वाराणसी वैभव

भोजपुरी लोक साहित्य एवं संस्कृति


कहावतें

कहावतें मानव जाति के अनुभवों की सुन्दःर अभिव्यक्ति हैं। इनसे सांसारिक व्यवहार-कुशलता एवं सामान्य बुद्धि का उत्कृष्ट निदःर्शन होता है। यह ग्रामीणों, खासकर ग्रामीण स्रियों की निजी सम्पत्ति है। लोक साहित्य के क्षेत्र में काम कर चुके या कर र प्रायः सभी विद्वेानों/खोजकर्त्ताओं की एकमत से राय है कि अधिकतर कहावतों का उदः्भव स्रियों द्वेारा हुआ है। शिक्षित के बजाय अनपढ़ स्रियों की वाणी में कहावतों/मुहावरों का कोश ही रहता है। वह इनका सट्ीक प्रयोग करना जानती और करती हैं। इसीलिए तेलगू में एक कहावत है- ""शिक्षित की अपेक्षा धोबी अच्छा है न?'' बातचीत के क्रम में सट्ीक कहावत का प्रयोग कर सामने वाले को प्रभावित एवं निर्रूत्तर किया जा सकता है; यही कहावतों की प्रामाणिकता का सबसे बड़ा आधार है, यही उसकी महत्ता एवं उपयोगिता का सबसे बड़ा प्रमाण है। इन कहावतों के माध्यम से समाज के बौद्धिक स्तर, उसके रहन-सहन, सभ्यता-असभ्यता आदि को काफी कुछ् समझा जा सकता है। कहावतों में लोक-जीवन की चेतना व आत्मा का निवास होता है। इनमें पूर्वजों के अनुभव एवं इतिहास समाहित होते हैं। यह पीढ़ी दःर पीढ़ी को उत्तराधिकार के र्रूप में प्राप्त होते हैं।

कहावतें लोक से जुड़ी उक्ति हैं, इसीलिए इन् लोकोक्ति भी कहा जाता है। इनके माध्यम से लोक नीति, लोक-प्रतिभा एवं लोक-संस्कारों का दिग्दःर्शन किया जा सकता है। यदि कहा जाय कि कहावतें/ लोकोक्तियाँ लोक की बौद्धिक सम्पदःा हैं, तो अनुचित नहीं। कहावतें प्रायः संक्षिप्त, सारगर्भित, लयात्मक, अनुप्रासयुक्त और प्रभावशाली अनुभूति की अभिव्यंजक होती हैं। इनकी शैली सरल और इनके भाव सजीव होते हैं। कहावतों का लोक प्रवाह अति प्राचीन काल से बना हुआ है, जो काल एवं परिवेश विशेष में प्राप्त अनुभवों के साथ क्रमशः समृद्ध होते गया है। कहावतें सार्वकालिक, सार्वदःेशिक एवं सदःा प्रासंगिक बनी रहेंगी। लोक जीवन से प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वेारा संकलित कु कहावतें यहाँ दी जा रही हैं। इनका महत्व स्वयंसिद्ध है।

१. अ़ँडु़आ बैल बंहेड़ु़आ पूत, खा ले बेटा कहीं सुत। (बंहेड़ु़आँउअवारा, कहा न मानने वाला)

२. अंजोरिया धरम के रात ह।

३. अंधरा कू लंगड़ा कूट्े, हमरा चाउर से काम।

४. अइली ना गइली फलां ब कहइली।

५. अउरी जात के भुखाइल ना गोेंड के लवलइ। (गोंड़उभंड़सार, जो दिन भर कु न कु खाते रहता है, पे भ रहने पर भी वह उतना खा जाता है, जो एक भूखा व्यक्ति खाता है, यही लवलई है)

६. अकरावन पिया मर गइले, सेजिया दःेख भयावन भइले। (अकरावनउअकर्मण्य, कर्महीन)

७. अकेले मियाँ रोवस कि कबर खानस।

८. अगरो अगरइली त खँडतर ले परइली। (खँड़तरउचिथड़ा, पराइलउभागना)

९. अगल-बगल घर गोलक में। (परस्पर सहयोग के आभाव में विपत्ति को निमंत्रण)

१०. अगली भइली पिछ्ली, पिछ्ली पुरधाइन। (पुरधाइनउप्रधान, मुख्य)

११. अगुताइल कोंहार लगले मूड़ी से माट्ी कोड़े।

१२. अगुताइल बिट्यिा के लइका भइल, गोड़ा तर धइल,सियार ले गइल।

१३. अघाइलो भइंस पाँच काठा। (अघाइलोउभर पे भोजन किया हुआ)

१४. अण् सिखावे बच्चा के चेंव-चेंव मत कर।

१५. अनका धन पर तीन ट्किुला!

१६. अनका धन पर तेल बुकवा।

१७. अनका धन पर विक्रम राजा!

१८. अनका धन पे रोवे अँखिया!

१९. अन्न बिनु लुगरी पुरुँख बिनु पइया, लुगवा के फट्ले धनि भइली बउरइया। (पुरुँष अन्न के आभाव में लुगरी, अर्थात् चिथड़ा, फटा-पुराना कपड़ा, कमजोर वस्र की तरह खस्ताहाल हो जाता है, और स्री पति के बिना पइया (बिना दःाना की छ्मिी, पट््टा!) की तरह जर्जर, खोखला, निरस या बेदःम हो जाती है। यहाँ "लुगा का फट्ना' एक मुहावरा है, तात्पर्य यह कि फट्ेहाल जिंदःगी पाकर मनुष्य पागल की दःशा को प्राप्त करता है।)

२०. अन्हरा सियार के पकुआ मेवा दःुर्लभ ? (पकुआउबरगद का फल)

२१. अन्हरा सियार के महुआ मिठाई।

२२. अन्हरी गाय के राम रखवार।

२३. अपना घर में कुकुर के सेना।

२४. अपना दःही के अहीर खट््टा ना कहे।

२५. अपना दःुआर कुतवा बरिआर।

२६. अपना बिनु सपना, गोतिया के धन कलपना। (गोतिया का धन रहने से क्या लाभ जब वह अपने लिए सपना ही हो, या किसी काम ना आवे)

२७. अपना मने सजनी, के गाँव के लोग क पदःनी। (सजनीउसज्जनी, सभ्य, अच्छा)

