकनाथ देवगिरि (दौलताबाद) में अपने गुरु जनार्दन स्वामी के पास बारह वर्ष तक शिक्षा ग्रहण करते रहे। इसके बाद गुरु की आज्ञानुसार व्याह किया। मराठी में इन्होंने रामायण, भागवत आदि बहुत-से ग्रंथ लिखे। इनके बनाये लोकगीत भी प्रसिद्ध हैं। इनकी मृत्यु १५९९ ई. के फागुन महीने में बतलाई जाती है। इस प्रकार यह गोस्वामी तुलसीदास से तीस वर्ष बाद मरे। कहते हैं जिस साल एकनाथ ने वाराणसी में अपने भागवत को समाप्त किया, उसी साल गोस्वामी ने ''रामचरितमानस'' का आरम्भ किया। उत्तर में रहने के कारण इनकी प्रवृत्ति हिन्दी की ओर भी हुई थी। इनके कुछ हिन्दी पद १६४ हैं-

आदि पुरुष निर्गुण निराधार की याद कर। मेरे गुरु परर्दिगार की याद कर।
जिने माया अजब बनाई। उस वस्ताद की याद कर।
गै बी खजाना जिसने दिया। उस साहब की याद कर।
श्री भगवन्त की याद कर। जोग-जुगत का बांधा तोड़ा।
शम-दम का सिर पर समला छोड़ा। समता सो ही सुहावे तुरा।
गुरु गारुडी बीर पुरा। नैन चीर के पैही मुद्रा।
कान फार के खाये दिद्रा। अनहद ध्वनी धुमक बाजे।
नाग-सुर धुँनक गर्जे। चल चल चल।
निरंजन जंगल के जिवड़े। खेलना होय तो उलट दृष्टि से खेल।
आवी कर्रूंगा तेरा तमाशा। पैल तेरी मूँड़ी काटूँगा।
साप सब भुले बिच, किडे। प्रपंच कोठरी में आके दःडे।
बड़े बड़े जानवर पाले। हरे, लाल, सफेत।
उजले, काले, पिले, भले, बेभले। हांडीबाग अभिमान जिवडे झुटमुठ चिपीच लढे।
नींह कहूं तो ब्रह्माण्ड काटने दौरे। देखो मियाँ हाय हाय।
डंख मारा बे डंख मारा। सो बड़े कू नहीं उतारा।
जब गुरु-ग्यान का लगाया मोहरा। जहर उतारा।
देखो मियां बाजीगिरी विद्य खेल। हांडीबाग बड़ा अलबेला।
हात हलावे के पांव हलावे। भोले भोले लोक भुलावे।
आ बे हांडीबाग। बाप बड़ा क्या बेटा बड़ा?
बेटे आगे बाप खड़ा। गुरु बड़ा क्या चेला बड़ा?
चेले आगे गुरु खड़ा। चेला तो प्रेम महेल पर चढ़ा।
धनी बड़ा क्या चाकर बड़ा? चाकर आगे धनी खड़ा।
सास बड़ी क्या बहू बड़ी? बहू आगे सास खड़ी।
बीबी बड़ी क्या बांदी बड़ी? बांदी आगे बीबी खड़ी।
निराधार की ले कर छड़ी। बीबी खसम की छाती पर चढ़ी।
तैं बड़ा क्या मैं बड़ा? मेरे आगे तैं खड़ा।
मैं नहीं मैं नहीं। आलस छाया मेरे गुरु।
ग्यानी कु ग्यान लगाऊँ। लोभे आंधे कू उडाऊँ।
फुक मार्रूं तो जा जा जा। बोध के पहाड़ पर जा।
बच्या जाहाँ आना नहीं, ताहाँ ज्या। मेरे सद्गुरु दाता कू शरन ज्या।
मेरे सद्गुरु दाता की इतनी-सी लकरी। मूल मंतर हात मो पकरी।
जिदर दौरा उदर दौरी। फेर देखे तो मेरी मेरे सात।
देख अबी कर्रूंगा खबूतर का तमाशा। बिन पर से उड़ता है कैसा?
खेल खेलते अविद्येके खलीते में घुसा। बाहेर कैसा आवेगा?
आब बे, आव बाहर आव। जिसे नहीं हात ना पाव।
जिसे नहीं गांव न ठांव। जिसे नहीं रुपरेखा नांव।
भाव ना अभाव कुछ नहीं। धीरे धीरे तेरा बी मंतर बोलूं।
लिंगदेह की गांठ खोलूँ। एक बार ऐसा खेल खेलूँ।
कि मेरे बड़े बड़े खेल थे। हा तो एक, एक के दो।
दो के तीन, तीन के चार। चार के पांच, पांच के पच्चीस।
पच्चीस के छब्बीस, छब्बीस का एक। एक बी नहीं, तो जनार्दन देख।

१६४. 'दक्खिनी का पद्य और गद्य'-- (श्रीराम शर्मा) पृष्ठ ५७-६६।

(७) शाह अली (मृ. १५६६ ई.)

