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वाराणसी वैभव |
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आमुख डॉ. उमेश दःत्त तिवारी
भोजपुरी भाषा-भाषी क्षेत्र २५ जिलों के करीब ५० हजार वर्गमील में फैला है और इस भाषा को बोलने वाले आज १० करोड़ से भी अधिक लोग हैं। १ यह भाषा इस क्षेत्र के लोगों के साथ दःेश-विदःेश के विभिन्न भागों में भी फैली है। कु वे भारतीय, जिनके पूर्वज दःूर के दःेशों, जैसे-नेपाल, मॉरिशस, सूरीनाम, गुयाना, युगांडा, बैंकांक, रंगून, सिंगापुर, फीजी आदि दःेशों में जाकर बस गये, वे भी किसी न किसी र्रूप में भोजपुरी को जीवित रखे हुए हैं। इस तरह भोजपुरी का क्षेत्र व्यापक है। कुछ् लोगों की यह धारणा रही है कि मॉरिशस में एकमात्र ""क्रियोल'' में ही लोक साहित्य विद्यमान है, लेकिन नहीं, वहाँ लोक साहित्य भोजपुरी में भी है २ और काफी विकसित है। क्रियोल और भोजपुरी अलग-अलग हैं। मोका स्थित महात्मा गाँधी संस्थान ने १९७६-७७ में मौखिक र्रूप से प्रवाहमान भोजपुरी लोक साहित्य को सुरक्षित करने के उदः्दःेश्य से एक ""डाक्यूमेन्ट्ेशन सेन्ट्र'' की स्थापना की थी, जहाँ लोक-कथाओं, गीतों, कहावतों, मुहावरों, पहेलियों आदि के संकलन का कार्य प्रारम्भ हुआ था। लोक साहित्य के अध्ययन एवं अनुसंधान की दिशा में वहाँ यह प्रथम प्रयास नहीं था, बल्कि इस संस्था की स्थापना के बहुत पहले ही (स्व.) डॉ. रामेश्वर ओर ने अपने शोध-प्रबन्ध ""मॉरिशस की भोजपुरी'' में भोजपुरी भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया था। मॉरिशस की भोजपुरी में और भी कार्य हुए हैं। भारतीय विश्वविद्यालयों से जुड़कर भी मॉरिशसवासी भोजपुरी में कार्य करते र हैं। इसी प्रकार भारतीय शोधार्थियों ने मॉरिशस में जाकर भोजपुरी में कार्य किया है। आज भारतीय भोजपुरी के साथ अन्य दःेशों के भोजपुरी के तुलनात्मक अध्ययन की भी आवश्यकता है। भोजपुरी प्रदःेश का अधिकांश भू-भाग मैदःानी है। इसमें गंगा, गंडक, गोमती, सोन, घाघरा, कोसी आदि छ्ोट्ी-बड़ी कई नदियों का प्रवाह है, जो इस क्षेत्र को हरा-भरा बनाये रखती हैं। सारण एवं चम्पारण नाम तो आरण्य से ही उदः्भूत हैं, जो यह इंगित करते कि यह क्षेत्र अत्यन्त प्राचीन काल से ही जंगलों एवं वनौषधियों से अच्छादित रहा है और यहाँ नाना प्रकार के जीव-जन्तुओं और पशु-पक्षियों का वास रहा है। यहाँ तीनों मौसम और छ्हों ॠतुओं के समान चक्र से पूरा वातावरण काफी सुहावना बना रहता है। ऐसे परिवेश में स्वाभाविक र्रूप से कृषि एवं पशु-पालन यहाँ के लोगों की जीविका के प्रधान साधन र हैं। इस क्षेत्र में प्रायः हर प्रकार के अन्न और दःलहन एवं तिलहन की पैदःावार होती है। बिहार एवं उत्तर प्रदःेश के उत्तरी भाग में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है, इसीलिए इस क्षेत्र में गुड़, खाण्डसारी एवं चीनी के कारखाने थोड़ी-थोड़ी दःूर पर ही दिखाई पड़ते हैं। आरण्यक क्षेत्र होने की वजह से इस भू-भाग में अनेक सुप्रसिद्ध ॠषियों-मुनियों का भी वास रहा, जैसे आरा में महर्षि विश्वामित्र का, तो सारण में गौतम मुनि का आश्रम रहा। पूरा भोजपुरी क्षेत्र शौर्य, पराक्रम एवं मस्ती के लिए प्रसिद्ध है। सुप्रसिद्ध लोक-साहित्य "लोरिकायन', जिस लोरिकदःेव की वीरता का आख्यान सुनाता है, वह बलिया-छ्परा के द्वेाब के ही रहने वाले थे। इसका उल्लेख आचार्य हजारी प्रसादः द्विेवेदी के उपन्यास "बाणभट्् की आत्मकथा' में