(अ) तुलसी
: ब्रजमंडल
में प्राय: घरों
में 'तुलसी'
का 'थामरा'
होता है।
स्रियाँ श्रद्धापूर्वक
उस पर जल
चढ़ाती हैं
तथा दीपक जलाती
हैं। तुलसी
की पूजा का
विोष अनुष्ठान
कार्तिक के महीने
में होता
है। 'कार्तिक
स्नान' करके
स्रियाँ 'राई
दामोदर'
की पूजा करती
हैं तथा तुलसी
के पौधे को
बीच में रखकर
कथा-कहानी
सुनाती हैं।-३
तुलसी के
विवाह तथा
गौने (द्विरागमन)
के गीत गाए जाते
हैं-
'हो
राम डूँगर
खटकी में सुनी
और नद जमना
के तीर' इस
गीत में कहानी
है कि जब
तुलसी सिर
पर गागर लेकर
यमुना-किनारे
गई, तो 'रुक्मणी'
ने तुलसी
को पकड़कर
हिला दिया
और उसके जेवर
तथा चूड़ियाँ
तोड़ डालीं,
गागर लुढ़का
दी और तुलसी
के पिता को
गालियाँ
दी। श्रीकृष्ण
आए और उन्होंने
पूछा कि-'तुलसी,
आज तुस इतनी
अनमनी क्यों
हो ?' तुलसी
ने कहा-'हे
कृष्ण, तुमरी
रुकमिन लाड़ली
और हम डारीं
झकझोर।' कृष्ण
बोले-'तुलसी,
मेरी सबसे
प्रिय तो तुम्हीं
हो और तुम्हें
मैं हृदय में
धारण करता
हूँ।'-४ स्मरणीय
है कि ' शालिग्राम'
की पूजा तुलसीदल
से होती
है। शालिग्राम
शिला पर एक
सौ आठ तुलसीदल
चढ़ाने का अनुष्ठान
किया जाता
है।
एक अन्य
गीत में 'राधा'
और तुलसी
के सपत्नी-भाव
की चर्चा है,
जिसमें एक धोबी
कृष्ण और तुलसी
के प्रेम के रहस्य
को प्रकट कर
देता है। राधा
श्रीकृष्ण से
उनके माथे पर
तिलक, मेहँदी
का पत्ता, पैरों
में महावर
तथा दुपट्टा
में लगे दाग
का रहस्य
पूछती है।
कृष्ण सभी
बातों का
उत्तर देकर कहते
हैं कि दुपट्टा
धोबी के
यहाँ बदल
गया। राधा
धोबी को
बुलाकर
पूछती है,
तो धोबी
कृष्ण और तुलसी
के प्रेम-प्रसंग
को प्रकट कर
देता है।-५
एक कथा
के अनुसार
वृन्दा ने कृष्ण
की तपस्या
करके वरदान
माँगा था कि
'मैं तुम्हारी
लीला के
लिए निकुंज
बनाऊँगी,
उस उपवन में
छ: ॠतुएँ एकसाथ
रहेंगी, तुम
उस निकुंज
में राधा के
साथ बिहार
करना।' ये ही
वृंदावन
की निकुंजें
हैं।
कार्तिक
मास में 'देवठान-एकाद शी'
को तुलसी-ाालिग्राम
के विवाह
का अनुष्ठान
किया जाता
है। उसमें गीत
गाया जाता
है-
आसाढ़े उजियारी
तीजा लै रे
बोवउ रानी
तुलसी के
बीजा ।
जोतहु बोवहु
करहु कियारियाँ
धनि जा मलिया
के बेटाहू
जायौ
तुलसी कौ
बिरवा सींच
जमायौ।
सावन तुलसा
पात-दुपाती,
भादों तुलसा
गहर गँभीरी
क्वार में तुलसा
कान कुँवारी
कातिक तुलसा
कौ रचौ
विवाहु।
इस गीत
में तुलसी
की माँ धरती
और पिता
इंद्र बताए गए
हैं।
तुलसी की
आरती का गीत
है-
तुलसा की
मंजरि तोरि
श्रीकृष्ण चढ़ाइयौ
।
श्रीकृष्ण चढ़ाइ
परमपद पाइयौ
।
कुसुमी चीर
पहराय तुलसीदे
कों व्याहिये
।
एक पुराकथा
के अनुसार
'वृंदा' शंखचूड़
असुर की पतिव्रता
पत्नी थी, जिसकी
वजह से वह
अजेय था। उसका
सतीत्व खंडित
करने के लिए
श्रीहरि ने
शंखचूड़ दानव
का रुप धारण
किया और
उसके पतिव्रत
को भंग किया।
तब वृंदा
ने श्रीहरि
को शालिग्राम
शिला होने
का शाप दिया
और शिव ने
वृंदा को
जड़ (वनस्पति)
होने का शाप
दिया।-६
एक अन्य
पुराकथा के
अनुसार 'तुलसी'
'जालंधर'
दैत्य की पत्नी
तथा 'कालनेमि'
की पुत्री थी।
जालंधर की
मृत्यु के पचात्
इसने अग्नि-प्रवे श
किया था। इसकी
पति-भक्ति से
'विष्णु' प्रसन्न
हुए। इसके अग्नि-प्रव श्ेा
के स्थान पर
'गौरी' के
अ श्ंा से आँवला,
'लक्ष्मी' के अं श
से तुलसी
तथा 'स्वरा'
के अं श से मालती
के पेड़ उत्पन्न हो
गए।-७ पंजाब
में जालंधर
में तुलसी
का प्रसिद्ध मंदिर
है।
पुराणों
में तुलसी
को वृंदा
के पसीने से
