धरती और बीज

राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

परिशिष्ट-२ धरती

 

१. धरती संबंधी वैदिक अवधारणा

सत्यं बृहतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञ: पृथिवीं धारयंति। (२)

सत्यं, बृहत् और उग्र ॠत, दीक्षा, तप, ब्रह्म और यज्ञ पृथिवी को धारण करते हैं।

यस्याशचतस्त्र: प्रदिश: पृथि यस्यामन्नं कृष्टय: संबभूबु:।

या विभर्ति बहुधा प्राणदेजत् सा नो भूमिर्गोष्वियन्ने दधातु। (४)

जिस पृथिवी के चारों ओर चार विशाल दिशाएँ दूर तक फैली हुई हैं, जिस पर मनुष्य खेती करके अन्न उत्पन्न करते हैं, जो चराचर संसार का हर प्रकार से पालन-पोषण करती है, वह हमें बहुत-सी गायें तथा अन्न प्रदान करे।

विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतो निवेशनी।

वैश्वानरं बिभ्रति भूमिरग्निमिन्द्र ॠषभा द्रविणे नो दधातु। (६)

समस्त विश्व का भरण-पोषण करनेवाली वह पृथिवी ही सब बहुमूल्य धन-संपत्तियों का खजाना है।

यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्

जो पृथिवी सृष्टि के उत्पत्ति के पूर्व महान समुद्र के भीतर जल ही जल स्वरुप थी।

सा नो भूमिर्विसृजतां माता पुत्राय मे पय:। (१०)

माता भूमि: पुत्रो अहं पृथि:। पर्जन्य पिता स उ न: पिपर्त्तु। (१२)

जिस प्रकार पुत्र को ही माता से पोषण प्राप्त होता है, उसी प्रकार पृथिवी जल-अन्न ऊर्जा या बल से अपने पुत्रों को (हमें) पुष्ट करे।

यह भूमि माता है और मैं (हम सब) पृथ्वी का पुत्र हूँ। समस्त रसों को प्रदान करनेवाला पर्जन्य मेघ सबका पालक पिता है, वह हमारा पालन करे।

विश्वस्वं मातरमोषाधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्

शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा। (१७)

भूमि समस्त औषधियों की माता है। बीजों को धारण करने के कारण धात्री है। भूमि समस्त धनों को धारण और उत्पन्न करनेवाली है, औषधियों को उत्पन्न करनेवाली है, स्थिर और धर्म द्वारा परिपालित, कल्याणकारिणी और सुखकारिणी है। सबको उत्पन्न करनेवाली पृथिवी में हम सदा और सब प्रदेशों में सब प्रकार से विचरण करें।

यस्ते गंध: पृथिवि संबभूव यं विभ्रत्योष्धयो यमाप:।

यं गंधर्वा अप्सरसश्च मेजिरे तेन मा सुरकिंभ कृणु। (२३)

हे पृथिवी, तुझमें सर्वत्र विशेष गुण के रुप में गंध विद्यमान है, औषधियाँ, जल और अनेक द्रवपदार्थ तुम्हारी गंध को प्रत्यक्ष रुप से धारण करते हैं तथा गंधर्व तथा अप्सराएँ इस सुगंधि का सेवन करती हैं।

यस्यां वृक्ष वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति विश्वहा।

पृथिवी विश्वधायसं धृतामच्छा वदामसि। (२७)

जिसमें वृक्ष और वनस्पतियाँ सदा स्थिर रुप से विराजती हैं। धरती विश्वंभरा है। ध्रुवा का तात्पर्य है कि भले ही वृक्ष-वनस्पति की आयु परिमित है किंतु उनका बीज हमेशा रहता है। यही उनका पृथिवी के साथ स्थायी संबंध है। करोड़ों वर्षों से विकसित होते हुए वृक्ष-वनस्पति वर्तमान जीवन तक पहुँचे हैं और आगे भी इसी प्रकार बढ़ते, फलते-फूलते रहेंगे।

यस्यामन्नं ब्रीहियवौ यस्या इमा पंच कृष्टय:।

भूम्यै पर्जन्य पत्न्यै नमोऽस्तु वर्षमेदसे। (४२)

जिस पर धान्य और जौ एवं अन्य नाना प्रकार के अन्न उत्पन्न होते हैं तथा जिस पर पाँच प्रकार के जल उत्पन्न होते हैं, उस पर्जन्य-पत्नी भूमि को सदा हमारा नमस्कार है। धरती में वर्षा मेद की तरह भरी है।

निधिं बिभ्रती बहुधा गुहा वसुमणिं हिरण्यं पृथिवी ददातु ये। (४४)

अपने गूढ़ प्रदेशों में तुम अनेक निधियों का भरण करती हो। रत्न, मणि और सुवर्ण की तुम देने वाली हो। रत्न का वितरण करनेवाली वसुधे, प्रेम और प्रसन्नता से पुलकित होकर हमारे लिए कोषों को प्रदान करो।

त्वमस्यावपनी जनानामदिति कामदुधा पप्रथाना

यत् त ऊनं तत् त आ पूरयति प्रजापति: प्रथमजा ॠतस्य। (६१)

हे पृथिवी, तू मनुष्यों और प्राणियों के सब ओर बीज तपन करने और उनको उत्पन्न करने के लिए विशाल क्षेत्र के समान है। तू अक्षय और विशाल है। प्राणियों की समस्त कामनाओं को पूरा करनेवाली है।

-अर्थवेद, द्वादशकांड, प्रथमसूक्त : पृथिवीसूक्त

२. धरती संबंधी अभिप्राय : ग्रीस-पुरा कथा

२.१. पृथ्वी का गर्भ : हेडीज़ का साम्राज्य

ग्रीस के पुराने विश्वासों के अनुसार मृतात्मा के हेडीज़ (मृतात्माओं के स्वर्ग) में प्रवेश के लिए शव का दफनाया जाना आवश्यक है, क्योंकि हडीज़ का साम्राज्य पृथ्वी के गर्भ में स्थित है। |Sx Eɱ ɷɺ E Vi l E i E n E +i E +{x BE VҴx , इɱB ɴ E nxx E |l E |Sɱx l* n ɶ E Vɱɪ Vi l, i =E J E 'Eɶ' ɮE {l Mc n Vi l* n ɴ E nxx +lɴ Vɱx E +ɺɮ x (r V +ɺɮ {ɮ) i i E ɴ {ɮ ix ]` ]] bɱ n Vi l, iE =E +i E Mɦ li bW E ©V |ɴ ɱ Vɪ +xl =E |i {l {ɮ ]Ei i * (पृ. ६८)


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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र पहला संस्करण: १९९७

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