धरती और बीज

राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

चिंतन-प्रणाली में धरती और बीज के बिम्ब


 

इसमें कोई संदेह नहीं कि चिंतन एक आंतरिक प्रक्रिया है परंतु यह भी सही है कि जिन बिम्बों की भाषा से यह प्रक्रिया चलती है, वे बिम्ब बाह्य परिवेा में प्राप्त होते हैं। मनुष्य जिस परिवे में रहता है, उसका बिम्ब उसके मन पर अंकित हो जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि मनुष्य बाह्य परिवेा को संवेदना शक्ति के द्वारा (पंच ज्ञानेन्द्रिय और मन के द्वारा : देखकर, सुनकर, सूँघकर, चखकर, छूकर तथा अनुभव करके) आंतरिक बना लेता है। इस प्रकार वह परिवे स्मृति के द्वारा मनुष्य की चेतना का अंग और अं बन जाता है।

जिस प्रकार जला शय के तट पर स्थित वृक्ष-आदि का बिम्ब जला शय में दृ श् यमान होकर जला शय का अंा बन जाता है, उसी प्रकार मनुष्य अपने चारों ओर के संसार को जो चित्र मन में बनाता है, वह उसका आधारभूत ज्ञान या अनुभव होता है। आधारभूत इसलिए कि मनुष्य बज भी कोई नया अनुभव करेगा, तो वह पूर्व-अर्जित-अनुभव, उस नए अनुभव का माध्यम बनेगा। उदाहरण के लिए बालक ने गरम दूध पिया तो उसका मुँह और जीभ झुलस गए, यह उसका आधारभूत-अनुभव हुआ। इसके बाद कभी किसी दिन उसे मठा (छाछ) दी गयी, तो उसका दूध पीने का आधारभूत-अनुभव स्मृति के द्वारा सजीव हो गया। कहावत है कि 'दूध का जला छाछ को फूँक- फूँककर पीता है।' जब उसे दूध और छाछ का अंतर ज्ञात हो गया तो यह उसका नया ज्ञान हुआ। इस प्रकार पूर्वार्जित बिम्ब आगे के चिंतन और ज्ञान का माध्यम बन जाता है।

(अ) बिम्ब : ज्ञान के विस्तार का माध्यम

बिम्बों के द्वारा के विस्तार की प्रक्रिया का एक उदाहरण 'पहेलियाँ' हैं। बच्चों को जो पहेलियाँ सुनाई जाती हैं, उनके बिम्ब बच्चों के मन पर पहले से अंकित होते हैं। उन पूर्व अर्जित बिम्बों के द्वारा नए ज्ञान को बूझने की प्रक्रिया में पहेलियाँ बच्चों के चिंतन को झकझोरती हैं। उदाहरण के लिए दो पहेलियाँ हैं-

              १.
एक थाल में सरसों गिनी न जाए

              २.
ऊँचौ सौ पहाड़ जापै फूलन की बहार
माली तोड़ न सकै माली जोड़ न सकै।

'एक थाल में अनगिनत सरसों' और 'ऊँचे पहाड़ पर फूलों की वह बहार जहाँ माली की पहुँच नहीं है' यो दोनों बिम्ब आका के सितारों का एक नया चित्र उभार देते हैं।

(आ) ज्ञात से अज्ञात की व्याख्या

मनुष्य प्राकृतिक परिवे का एक बिम्ब ग्रहण करता है तथा उस बिम्ब से फिर प्राकृतिक परिवे के दूसरे बिम्ब को समझता और अभिव्यक्त करता है। इसे हम ज्ञात से अज्ञात की व्याख्या भी कह सकते हैं। जैसे आका में सितारों की पहचान के लिए राशियों के जो बिम्ब परिकल्पित किए गए, वे सब (मेष, वृष, कर्क, सिंह, वृचिक, मकर, मीन) प्राणी धरती के हैं।

आका में सप्तर्षि के सात तारों के पास 'त्रि शुंक' के तीन तारे होते हैं। किसान ने उन्हें एक कथा के माध्यम से यों समझा कि "सात गायें खेत में चुग रही थीं, जब बे खेत में अधिक नुकसान करने लगीं तो भगवान ने तीन गाँठ का पैना (बैलों को हाँकने के उपस्कर) फेंककर मारा। वही तीन गाँठ का पैना आका में त्रि शंकु के रुप में मौजूद है।"-१ इसी प्रकार कालचक्र से बेंधे हुए सितारों को आका में जनपदीयजन ने उसी प्रकार घूमता देखा, जिस प्रकार उसके खेत में 'दाँय' चलती है, तब गेहूँ की लाँक (ढेरी) पर बैल मंडल बाँधकर घूमते हैं।-२ उसके लिए आका में सूरज-चंदा यदि ऐसे लगें, जैसे उसके खेत में मिट्टी के दो ढेले,-३ तो यह अस्वाभाविक नहीं है।

(इ) अपढारी चकिया : प्रकृति की प्रक्रिया

चिंतन की प्रक्रिया में बिम्ब किस प्रकार अपनी भूमिका निभाते हैं, इसका एक उदाहरण 'अपढारी चकिया' है। जनपदीयजन गाँव में चाकी चलानेवाली 'पिसनहारी' को नित्य प्रति देखता है और यह भी देखता है कि चाकी के दो पाट होते हैं, एक नीचेवाला और एक ऊपरवाला। यह उसका आधारभूत बिम्ब है। अब किसी दिन किसी क्षण वह विश्व के रहस्य के संबंध में सोच रहा था। तब उसके मन में 'पिसनहारी' और चाकी का बिम्ब उभरा। इस पूर्व बिम्ब के माध्यम से उसने प्रकृति के व्यापार को देखा और समझा-

निरगुन चकिया चलै अपढारी।
एक पाट धरती चलै दूजौ चलै अकास।
पीसनहारी याम सुंदरी पीसै दिन और रात।

अर्थात् प्रकृति की अपढारी (अपने-आप चलनेवाली) चाकी चल रही है। इस चाकी का एक पाट आकाा और दूसरा पाट धरती है। चाकी घूम रही है, दिन और रात भी घूम रहे हैं।