उत्पन्न बताया
गया है,-८ एक
कथा के अनुसार
'समुद्रमंथन'के अवसर पर
जब अमृत बाहर
आया तो उसकी
बूँद जमीन
पर गिरी। उस
बूँद से तुलसी
का पेड़ उत्पन्न
हुआ, जो 'ब्रह्मा'
ने 'विष्णु' को
दिया।-९ तुलसी
का भगवान
के चरणों में
निवास है,
लक्ष्मी का भी
निवास भगवान
के चरणों में
है, इसलिए
तुलसी को
'लक्ष्मी' की सौत
मान गया है।
ब्रज में
जब 'ठाकुरजी'
को भोग
समर्पित किया
जाता है तब
भोग में तुलसी-दल
डाला जाता
है, क्योंकि
उसे बिना वे
भोग स्वीकार
नहीं करते-
छप्पन
भोग छतीसौ
व्यंजन बिन
तुलसा हरि
एक न मानी
नमो-नमो।
तुलसा महारानी
नमो-नमो
'चरणामृत'
में भी तुलसीदल
होता है।
विवाहों
में तेल चढ़ाया
जाता है, 'तेल
चढ़ाने' के समय
गीत गाया
जाता है-
ए हरि
नवन सँजोय
तुलसा पलोटै
हरि के पाँय
हो।
कार्तिक
में कही जानेवाली
तुलसी की
एक कहानी है
कि 'एक घर में
ननद-भावज
थीं। कुँआरी
ननद तुलसी
की पूजा करती
थी, जब ननद
का विवाह
हुआ तो भाभी
ने बरातियों
के आगे गमला
तोड़कर डाल
दिया, जो
पकवान के
रुप में बदल
गया, तुलसी
की मंजरी
गहना बन
गई ।-१०
'रामचरितमानस'
में प्रसंग है
कि 'लंकापुरी'
में 'विभीषण'
के घर पर हनुमान
ने तुलसी
के पौधे देखे
और अनुमान
किया कि अवय
ही यहाँ
किसी भक्त
का निवास
है-
नव
तुलसी के
वृंद बहु
लखि हरसे
कपिराय ।
वैष्णव
लोग तुलसी
की कंठी पहनते
हैं तथा तुलसी
की माला
पर ही जप
करते हैं। मृत्यु
के समय मुख
में गंगाजल
और तुलसीदल
जाला जाता
है और विश्वास
किया जाता
है कि ऐसा
करने से 'बैकुंठ
लोक' प्राप्त
होता है।-११
(आ) पीपल
: पीपल वृक्ष
का उल्लेख वैदिक-साहित्य
में है।-१२ गीता
में श्रीकृष्ण
ने पीपल को
अपना ही प्रतिरुप
बताया है-१३
तथा लोकजीवन
में उसे विष्णु-नारायण
एवं वासुदेव-वृक्ष
माना जाता
है। पीपल
सतयुग का
वृक्ष है। भगवती
'जालपा देवी'
के भवन के
द्वार पर पीपल
और 'पिछवारे'
वट का वृक्ष
है।
पीपल
वृक्ष पर शनि,
नाग देवता,
पीर, लक्ष्मी,
भूत-प्रेत तथा
पितृश्वर देवताओं
का निवास
माना जता
है। शनिवार
तथा 'अमावस्या'
को संतान
की कामना
तथा 'ग्रहदोष'
एवं 'अनिष्ट-निवारण'
के लिए पीपल
की पूजा की
जाती है। गाँवों
में प्राय: पीपल
के नीचे छोटे-छोटे
पत्थर रखे होते
हैं, यह वास्तव
में 'चैत्य-पूजा'
की परंपरा
का रुप है।
भैंस अथवा
गाय के 'ब्याने'
पर (बच्चा होने
पर) एवं नई
फसल आने
पर सबसे
पहले देवपूजा
का भाग पीपल
के 'चैत्य' पर
चढ़ाया जाता
है।
एक लोक
कहानी है
कि एक लड़की
पीपल को
जल चढ़ाने
जाया करती
थी तो 'लक्ष्मी'
उसके पीछे जाकर उसके
घर का सारा
काम कर दिया
करती थी।-१४ लोकमानस
में पीपल
को शनि के
रुप में पूजा
जाता है। ब्रज
की एक लोककथा
में एक महिला
पीपल से
'गोद भरने'
की याचना
करती है-
पीपर
देउ सनीचर
देउ मेरी गोद
में लरका
देउ
पीपल के प्रसाद
से जब ननद
के भी लड़का
हुआ तो भाभी
न पति से शंका
की। भाई को
भी विश्वास
नहीं हुआ,
तब पीपल
का तना फटा
और बालक
उसमें समा
गया। इस दुर्भाव
के कारण भाई
को 'कुष्ठ' हो
गया तब वह
पुन: पीपल
से 'सत' के भांजे
को माँगने
गया।-१५ इस कहानी
में पीपल
गोत्र का महत्त्वपूर्ण
संकेत है।
'सासनी' के
पास 'बिजाहरी'
गाँव के जाटव
बिरादरी
के एक महानुभाव
ने पीपल 'गोत्र'
का उल्लेख किया
था।-१६
जब
'मुगल' देवी
के 'मढ़' के द्वार
पर स्थित 'हरियल
पीपर' काटने
को उद्यत हुआ-'हरियल
पीपर ग्वाइ
कटवाय दउँ
तब मानैं
मन मेरौ'
तब लाँगुरिया
ने उसे सावधान
किया। पीपल
काटने के कारण