भी हुआ है। भोजपुरी क्षेत्र के लोग धर्मभी तो बहुत हैं, किन्तु साथ ही अत्यन्त कर्मठ और स्वाभिमानी भी हैं। अपने परिश्रमी होने की पहचान इन लोगों ने मॉरिशस, फिजी, ट्रिनीडाड, सूरीनाम आदि दःेशों में भी जाकर करायी है। अपनी भाषा, संस्कृति और मिट््ट्ी से इन्हें काफी प्रेम है, इसीलिए मॉरिशस, फिजी आदि दःेशों में रहकर भी भोजपूरिया लोगों ने अपनी इस भाषा व संस्कृति को हमेशा जीवन्त बनाये रखा। भोजपुरीवासियों की वीरता के अनेक मिसाल उपलब्ध हैं। ब्रिट्शि काल में १८५७ के विद्रोह का नेतृत्व इसी क्षेत्र के बलिया जनपदः ने किया था, १९४२ की क्रान्ति में भी इस क्षेत्र की अहम भूमिका रही थी। स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेता और प्रथम राष्टपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इसी क्षेत्र (सिवान) के रहने वाले थे, जो राष्टपति भवन में भी ठेंठ गंवई अंदःाज में रहते थे और भोजपुरी में खुलकर बातें करते थे। सम्पूर्ण क्रान्ति के पुरोधा लोकनायक जयप्रकाश नारायण, सुप्रसिद्ध सर्वोदःयी नेता बाबा राघवदःास और सुप्रसिद्ध विद्धान् डॉ. सम्पूर्णानन्द भी इसी भोजपुरी भाषी क्षेत्र के थे। गाँधी जी ने अपने स्वतंत्रता आन्दःोलन को एक नयी धार दःेने के लिए इसी भोजपुरी प्रदःेश के चम्पारण क्षेत्र को चुना था। भोजपुरी के ख्यातिलब्ध नाट्ककार, विदःेशिया नाट्क मंडली के संस्थापक स्व. भिखारी ठाकुर छ्परा के ही रहने वाले थे। भोजपुरी लोक-संस्कृति के सभी तत्व, खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन, तीर्थ-त, धर्म-कर्म, मनोरंजन, कला-प्रेम, खेती-बारी, पशु-पालन आदि यहाँ की भाषा-बोली; यथा -कहावतों, मुहावरों, पहेलियों, गीतों, विभिन्न पदः-बन्धों और ठेठ शब्दःों में पूरी तरह परिलक्षित हैं। भोजपुरीवासियों में धर्मभीर्रूता और अशिक्षा की अधिकता के कारण इस क्षेत्र में लोक-विश्वास एवं र्रूढ़ियाँ भी काफी दिखाई दःेंगी। यहाँ भूत-प्रेत, जादःू-टोना, तंत्र-मंत्र, शकुन-अपशकुन, दिशा-शूल, शुभ-अशुभ, तिथि-नक्षत्र आदि की मान्यताओं के विश्वासी भी बहुत मिलेंगे। इस क्षेत्र के प्रायः हर गाँव में एक ब्रह्मस्थान पाया जाता है, जहाँ गाँववासी कोई भी नया अथवा मांगलिक कार्य करने से पहले अनुष्ठान/पूजा-पाठ अथवा मनौती अवश्य करते हैं। भोजपुरी क्षेत्र में मनोरंजन के प्रमुख साधन कुश्ती, दःंगल, नाच, नौट्ंकी आदि र हैं, जहाँ ग्रामीणों की भारी भीड़ उमड़ती रही है। विदःेशिया नाट्क मंडली क्षेत्र में घूम-घूमकर नृत्य-नाट्किाओं का प्रदःर्शन किया करती थी। अहीर जाति के लोगों का नगाड़े की धुन पर फर्री का नृत्य और चमार जाति के लोगों का हुड़ु़क नृत्य भी प्रसिद्ध रहा है। यहाँ चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला भी अपने ढ्ंग की निराली रही है। व्याह एवं यज्ञोपवीत के अवसर पर घर के बाहरी दिवालों पर हाथी, घोड़े एवं सिपाही के चित्र अब भी बनाये जाते हैं। लड़की के विवाह के समय कोहबर वाले कम में भी चित्रकारी की जाती है। द्वेारपूजा के समय दःरवाजे पर आ का चौका पूरा जाता है, जो ज्यामितीय आकार का होता है। कलश पर अल्पना बनायी जाती है। कुँवारी या नव-विवाहित कन्यायें हाथों में मेंहदी रचती हैं, जो चित्रात्मक होती है। व्याह-यज्ञोपवीत के समय आँगन में कलात्मक मण्डप बनाये जाते हैं। प्रस्तुत डिजिटाइज्ड ग्रन्थ "भोजपुरी लोक-साहित्य एवं संस्कृति' में भोजपुरी भाषा-भाषी प्रदःेश के उपरोक्त सभी