(ई) भवसागर

इसी प्रकार का एक और उदाहरण 'भवसागर' है। समुद्र के परिवेा में रहनेवाले मनुष्य ने अनुभव किया कि समुद्र दुर्लंघ्य है, समुद्र अथाह है, समुद्र दुर्गम है, उसमें ज्वार-भाटे आते हैं। समुद्र को देख-समझकर मनुष्य के मन पर समुद्र की दुर्गमता और दुर्लंघ्यता का जो बिम्ब बना, उसके आधार पर जब उसने सांसारिक प्रपंचों और जीवन की जटिलता को देखा तो उसने 'भवाटवी' की अवधारणा रची थी। जिस प्रकार समुद्र के झंझावात में फँसी नाव में बैठे हुए व्यक्ति को उस आपदा में 'दिव्याक्ति' और उसके प्रति 'विश्वास' में ही आाा की एक मात्र किरण दीखती है, उसी प्रकार भवसागर से पार होने के लिए तथा नाव को किनारे लगाने के लिए वह ईश्वर का स्मरण करता है। कितने ही लोकगीतों और भजनों में भगवान को 'खेवनहार' और नैया पार लगानेवाले के रुप में स्मरण किया गया है। गीता में भी श्रीकृष्ण मृत्यु-संसार सागर के उद्धार की बात कहते हैं-

तेषामहं समुद्धतां मृत्युसंसारसागरात्।-४

(उ) आधारभूत बिम्ब

प्रत्येक संस्कृति की चिंतन-प्रणाली में कुछ आधारभूत बिम्ब होते हैं और ये बिम्ब उस देा तथा जनपद के परिवे से संबंधित होते हैं। प्यास से आकुल-व्याकुल मृग को रेगिस्तान में कड़ी धूप के कारण जल की लहरों का आभास होता है और इस आभास के कारण मृग उन जल-लहरों के पास पहुँचने के लिए दौड़ता है। जल की लहरें उत्तरोत्तर दूर दिखाई पड़ती हैं तथा जैसे-जैसे दूरी बढ़ती है, मृग वैसे-वैसे दौड़ता चला जाता है और अंत में थक जाता है। सांसारिक इच्छाओं को लोकमानस ने 'मृगमरीचिका' के उक्त बिम्ब के माध्यम से जाना-समझा है। मृगमरीचिका का यह बिम्ब शास्र और लोक दोनों में समान रुप से ग्रहण किया गया है। ब्रह्माण्ड तथा पिंडांड का अंड से और एक महीने के दो पक्ष (कृष्ण-पक्ष और शुक्ल-पक्ष) पक्षी के पंखों से जुड़े हुए बिम्ब हैं। इसी प्रकार हंस गति, गजगति, पिपीलिका मार्ग, शुकमार्ग, नीरक्षीर विवेक, कच्छप गति, विहंगावलोकन, सिंहावलोकन, मंडूकप्लुति, अस्वगति, चौकड़ी, दुलत्ती आदि हजारों-हजारों बिम्ब परिवे से प्राप्त हुए हैं। दधिमंथन के आधार पर पुराण-प्रसिद्ध समुद्रमंथन-५ तथा गोदोहन के आधार पर पृथ्वीदोहन-६ तथा क्षीरसागर-७ के बिम्ब बने हैं। मनुष्य के चिंतन में इन बिम्बों की भूमिका कितनी महत्त्वपूर्ण होती है, इसका एक उदाहरण पहिता या चक्र है। चक्र के इस एक बिम्ब से ॠतुचक्र, भाग्यचक्र, जीवनचक्र, कालचक्र, ब्रह्माण्डचक्र, इतिहासचक्र आदि के रुप में जीवन और प्रकृति की गतियों की कितनी व्यापक व्याख्या की गयी है, यह एक स्वतंत्र अनुसंधान का विषय है। परिवे से प्राप्त ये आधारभूत बिम्ब आगे के चिंतन का माध्यम और मार्ग बनते हैं। धरती और बीज के बिम्ब भी इन्हीं 'आधारभूत बिम्बों' में से हैं।

(ऊ) चिंतन-प्रणाली में धरती और बीज के बिम्ब : वर्गीकरण

धरती और बीज संबंधी बिम्ब वैदिक साहित्य से लेकर लोकसाहित्य तक भारतीय चिंतन-प्रणाली में बहुत गहरे तक रसे-बसे हैं। चिंतन-प्रणाली में धरती-बीज संबंधी इन बिम्बों का वर्गीकरण निम्नलिखित रुप में किया जा सकता है (रेखाचित्र-११)।

(क) प्रकृति संबंधी चिंतन
(ख) जीवन संबंधी चिंतन

(क) प्रकृति संबंधी चिंतन

जिज्ञासा मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है और भोजन करने के बाद उसकी दूसरी समस्या अपने परिवे को समझना ही है। वह अनादि काल से सूरज, चंदा, आका श, तारे, बादल, हवा, नदी, समुद्र, पहाड़, वृक्ष-वनस्पति तथा प शु-पक्षी को देखता रहा है और उनके संबंध में सोचता रहा है। यह प्रकृति क्या है? इसका कारण क्या है? इसका कर्त्ता कौन है? सूरज क्यों उगता है? क्यों अस्त हो जाता है? कहाँ से आता है और कहाँ चला जाता है?- ये प्रन मानव-चिंतन के मौलिक प्रन हैं।

धरती-बीज और प्रकृति संबंधी अध्याय में हमने देखा था कि धरती-बीज की प्रक्रिया एकांत प्रक्रिया नहीं है, वह सम्पूर्ण प्रक्रिया से उसी प्रकार अविच्छिन्न है, जिस प्रकार कि जला शय में एक लहर दूसरी लहर से अविच्छिन्न है। वहाँ हम देख चुके हैं कि बीज की जीवनयात्रा अंकुरण से प्रारंभ होकर पुन: नए बीज बनने के साथ पूरी होती है और इस जीवनयात्रा में धरती, पानी, हवा, रो शनी, ऊष्मा तथा ॠतुओं का प्रभाव निर्णायक होता है। प्रकृति के इस प्रभाव को भारत के मुनिमानस और लोकमानस दोनों ने देखा है और पंचमाहभूतों की प्रक्रिया के रुप में उसकी पहचान की है।-८ लोककथा और पुराकथाओं में ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जिनमें प्रन उठा है कि पंचमहाभूतों में सबसे शक्तिााली कौन है? पहले आका है कि पहले धरती, पहले हवा है कि पहले पानी, पहले चंदा है कि पहले सूरज? फिर सूरज अपनी चमक से चमकता है कि इसके पीछे किसी 'और' की सत्ता है?