'मुगल' नष्ट
हो गया। पीपल
की लकड़ी जलाने
का दोष माना
जाता है, विश्वास
किया जाता
है कि पीपल
काटने से कोढ़े
हो जाता
है।
लक्ष्मी,
शनि तथा देवी
के अतिरिक्त 'पितृपूजा'
में भी पीपल
का महत्त्व है।
'पितृश्वरों'
को तृप्त करने
के निमित्त मृत्यु
के बाद दस
दिनों तक एक
जल से भरा
घड़ा पीपल
पर टाँग दिया
जाता है।-१७ प्रेत
अपनी मुक्ति
के लिए स्वप्न
देता है कि
मेरी मुक्ति
के लिए पीपल
का वृक्ष लगवाओ।
यदि
छोंकर ( शमी
वृक्ष) पर पीपल
का वृक्ष उत्पन्न
हो जाता
है तो उसे
'नर-नारायण'
का वृक्ष कहते
हैं।-१८ उसी वृक्ष
की सूखी लकड़ी
से यज्ञ में
'अरणि-मंथन'
(लकड़ी के घर्षण
से अग्नि की चिनगारी
उत्पन्न होती
है, उससे यज्ञ
की अग्नि प्रज्वलित
की जाती है)
करने का विधान
है।
' नाग
पूजा' का दूध
भी पीपल
पर चढ़ाया
जाता है। पुराणों
में पीपल
को विष्णु
का रुप कहा
गया है-
मूले विष्णु:
स्थितो नित्यं
स्कंधे केाव
एव च।
नारायणस्तु
शाखासु पत्रेषु
भगवान्
हरि:।
फलेऽच्युतो
न सन्देह: सर्वदेवै:
समन्वित:।
स एव विष्णुर्द्रुम:।
- (स्कंद पुराण)
एक पुराकथा
है कि शिव-पार्वती
की रतिक्रीड़ा
में अग्नि ने बाधा
डाली तब
पार्वती ने
सभी देवताओं
को वृक्ष बन
जाने का शाप
दिया, परिणामस्वरुप
ब्रह्मा पीपल
बने और विष्णु
वट। एक कथा
के अनुसार
लक्ष्मी की बड़ी
बहन 'दरिद्रा'
एक बार रुठकर
पीपल के नीचे
जा बैठी। शनिवार
के दिन लक्ष्मी
उससे मिलने
आयी, इसलिए
शनिवार को
तो पीपल
लक्ष्मीप्रद होता
है तथा अन्य
दिनों उसका
स्र्पा करने
का निषेध
है। भूत-प्रेत
तथा दरिद्रा
के निवास
के कारण पीपल
को गृहस्थ
घर में रखने
का निषेध
है।
भगवान
शिव पीपल
के नीचे ध्यानमग्न
रहते हैं।
जब भगवान
कृष्ण पीपल
वृक्ष में बैठे
थे, तभी उनके
पैर में बहेलिया
का बाण लगा
था तथा उनका
परमधाम
गमन हुआ।-१९
गोस्वामी
तुलसीदास
के संबंध
में किंवदंती
है कि वे जिस
पीपल पर
पानी चढ़ाते
थे, उसी के नीचे
उन्हें हनुमानजी
के द र्शन हुए।
इस प्रकार के
किस्से गाँव-गाँव
में प्रचलित
हैं कि-"गाँव
के पच्छिम माँऊँ
एक बम्बा पै
कोठी ऐ, ग्वा
पै कैऊ पीपर
ठाड़े ऐं,
थान बन रए
ऐं, म्वाँ ते पीर
निकरतु ऐ।"-२०
पीपल
को धर्म का
द्वारा माना
जाता है। शपथपूर्वक
कहने के लिए
पीपल की डाल
पकड़कर सत्यनिष्ठा
प्रकट की जाती
है। गाँवों
में पहले
पंचायतें
पीपल के नीचे
की जाती थीं
ताकि लोक
झूठी गवाही
न दें। ब्रज की
अनेक जातियों
में बालकों
का 'मुंडन
संस्कार' (मुड़ामन)
पीपल के नीचे
कराया जाता
है।-२१
यदि
किसी कन्या
की कुण्डली
'मंगली दोष'
अथवा अन्य कोई
अनिष्ट दोष
होता है
तो उसके निवारण
हेतु उस कन्या
के 'फेरे' पहले
पीपल के साथ
डालने के
बाद फिर
विवाह की
विधि सम्पन्न
करायी जाती
है।
जिस
प्रकार शालिग्राम-तुलसी
के विवाह
का अनुष्ठान
कराया जाता
है उसी प्रकार
पीपल का जोड़े
से अथवा नीम
के साथ विवाह-अनुष्ठान
भी कराया
जाता है। लोकगीतों
में पीपल-पूजा
का अभिप्राय
बहुप्रचलित
है-
पीपर
पूजन हम
चलीं बाँयें
बोलौ काग।
पीपर पूजत
पिय मिलें
एक पंथ दो काज।
(इ) वट
: वट-वृक्ष भी
पीपल के समान
ही नारायण
विष्णु का स्वरुप
माना गया
है। इसी वृक्ष
के नीचे 'सावित्री'
ने मृत्यु को
जीतकर 'सत्यवान'
का पुनर्जीवन
प्राप्त किया
था। ज्येष्ठ मास
की अमावस्या
(बड़मावस
अथवा सावित्री
व्रत) को दीवाल
पर हल्दी-चावल
के 'ऐंपन' से
बड़ का चित्र
बनाकर अथवा
उसकी टहनी
लाकर सौभाग्यवती
स्रियाँ सुहाग
की कामना