''माशूक-अल्ला '' (भगबत्-प्रियतम) उपनाम था। यह अहमदाबाद में पैदा हुये और वहीं इनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। एक गांव की जागीर मिली थी, इसीलिये ''गांवधनी '' भी कहे जाते थे। यह सूफी सन्त थे। इनके उपदेशों को ''जवाहर-उल-इस्रारे-अल्ला '' (भगवत् रहस्य-सार) में इनके शिष्यों ने जमा किया। इनकी कविता के नमूने दखिये १६५ -

आपी खेलूँ आप खिलाऊँ। आपी आपस ले, कल लाऊँ।।
मेरा नाँव मुझे अत भावे। मेरा जीव झुँकी पर जावे।।
मेरी निया मुझी सूँ माती। रह री, अपनई रुप लुभाती।।
ला का निया सो मुँज सूँ मिथ्या। जद का सो धन आपस दीथा।।
जी को अपनइ रुप लुभावे। भइ सो क्यों न आप सुहराबे।।
मैं मुँज रह्या, ना तूँ संघाती। 'आहअली' जिव ही मुज साथी।।
मुँझ बिन कोइ नहीं जग माँहा। चेरी सुहागिन हूँ तिस नाहा।।
आपन खेले आप खिलावे। आपन आपस ले कल लावै।।

हासिल सब कुरान का है इतना जानो।
बहम दुई का दूर करो होर मुँझे पछानो।।
ढूँढन निकली पीव कूँ, अपस गई सो खोय।
जिधर देखूँ (सो) एक कहूँ, मुँज बिन औैर न कोय।।
मैं आपकूँ भाय कह्या, मा-बाप अपस्कूँ कह्या।
तिस आप पद आवे दया, रे भाइयो हौं से कर्रूं।।
जब प्रेम अपने चित धर्रूं, अपसे दिखाऊँ मन हर्रूं।
यों आपके घूँघट कर्रूं, रे भाइयो, हौं सो कर्रूं।।

है सो हो हो होय रही है।
जिधर देखूँ एक वही है।।
मैं तो बहुत छिपाया पन काहू कीजे।
आप माता जब जन दिसूँ कहा थे कल दीजै।।
दीठा पर्या जग सूँ सब रहे सो जोय।।
हुव जे भोत छिपाये सूँ कित माने कोय।।
जैसा कोई होय से सब कोई कहती।
आवत जनदिसे ओ क्या क्यों छिप्या रही।।
आपें बरकत होय, करे भेस मेरा लेता।
मुँज कूँ आके 'शाहअली' तइं दिखला देता।।
किन्हें केरे दीठतें जे तिल भी टलता।
कुछ भी छिपाता आपकूँ तो मेरा चलता।।

अभरन मेरा सही सो पिव है। पिव का जिव सो मेरा जिव है।
हार हमेलाँ मुँज शहबाहां। मोतीहार सो तुम गल माँहा।।
मुझ शह अन्तर कछु न भावै। प्यारो चोला चीर उतरावे।।
एकमेक जो राख्या लौ द्वेै। सो बुज अभरन क्यों कुछ छोड़े।।

जब ज्यों राखे तब त्यों रहिये। लटका पिव का किसे न कहिये।।
जे कहना होय सो कहिये। मन माही, ले न रहिये।।
कभी सो मजनू होय बिरलावे। कभी लैला होय दिलावै।।
कभी सो खुसरो शाह कहावे। कभी सो शीरीं हो कर आवे।।
कभी सो साथी कहें अली जियो। अली मुहम्मद कहीं कहावे।
कभी सो शाह हुसेनी राजा। ऐवें तिल-तिल भेस भरावे।
अहरपनवाली जग रतनाली। बेनी बासक हरतिल काली।
इ जो बाँकी भों दो माली। रे जीव सब सुन एवें कीजे।।
यह जीव 'शाहअली' जिउ दीजै। दोनों जगमाँ तू राज करीजे।।