तर्काास्रियों ने, वृक्ष पहले हुआ था या बीज पहले हुआ, इस प्रन को लेकर बहुत लंबी बहस की है, जिसे 'बीजंकुर न्याय' कहा जाता है। यही प्र श् न अपने ढ़ग से कबीर ने उठाया-

 

प्रथम गगन कि पुहुमी प्रथमे प्रथमे पवन कि पाणी।
प्रथम चंद कि सूर प्रथम प्रभु प्रथमे कौन विनाणी।
प्रथमे दिवन कि रैणि प्रथमे प्रथमे बीज कि खेतम्
कहै कबीर जहाँ बसहु निरंजन तहाँ कछु आहि कि
शून्यम्।-९

अहम् और इदम् का प्र श्

सच बात तो यह है कि प्रकति संबंधी प्र श् न मनुष्य के अपने ही जीवन का प्रन है क्योंकि विश्व का उदगम् तथा जीवन का उद्गम एक ही है। लोकमानस ने हमे शा अपने अनुभवों के माध्यम से प्रकृति के संबंध में सोचा है तथा प्रकृति संबंधी ज्ञान के माध्यम से अपने जीवन की व्याख्या की है। विश्व से कारण की खोज मनुष्य-जीवन के अपने ही कारण की खोज है। इस कारण-तत्त्व की खोज के आधार पर द श् ानाास्र और आगे चलकर विज्ञान का विकास हुआ और आगे भी होगा।

कोई भी चिंतन शून्य में नहीं होता, परिवे में होता है तथा उन बिम्बों के माध्यम से होता है, जो हमें अपने परिवे से प्राप्त होते हैं, इसलिए प्रत्येक चिंतन में परिवे तत्त्व व्याप्त होता है। परिवे चिंतन को प्रभावित करता है तथा चिंतन परिवे की रचना करता है, जीवन में यह परस्पर प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। यदि हम चिंतन-प्रणाली के इतिहास का अध्ययन करें तो हम देखेंगे कि जैसे-जैसे हम अतीत की चिंतन-प्रणाली की गहराइयों में जाएँगे, प्राकृतिक परिवे के बिम्ब हमें उतने ही प्रत्यक्ष होंगे। वे अवधारणाएँ आज के जीवन में इतनी भिन्न-भिन्न दि श् ााओं में प्रचलित हैं कि उन्हें प्रयासपूर्वक ही पहचाना जा सकता है, उदाहरण के लिए 'मौलिक' शब्द है। अधिकार भी मौलिक होते हैं, चिंतन भी मौलिक होता है और सृजन भी मौलिक होता है, न्यायालय में भी न्यायाधी मूल-अपराधी की पहचान करता है तथा रोग विज्ञानी रोग के मूल की खोज करता है। अब यहाँ ध्यान देने की बात है कि 'मूल' शब्द वानस्पतिक है। मूल शब्द धरती और बीज की चिंतन-प्रणाली से आया है। जिस प्रकार नदी में बाढ़ आती है और बालू की एक नयी परत बिछा जाती है, पुन: दूसरी बाढ़ आती है और पुरानी परत के ऊपर फिर एक नयी परत बिछा जाती है, उसी प्रकार हमारी चिंतनधारा के नीचे अतीत के चिन्तन की अवधारणाएँ विद्यमान रहती हैं। इसी प्रकार के धरती-बीज संबंधी बिम्ब हमारी चिंतन-प्रणाली में बिखरे हुए हैं। प्रकृति-संबंधी चिंतन में धरती-बीज के बिम्बों को पुन: दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

 

१. सृष्टिविद्या (विश्व की उत्पत्ति संबंधी प्रन)
२. विश्वविद्या प्रकृति की समग्र व्याख्या)

१. सृष्टिविद्या

विश्व की उत्पत्ति के संबंध में मनुष्य तब से ही सोचता रहा है, जब से उसका जन्म हुआ। पुराकथा और लोककथाओं के साथ ही दा र्शनिकों और संतों ने उत्पत्ति की इस पहेली को अनेक प्रकार से बूझा है और उल्लेखनीय तथ्य यह है कि उत्पत्ति के प्र श् न की चर्चा जब और जहाँ भी हुई है, बीज का बिम्ब वहाँ उपस्थित हुआ है, क्योंकि धरती पर बीज का गिरना, उसका अंकुरित होना तथा निरंतर बझडते हुए उसका वृक्ष बन जाना लोकमानस के लिए सृष्टि का एक रहस्य है।

विश्व-उत्पत्ति संबंधी चिंतन में धरती-बीज के बिम्बों को हम तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं-

१.१. मिथक
१.२. कारण तत्त्व की पहचान
१.३. परम कारण की खोज

१.१. मिथक

वेदों, उपनिषदों तथा पुराणों में विश्व-उत्पत्ति के दो प्रकार के मिथक हैं-

 

१.१.१. वानस्पतिक मिथक
१.१.२. जैविक मिथक

१.१.१. वानस्पतिक मिथक : सृष्टिकमल विश्व उत्पत्ति का वानस्पतिक मिथक है।
उल्लेखनीय है कि कमल जलीय वनस्पति है और जलीय वनस्पति सर्व प्राचीन वनस्पति है। सृष्टिकमल के मिथक के साथ यह कथा जुड़ी है कि सम्पूर्ण विश्व की रचना ब्रह्मा ने की तथा स्वयं ब्रह्मा की उत्पत्ति कमल से हुई। उत्पन्न होने के बाद ब्रह्मा ने स्वयं कमल के मूल कारण को खोजा।-१० वास्तव में ब्रह्मा के मन में उठनेवाला मूल कारण संबंधी प्रन मानव-मन का सनातन प्रन है।