से बड़ की
पूजा करती
हैं तथा बड़-वृक्ष
उपलब्ध हो
जाए तो वहाँ
पौनी (कच्चा
सूत) लपेटकर
एक सौ आठ परिक्रमा
करती हैं।
पुराणों में
शिव का आसन
वट-वृक्ष के
नीचे उल्लिखित
है। पुराण
प्रसिद्ध 'मार्कण्डेय
मुनि' ने जो
प्रलय-र्दान
किया था, उसमें
'प्रलयकाल'
में केवल
'अक्षयवट' शेष
था और सर्वत्र
जल ही जल
था। वट-वृक्ष
के पत्ते पर
'बालमुकुंद'
शयन कर रहे
थे।-२२
ब्रज में
कहावत है
कि-
वृंदावन
सौ बन नहीं,
नंद गाँव
सौ गाँव।
वं शीवट सौ
वट नहीं, कृष्ण
नाम सौ नाम।
इसी
व श्ंाीवट के
नीचे श्रीकृष्ण
ने गोपियों
के साथ रास
किया था। भागवत-पुराण
के व्याख्याकारों
ने 'रास' के अभिप्राय
की विस्तार
से व्याख्या
की है तथा
'विराट पुरुष',
'श्रीयंत्र' जैसे
अभिप्रायों
की भाँति
अध्यात्म-विद्या
के रुप में रास
का विवेचन
किया है।
वट का अभिप्राय
' शास्र' में किस
रुप में प्रतिष्ठित
है, इसका एक
उदाहरण वं शीवट
तथा दूसरा
उदाहरण 'अक्षयवट'
है। भगवान
बुद्ध के जीवन-प्रसंग
में सुजाता
की दासी ने
गौतम बुद्ध
को वृक्ष का
देवता यक्ष
समझकर खीर
समर्पित की
थी। ब्रज के 'भांडीर
वन' में भांडीर
यज्ञ का 'भांडीर
वट' प्रसिद्ध
है।
'करवा चौथ'
के व्रत में दीवाल
पर वट का
अभिप्राय अंकित
किया जाता
है, क्योंकि
सात भाइयों
ने 'अखैबर'
के पेड़ पर
चढ़कर ही
दीपक दिखाया
था। विष्णुसह शनाम
में 'न्यग्रोधोदुंबरऽावत्थ:'।
वट, पीपल
तथा गूलर
विष्णु के स्वरुप
हैं। भागवत
में वट को
'महायोगमय
तथा मुमुक्षुओं
का आश्रयभूत'
कहा गया
है। (४.६.३३)। इस प्रकार
' शास्र' और
'लोक' दोनों
में वट की
महिमा प्राचीन
का से प्रतिष्ठित
है।
(ई) दूब
: श्रावण शुक्ला
सप्तमी को
'दूर्वा-सप्तमी'
या 'दूबरी
सातें' कहा
जाता है। 'दूबरी
सातें' की कहानी
में उल्लेख है
कि 'दूबरी
सातें' के दिना
सबु बैयरबानी
जुर मिल
में दूब लैबे
जाओ करतीं।'-२३
दूब को देवी
का रुप माना
गया है तथा
इसकी पूजा
से सुख-सम्पत्ति-संतान
की प्राप्ति होती
है। दूब गणे श
को प्रिय है
तथा गणे शजी
की पूजा में
दूब का होना
अत्यंत आव श् यक
माना जाता
है। भविष्य
पुराण की
कथा है कि-"जब
देवताओं
ने 'क्षीरसागर-मंथन'
किया, उस समय
विष्णु भगवान
ने अपनी पीठ
पर 'मंदराचल'
को धारण
किया, उसकी
रगड़ से भगवान
के जो रोम
उखड़कर जल
में गिरे, उनसे
दूब उत्पन्न हुई,
उस दूब पर
देवताओं
ने 'अमृत के
कुंभ' रखे,
उस अमृत के स्र्पा
से यह अजर-अमर
हो गयी।"
ब्रज की एक लोक
कहानी है
कि कौआ 'अमरौती'
लेकर आया
तो उसने दूब-घास
पर रखकर
ही अमरौती
खायी थी। दूब
को अजर-अमर
माना गया
है। दूब कितनी
ही सूख जाए,
एक बूँद जल
से ही हरी
हो जाती
है। दूब उर्वरता
की प्रतीक है
तथा पुत्र-जन्म
के उत्सव में
'नाई' परिजनों
के कान पर
दूब लगाकर
दक्षिणा लेता
है।
(उ) अ शोक
: 'अ शोक' कामदेव
का प्रतीक है।
विवाह आदि
अवसरों पर
अ शोक के पत्तों
का बंदनवार
बाँधा जाता
है। कामदेव
के हाथस में
अ शोक का बाण
है। संतान
की कामना
से स्रियाँ
चैत्र शुक्ल अष्टमी
को इसकी पूजा
करती हैं
तथा इसकी आठ
पत्ती खाकर
विश्वास किया
जाता है कि
उसके पुत्र उत्पन्न
होगा। रावण
की लंका में
अ शोक वाटिका
थी और 'सीता'
को अ शोक वाटिका
में रखा गया
था। वे अ शोक
वृक्ष के नीचे
बैठती थीं-'सुनहु
विनय मम
विटप 'आोका'।'
किंवदंती
है कि अ शोक
का फूल सुंदरी
के पदाघात
से फूलता
है। इस अभिप्राय
से युक्त प्राचीन
प्रतिमाएँ 'पुरा-संग्रहालय'
में विद्यमान
हैं।
(ऊ) गूलर : 'गूलर'