२८. अपना ला लालबिल जगतर ला दःानी। (लालबिलउलु-लु, छु-छु, दःरिद्रता की दःशा)

२९. अपना हारल मेहरी के मारल के ना कहे।

३०. अपने उरुँआ सुगा के पढ़ावऽ तारे। (उरुँआउउल्लू,व्यंगार्थ-मूर्ख)

३१. अपने दिल से समझो पराये दिल की बात।

३२. अब दिनन भइल भारी, अब का लदःबऽ हो बेपारी।

३३. अबर कुट्निहार दःउर-दःउर फट्के।

३४. अबर के मेहरा गाँव भर के भउजाई।

३५. अबर सवार घोड़ी फोद काढ़े ले।

३६. अभागा गइले ससुरार, तहँवो मांड़े-भात।

३७. अरधी मेहरा बट्ैया खेत। (कोई भरोसा नहीं )

३८. अरवा चाउर बसिया माँड़, ओ में डाले समझी के डा़ँड।

३९. अ खाइल प पादःल। (अ उ यहाँ, प उ वहाँ)

४०. अल्लाह के एक लड़का!

४१. अहीर के लाठी कपार पर।

४२. अहीर गड़ेरिया पासी, तीनो सत्यानासी।

४३. अहीर बहीर बन बइर के लासा, अहीर पदःलेस भइल तमासा।

४४. अहीर बुझावे से मरदः।

४५. अहीर साठ बरिस ले नाबालिग रहेले।

४६. अहीर साधु, मूसर धनुही ना होले। (मूसर उ ओखली का मूसर, धनुहीउधनुष)

४७. अहीर से इयारी भादःो में उजारी।

४८. अहीर, राजपुत, डोंम, तीनो जात हड़बोंग। (हड़बोंगउ हल्ला-हुड़दःंग मचाने वाला)

४९. अहीरिन के माँग में सोने का मंगट्ीका।

५०. आँख आन्हर दःेह मरखाह।

५१. आँख के अंधा नाम नयनसुख।

५२. आँख के आन्हर गांठ के पुरा।

५३. आँख चले भौं चले, अउर चले पपनी। सोरहो घर लट््टा लगावे, इ घर कुट्नी। (परस्पर झगड़ा लगाने वाली औरत आँख, भौं और पुतली से इशारा करती है। "लट््टा'- महुआ और भुना चावल ओखल में कूट्कर हलवा बनाया जाता है, इसे लट््टा कहते हैं। यहाँ व्यंजना में प्रयुक्त)

५४. आँख त हइये ना कजरौटा चाहीं।

५५. आँख ना दीदःा मांगे मलीदःा।

५६. आँख बिलबिल बग्गा में चरवाही। (बिलबिल उमोतियाबिन्द कीचड़-पानी युक्त, बग्गाउई का खेत)

५७. आँख में न कान में, एगो लकरी। सउसे समुंदःर में एगो मछ्री।

५८. आँवा के आँवा झाँवा।

५९. आइ-माइ के ट्किा ना, बिलाई के भरमंगा।

६०. आइल थोर दिन गइल ढ्ेर दिन।

६१. आइल बानी गवने, सकोचऽ तानी बात, ना तऽ अउर लेती भात।

६२. आइल मघवा, फूलल गाल, फिर उहे हाल।

६३. आई आम चा जाई लबेदःा।

६४. आखिर मुरुँख पछ्तइहें, ट्ट्का भात बसिया क के खइहें।

६५. आखिर संख बाजल, बाकिर बावाजी के पदःा के।

६६. आगी के तपला से जाड़ ना जइहें, पिया के कमाई से ऱ्हदःया ना जुड़इहें।

६७. आगे अन्हार, पा सूझेना; जियरा चंडाल बूझे ना।

६८. आगे नाथ ना पा पगहा।

६९. आगे बैजू, पी नाथ। (पहले बैजू, अर्थात् बदःमाश को प्रणाम् करो, तब नाथ (सज्जन) को)

७०. आतुर वश कुकर्मा।

७१. आदःमी के दिन घोड़ा के दिन लागले ना रहे।

७२. आदःमी चलते चिन्हाला।

७३. आदःमी बन ट्ेले, जल ना ट्ेले।

७४. आधा बात समधिया जाने ले। (समधियाउसंदःेशवाहक)

७५. आधा रोट्ी बस, कायथ हईं कि पस (पशु)!

७६. आनकर मूड़ी बेल बराबर।

७७. आनी से बानी भाखा से पहचानी।

७८. आन्हर आँख बबुर पर झट्हा। (झट्हाउछ्ोटा लबेदःा)

७९. आन्हर कुकुर बतासे भोंके । (बतासे उ हवा की आह पाकर। अर्थात् अनायास, बिना तुक के भोंकना, व्य्ंाजना में आशंका, संदःेहमात्र पर हो-हल्ला करना)

८०. आन्हर गु बहिर चेला, मंगले गुड़ लेअइले ढ्ेला।

८१. आन्ही के आगे बेना के बतास! (बेनाउपंखा, बतासउहवा)

८२. आप र्रूप भोजन परर्रूप सिंगार।

८३. आपन अपने ह, विरान विराना। (विरानउ पराया, अनजान)

८४. आपन करनी पार उतरनी।

८५. आपन कानी र उतानी।

८६. आपन काम मो आवे दःे।

८७. आपन दिया बार के मस्जिद के दिया बारीं।

८८. आपन निकाल मोर नावे दःे। (अपना काम रोक कर मेरा करो, व्यंजना में स्वार्थभक्ति)

८९. आपन फूली केउ ना निहारे, दःोसर के ढ्ेढ़ निहा ला। (फूलीउआँख का मा़ंडा, ढ्ेढ़उ कनडेरपन)

९०. आमा गिहथिन रहली, त भर्रूके-भर्रूके पिसान भइल। (गिहथिन ऊँगृहस्थिन, गृहस्थ की औरत, गृहणी, प्रचलित अर्थ कुशल, प्रवीण, होशियार। भर्रूका उ भांड़ा ; ज्यादःा होशियारी घर की बरबादी)

९१. आवते बहुरिया जनमते लइकवा। (नई दःुल्हन और नवजात शिशु को विशेष आदःर मिलता है)

९२. इ कढ़ावे ली, त उ घोंटावे ली। (हँा में हँा मिलाना)