सृष्टिकमल : सनक आदि ॠषियों ने जब संकर्षण के समक्ष ब्रह्मतत्त्व की जिज्ञासा की, तब संकर्षण ने सनकादि को भागवत-कथा सुनायी और बताया कि "सृष्टि के पूर्व सम्पूर्ण विश्व जल में निमग्न था। श्रीनारायण शेष- शैया पर पौढ़े हुए थे। जिस प्रकार अग्नि अपनी दाहिका शक्ति को छिपाकर काष्ठ में व्याप्त रहती है, उसी प्रकार अग्नि अपनी दाहिका शक्ति को छिपाकर काष्ठ में व्याप्त रहती है, उसी प्रकार नारायण ने सम्पूर्ण प्राणियों के सूक्ष्म शरीरों को अपने शरीर में लीन कर लिया था। जब उनकी काल शक्ति ने उन्हें जीवों के कर्मों की प्रवृत्ति के लिए प्रेरित किया, तब उन्होंने अपने शरीर में लीन हुए अनंत लोक देखे। जिस समय भगवान की दृष्टि अपने में निहित 'लिंग' शरीरादि सूक्ष्म तत्त्व पर पड़ी तब वह कालाश्रति रजोगुण से क्षुभित होकर सृष्टि-रचना के निमित्त वट के बीज से विााल वृक्ष के समान ब्रह्माणड-कमल उनके नाभिदेा से बाहर निकला। वह सूक्ष्म तत्त्व कमल को के रुप सहसा ऊपर उठा और उसमें से ब्रह्माजी प्रकट हुए। वे सोचने लगे-'इस कमल की 'कर्णिका' पर बैठा हुआ मैं कौन हूँ? यह कमल भी बिना किसी अन्य आधार के जल में कहाँ से उत्पन्न हो गया?' ऐसा सोचकर वे उस कमल की नाल के सूक्ष्म छिद्रों में होकर जल में घुसे। किंतु उस नाल में खोजते-खोजते नाभिदेा के समीप पहुँचकर भी वे उसे प्राप्त नहीं कर सके किंतु योगसाधना के द्वारा उन्होंने अपने अंत:करण में ही उस प्रका को देखा।"-११

१.१.२. जैविक मिथक : वेद, उपनिषद और पुराणों में 'हिरण्यगर्भ' के रुप में सृष्टि के जैविक मिथक की व्यापक चर्चा है।

अंडा, ब्रह्मांड : हिरण्यगर्भ : श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि सृष्टि के प्रारंभ में सर्वत्र अंधकार था। उस समय पानी में एक अं उत्पन्न हुआ और उस अं से ब्रह्मा उत्पन्न हुआ, उस ब्रह्मा से सारा जगत् उत्पन्न हुआ। जिस अण् से विराट की उत्पत्ति हुई, उसका नाम 'विोष' है।-१२

सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवाले इस अंड को ॠग्वेद में 'हिरण्यगर्भ' कहा गया है-

हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्।
१०.१२.१

महाभारत का कथन हे कि परमात्मा ने सर्वप्रथम प्राणियों के जीवन-निर्वाह के लिए नाना प्रकार के अन्न की सृष्टि की। तदनंतर जो सुवर्णमय अंड प्रकट हुआ, उससे ब्रह्मा ने अंड के दोनों टुकड़ों से स्वर्ग तथा भूतल के मध्य में आकाा की सृष्टि की।-१३ इस अंड के मृत हो जाने के पचात् उत्पन्न होने के कारण सूर्य का नाम मार्तण्ड है।-१४

इस अंड के बिम्ब से ही तंत्र में अनेक अवधारणाओं का विकास हुआ; जैसे - पिंडांड, ब्रह्मांड, विष्वंड, प्रकृत्यंड, मायांड,
शक्तयंड आदि। तंत्र शास्र का सिद्धांत है-'यर्जिंत्प तद् ब्रह्मांडे' अर्थात् जो पिंड में है, वही ब्रह्माण्ड में है।

१.२. कारण तत्त्व की पहचान

विश्व-उत्पत्ति संबंधी चिंतन में कारण तत्त्व की पहचान पुन: वानस्पतिक तथा जैविक दो रुपों में की गयी है। इसी के साथ यह पहचान भी की गयी है कि उत्पत्ति की वानस्पतिक प्रक्रिया तथा जैविक प्रक्रिया एक जैसी ही हैं। इसलिए उत्पत्ति के वानस्पतिक कारण तत्त्व की व्याख्या में जैविक कारणों के बिम्ब तथा जैविक कारण तत्त्व की व्याख्या में वानस्पतिक कारणों के बिम्ब लिए गए हैं। यद्यपि खेत और किसान अथवा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बिम्ब को वानस्पतिक बिम्ब वर्ग के अंतर्गत रखा जाता है, परंतु इसमें जैविक तथा वानस्पतिक दोनों बिम्बों का समावेा है। अंतत: वनस्पति भी जीव ही है, भले हि वह स्थावर हो। इसलिए अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से जैविक कारण तत्त्व के अंतर्गत हम वीर्य, लिंग और योनि को तथा वानस्पतिक कारण तत्त्व के अंतर्गत क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और बीज को समाविष्ट कर सकते हैं।

 

१.२.१. जैविक कारण तत्त्व : जैविक कारण तत्त्व की पहचान शरीर संदर्भ में भी की गयी है तथा सृष्टि संदर्भ में भी।

१.२.१.१. वीर्य : बीज : शरीर-संदर्भ में : शरीर-संदर्भ में भी बीज का वैसी ही बिम्ब है, जैसा सम्पूर्ण सृष्टि में। पुरुष के वीर्य से जीवों की उत्पत्ति होती है-

तस्माद् तदात्मकाद् रागाद् बीजाद् जायंति जंतव:।
- म. भा. ाांति. २१३/१०

अथवा

भायार्ं पति सम्प्रविय स यस्माज्जायते पुन:।
जायायास्तद्धि जायात्वं पौराणा कवयो विदु:।
- म. भा. आदि ७४