सांस्कृतिक तत्वों पर कहावतों, मुहावरों, पहेलियों, बच्चों के खेल-गीत, लोकोक्तियों, लोकगीतों, ठेठ ग्रामीण शब्दःों आदि के माध्यम से प्रकाश पड़ा है। इसमें ग्रामीणजनों की भाषा-बोली को ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। इस संकलन में ऐसे शब्द भी मिलेंगे, जिन् शिक्षित लोग अप-शब्दःों की श्रेणी में रखते हैं, किन्तु ग्रामीण जीवन में जो कुछ् वास्तविक एवं यथार्थ है, चा वह सभ्यता की श्रेणी में हो अथवा असभ्यता की श्रेणी में, उनपर इन संकलनों के माध्यम से एक जर्रूरी प्रकाश पड़ा है। इसके बिना ग्रामीण जीवन की पूरी तस्वीर सामने नहीं आ सकती। लोक-संस्कृति लोक-जीवन का अविभाज्य अंग है और उसे लोक-साहित्य के माध्यम से भी काफी कु समझा जा सकता है यह संस्कृति सनातन से स्वतः ढ्लती, बनती और बिगड़ती चली आयी है। उसमें लोक-जीवन के नाना अनुभवों के सार समाये हुए हैं, जिसे किसी शिष्ट/शास्रीय साहित्य में नहीं पाया जा सकता। लोक-साहित्य लोक-जीवन का दःपंण है, जिसमें वह सब कुछ् दिखाई दःेगा, जिसे हम लोक में दःेखना चाहते अथवा लोक में जो कुछ् व्याप्त है। लेकिन आधुनिकता के साथ तेजी से हो र संक्रमण के वर्तमान दःौर में जैसे-जैसे लोक-जीवन का रंग-ढ्ंग बदःलते जा रहा है, वैसे-वैसे लोक-संस्कृति एवं लोक साहित्य का स्वर्रूप भी क्रमशः बदःलते जा रहा है। प्रस्तुत संकलन में ऐसी तमाम बातें मिलेंगी, जो भोजपुरी क्षेत्र के अनेक हिस्सों में अब या तो लुप्त हो चुकी या लुप्त होने के कागार पर हैं। जैसे बच्चों के खेल-गीत के अन्तर्गत संकलित बहुत से गीत अब अतीत या इतिहास की बातें हो चुकी हैं, यद्यपि चालीस वर्ष से अधिक आयु वाले लोग उन् याद कर आज भी अतीत की सुखदः अनुभूतियों से भर जाते हैं। फिर भी इन सामग्रियों का संकलन व संरक्षण अतीत को जानने और उससे प्रेरणा लेने में काफी सहायक, उपयोगी तथा रोचक सिद्ध होगा। प्रस्तुत संग्रह की सम्पूर्ण सामग्री प्रस्तुतकर्त्ता के व्यक्तिगत खोज-संकलनों पर आधारित है। इसका संग्रह वर्ष १९८३ से १९८८ के बीच किया गया था। अधिकांश सामग्री बिहार के गोपलगंज, छ्परा एवं सिवान जिलों के ग्रामीण आंचलों की महिलाओं, पुरुँषों एवं बच्चों से प्राप्त ई हैं। बहुत सी सामग्रियों मिथिलांचल के मुजफ्फरपुर, मगही से प्रभावित सोनपुर एवं आरा, बक्सर, दःेवरिया, बनारस आदि क्षेत्रों के लोगों से बातचीत के क्रम में एकत्र ई हैं, जिन पर स्वाभाविक र्रूप से भाषायीय क्षेत्रीयता का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होगा। कु पदःबन्ध पू कर नो किये गये थे, किन्तु कहावतों, मुहावरों और ठेठ ग्रामीण शब्दःों को व्यवहार में आते हुए सुनकर नो किया गया। कहीं पंचायत हो रही है, कहीं झगड़ा हो रहा है, कहीं गीत-मंगल हो र हैं, कहीं यूँ ही कु लोगों की बैठकी लगी है, कहीं श्रमिक काम कर र हैं, ऐसे जगहों पर चुपचाप बैठकर उच्चरित वाक्यों, शब्दःों व पदःबन्धों पर ध्यान दिया गया और जो मकसद की चीज मिलती गई, उसे चुपचाप कागजों पर उतारा गया। नाते-रिश्तेदःारी में कई बार औरतों के समीप दःेर रात तक बैठकर काम की चीजें नो की गईं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलायें प्रायः सबसे अंत में भोजन करती हैं, कभी-कभी उन् दःुबारा भोजन भी बनाना पड़ता है, इस वजह से वह दःेर तक जगी रहती हैं। सामग्रियों के लिए इन अवसरों का भी लाभ उठाया गया। सामग्रियों के खोज-संकलन क्रम में प्रस्तुतकर्त्ता को एक विशेष अनुभव