९३. इ गुर खइले कान छ्ेदःवले। (गुरउ गुड़)

९४. इ बिलाइ बने गइली, उ महोखा बन गइलन।

९५. इ रास्ता केने जाई ?, त कोड़ऽ तानी।

९६. इजत बरोह जोगवले से।

९७. इजती इजते पे म ला।

९८. इडिल-मिडिल के छ्ोड़ऽ आस, धरऽ खुरपी गढ़ऽ घास।

९९. इयर फूट्ल बीयर फूट्ल, बाबा हो कुँआ बानी।

१००. इसर निकलस दःरिदःर पइसस।

१०१. इसर से भें ना दःरिदःर से बैर।

१०२. उ डाढ़ी-डाढ़ी त इ पाते-पाते। (एक से बढ़ कर एक, छ्काने की कोशिश व्यर्थ)

१०३. उखड़े बाल ना बरिआर खाँ नाम।

१०४. उजरा गँाव में ऊँ आइल, लोग कहे बलबले हऽ।

१०५. उजारी टोल मुरारी महतो।

१०६. उठ लिहली मुँह धो लिहली, पान के बीरा चबा लिहली।

१०७. उठऽ बहुरिया सांॅस ल ऽ ढ्ेकी छ्ोड़ऽ जाँत ल ऽ। (इसी पर एक अन्य कहावत है - खड़ा होखऽ त कोड़ऽ, बइठऽ त चेखुरऽ ! अर्थात् चैन नहीं)

१०८. उधरिया बइठले अगिला मंागा। (मांगाउनाव का अगला भाग, जिसपर बैठा जा सकता है)

१०९. उधिआइल सतुआ पितर के दःान। (बिना मन का सम्मान)

११०. उपास भला कि मेहरी के जूठ भला !

१११. उरदी के भाव पूछ्े, त कुल्थी/बनउर क सेर! (कुल्थी-एक प्रकार की जड़ी, जो पशु रोग में दी जाती है)

११२. ऊँ चुराये निहुरल जाय।

११३. ए कुकुर दःूबर का ? त गोड़ के आवाजाही।

११४. ए गाय! खा, तहार बाछा बिकाई।

११५. ए बबुआ! तोर भाई केइसन! घर-घर ढ्ँूढ़े बिलरिया एहिसन।

११६. ए बुरी गोह! ध के गोड़ त धइले बाड़े सोर!

११७. ए भइंस, आपन पोंकल नेवारऽ, तहरा दःूध से बाज आवतानी।

११८. ए भेंड़िया भेंड़ चरइबे!, त हमार कमवे कवन !

११९. ए हाथ करऽबऽ, त ओ हाथ पइबऽ।

१२०. एक आन्हर एक कोढ़ी, भले राम मिलवले जोड़ी।

१२१. एक घर इनो बक्से ले। (बक्सनाउछ्ोड़ना)

१२२. एक ट्का के मुर्गी नव ट्का के मसाला।

१२३. एक त गउरा अपने गोर, दःूसर लहली कमरी ओढ़।

१२४. एक त गिलहरी पेड़ से गिरल, दःूसरे मरलख मुअड़ी। (मुअड़ीउमोटा लबेदःा)

१२५. एक त छ्उँड़ी नचनी, गोड़ में परल बजनी, अउरी हो गइल नचनी।

१२६. एक त मोरा रुँचे ना, तीन सेर में छूट्े ना।

१२७. एक बूँ के दःाल। (एकता में बिखराव)

१२८. एक बोलावे चौदःह धावे।

१२९. एक भे़ंड बिना पों के, त रक्षा करिहें भगवान। आ लेहँड़ बिना पों के, त का करि भगवान !

१३०. एक मन के बंसी, चौरासी मन के छ्ीप।

१३१. एक लकड़ी, नब्बे खर्च।

१३२. एक हाथ के ककरी, नौ हाथ के बिआ।

१३३. एके माघ ले जाड़ ना होला।

१३४. एड़ी के मा भेड़ी के खौरा। (गर्ज दःूसरे को, खुद बेचैन)

१३५. ए ले ललगंड़िया के सोने के बनुक। रात चलावे, दिन खरची के दःु:ख।

१३६. ओएड़े-गोयड़े खेत चरइहऽ मेहरी के ट्किुला दःेख-दःेख जइहऽ।

१३७. ओछ्री के भोज में छुछुनरी गइल नेवता।

१३८. ओढ़ले पहिरले वर, छ्पले-छुपले घर।

१३९. केंगाल ठीक, जंजाल ना ठीक।

१४०. केंठी, चंदःन, मधुरी बानी, दःगाबाज के तीन निसानी।

१४१. कउआ खइले अमर!

१४२. कतनो अहिर होई सयाना, लोरिक छाड़ि न गाव आना।

१४३. कथनी कथे अगाध के चले गिध के चाल। (अगाधउकठिन, गंभीर, सुसंस्कृत)

१४४. कनिओ के मौसी, दःुलहो के मौसी।

१४५. कनिया के आख में लो ना, लोकनी हकन करे। (लोकनीउमंथरा, हकनउ गला फाड़-फाड़ कर रोना)

१४६. कपड़ा के दःागी धोबी कीहाँ, अउर दिल के दःागी भगवान कीहाँ मिट्ेला।

१४७. कपार पर के लिखल के मेटाई !

१४८. कभी नाव पर गाड़ी, कभी गाड़ी पर नाव।

१४९. कम कूबत, मार खाये के निसानी।

१५०. कम पूंजी पट््टा, त करऽ पसरहट््टा। (पसरहट््टा उ क्रंद्धदृsseद्ध फेरी लगाना, अनाज की खरीदः-बिक्री)

१५१. कमाय धोती वाला खाय टोपी वाला।

१५२. करकसा बेट्ी करकसा चाल। (करकसाउकर्कस, कठोर वचन बोलने वाली)

१५३. करत में डाँड़ टू खात में नीक लागे।

१५४. करनी ना धरनी, धिया होइ ओठ बिदःरनी।

१५५. करम फूट्ल गेहूँ के, गेहूँ गइले घोनसारी। (घोनसारीउ भंड़सारी)

१५६. करवाँ कोंहार के धी जजमान के।

१५७. करिअवा भेली ढ्ेर मीठ।

१५८. करिआ अछ्र भइंस बराबर।

१५९. करिआ कमरी में लाल के तोई। (तोईउरजाई या झुला में लगने वाला एदृद्धड्डीeद्ध)

१६०. करिया बाभन गोर चमार। (तेज होते हैं)

१६१. करिया भइंस अन्हारी रात, ब प अहिर के जात।

१६२. करिया में कुच-कुच करिया में काई। करिया भतार दःेख आवेला ओकाई। (ओकाईउउल्ट्ी)

१६३. करिया वाभन गोर शुद्र, ओह के दःेख काँपे रुँद्र।

१६४. कर्जा लेके साख बनी!