अर्थात् पति बीज रुप से अपनी स्री में प्रविष्ट होकर पुन: पुत्र रुप में जनमता है, इस तरह पति को पुत्र रुप से उत्पन्न करने के कारण पत्नी को जाया का नाम सार्थक होता है। बृहत्संहिता (सौबाग्यकरणाध्याय १२) में बीज-वृक्ष के बिम्ब के साथ पुत्र-उत्पत्ति की प्रक्रिया का विवेचन करते हुए कहा गया है कि 'जिस वृक्ष का कलम या बीज भूमि में बोया जाता है, वही वृक्ष उत्पन्न होता है, दूसरा नहीं। इस तरह आधारभूत स्री में फिर पुत्र रुप से आत्मा की ही उत्पत्ति होती है, केवल क्षेत्र का योग वि शेष है।' यही बात दूसरे शब्दों में भागवत में कही गयी है कि 'जैसे एक बीज से दूसरा बीज उत्पन्न होता है, वैसे ही पिता की देह द्वारा माता की देह से पुत्र की देह उत्पन्न होती है।' वीर्य से प्रकट होनेवाली चेतना को वट-बीज के बिम्ब द्वारा समझाते हुए महाभारत (ाांति २१८.२९) ने कहा-

रेतो वट कणीकायां घृतपाकाधिवासनम्।
जाति: स्मृतिरयस्कांत: सूर्यकांतोऽम्बु भक्षणम्।

अर्थात् जैसे वटवृक्ष के बीज में पत्र, पुष्प, फल, मूल तथा त्वचा छिपे होते हैं उसी प्रकार वीर्य से शरीर आदि के साथ चेतनता भी प्रकट होती है।

लोकजीवन में वीर्य को बीज और वं कहा जात है और इस प्रकार के प्रयोग प्रचलित हैं-'मिट गयौ बीज व श्ंा' अथवा 'अभिमन्यु ने उत्तरा के गर्भ में पुरुवंा का बीज स्थापित किया।'

१.२.१.२. वीर्य : बीज : सृष्टि-संदर्भ में : नासदीय सूक्त का वचन है कि-'कामस्तदग्र समवर्ततांधि मनसो रेत: प्रथमं मदासीत्' अर्थात् उस ब्रह्मा के मन का जो रेत (वीर्य) प्रथमत: निकला, वही आरंभ में काम अर्थात् सृष्टि-निर्माण की शक्ति हुआ।-१५

श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण 'गर्भस्थापन' के ही बिम्ब से सृष्टि की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि मेरी प्रकृति ही मेरे लिए गर्भस्थापन का क्षेत्र है, उसमें में गर्भ-स्थापन करता हूँ, उससे ही सब भूतों की उत्पत्ति होती है-

ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गमर्ं दधाम्यहम।
संभव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत। (१४/३)
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: संभवंति या:
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता। (१४/४)

१.२.१.३. सृष्टि-संदर्भ : लिंग : सृष्टि विद्या के विवेचन प्रसंग में रेत और गर्भस्थापन के बिम्ब के साथ ही सृष्टि के प्रतीक के रुप में लिंग की महिमा का विस्तार अनेक पुराण-कथाओं में विद्यमान है। लिंग-पुराण में तो तत्संबंधी अनेक प्रसंग हैं ही, स्कंद पुराण में ब्रह्मा और नारायण शिवलिंग के आदि और अंत का अनुसंधान करते हैं किंतु उसके आदि-अंत को नहीं देख पाते। लिंग की यह अज्ञेय महिमा वास्तव में सृष्टि विद्या के प्र श् न की ही अभिव्यक्ति है।

१.२.२. वानस्पतिक कारण तत्त्व : वनस्पति के कारण तत्त्व को खेत, किसान और बीज के रुप में जाना गया है।

१.२.२.१. क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ : सृष्टि विद्या के प्रसंग में एक और महत्त्वपूर्ण बिम्ब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का है। गीता का तेरहवाँ अध्याय 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग योग' नाम से प्रसिद्ध है। इसमें प्रकृति को क्षेत्र तथा पुरुष को क्षेत्रज्ञ (किसान) कहा गया है। प्रकृति और पुरुष अथवा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही सचराचर की उत्पत्ति होती है-
यावत्संजायते किंचित्सत्वं स्थावर जंगमम्।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ १३/२६

अर्थात् स्थिर रहनेवाले वृक्ष, लता, दूब, गुल्म, त्वक्सार, बेंत, बाँस आदि जितने स्थावर प्राणी हैं और चलने-फिरनेवाले मनुष्य, प शु-पक्षी, कीट, पतंग, मछली, साँप आदि थलचर, जलचर, नभचर जितने जंगल प्राणी हैं, वे सबके सब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही पैदा होते हैं।

१.२.२.२. बीज : (अ) वट-बीज की अणिमा : छांदोग्य-उपनिषद् में जब आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को तत्त्व का उपदेा करने लगे, तो बोले-'इस सामनेवाले वटवृक्ष से एक बड़ का फल ले आ।' जब श्वेतकेतु बड़ का फल ले आया, तब बोले-'इस फोड़।' जब श्वेतकेतु ने बड़ के फल को फोड़ दिया, तब बोले-'इसमें क्या देखता है?' श्वेतकेतु ने कहा, 'भगवन्, इसमें ये अणु के समान दाने हैं।' आरुणि के पुन: उन दानों में से एक दाने को फोड़ने को कहा और फिर पूछा कि 'इसमें क्या देखते हो?' श्वेतकेतु ने कहा-'कुछ नहीं।' तब आरुणि ने समझाया कि-'हे सौम्य, इस वट-बीज की जिस अणिमा को तू नहीं देखता, उस अणिमा का ही यह इतना बड़ा वटवृक्ष है। यह जो अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और श्वेतकेतु वह तू है।-१६

(आ) सृष्टि बीज : 'योगवासिष्ठ' में महर्षि वसिष्ठ कहते हैं कि 'ब्रह्म रुप से स्थित हुए मैंने जब समाहित चित्त होकर देखा तो अपने शरीर के भीतर ही मुझे सृष्टि रुपी वृक्ष एक अंकुर के रुप में स्थित दिखाई दिया। जैसे देहरी के भीतर रखा हुआ बीज वर्षा के जल से भीग जाने पर अंकुरित हो जाता है, उसी प्रकार सृष्टिबीज अंकुरित हुआ।-१७