को 'विष्णुसह"ानाम'
में विष्णु
का रुप माना
गया है। गूलर
को 'व्रण वृक्ष'
माना गया
है। भगवान
नृसिंह ने
अपने नखों की
गरमी को
(क्रोध के ताप
को) गूलर
के वृक्ष में
गाड़कर शांत
किया था, इसलिए
इसका फल
विरस हो
गया तथा 'व्रण'
के रुप में कीड़े
भी उत्पन्न हो
गए। गूलर के
नीचे सैयद
का थान होता
है-'गूलरिया
धुकधालरी
म्वाँ सैयद
कौ थान।'
(ए) शमी
(छोंकरा) : दाहरा
(आश्विन) के दिन
स्रियाँ शमी
(छोंकरा के
पेड़) की पूजा
करती हैं।
यज्ञ में 'अरणिमंथन'
के लिए इसी
की लकड़ी ली
जाती है। विवाहों
में 'वरमनियाँ'
को 'बव्रावाहन'
(बर्बरीक)
का रुप माना
जाता है। लोक-कथा
है कि श्रीकृष्ण
ने बव्रावाहन
को यह वरदान
दिया था कि
तेरी पूजा
छोंकर के वृक्ष
पर होगी।-२४
(ऐ) आँवला
: आँवले के
वृक्ष पर देवताओं
और ब्रह्माजी
का निवास
माना जाता
है। पुराकथा
के अनुसार
यह गौरी
के तेज से उत्पन्न
होनेवाला
वृक्ष है। अखयनवमी
(कार्तिक शु. नवमी)
के दिन कुमारियाँ
घी-गुड़ से
इसकी पूजा
करती हैं
तथा कच्चे सूत
के साथ परिक्रमा
करती हैं।
इतवार के
दिन आँवले
का नाम लेना
निषिद्ध है।-२५
(ओ) अंडी
(एरंड) : गाँवों
में बसंत
पंचमी के दिन
होरी का
'डाँड़ा' गढ़ता
है। लक्कड़ों
के बीच में
'अंडी' के पेड़
के लगा देते
हैं। जब होली
जलाई जाती
है, तब इसे
निकाल लिया
जाता है, यह
प्रह्मलाद का
प्रतिरुप माना
गया है।
(औ) आक
: श्रावण शुक्ल
षष्ठी को 'अकौआ
छट' कहा जाता
है। इस दिन
आरोग्य-कामना
से सूर्य
के नामों से
आक की पूजा
की जाती है।
यह स्वर्ग
का वृक्ष माना
जाता है। जब
कोई तीसरा
विवाह करता
है, तो पहले
उसका विवाह
आक से होता
है। इसका नाम
मंदार भी
है।
(अं) केला : बृहस्पतिवार
को स्रियाँ
सौभाग्य-कामना
से गुड़ और
चने की दाल
से केले की
पूजा करती
हैं तथा कच्चा
सूत लपेटकर
परिक्रमा करती
हैं।
(अ:) नीम
: नीम के पेड़
पर भैरव
का निवास
माना जाता
है। विश्वास
किया जाता
है कि स्नान
करके नीम
पर जल चढ़ाने
से दुख-दरिद्रता
दूर हो जाती
है। यह शीतला
माता का प्रिय
वृक्ष है।
(क) कदंब
: कंदब वृक्ष
एक ओर कृष्ण-लीला
के संदर्भ
से जुड़ा है-'बैठो
कदम की डारी
कदम बिच
बनवारी',
'कालिंदी कूल
कदंब की डारन',
'कदम चढ़ कान्ह
बुलावत
गइयाँ'। 'टेर
कदम्ब' प्रसिद्ध
है। दूसरी
ओर भगवती
जगदंबा भी
कदंबवन-वासिनी
हैं। भगवती
का चिंतामणिगृह
कदंबों से
घिरा है-मणिद्वीपे
नीपोपवनवति
चिंतामणिगृहे।-२६
कंदब वृक्ष
विश्व वृक्ष
है तथा इस
पर लोहितायनि
(कार्तिकेय
की धाय) की
पूजा होती
है।
(ख) बेल
: बेल का वृक्ष
शंकर को भी
प्रिय है और
लक्ष्मी को भी।
ज्येष्ठ मास
की पूर्णिमा
को ज्येष्ठा
नक्षत्र में सरसों
मिले जल
से इसकी पूजा
होती है,
माना जाता
है कि जो
इस प्रकार पूजा
करे, वह स्री
विधवा नहीं
होती। 'बेल
वृक्ष' की पूजा
करने से धन
और पुत्र की
भी प्राप्ति होती
है। इसकी तीन
पत्तियाँ मिली
हुई होती
हैं, इन्हें बेलपत्र
(बेल पत्थर
भी) कहते
हैं और शिव
की पूजा में
बेलपत्र का
महत्त्व उसी
प्रकार का है;
जैसे- शालिग्राम
पूजा में तुलसीदल
का। एक कथा है
कि एक भील
बेल पर चढ़
उसके पत्र तोड़-तोड़कर
गिरा रहा
था, नीचे शिवलिंग
था। भगवान
शंकर इस कृत्य
से भील पर
प्रसन्न हो गए।-२७
(ग) कमल
: भारतीय
संस्कृति में
कमल सृष्टि
का प्रतीक है।
ब्रह्मा की उत्पत्ति
कमल से मानी
गयी है। यह
कमल विष्णु
का नाभि से
उत्पन्न हुआ था।
लक्ष्मी का नाम
कमला है,
उसका निवास
कमल-वन