यह हुआ कि लोक साहित्य का (मुख्यतः कहावतों, मुहावरों एवं पहेलियों का) जितना विपुल भण्डार महिलाओं के पास है, उतना पुरुँषों के पास नहीं। इस संकलन की ऐसी अधिकांश सामग्रियाँ महिलाओं से ही प्राप्त ई हैं। लोक साहित्य के सन्दःर्भ में पुरुँषों की अपेक्षा महिलाओं की स्मृतियाँ काफी जागृत एवं समृद्ध पायी जाती हैं। जब वे आपस में किसी प्रसंग पर बात-चीत अथवा झगड़ा करने लगती हैं, तब उनकी वाणी में कहावतों, मुहावरों की प्रायः एक झड़ी सी लग जाती है, किन्तु संकलनकर्त्ता को यहाँ इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे जो कु नो करें, उसकी जानकारी स्रोत वक्ताओं को न होने पाये, अन्यथा वक्ताओं की वाणी का प्रवाह अवरुँद्ध होने लगेगा। किसी से पूछ्कर कहावतों, मुहावरों को तो पाया ही नहीं जा सकता, क्योंकि ये सब व्यवहार में प्रसंगात ही उपस्थित होते हैं। पूछ्ने पर वक्ता झेंप या असमंजस की स्थिति में आ जाता है और उसकी स्मृति काम नहीं करती। जितने स्री-पुरुँषों से इस संकलन की सामग्रियाँ प्राप्त की गई हैं, उन सबका यहाँ नाम पाना संभव नहीं, किन्तु लोक साहित्य एवं संस्कृति के वाहक इन ग्रामीणजनों को हम अपना हार्दिक आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित करना एक जर्रूरी कर्त्तव्य अवश्य समझते हैं। लोक साहित्य एवं लोक कलाएँ एक तरफ लोक संस्कृति के वाहक हैं, तो दःूसरी ओर शिष्ट साहित्य की जन्मदःात्री भी, अतः इसकी सुरक्षा होनी ही चाहिए। लेकिन आज भारत में बढ़ते औद्योगीकरण की उफान, पाश्चात्य प्रभाव एवं समय तथा दःूरी पर विज्ञान की विजय तथा दःूरस्थ जगहों पर आने-जाने व बस जाने के कारण प्राचीन भारतीय संस्कृति का लोक प्रचलित प्रवाह काफी कु बाधित भी होता जा रहा है, और इस धारा की मौलिकता के विनष्ट होने का खतरा गंभीर र्रूप से उपस्थित है। यह लोक साहित्य पूर्णतया प्रत्यक्ष एवं मौखिक है, इसके वाहकों का अवसान होना इस संस्कृति के एक हिस्से का अवसान होना है, अतः आधुनिकता से आहत इस लोक-साहित्य एवं संस्कृति के संरक्षण का कार्य तेजी से करने की आवश्यकता है। भोजपुरी में मौखिक लोक साहित्य के संग्रह एवं शोध के कार्य यद्यपि बहुत हुए हैं, फिर भी इस दिशा में कार्य की अभी व्यापक संभावनाएँ मौजूद हैं। प्रस्तुत संकलन का डिजिटाइजेशन कम्प्यूट्र इंजीनियरिंग विभाग, काशी हिन् विश्वविद्यालय स्थित "मालवीय सूचना प्राद्योगिकी केन्द्र' (कॉयल-ने परियोजना) के अन्तर्गत हुआ है। विभाग के विद्वेान अध्यक्ष एवं परियोजना के मुख्य निरीक्षक (चीफ इन्वेस्ट्ीगेट्र) प्रो. के.के. शुक्ल जी का मैं विशेष र्रूप से इस लिए आभारी हूँ क्योंकि उन्होंने न सिर्फ मुझे एक "रिसोर्स परसन' के र्रूप में उक्त परियोजना के अन्तर्गत कार्य करने का अवसर प्रदःान किया, बल्कि कार्य-सम्पादःन प्रक्रिया में किसी प्रकार की कोई असुविधा उत्पन्न न हो, इसका भी हर वक्त पूरा ख्याल रखा। प्रो. शुक्ल जी अपने विभाग के साथ-साथ उक्त परियोजना का संचालन भी जिस निष्ठा, लगन एवं प्रतिबद्धता के साथ करते हैं, वह तमाम विभागाध्यक्षों व परियोजना निदःेशकों के लिए दिशा-निर्दःेशक एवं अनुकरणीय हो सकता है। यह ग्रंथ हमारी लोक-संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन में सहायक तथा इसमें रुँचि रखने वाले अध्येताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगा, ऐसा विश्वास है।
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