(इ) सिसृक्षा बीज : उपनिषदों में अपने को रचने की सोई हुई इच्छा ही सृष्टि का बीज है। सामान्यतया प्रत्येक बीज में एक से अनेक होने का संकल्प है और यही सृष्टि रचना का सत्य है-

बहुस्यां प्रजायेय (छांदोग्य ६.२.३ तथा तैत्तिरीय २.३)

(ई) प्रकृति बीज : 'श्वेताश्वर उपनिषद्' में प्रकृति को सृष्टि का बीज कहा गया है-'एकं बीजं बहुधा य: करोति (६.१२)' अर्थात् परमेश्वर एक ही प्रकृति रुप बीज को बहुत प्रकार से रचना करके विचित्र जगत् को बनाते हैं।

(उ) आत्मा बीज : महाभारत में देहधारी प्राणियों का बीज अव्यक्त आत्मा को बताया गया है। यह बीज भूत आत्मा ही गुणों के संग के कारण 'जीव' कहलाता है-

तद्बीजं देहिनामाहुस्तद् बीजं जीव संज्ञितम्।
- म.भा. ाांतिपर्व २१३.३

(ऊ) कर्म बीज : महाभारत में प्राणियों की उत्पत्ति का बीज कर्म है और वह कर्म ही इंद्रियों की उत्पत्ति का भी कारण है-

कर्णणा बीज भूतेन चोद्यते यद् यदिन्द्रियम्।
जायते तदहंकाराद् रागययुक्तेन चेतसा।
-म. भा. ाांति २१३.१५

अर्थात् बीजभूत कर्म से जिस-जिस इंद्रिय को उत्पत्ति के लिए प्रेरणा प्राप्त होती है, राग युक्त चित्त से वही-वही इंद्रिय प्रकट हो जाती है।

गुण-कर्म का बीज ही वह कारण है जिसका परिणाम आत्मा और प्रकृति में विविधता के रुप में अभिव्यक्त होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे कि एक ही जल नीम में कडुंआ और आम में मीठा बन जाता है-

भूमि संस्थान योगेन वस्तु संस्थान योगत:।
रसभेदा यथा तोये प्रकृत्यामात्मनस्तथा।
-
शांति २२०

(ए) वासना बीज : जन्म-मरण : सांसारिक प्रपंच के बीज पर विचार करते हुए संतों ने तृष्णा, अहंकार, मोह, अज्ञान और वासना का उल्लेख किया है। संत पलटू साहब का कथन है कि-
बीज वासना कौ जरै तब छूटे संसार।

जला हुआ बीज नहीं उग सकता इसलिए अहंकार और वासना का बीज जब तक जलेगा नहीं, तब तक जीव बार-बार जन्म-मरण के चक्र में फँसा रहता है।

फसल काटने के बाद खर-पतवार के बीज खेत में रह जाते हैं। किसान उन्हें जला देता है, क्योंकि यदि उन्हें जलाया न जाए तो वे बीज भविष्य में धूप, वर्षा और हवा की अनुकूलता पाकर पुन: झाड़, झंखाड़, लता और तृण आदि के रुप में उत्पन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार मन में कामनाओं और इच्छाओं के बीज छिपे रहते हैं। ये ही बीज 'पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्' रुप भव चक्र के कारण होते हैं। संत पलटू इन्हीं बीजों को जलाने की बात कहते हैं।

(ऐ) बीज : अव्यक्त तत्त्व की खोज : बीज और वृक्ष के संबंध की पहचान कारण और कार्य के संबंध की पहचान तो है ही, इसी के साथ वह एक से अनेक

(ए) वासना बीज : जन्म-मरण : सांसारिक प्रपंच के बीज पर विचार करते हुए संतों ने तृष्णा, अहंकार, मोह, अज्ञान और वासना का उल्लेख किया है। संत पलटू साहब का कथन है कि-
बीज वासना कौ जरै तब छूटे संसार।

जला हुआ बीज नहीं उग सकता इसलिए अहंकार और वासना का बीज जब तक जलेगा नहीं, तब तक जीव बार-बार जन्म-मरण के चक्र में फँसा रहता है।

फसल काटने के बाद खर-पतवार के बीज खेत में रह जाते हैं। किसान उन्हें जला देता है, क्योंकि यदि उन्हें जलाया न जाए तो वे बीज भविष्य में धूप, वर्षा और हवा की अनुकूलता पाकर पुन: झाड़, झंखाड़, लता और तृण आदि के रुप में उत्पन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार मन में कामनाओं और इच्छाओं के बीज छिपे रहते हैं। ये ही बीज 'पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे ायनम्' रुप भव चक्र के कारण होते हैं। संत पलटू इन्हीं बीजों को जलाने की बात कहते हैं।

(ऐ) बीज : अव्यक्त तत्त्व की खोज : बीज और वृक्ष के संबंध की पहचान कारण और कार्य के संबंध की पहचान तो है ही, इसी के साथ वह एक से अनेक अदृय, अव्यक्त से व्यक्त, सूक्ष्म से विराट, निराकार से साकार और निर्गुण से सगुण के संबंध की भी पहचान है। बीज में वृक्ष की संभावना अव्यक्त से व्यक्त की गति की संभावना अव्यक्त से व्यक्त की गति की संभावना है-

यथाश्वत्थ कणीकायामन्तर्भूतो महाद्रुम:।
निष्पन्नो दृयते व्यक्तमव्यक्तात् संभवस्तथा।
-म.भा.
शांति २११.२

अर्थात् जैसे पीपल के छोटे से बीज में एक वि शाल वृक्ष अव्यक्त रुप से समाया हुआ है, उसी प्रकार अव्यक्त से व्यक्त की उत्पत्ति होती है।