में है, उनका
आसन भी कमल
है, उनके हाथ
में कमल का
ही आयुध है।
लक्ष्मी को पद्मा,
पद्मायताक्षी,
पद्महस्ता,
पद्मप्रिया,
पद्मसंभवा
कहा गया
है।-२८ विष्णु
के हाथ में
भी पद्म
है और चरणों
में भी पद्मचिन्ह
हैं। भगवती
सरस्वती
'श्वेत पद्मासना'
हैं। राधा
के हाथों
में भी लीला-कमल
है। महाभारत
(वन. १५४/२०.२१) में प्रसंग
है कि कुबेर
के पास सौगंधिक
कमलों का
सरोवर
था और भीम
कमल लेने
गए थे। योग शास्र
में षट्चक्रों
की परिकल्पना
कमलों के
रुप में की गयी
है।
नित्य-वृंदावन
कमल पर ही
बसा हुआ
है, ऐसा विश्वास
प्रचलित है-'अधर
कमल बिंदावन
बसि रह्यौ।'
(घ) वृंदावन
के वृक्ष : वृंदावन
के लता-पता
और वृक्षों
को ॠषि-मुनि
माना जाता
है। भागवत
में उल्लेख है
कि स्वयं उद्धव
ने वृंदावन
की गुल्म लतौषधि
बनने की कामना
की थी।
ब्रज की
लता-पता मोहि
कीजै।
आसामहोचरण
रेणुजुषामहं
स्याम
वृंदावने
किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
रसिक
भक्त इन लताओं
को 'सखी' रुप
मानते हैं,
जो यामा-याम
के लीला
विहार की
सहायक एवं
साक्षी हैं।
वृंदावन
के भक्त ब्रजलताओं
के साथ निवास
को अपने जीवन
का सौभाग्य
मानते हैं।
बास
करै ब्रज लतन
सँग माँग
मधुकरी खाँय।
वृंदावन
के वृक्षों की
महिमा संबंधी
कहावत है-
वृंदावन
के बिरछ कौ
मरम न जानें
कोय।
डार-डार अरु
पात-पात पै
राधे-राधे
होय।
(ङ्) रुद्राक्ष
: एकमुखी 'रुद्राक्ष'
को गौरी
शंकर कहते
हैं। रुद्राक्ष
के दाने पर
शिव की पूजा
होती है।
पुराणों में
रुद्राक्ष की महिमा
का विस्तार
से वर्णन किया
गया है। रुद्राक्ष
धारण करने
से सौभाग्य
प्राप्त होता
है।
शिव
पर केतकी
का फूल नहीं
चढ़ाया जाता
क्योंकि एक कथा
के अनुसार
'शिवलिंग'
का आदि और
अंत ब्रह्मा ने
खोज लिया
है' ऐसी झूठी
गवाही देने
के कारण केतकी
को यह शाप
दिया गया
था।
(च) बाँस
: भगावत-माहात्म्य
के प्रसंग में
गोकर्ण का
भाई 'धुंधकारी'
प्रेत बना और
उसने सात गाँठों
के बाँस में
प्रवेा करके
भागवत सप्ताह
सुना था।-३० भागवत
सप्ताह के
आयोजन में
एक बाँस प्रतिष्ठित
किया जाता
है।
(छ) कल्पवृक्ष
: देववृक्ष
: गायों में
जो स्थान सुरभि
नामक गौ
का है, वृक्षों
में वैसा
ही स्थान पारिजात
अथवा कल्पवृक्ष
का है। 'सुरभि'
स्वर्ग की गाय
है तथा उसे
कामधेनु कहा
जाता है, पारिजात
उसी प्रकार
स्वर्ग का वृक्ष
है। जिस प्रकार
कामधेनु सम्पूर्ण
कामनाओं
को पूर्ण करनेवाली
है, उसी प्रकार
कल्पवृक्ष भी
सम्पूर्ण इच्छाओं
को पूरा करनेवाला
तथा समस्त
अभावों को
दूर करनेवाला
है। पुराकथाओं
की भाँति
ही लोक
कहानियों
में भी इसका
प्रसंग आता
है और जहाँ
भी इसका प्रसंग
आता है वहाँ
पर अभिप्राय
जुड़ा रहता
है कि किसी
व्यक्ति ने कल्पवृक्ष
के नीचे जो
संकल्प किया,
जो इच्छा की,
वह पूर्ण
हो गयी। भगवान्
को 'वांछा
कल्पतरु' कहा
गया है तथा
जगदंबा को
'कल्पलता' नाम
से भी अनेक
ग्रंथ रचे गए
हैं, स्तोत्र
ग्रंथ उपलब्ध
होते हैं
तथा 'कल्पद्रुम'
नाम से भी
अनेक ग्रंथ रचे
गए हैं, जैसे- शब्दकल्पद्रुम,
काव्यकल्पद्रुम
आदि। 'कल्पवृक्ष'
उन 'चौदह रत्नों'
में से एक है,
जो समुद्र-मंथन
के माध्यम
से प्रकट हुआ
था। 'पारिजात
वृक्ष' नंदन
वन में था
और इस वृक्ष
को स्वर्ग से
द्वारका में
लाने के लिए
कृष्ण का इंद्र
से युद्ध हुआ
था और कृष्ण
ने इंद्र को परास्त
किया था। कृष्ण
के परमधाम
गमन के बाद
इंद्र इस पुन:
स्वर्ग ले गया,
ऐसा उल्लेख
भी पुराकथाओं
में विद्यमान