आज प्रेम तो तुज सूँ खेलूँ, जो ये बाचा देवे।
जे तूँ जीते मुँज कूँ लीजे, होर धन जीते तूँ लेवे।।
एक सो बात प्रेम की भारी। दूजा तुज सूँ खेल चढाई।
तिस पर तैं मतवाली केती। भर भर प्याली प्रेम पिलाई।।

जिसें तिरे दो, नयन हात ... सो तो नहीं साथी।
तुज बिन कुछ भी ना जोऊँ, क्या कर्रूँ संघाती।।
ये यारी होर दोस्ती मेरी।
ये सब यारी दोस्ती तेरी।।
हब क्या कीजै बात घनेरी।

क्या कुछ रुप है मुँझ माँ सहेली।
जे हूं किसमें देख करे हो जाऊँ खेली।।
रुप लुभाने आपके धन आप दिखावे।
आगे अपने रुप के सो दास कहावे।।
जग में मुँझ बिन कोइ नहीं हौं अपने दासा।
ए जी, महके फूलरी सब मेरा बासा।।
ये जग मेरी आरसी कर अपस देखूँ।
अपना रुप बखेर करि मुझ जन धन पेखूँ।।
सूरज-तारों चांद-माँही में खाल अछाय।
की उजाली माँझ जगे होर दिया विदाय।।
इन सब कलियों माँ महीन रंग आप दिखाऊँ।
राती माती होय सही मुँझ वारी जाऊँ।।
अली मुहम्मद नाम मुझे बन दास कहाऊँ।।

-''जवाहरु-ल-हसरारे-अल्ला''

१६५. 'दक्खिनी का पद्य और गद्य ' पृष्ठ ६७-७०।


(८) वजही दकनी (१६०९ ई.)

यद्यपि दक्खिनी हिन्दी कविता का आरंभ ख्वाजा बन्दानेवाज (१३४१ ई.) अर्थात विद्यापति के समय से होता है, किन्तु उसको उन्नति के शिखर पर पहुंचाने वाला वजही दकनी है। वह राजकवि मुहम्मद कुल्ली कुतुब (१५८०-१६११ ई.) के पिता मुल्तान इब्राहीम कुल्ली कुतुब शाह (१५५०-८० ई.) के समय कविता करने लगा था, यही तुलसीदास की तरुणाई का समय है। वजही के दो काव्य-ग्रंथ मिले हैं, जिनमें से एक ''कुतुब मुश्तरी'' को उसने १६०९ ई. में अर्थात् अकबर की मृत्यु के चार वर्ष बाद तथा तुलसीदास के निधन से १४ वर्ष पहिले) समाप्त किया था। यह कवि की मौलिक मृति है, जिसमें उसने बंगाल की राजकुमारी मुश्तरी और अपने संरक्षक इब्राहीम कुतुबशाह के उत्तधिकारी मुहम्मद कुल्ली कुतुब के काल्पनिक प्रेम का वर्णन किया है। लेकिन ग्रंथ-समाप्ति के समय मुहम्मद कुल्ली कुतुब युवराज नहीं, बल्कि सुल्तान और ख्यातनामा कवि हो चुका था। बजही की आरम्भिक कविताओं का पता नहीं लगता। जिस समय (१६०९ ईं) उसने कुतुब-मुश्तरी समाप्त की, उससे बहुत पहले से उसने कविता करनी शुरु की होगी। वजही के समकालीन गौवासी आदि और भी कितने ही कवि गोलकुडा में मौजूद थे, लेकिन वह अपने से पहले के कवियों में फीरोज और महमूद का ही सम्मान के साथ स्मरण करता है। गौवासी को तो वह बहुत नीची निगाह से देखता है, यद्यपि गौवासी का स्थान दक्खिनी हिन्दि-कवियों में वजही से कम नहीं है। आलोचकों का मत है, कि गौवासी के तेज के सामने अंत में वजही इतना धुमिल हुआ कि उसने ''कुतुब-मुश्तरी'' लिखने (१६०९ ई.) के बाद फिर पद्य काव्य पर कलम नहीं उठायी और २६ वर्ष बाद (१६३५ ई.) यदि लिखा भी, तो गद्य ''सबरस'' ही। ''सबरस'' बजही की मौलिक कृति नहीं मसझी जाती, किन्तु वह अपने कवितामय गद्य के रुप में विशेष महत्त्व रखता है। तुलसीदास के तुरन्त बाद या समकालीन गद्य का क्या रुप था, इसका यह एक अच्छा नमूना है। इस प्रकार यह महाकवि गद्य और पद्य दोनों का उत्कृष्ट रचयिता है। गद्य में ऐसा कोई उदाहरण उत्तर के समकालीन हिन्दी-कवियों द्वारा उपस्थित नहीं किया गया।