१६५. कलकत्ता के कमाई जूता छाता में लगाई।

१६६. कलवार के लइका भूखे मरे, लोग क ताड़िए पी के मातल बा।

१६७. कहला बिनु कथनी ट्ेढ़! (बार-बार कहने पर भी कोई प्रभाव नहीं और एक बार कड़े ढ्ंग से कह दःेने पर चिढ़)

१६८. कहला से धोबी गदःहा पर ना चढ़े।

१६९. कहाँ राजा भोज कहाँ भोजवा तेली!

१७०. कहावे के अनेरिआ, चलावे के लधार। (अनेरिया उबिलाला, किसी काम का नहीं, लधारउ लात)

१७१. कहिया राजा अइहें, त कब हँडिया धोअब !

१७२. कहीं के ईं कहीं का रोड़ा, भानमती के कुनबा जोड़ा।

१७३. क के रहनी कहल ना जाव, कहला बिना रहल ना जाव।

१७४. का खुरपी के बान् धइले, का खुरपी के बेंचले!

१७५. का पर कर्रूँ सिंगार पिया मोर आन्हर। (का पर उ किस पर)

१७६. काँस-पितर कवनो गहना ना, करिया भतार गोड़ जातऽ ना।

१७७. काठ के हँडिया एके बेर।

१७८. कातिक गइले, बैल पदःवले। (कुसमय प्राप्ति)

१७९. कान कुइस कोत गर्दःनिया, ए तीनों से हा दःुनिया। (कोतउभूरा आँख वाला)

१८०. कानी गाय के अलगे बथान।

१८१. कानी बिलाई के घर में शिकार।

१८२. काम क नथ वाली, लागे चिरकुट्ही।

१८३. काम के ना काज के दःुस्मन अनाज के।

१८४. काम के ना काज के कटावऽ घोड़ी घास के।

१८५. काम धाम में आलसी भोजन में होसियार।

१८६. काम न धन्धा अढ़ाई रोट्ी बन्धा।

१८७. काम प्यारा चाम नहीं।

१८८. काल्ह के बनिया आज के सेठ।

१८९. का रजवा के घ अइले, का रे विदःेसे गइले।

१९०. का भीम गए अगुताई, तातल दःूध ओठ ज जाई। (तातलउगर्म)

१९१. कि पे भा अनवतवा भाय, कि पेट् भा नमिया माय। (अनन्त त, नवमी)

१९२. कुकुर बिलाई के जमघट्।

१९३. कुटुम कुटुम जइसन रहले कुटुम ओहिसन पवले कुटुम।

१९४. कुत्ता का अनजान के बनिया काट्े पहचान के।

१९५. कुत्ता के पों में केतनो धी लगाईं, ट्ेढ़ के ट्ेढ़े रही।

१९६. कु के बैल, त कुदःेला तंगी। (तंगीउ लादी, जीन)

१९७. कुबंस ले निरबंस अच्छा।

१९८. कुल कपड़ा रखले से।

१९९. के मनावल! त बकरी।(काफी मान-मनौव्वल के बावजूद चुप न हुआ, कु दःेर में स्वयं चुप हो गया)

२००. के हऊँ! त बर के मउसी; नून दःेबू! त अगतिआ नइखे। (अगतियार उ अधिकार)

२०१. केंकरवा के बिहान केंकरवे खाला। (केंकरवाउ केकड़ा, बिहानउबिआड़, नवजात)

२०२. केंकरा पैर पसारे, त पोखरा के थाह पावे।

२०३. केतनो अहिर पिंगल पढ़े, बाकिर बात जंगल के बोले।

२०४. केतनो करि चतुराई विधि के लिखल बाँव ना जाई।

२०५. केतनो खेती बना के जोतीं, एक दिन दःखिना लग जाई।(दःखिनाउएक प्रकार का फसली रोग)

२०६. केतनो चिरई उड़ि आकास, लेकिन करि धरती के आस।

२०७. केतनो बरई पान जोगइहें, पाला परिए जाई।

२०८. के के बैगन पंथ के के बैर।

२०९. के खाते-खाते मुये, के खइला बिनु मुये।

२१०. के ना पू हा बानी।

२११. कोइरी के पहुना! (आलसी, बेकाम का)

२१२. कोई गंगा नहाइल कोई गुड़ही। (फिर भी बराबरी)

२१३. कोई जनम के संघाती होला, करम के ना होला।

२१४. कोई लेत कोई दःेत कोई ट्क दःेले बा। (ट्क दःेनाउन लगाना)

२१५. कोढ़िया डरावे थूक के भरोसे।

२१६. कोदःो साँवा अन्न ना, बेट्ी दःामाद धन ना।

२१७. कोल्ह एहिसन मरदःा, कोतार एहिसन जोय, सेकर लइकवा चीलर एहिसन होय। (हट््ठा-कट््ठा पुरुँष-स्री, लेकिन लड़का दःुबला-पतला)

२१८. कौआ के आँड़ उड़ते में चिन्हा जाला।

२१९. कौआ ले कबलवे चतुर। (कबलवेउकौआ का बच्चा)

२२०. खइले पियले साथ।

२२१. खग ही जाने खग के भाखा।

२२२. खा ले पी ले, चुल्हा के ढ्हा दःे।

२२३. खा ले बेट्ी दःूध-भात आखिर परबे विराना हाथ।

२२४. खाऽ त धी से, जाऽ त जी से।

२२५. खाँड़ छ्ोड़ सउँसी पर धावे, सउँसी मिले ना खांड़ा पावे। (खाँड़उटुकड़ा, सउँसीउसंपूर्ण)