है।-३१
मलिक
मुहम्मद जायसी
ने अपने 'पद्मावत'
में 'कंचनवृक्ष'
का वर्णन किया
है, यह वर्णन
बहुत कुछ
कल्पवृक्ष की
परिकल्पना
से मिलता-जुलता
है-
और कुंड एक
मोंती चूरु,
पानी अंब्रित
कीच कपूरु।
ओहिक पानी
राजा पैं पिया,
बिरिध होइ
नहिं जो लहि
जिया।
कंचन बिरिख
एक तेहि पासा,
जस कल्पतरु
इंद्र का विलासा।
मूल पताल
सरग ओहि
साखा, अमर
बेल पाव
को चाखा।
चाँद पात औ
फूल तुराई,
होइ उजियार
नगर जहँ ताई।
वह फर पावै
ताप कें कोई,
बिरिध खाय
नव जोबन
होई।
राजा भये
भिखारी सुनि
वह अंब्रित
भोग।
जेहि पावा
सो अमर भा
न किहु व्याधि
न रोग
महात्रिपुर
सुंदरी के
मणिद्वीप की
परिकल्पना
में कल्पवृक्षों
के वन हैं-
सुधासिंधोर्मध्ये
सुरविटपवाटी
परिवृते।-३२
कल्पवृक्ष
का विश्वास
'वृक्ष में परिपूर्णता-सम्पूर्णता'
का विश्वास
है। अनेक साहित्य-मनिष्यों
ने मन तो ही
कल्पवृक्ष कहा
है।
(ज) वृक्ष-पूजा
: विधि-विधान
: वृक्ष-पूजा
के विधि-विधानों
में कर्मकांड
के प्राचीन अव शेष
विद्यमान हैं।
सूत लपेटना,
परिक्रमा करना,
जल चढ़ाना,
दीपक जलाना,
कथा-कहानी
कहना, गीता
गाना, दान करना,
व्रत-उपवास
रखना, चित्र
लिखना-३३ तथा
उद्यापन करना
वृक्षपूजा
के विधि-विधान
हैं। साँझी-टेसू
के अनुष्ठान जिस
प्रकार खेल
के रुप में आयोजित
होते हैं,
उसी प्रकार
कजली खेलना
जौ-बोने
संबंधी अनुष्ठान
है। पूजा-अनुष्ठान
के साथ खेल
का तत्त्व किसी
प्राचीन परंपरा
का संकेत
करता है।
केला, पीपल
और तुलसी
की पूजा में
कथा-कहानी
सुनने-सुनाने
का विोष
महत्त्व है।
तुलसी के
पूजन में गीत
भी गाए जाते
हैं और भिन्न-भिन्न
अंचलों में
भिन्न-भिन्न
प्रकार के तुलसी
के गीत प्रचलित
हैं।-३४
(झ) टोटम
(गणगोत्र) : आचार्य
क्षितिमोहन
सेन ने थस्र्टन
द्वारा लिखित
पुस्तक के आधार
पर उल्लेख
किया है कि
अनेक जातियाँ
अपनी उत्पत्ति वृक्षों
से मानती
हैं। इस प्रकार
के टोटम वृक्षों
(गणगोत्र से
संबंध रखनेवाले
वृक्षों) की
संख्या एक सौ
तक है। पीपल,
गूलर, नीम,
बेल, बरगद
आदि की गणना
भी इन वृक्षों
में की गयी
है।-३५ इस संदर्भ
में सासनी
के पास बिजाहरी
गाँव में एक
जाटव परिवार
के पीपल गोत्र
का उल्लेख यथा-प्रसंग
किया जा चुका
है।
(ञ) अध्यारोपण
: कुछ वृक्षो-वनस्पतियों
को किन्हीं
प्राचीन 'व्यक्तित्वों'
का प्रतिरुप
माना जाता
है। तुलसी
कृष्ण की प्रेयसी
है, साथ ही
शंखचूड़ की
पतिव्रता पत्नी
और जलंधर
की सती स्री
भी वह है।
(ट) अंतर्भुक्ति
: इतिहास में
हम देखते
हैं कि जब
दो मानव
जातियों का
सम्मिलन
होता है
तो उन जातियों
के देवतत्त्व
और पूजातत्त्व
भी एक-दूसरे
में समा जाते
हैं। तुलसी
देवतत्त्व में
वृंदा देवतत्त्व
की अंतर्भुक्ति
उदाहरण है।
पुराणों में
तुलसी और
वृंदा दो
भिन्न-भिन्न
व्यक्तित्व हैं,
जिनका संबंध
असुर और
दानव-संस्कृति
से है और
वह दानव
संस्कृति आज
तुलसी की
वैंष्णवी पूजा
में इस प्रकार
अंतर्भुक्त है
कि उसे पहचानना
ही कठिन है।
होली का
संबंध दैत्य
संस्कृति से
है। होली
पर जो गीत
गाए जाते हैं,
उनमें राजा
बलि का उल्लेख
मिलता है
'राजा बलि
के द्वारा मटी
रे होरी।'-३६
होली पर
अंडी का दंड
जो प्रह्मलाद
का प्रतिरुप
माना जाता
है, दैत्य संस्कृति
का पूजा तत्त्व
है, प्रह्मलाद
दैत्य थे। इसी
प्रकार अर्क पूजा
का संबंध
आदित्य से है।
आक की पूजा
सूर्य के नाम
से की जाती
है।
पीपल
की पूजा में
नाग देवतत्त्व
तथा शनिग्रह
देवतत्त्व अंतर्भुक्त
हैं। लक्ष्मी