वृक्ष के स्कंध, शाखा, प्र शाखा, पत्र, पुष्प, फल स्पष्ट दिखाई देते हैं पर बीज में वे दिखाई नहीं देते किंतु सूक्ष्म रुप में विद्यमान रहते हैं। यही सूक्ष्म से विराट और विराट से सूक्ष्म की गति है। बीज से वि शाल वृक्ष बनता है और फिर वृक्ष की वि शालता सूक्ष्म रुप में बीज में समाहित हो जाती है, पुन: वृक्ष बनने के लिए। इस प्रकार भारतीय द श् ान में अव्यक्त तत्त्व की खोज का आधार बीज का बिम्ब है और अव्यक्त के प्रतिपादन में वटवृक्ष और उसके बीज का उदाहरण बार-बार दिया गया है। यह कहना असंगत नहीं है कि भारत का तत्त्व-चिंतन बीज-वृक्ष के बिम्ब को अपने साथ लेकर आगे बढ़ा है।

(ओ) बीज और वृक्ष : निद्रा और जागरण : प्रलय और सृष्टि : सृष्टि और प्रलय एक ही 'परम कारण' की दो स्थितियाँ हैं। बीज को सोया हुआ वृक्ष कहा जा सकता है तथा वृक्ष को जागा हुआ बीज। बीज अंकुरित पल्लवित, पुष्पित और फलित होकर अंत में फिर अपने को बीज-रुप में समाविष्ट कर देता है, इस प्रकार सिकुड़ करके वही बीज बन जाता है और फैलकर वही वृक्ष बन जाता है। एक अवस्था में सम्पूर्ण सृष्टि बीज में लीन हो जाती है और दूसरी अवस्था में वह अपना ही सृजन करती है, पहली अवस्था निद्रावस्था है और दूसरी अवस्था जागरण की अवस्था है। इसलिए प्रलय को निद्रा कहा गया है-योगनिद्रा और सृष्टि जागरण की स्थिति है। निद्रा की अवस्था में सम्पूर्ण शक्तियाँ 'मूलचेतना' में समा जाती हैं, इसलिए 'तत्त्वसन्दोह' में कहा गया है-


सचराचर जगतो बीजं निखिलस्य निज निलीनस्य।
-त. स. २

निद्रावस्था में सृष्टि का सम्पूर्ण प्रसार सचराचर जगत् के उसी बीज में लीन हो जाता है। बीज में वृक्ष होना आविर्भाव है और वृक्ष का बीज में सिमट जाना तिरोभाव है।

(औ) पाँच द शा : बीज और वृक्ष का बिम्ब जहाँ विश्व की (सृष्टि और प्रलय) दो अवस्थाओं को अभिव्यक्त करता है, वहीं सृष्टि की भी पाँच अवस्थाएँ इसी बिम्ब के माध्यम से स्पष्ट हो जाती है। उत्पन्न होना, बढ़ना, स्थिर रहना, घटना (क्षीण होना) और नष्ट हो जाना (आत्यंतिक ना नहीं, रुप परिवर्तन) दूसरे शब्दों में अंकुरित होना, पल्लवित होना, फलना-फूलना, छीजना और नाम-रुप का नष्ट हो जाना-वृक्ष की ये पाँच अवस्थाएँ हैं।-१८ सृष्टि की भी पाँच द शाएँ ही मानी गयी हैं।

वृक्ष ही नहीं, पत्ती और फूल की भी भिन्न अवस्थाएँ होती हैं। एक अवस्था वह होती है, जह वृक्ष पर कौंपल (किसलय) आती है फिर वह विकसित होकर पत्ती बन जाती है और अंत में वह सूखती है और पतझर और वसंत जुड़े हुए हैं, उसी प्रकार उदय और अस्त तथा सुख और दुख जुड़े हुए हैं-

एक दिना फल फूल कें को न भयौ पतझार।

(अ:) बीज सनातन है : बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज की प्रक्रिया तो निरंतर चलती है, परंतु बीज का आत्यंतिक विनाा नहीं होता। कहीं न कहीं वह बीज सुरक्षित रहता है। श्रीमद्भागवत में प्रलय के प्रसंग में उल्लेख आता है कि मनु बीज को लेकर नाव पर सवार हुए।-१९ तंत्राास्र में बतलाया गया है कि बीज शिव के मुख में सुरक्षित है।

बीज उन अर्थों में भी सनातन है कि नए वृक्ष रुप में बीज अपना कायाकल्प करता है। जिस प्रकार पुत्र के रुप में पिता ही नया जन्म लेता है, उसी प्रकार वृक्ष की वं श-परंपरा सनातन है।

१.३ परम कारण की खोज

वृक्ष-बीज के बिम्ब ने मानव बुद्धि को कारण-तत्त्व की खोज में प्रवृत्त किया और उसने प्रत्येक कार्य के कारण को खोजा। भिन्न-भिन्न कारणों का कोई एक ही परम कारण होना चाहिए।

१.३.१. जो पै बीज रुप भगवान : विश्व के उस परम कारण को बीज के रुप में ही जाना-समझा गया। संत कबीर कहते हैं-

जो पै बीज रुप भगवाना तो पंडित का कथसि गियाना।

तत्त्व की बात एक यही है कि सबका बीज ईश्वर है।

१.३.२. अव्यय बीज : श्रीमद्भगवद्गीता में ईश्वर को 'अव्यय बीज' कहा गया है। सामान्य बीज से अंकुर पैदा होता है, तब बीज का वह स्वरुप नहीं रहता परंतु परमात्मा अव्यय-बीज है और अंकुर पैदा करने के बाद भी वह उसी प्रकार अपने स्वरुप में बना रहता है जिस प्रकार शून्य में से शून्य घटा देने पर शून्य तद्वत शेष रहता है। परमात्मा पूर्ण है और पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होने के बाद भी पूर्ण, पूर्ण ही रहता है। इसलिए गीता के शब्दों में परमतत्त्व अव्यय तथा सनातन बीज है-

प्रभव: प्रलय स्थानं निधानं बीजमव्ययम्। ९.८
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन। १०.३९
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। ७.१०

१.३.३. संसार महीरुहस्य बीजाय : जिस प्रकार विश्व की व्याख्या वृक्ष के बिम्ब के माध्यम से की गयी है तथा विश्ववृक्ष या संसार विटप के प्रतीकों की परंपरा वैदिक साहित्य से लेकर लोकसाहित्य तक सर्वत्र विद्यमान है, उसी प्रकार विश्वबीज, सर्वबीज, सचराचरबीज आदि के रुप में ईश्वर की अवधारणा बहुत व्यापक है।