२२६. खाए के ना खिआवे के दःउर-दःउर कोआ बिछावे के।

२२७. खाए के नाना के, कहाए के दःादःा के।

२२८. खाए के बेट्ी, लु के दःमादः, हाथ-गोड़ तजले बा गोतिया-दःेआदः। (हाथ-गोड़ तेजल (मुहावरा) उ कोई काम न करना, अकर्मण्यता)

२२९. खाए के मन ना नौ गो बहाना।

२३०. खाए के मांड़ ना नहाये के तड़के।

२३१. खाना कुखाना उपासे भला, संगत-कुसंगत अकेले भला।

२३२. खास भीम हगस सकुनी।

२३३. खिआवे के ना पिआवे के, मांग-ट्ीका धोवे के। (खर्च न करना, किन्तु सुख चाहना)

२३४. खिचड़ी खात नीक लागे, बटुली मलत पे बथे।

२३५. खेत खाय पड़िया, भइंस के मुँह झकझोरल जाय।

२३६. खेत च गदःहा मार खाए धोबी।

२३७. खेत ना जोतीं राड़ी भइस ना बेसाहीं पाड़ी।

२३८. खेत-खेत पाटा, दःेह-दःेह नाता।

२३९. खोंसी के छाल पर कुत्ता के मांस बिकाय।

२४०. खोंसी के जान जाय, खवैया के सवा ना।

२४१. खोलले बकरी, बन्हले लकड़ी।

२४२. गइल घर बुरबकवे बिना।

२४३. गइल जवानी फिर ना लौट्ी, चा धी मलीदःा खाय।

२४४. गइल जवानी माझा ढ्ील। (माझा उ शरीर)

२४५. गइल बहुरिया तीनों से- र्तृया, गोर्तृया, रसोइया से।

२४६. गइल भइंस पानी में।

२४७. गइल माध दिन उनतिस बाकी।

२४८. गत के ना पत के सुते अइले स के।

२४९. गदःहा के इयारी लात के सनसनहट्।

२५०. गदःही दिहलऽ दःँतकट्ही ए बैठा, गइया दिहलऽ मरखाह। छ्ँउड़ी दिहलऽ घर घूमनी ए बैठा, उठि-सुति मुअड़ी खाय।

२५१. गया मरद जो खाय खटाई, गई नारि जो खाय मिठाई।

२५२. गया राज चुंगला पैठा, गया पेड़ बगुला बैठा।

२५३. गया आसन बनारस पीठा। (सिद्धान्त और व्यवहार में कोई तालमेल नहीं; बात का कोई ठिकाना नहीं)

२५४. गरदःन में ढ्ोल परल, रो के बजावऽ चा गा के।

२५५. गरह से निकल गरहन में।

२५६. गलगर होइहऽ धिया, बड़ होके रहिहऽ। (मुँहगर, बातूनी की हर जगह इज्जत)

२५७. गवना के घूँघ अउर लइकाई के कुई ना मिले।

२५८. गाँव भर ओझा, चलीं केकरा सोझा !

२५९. गा कट्हर, ओ तेल।

२६०. गाय ओसर भइंस दःोसर। (ओसरउपहिल बिआन)

२६१. गाय गुन बछ्ड़ा पिता गुन घोड़, ना कु त थोड़े-थोड़।

२६२. गाय ना बाछा, नींद प अच्छा।

२६३. गाय बाभन घुमले फिरले।

२६४. गाया में गाय दःान, रास्ता में बाछ्ी, घर अइला पर बावा जी खोसी लेबऽ कि पाठी !

२६५. गाल दःेब बजाय, सासु जइ लजाय।

२६६. गुदःर-मुदःर सब सोये, बिसनिया लोगवा रोवे। (होशियार होकर भी लड़कपन करना)

२६७. गु गुरुँये रह गइले, चेला चीनी भइले।

२६८. गु से गुरुँआई ?

२६९. गृद्ध दृष्टि अपार।

२७०. गेंठी खुले ना बहुरिया दःुबरास।

२७१. गेहँू के साथ घून पिसाला।

२७२. गो के एगो गोड़ टूट्यिे जाई, त ओकर का बिगड़ी!

२७३. गोड़ गरीबनी मगज बिल़ंड। (शरीर में जान नहीं, किन्तु घमण्ड अधिक)

२७४. गोदी के दःहाइल जा, ढ्ीढ़ के ओझाई।

२७५. गोबर जरे, गोइठा हँसे।

२७६. गोबर सूँघला से मुसरी जीओ। (मुसरीउचूहा)

२७७. गोर चमइन गरबे आन्हर।

२७८. गोसेया भुइंया कुकुर पंुजौली। (पुंजौलीउपुआल का ढ्ेर)

२७९. घंट्ी क घनर-घनर अउर नकजपना। ठाकुर जी के अंगुठा दिखा के खा ले मन अपना।

२८०. घट्ले नाती भतार।

२८१. घर के मारल बन में गइली, बन में लागल आग। बन बेचारा का क कि करमें लागल आग ?

२८२. घर छाय दःेखनी घर छुप दःेखनी, घर में तनी आग लगा के दःेखनी।

२८३. घर ना दःुआर बर तर ठाढ़। (बहसपना)

२८४. घर पर छ्पर ना बाहर फुटानी।

२८५. घर फु गंवार लूट्े। (गँवार ऊँ गँवइ, ग्रामीण, व्यंजना में असभ्य, लुहेड़ा, लूचा)

२८६. घर भर दःेवर भतार से ठट््ठा।

२८७. घर में खरची ना, बाहर ढ़कार।

२८८. घर मेह ना, बेटा बाहर क्रिया खास।

२८९. घर-घर दःेखा एके लेखा।

२९०. घर लौका बन लौका लौका के तरकारी, एहिसन घा उतरले लौका गइले ससुरारी।

२९१. घीव के कूंड़े, नाहीं त जव के ठूढ़े।

२९२. घीव दःेत घोर नरिया।

२९३. घीव संवा काम बड़ी ब के नाम।

२९४. घीवो खाइब, त खेंसारी के दःाल में।

२९५. घूघ मोर चुवेला ठेहुनवा, पाद मोर सुनेला पहुनवा।

२९६. घेंाघा के मुँह खुलल।

२९७. घोंघा में बनावेलीन सितुहा में खालीन। (खालीन उ खाती है)

२९८. घोड़ी पड़ी अहिर के पाले, ले दःौड़ायल आले-खाले।

२९९. घोड़े की नालबाजी में गदःहा पैर बढ़ावे।

३००. च मड़वा प बिआह।

३०१. च लिट्ी प भंटा।

३०२. चढ़े के हाथी पर चले के भुइंया-भुइंया।

३०३. चमड़ा के ढ्ेर पर कुत्ता के रखवारी।

३०४. चमार के सरपला से गाय मरी!