देवतत्त्व का
भी उसमें समावे श
है। आगे चलकर
हम पीपल
के साथ नारायण
एवं विष्णु
को भी अंतर्भुक्त
देखते हैं।
गूलर विष्णु
का रुप माना
गया है परंतु
गूलर के साथ
प्रेत और पितृश्वर-देवतत्त्व
अंतर्भुक्त होते
हैं, सैयद
पनमेसुरेका
थान भी गूलर
के नीचे मिल
जाता है।
अंतर्भुक्ति
की प्रक्रिया
निरंतर प्रक्रिया
है तथा जातीय
जीवन के साथ
उसका अभिन्न
संबंध है।
जातीय जीवन
की घटनाएँ अंतर्भुक्ति
की प्रक्रिया
में परिलक्षित
की जा सकती
हैं। इसी प्रकार
वृक्ष-वनस्पतियों
से
संबंधित
निषेधों का
अध्ययन भी
सांस्कृतिक
इतिहास के
अध्ययन में सहायक
हो सकता
है।
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भूत-प्रेतों
और आत्माओं
का वर्गीकरण
भी किया
जा सकता है;
जैसे 'पुरखा-पनमेसुरे',
'अऊत', 'पितर',
'भुमियाँ',
'भूत', 'प्रेत',
'जोगिनी', 'सती',
'सैयद', 'पीर',
'जिन्न', 'खईस'
और 'चुड़ैल'
आदि।
जिन्न,
बेर पर रहता
है। खईस केवड़ा
में रहता
है, गूलर
पर भी रहता
है।
धुंधकारी
का प्रेत बाँस
में प्रतिष्ठित
होकर भागवत-सप्ताह
सुनता था।
'हरदौल'
का प्रेत 'महुआ'
पर स्थित था।
'हरदौल'
गाथा-३८ का एक
प्रसंग है-
त्यारे
बिरन द्वेै
बिरछ लगाए
एक महुआ एक
आम।
आम मिली
है रोय
कें रे महुआ
ऐ छाती फारि।
महुआ की फटि
करिचें भई
रे बैठे हैं
गुंजलक मार।
सैयद
का थान गूलर
के नीचे होता
है-
गूलरिया
झुक झालरी
म्वाँ सैयद
कौ थान।
इस प्रकार
का लोकविश्वास
भी प्रचलित
है कि मृत्यु
के उपरांत
आत्मा वृक्ष
के रुप में भी
जन्म ले लेती
है।
बाबुल
मरि महुआ
भये और
वीरन पीपर
के पेड़।
(ड) प्राचीन
जातियों की
स्मृति : अनेक
मानवाास्रियों
तथा पुराविदों
ने वृक्षपूजा
की परंपरा
तथा पौराणिक
उल्लेखों के
आधार पर प्राचीन
जातियों और
उनकी सांस्कृतिक
परंपराओं
की पहचान
की है। प्राचीन
काल में यक्ष
और गंधर्व
पेड़ों को
आवास बनाकर
रहते थे, इसलिए
प्राचीन संस्कृत-साहित्य
में वृक्षों
का एक नाम यक्षावास
भी आता है।
याोदा के
आँगन में दो
अर्जुन (यमलार्जुन)
वृक्ष थे। भागवत
में उल्लेख है
कि नल और
कूबर नाम
के यक्ष नारद
के शाप से ग्रस्त
होकर इन
पेड़ों के रुप
में उत्पन्न हुए
थे।-३९ डॉ. नीलकंठ
पुरुषोत्तम
जो शी ने वटवृक्ष
का यक्षों से
संबंध रेखांकित
किया है।-४०
भांडीर यक्ष
का भांडीरवन
ब्रज की चौरासी
कोसी परिक्रमा
में तीर्थ के
रुप में माना
जाता है।
काम
गंधर्व देवता
था और आम,
अ शोक, पलाा,
ईख, कमल, कुमुद
एवं दमनक
कामदेव के
सम्बद्ध माने
जाते हैं। दमनक
और अ शोक
पर काम की
पूजा होती
है। आम, अ शोक,
पला श, कुमुद
और कमल
की गणना कामदेव
के बाणों
के रुप में तथा
ईख की गणना
कामदेव के
धनुष के रुप
में की जाती
है।
'हिकिंडब' नाम
का राक्षस
शाल
वृक्ष पर रहता
था।-४१ सिहोर
का वृक्ष पि शाच-वृक्ष
है। पीपल
का संबंध
नाग संस्कृति
से है, क्योंकि
नागपूजा का
दूध पीपल
पर चढ़ाया
जाता है। 'तुलसी'
या 'वृंदा'
का संबंध
कालनेमि
दैत्य, असुर
शंखचूड़ तथा
दैत्य पौराणिक
कथा के अनुसार
पीपल और
अश्वत्थ नामक
असुर ब्राह्मणों
का वध करते
थे। इस प्रसंग
में प्रख्यात विद्वान्
आचार्य क्षितिमोहन
सेन का विचार
उल्लेखनीय
है। वे कहते
हैं-'वृक्षों
की पूजा आर्यों
ने आर्यपूर्व
भारतीयों
से ग्रहण की
होगी।' उनका
तर्क है कि
'जिन देवताओं
से संबंद्ध
माने जाकर
तुलसी, पीपल,
बिल्व आदि
वृक्ष पवित्र
माने गए हैं,
उन देवताओं
का आदिम परिचय
वेद विरुद्ध
देवता के
रुप में मिलता
है।'-४२