दुर्गासप्ताती में भगवती को विश्वबीज कहा गया है-

त्वं वैष्णवी शक्तिनरंतवीर्या विश्वस्यबीजं परमासि माया। (११.५)

तंत्राास्र में 'पराम्बा' को सर्वबीजा, सर्वबीज-स्वरुपा तथा बीजाकर्षिणी कहा गया है।
-२०

भागवत के कथावाचक 'मंगलाचरण' में श्रीकृष्ण को संसार-महीरुह (वृक्ष) के बीज के रुप में नमन करते हैं-

तस्मै श्री कृष्णाय नम: संसार महीरुहस्य बीजाय।

१.३.४. बिंदुभाव : बीज : तंत्राास्र में श्रीचक्र के रुप में विश्वविद्या का विवेचन है। विश्ववृक्ष की भाँति श्रीचक्र भी विश्वचक्र है। बिंदु बीज है और वृक्ष वृत्त है। बिंदु का ही विस्तार वृत्त में है। इसलिए सम्पूर्ण वृत्त समाया हुआ है। ठीक वैसी ही बात-

बिंदु में सिंधु समान, को कासों अचरज कहै।

श्रीचक्र का मूल बिंदु चराचर का बीज है। प्रलयकाल अर्थात् सुषुप्ति अवस्था में सम्पूर्ण स्थूल और सूक्ष्म-जगत् परम कारण में लीन हो जाता है। उस समय विर्मामयी महााक्ति विश्व को अपने गर्भ में लीन करके प्रकाामय हो जाती है और देाकाल से सर्वविध परिच्छेद-ाून्य होकर विश्राम करती है। इसे तंत्राास्र की परिभाषा में 'बिंदु-भाव' कहते हैं। यह वह अवस्था है, जब समस्त प्रपंच वासना वृक्ष की भाँति बीज में लीन रहती है।-२१

१.३.५. परावाक् : अस्फुट विश्व : श्रीचक्र के बिंदु को ही परवाक् कहा गया है, जिस प्रकार मयूर के अं के रस में मोरपंख के नाना रंग अव्यक्त रुप से अभिन्न होकर रहते हैं, उसी प्रकार स्थूलवाणी का सम्पूर्ण वैचित्र्य अव्यक्त रुप से परावाक् में विद्यमान है। दूसरे ाब्दों में परावाक् आत्मसत्ता है, जिसमें अस्फुट रुप से बीज-रुप में विश्व समाया हुआ है।-२२

२. विश्वविद्या

विश्वविद्या के अंतर्गत हम प्रकृति संबंधी उस चिंतनधारा और अवधारणाओं को सम्मिलित कर सकते हैं, जिनमें विश्व की समग्रह व्याख्या की गयी है। श्रीविद्या, श्रीमंत्र तथा विराट पुरुष आदि ऐसी ही अवधारणाएँ हैं। इन्हीं अवधारणाओं में एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा विश्ववृक्ष है, जिसमें वृक्ष के बिम्ब के आधार पर विश्व-प्रसार का विवेचन है। विश्वविद्या के अंतर्गत ही हम कर्ता के खोज संबंधी प्र श् न को भी सम्मिलित कर सकते हैं, क्योंकि जहाँ लोकमानस को कारण प्रत्यक्ष नहीं हुआ, वहाँ उसने कर्त्ता के रहस्य की पहचान करने का प्रयास किया है। इस प्रकार विश्वविद्या के अंतर्गत प्रकृति संबंधी चिंतन को हम दो भागों में वर्गीकृत कर सकते हैं-

२.१. विश्ववृक्ष
२.२. कर्त्ता के वृक्ष

२.१. विश्ववृक्ष : विश्व की व्याख्या : वृक्ष का बिम्ब

भारतीय साहित्य में वृक्ष के बिम्ब के आधार पर विश्व की व्याख्या करने की परम्परा बहुत व्यापक है। वैदिक साहित्य में जीवात्मा-परमात्मा को अश्वत्थ वृक्ष पर बैठे दो पक्षियों के रुप में देखा गया है। दोनों पक्षी सखा हैं और एक ही डाल पर बैठे हैं। प्रारब्ध के अनुसार प्राप्त होनेवाले सुख-दुख ही इस अश्वत्थ के फल हैं। जीवात्मा रुप एक पक्षी तो इन फलों को खा रहा है किंतु परमात्मा रुप पक्षी केवल देख रहा है, वह साक्षी मात्र है-

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्ष परिष जाते
तयोरन्य पिप्पलं स्वद्वत्यनन्नयो अभिचाकाीति।
-ॠग्वेद १.६.४.२० अथर्व ९.९.२० श्वेता ४.६

 

२.१.१. ब्रह्मांड : अश्वत्थ : 'कठोपनिषद्' में कहा गया है कि-जिसका मूल परब्रह्म है, प्रधान शाखा ब्रह्मा और अवांतर शाखा, देव, पितर, मनुष्य, प शु, पक्षी, हैं,

ऐसा यह ब्रह्मांड रुप पीपल का वृक्ष अनादि काल से है-

ऊर्ध्वमूलोऽवाकााख एषोऽश्वत्थ: सनातन:।
तदेवं
शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते।
तर्जिंस्मल्लोका: श्रतिा सर्वे तदेवामृतच्यते।
-तृतीय वल्ली.

२.१.२. अव्यय अश्वत्थ : श्रीमद्भगवद्गीता में संसार को ऊपर की ओर मूल तथा नीचे की ओर शाखा वाला अव्यय अश्वत्थ बतलाया गया है-


उर्ध्वमूलमध:
शाखामश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छंदांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।
अधचोंध्वर्ं प्रसृतास्तस्य
शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवाला:।
अधचमूलान्यनुसंततानि कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके।
-१५.१-२

ऊर्ध्व शब्द परमात्मा का वाचक है। संसार-वृक्ष परमात्मा से उत्पन्न हुआ है। संसार-वृक्ष की प्रधान शाखा ब्रह्मा है तथा वेद इस संसार-वृक्ष के पत्ते हैं। संसार-वृक्ष की सत्, रज, तम-गुणों के द्वारा बढ़ी हुई शखाएँ नीचे, मध्य में तथा ऊपर फ