आजकल हिन्दी-कवियों के ऊपर एक यह आक्षेप किया जाता है, कि ये स्वयंभू कवि किसी को अपना गुरु नहीं बनाते। यद्यपि यह कोई उचित आक्षेप नहीं है, नवीन कवि पुराने कवियों की कृतियों द्वारा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। ऊर्दू-कवियों में तो परिपाटी बन गयी है, कि वे किसी-नकिसी कवि को अपना गुरु बनाते हैं, और गुरुकवि अपने शिष्य की कविता के संशोधन में काफ़ी परिश्रम से काम लेता है, लेकिन वजही और गौवासी के समय गुरु-परम्परा कायम करने की कोई परिपाटी नहीं थी। दक्खिनी हिन्दी के छन्द सभी अरबी छंद हैं, जो मात्रिक होते हैं और स्वरों के खींचातानी करने में कोई रुकावट नहीं डालते, इसलिए जहां तक छंद का सम्बन्ध है कवि को कोई शिक्षा लेने की आवश्यकता नहीं थी। वजही के समय भी सुल्तान के कवि-दरबार हुआ करते थे, किन्तु इब्राहीम कुतुबशाह का समय वह समय था, जब कि दरबार में हिन्दी नहीं, फारसी कविता की तूती बोल रही थी। दक्खिनी हिन्दी-कवियों ने उन्हीं अरबी छंदों को अपनाया था, जो फारसी में भी एकाधिप्त्य रखते थे। बाकी अलंकार आदि जो कविता के सजाने, गंभीर तथा चमत्कारपूर्ण बनाने के लिए आवश्यक होते हैं, उनका ज्ञान उन्हें पुस्तकों तथा कवि-दरबारों द्वारा हो जाया करता था। फारसी कविता का जिसने रसास्वादन और अवगाहन न किया हो, औसा दक्खिनी कवि शायद ही कोई हो।

यद्यपि वजही के बुढ़ापेमें, मुहम्मद कुल्ली के नाती तथा द्वितीय उत्तरधिकारी अब्दुल्ला कुतुब शाह (१६२४-७२) के समय शाहजहाँ और औरंगजेब के काल में) गौवसी गोलकुण्डा का राजकवि था और वजही का सितारा डूब चुका था, लेकिन जैसा कि डॉक्टर जोर ने कहा है:-

''वजही कई बातों के लिहाज से दक्खिन का एक अद्वितीय साहित्यकार है। उसका विषय स्वयं उसकी मानसिक उपज है। उसको इस बात पर अभिमान था कि उसने और कवियों की तरह दूसरों से विषय उधार नहीं लिया। दूसरी भाषाओं से अनुवाद करना या दूसरे के विषय को उधार लेना उसकी दृष्टि में चोरी और दगाबाजी-जैसा अपराध था।... वजही वह सौभाग्यशाली कवि है, जिसकी रचना के गद्य और पद्य दोनों नमूने इस समय मौजूद हैं। ये दोनों उसकी साहित्यिक शक्ति के सबसे अच्छे सबूत हैं। उसके गद्य ''सबरस'' के गुणों से साहित्यप्रेमी अपरिचित नहीं हैं और उसके पद्य ''कुतुब मुश्तरी'' के अध्ययन से कहा जा सकता है कि वह गोलकण्डा का बहुत बड़ा शायर है।... वह वस्तुतः दक्खिन का एक आला दरजे का कवि था।... उसने बहुत अच्छा मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है। उसमें बनावटी और रुढिग्रस्त विचारों का कोई स्थान नहीं है। उनसे मालूम होता है कि सर्वप्रथम उर्दू (दक्खिनी) कवियों ने हिन्दी-कविता का अनुकरण आरंभ किया था। यदि वह इस पर कायम रहते तो शायद उनकी कविता आज किसी दूसरे ही रंग में होती।''

 


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