३०५. चमार सियार सदःा होसियार।

३०६. चरभर के अंत मिले, मुरघुइंस के ना मिले। (चरभरउ अधिक बोलने वाला, मुरघुइंसउ चुप्पा अन्तर्मुखी)

३०७. चल बगेरी आपन झुण्ड।

३०८. चलनी धूसली सूप के, जिनका अपने सहसर गो छ्ेदः।

३०९. चार बेद चार ओर, ता बीच चतुरी। चार्रू वेद करऽ ता चतुरी की चाकरी। (बिना बुद्धि जरो विद्या)

३१०. चाल चले सिधरी, रो के सिर पर बिसरी।

३११. चालाक पदःनिहार पहिलहीं नाक दःाबे।

३१२. चा र्तृया घर रहे, चा र बिदःेस।

३१३. चिउरा के गवाह दःही।

३१४. चिउरा दःही बारह कोस, लिचुई अठारह कोस। (लिचुईउपूड़ी)

३१५. चित प त हमार, प प त तहार।

३१६. चिरइआ उ बिआ, पंखिया रंगा गइल बा।

३१७. चिरई के जान जाय लइका के खेलवना।

३१८. चींट्ी अपना पावें भारी, हाथी अपना पावें भारी।

३१९. चीना के सपूत भइले मार्हा। (चीना उ एक प्रकार का अन्न, इसके चावल को भूनने पर "मार्हा' बनता है। "मार्हा' दःूध दःही के साथ खाने पर बहुत अच्छा लगता है)

३२०. चेत करऽ बाबा बिलार मा मट्की।

३२१. चेरिया बिअइली मर के, रानी कहली "बेट्ए' ?

३२२. चोर के मुँह चाँद निअर। (निअरउजैसा)

३२३. चोर के हजार बुद्धि।

३२४. चोरवा के मन बसे केंकरी के खेत में।

३२५. चोरी क निहाय के, क सूई के दःान। उ चा बैकुण्ठ के त बुरबक बाड़े राम। (निहायउसोनारी का एक समान जिसपर सोना, चांदी पीटा जाता है)

३२६. छाव क छौंड़ी छाव करे, अंगुरी का के घाव करे। दःवा दःेहला पर छ्पबे ना करे, बिना भतार के रहबे ना करे।

३२७. छ्ीन छ्ोर के खाईं, बापू कहाईं।

३२८. छुछुन्दःर के माथ पर चमेली के तेल। (छुछुन्दःरउ चू की एक प्रजाति)

३२९. छ्ो मुँह बड़ कवर।

३३०. छ्ोलक खट्यिा ढुलकत घोर नारी करकसा विपत के ओर। (घोरउघोड़ा, विपत के ओरउअतिशय विपत्तिदःायक)

३३१. छ्ोलक जात बदःरक घाम, मउगा से पत राखऽ राम। (छ्ोलकट्उ छुद्र,इ शूद्र, पतउइज्जत)

३३२. छ्ो छाती फा लोर के ठेकाने ना।

३३३. छौंड़ी तोर आँगन कतेक !

३३४. जग जगदीश के।

३३५. जजमाने के घी, जजमाने के लकड़ी स्वाहा।

३३६. जथा के ठेकाने ना कुटुम्ब करस धावा। (जथाउपंूजी, थाती)

३३७. जनम के दःुखिया करम के हीन, हाथ में खुरपी मोथा बीन। (मोथाउएक प्रकार का जड़ीयुक्त घास)

३३८. जनमत खइले माता-पिता के, घुसकत आजा-आजी। ममहर में ननिअउरा खइले, कुल में दःागा-बाजी।

३३९. जनाना के खाइल मरद के नहाइल केहू ना दःेखे।

३४०. जब कवर भीतर, तब दःेवता पीतर।

३४१. जब चिन्हबे ना करब त आपन केहिसन !

३४२. जब जेहिसन तब तेहिसन, इ ना बूझे से पंडित केहिसन!

३४३. जब राम तकि सब दःु:ख भगिहें।

३४४. जब ले करेब पूता-पूता, तब ले लगाइब आपन बूता। (बूताउकाबू, ताकत, शक्ति)

३४५. जब साग से ना जुड़इनी, तब साग के पानी से जुड़ाएब!

३४६. जब हाँड़ी पर ढ्कना ना होखे, त बिलाइयो के लाज क के चाहीं।

३४७. जबर मउगी के अबर बोतू। (मउगीउऔरत, बोतूउपति)

३४८. जबरा क जबरई, अबरा क नियाब। (नियाबउन्याय)

३४९. जबरा मारे, रोवे ना दःे।

३५०. जबाब से के जीभ काट्ी?

३५१. जरी जलुहार त पुलंगी भूमिहार। (जलुहारउजोलहा, मुसलमानों के बीच एक छ्ो जाति)

३५२. जव के दिन जइहऽ, सतुआरी के अइहऽ।

३५३. जव के रोट्ी गबर-गबर, सास ले पतोह जबर।

३५४. जवन जानल जाला, तवन बात के सीअल जाला।

३५५. जवना डार पर बइ के ओही के का के।

३५६. जवना पतल में खाए ओही में छ्ेद करे।

३५७. जवान मउगी के कोख भारी।

३५८. जस दःुलहा तस बनी बराती।

३५९. जस बबुआ तस बबुनी नाहीं, जस ढ्ेबुआ तस कुई नाहीं। (ढ्ेबुआउअंग्रेजी शासन में प्रचलित मुद्रा)

३६०. जस-जस धीया बाढ़ेली, तस-तस काँढ़ काढ़े ली। (धीयाउबेट्ी, काँढ़ काढ़नाउचिन्ता बढ़ाना)

३६१. जहाँ गेहुअन के मूड़ी, तहाँ बाबू के सिरहान।

३६२. जहाँ चार कानू, तहाँ बात मानू।

३६३. जहाँ चार गगरी, तहाँ लड़बे करी।

३६४. जहाँ ढ्ेर मउगी, तहाँ मरद उपास।

३६५. जहाँ न पहुँचे रवि, तहाँ पहुँचे कवि।

३६६. जहाँ मीठा होई, उहाँ चिंउट्ी लगबे करी।

३६७. जहाँ मुर्गा ना होई, तहाँ बिहाने ना होई?

३६८. जहाँ लू प तहाँ टू परीं, जहाँ मार प तहाँ भाग परीं।

३६९. जाईं नेपाल, संगही कपार।

३७०. जाइज पर रहेब त करऽबऽ का?

३७१. जागऽ किसान, भइल बिहान, फौड़ा उठावऽ चलऽ खेते।

३७२. जागल भाग पड़ले पाले, धइले पोंछ् पट्कले खाले।

३७३. जातो गंवइली, भातो ना मिलल।

३७४. जा जोगी मठ के उजाड़।

३७५. जानीं से सानीं।

३७६. जाने ले चीलम, जिनका पर चढ्ेला अंगारी।

३७७. जिअला में बोरा ना, मरला पर दःोलाई। (दःोलाईउरजाई)

३७८. जिन पुत जनमले ना होइहें, उ अबट्ले का होइहें। (अबट्ले उ उबट्न लगाने से।)

३७९. जिन ब अपने छ्निार, लगवली कुल परिवार।

३८०. जीअता पर छूँ भात, मरला पर दःूध भात।

३८१. जीतला के अगाड़ी, हारला के पछाड़ी।

३८२. जुरता पर कुरता।

३८३. जु साग ना सोहरत जाय।

३८४. जे खाय गाय के गोस, उ कइसे हिनू के दःोस! (दःोसउदःोस्त)

३८५. जे जनमते ना उजिआइल, उ आगे का उजिआई?

३८६. जे ना पढ़ी फकरा, उ का पढ़ी पतरा! (फकराउझूठ-साँच, पाखण्ड)

३८७. जे ना पू से का बाबा। (जे ना पूछ्ेउजिसको कोई न पूछ्े)

३८८. जे पंच, सेही चट्नी।

३८९. जे पांड़े के पतरा में, से पंडिताइन के अंचरा में।

३९०. जे फूल होखे से महादःेव जी पर।

३९१. जे बनावे जाने, उ खाए भी जाने।

३९२. जे बाड़े से गु बाबा।

३९३. जे रोगिया के भावे से बैदःा फुरमावे।

३९४. जेकर धन जाले ओकर धरम जाले।

३९५. जेकर पिया माने, से सोहागिन।

३९६. जेकर बनरी से ही नचावे, दःोसर नचावे त का धावे।

३९७. जेकर माई पूड़ी पकावे, सेकर बेटा छ्छ्ने। (छ्छ्नेउतरसे)

३९८. जेकर मुँख बदःन न पाईं, ओकरा आंगन का क जाईं ?

३९९. जेकर रोट्ी उ बन-बन फिरे, फकीरवा ठोक-ठोक खाय।

४००. जेकरा घूरा बइ के ओक आंड़ दःागे के?

४०१. जेकरा घेघ ओकरा उदःबेगे ना, दःेखवैया का उदःबेग? (उदःबेगउ उद्विेग्नता, बेचैनी)

४०२. जेकरा छाती में बार ना ओकर एतबार ना।

४०३. जेकरा पर चूई, से छायी।

४०४. जेकरा पास माल बा, ओकर गोट्ी लाल बा।

४०५. जेक माई मरे, ओक पतल में भात ना।

४०६. जेतना के मुन्ना ना ओतना के झुनझुना।

४०७. जेतना घट्वा गरजे ओतना बरसे ना।

४०८. जेतना मुअड़ी मारीं ओतना हगाईं।

४०९. जेतने घी ओतने चीकन।

४१०. जेहिसन कोंहड़ा छान्ही पर, ओहिसन कोंहड़ा भूइयाँ।

४११. जेहिसन जात ओहिसन भात।

४१२. जेहिसन दःाल-भात, ओहिसन फतेहा।

४१३. जेहिसन दःेव ओहिसन पूजा।

४१४. जेहिसन दःेवर ओहिसन भउजाई।

४१५. जेहिसन नेत ओहिसन बरक्कत।

४१६. जेहिसन रहर ओहिसन बीआ, जेहिसन माई ओहिसन धीया।

४१७. जेहिसन राजा ओहिसन परजा।

४१८. जेहिसन हीरा के चोर ओहिसन खीरा के चोर।

४१९. जैसी ब बयार पीठ तब तैसी दीजै।

४२०. जोलहा के बेगार पैठान। (बेगारउट्हलुआ, आदःेशपाल, बेकार)

४२१. झोरी में फुट्हा ना सराय में डेरा। (फुट्हाउभूजा, दःाना)

४२२. ट्का ट्काई नौ ट्का बिदःाई।

४२३. ट्का पास में जो साथ में।

४२४. ट्ट्हरी के छ्पला से बादःर छ्पाई?

४२५. टूट्लो तेली त नौ अधेली। (अधेलीउपैसा, आधा पैसा या आध आना)

४२६. ठाँव गुन का कुठाँव गुन कारिख।

४२७. डाँड़ डूबल जाव, ठेहुना के पते ना।

४२८. डिबनी कतके दःूर, अब निअराइल बा।

४२९. ढ्ँू कुकुर गोसेंया के हानि। (गोसेंयाउगोसाईं, घर का मालिक)

४३०. ढाल छुरा तर्रूआ गइल कुँअर के साथ, ढ्ोल मजीरा खंजड़ी, रहल उजैनी हाथ। (एक प्रकार का वाद्य यंत्र)

४३१. ढुलमुल बें कुदःारी के, हँस के बोले नारी से।

४३२. ढ्ेलाह खेत, पेटाह बेटा बाद में बुझाला।

४३३. तर धइली छ्तिनी ऊँपर धइली साग, पिअवा कहलस पदःनी, त लौट्ल भाग। (छ्तिनीउबांस से बना छ्तिनार बर्तन)

४३४. तर धरती ना ऊँपर बंजर।

४३५. तसलिया तोर कि मोर!

४३६. तहरा किहाँ जाएब त का खिअइबऽ, हमरा किहाँ अइबऽ त का लेके अइबऽ?

४३७. ताकते बानी, लउकत नाहीं।

४३८. ताग पा के जूरा, चिरकु के फुरहुरा। (जूराउजूड़ा, फुरहुराउपहनी ई साड़ी का निचला, पैर के पास झूलने वाला हिस्सा)

४३९. ताग पा ढ्ोलना, कु नहीं बोलना।

४४०. ताड़ी के चिखना, बाप के कमाई, जोगाऽ के खाईं।

४४१. तीन कायथ कहवाँ, बिपत प तहँवा।

४४२. तीन जात अलगरजी, बढ़ई, लोहार, दःरजी।

४४३. तीन जात घचान्हर, ऊँट्, बिद्यार्थी, बानर।

४४४. तीन जात हड़बोंग, राजपूत, अहीर, डोंब।

४४५. तीन ट्कि महा बिकट्।

४४६. तीन दिन रहई, त पियाजी से कहई।

४४७. तीन परानी पदःमा रानी। (छ्ोटा परिवार सुखी परिवार)

४४८. तीन परानी पोखरा रानी।

४४९. तीन मन में तिनमनिया, सेर भर में उतनिया।

४५०. तीन में कि तेरह में, कि सुतरी के गिरह में!

४५१. तीन विप्र कहँवा, ब प तहँवा।

४५२. तीस में ट्ीस, चालिस में नखालिस।

४५३. तू गंगा पार हम जमुना पार।

४५४. तू धनैतिन धने आगर, हम तरवा के धू आगर।

४५५. ते गोतिन गगरी, हम ते बरोबरी।

४५६. तेतर बेट्ी राज लगावे।

४५७. तेलिया हा बार-बार, दइबा हा एक बार।

४५८. तोर नउजी बिकाय, मोर घेलुआ दःे। (नउजीउचा न, घेलुआउफोक का सामान)

४५९. तोरा त पेट्वे ना त लोट्वे।

४६०. थान हार जइहें, बाकिर गज ना हरिहें।

४६१. दःमड़ी की हाड़ी गई, कुत्ते की जात पहचानी गई।

४६२. दःरबे से सरबे, चहबे से करबे।

४६३. दःवा भीतर दःम बाहर।

४६४. दःही के गवाह चिनी।

४६५. दःही के रखवार बिलार।

४६६. दःही तब सही।

४६७. दःाँत के ठेकाने ना, रहरी के भसक्का।

४६८. दःाजे गइल खेती, रिसे गइली बेट्ी। (दःाजेउदःूस के भरोसे)

४६९. दःादःा काट्ेले घास, मोरा हँसी आवेला।

४७०. दःादःा के भरोसे अदःौरी भात।

४७१. दःादःा दी हँसुआ, त घास का जाएब।

४७२. दःादःा मरि त पोता राज करिहें।

४७३. दःानी दःान क भंडरी के पे फूले।

४७४. दःानी ले सोम्ह भला, जे ठावें दःेत जवाब।

४७५. दःा उनकर छाती फाट्े, लोर के ठेकाने ना।

४७६. दिआरा के बंस, कभी राजा कभी रंक।

४७७. दिन जाला गुन भारी होला।

४७८. दिन भर चले अढाई कोस।

४७९. दिन भर मांगे त सवे सेर।

४८०. दिल लगे दिवार से तो परी क्या करे।

४८१. दःुधार गाय के गो लातो सहल जाला।

४८२. दःुनिया दःुरंगी मुवल्लिक सराय, कहीं खूब-खूबी, कहीं हाय-हाय।

४८३. घर भोज भइल, कुतवा के मन हुलबुलिये में।

४८४. मने दःूमनिया, तीन मने उतनिया, ना र त पे कुनिया।

४८५. दःूध-पूत छ्पिवले।

४८६. दःूनो हाथ से ताली बाजे ला।

४८७. दःेख पड़ोसी झल्ल मारे।

४८८. दःेखत माया परखते छ्ोह, जब दःेखीं त लागे मोह।

४८९. दःेखनी में से चिखनी में।

४९०. दःेखनीहार के धरनीहार लागे।

४९१. दःेखल कनिया दःेखल वर, कोठी तर बिछ्ौना कर।

४९२. दःेखले छ्उँड़ी समधी।

४९३. दःेखहीं के बाड़े पिया, चिखहीं के नाहीं, सूरत बा कवनो लजत नाहीं।

४९४. दःेखा-दःेखी पाप, दःेखा-दःेखी धरम।

४९५. दःेवकुरी गइले दःूना दःुख।

४९६. दःेह घुसके ना गेहँू बन चाहीं (बनउ बनिहारी, मजदःूरी)

४९७. दःेह डोरा, पे बोरा।

४९८. दःेह में दःम ना बजार में धक्का।

४९९. दःेहात में गाही, बाजार में नौ गाही।

५००. धन के बढ़ल अच्छा, मन के बढ़ल ना अच्छा।

५०१. धन मधे कठवत, सिंगार मधे लहँगा।

५०२. धनिके के पहुना के दःाल भात बारा, गरीबे के पहुना के मकई के दःारा।

५०३. धान के दःेस पुअ से बुझाला।

५०४. धीया ना पूता, मुँह चा कुत्ता।

५०५. "न' से " '।

५०६. नइहर जो, ससुरा जो, जांगर चला बेट्ी कतहूँ खो।

५०७. नइहर रहले ना जाय, ससुरा सहले ना जाय।

५०८. नइहर से आइल लुगरी, चढ़ गइल गुलरी। (गुलरीउगुलर के पेड़)

५०९. नकली नारी बिपत के ओर।

५१०. ननद के भी ननद होले।

५११. नया धोबिनिया लुगरी में साबुन।

५१२. नया मियाँ, जिया पिआज खाले।

५१३. नया लूगा तीन दिन, लुगरी बरीस दिन। (लूगाउसाड़ी, लूगरीउपुरान साड़ी, पहना हुआ)

५१४. नया-नया राज भइल, गगरी अनाज भइल।

५१५. नरको में ठेला-ठेली।

५१६. नव जानेली छ्व ना जानेली।

५१७. ना अकरब मुये, ना छुतिहर फूट्े। (अकरबउअभक्ष्य भोजन करने और गंदःा रहने वाला, छुतिहरउ मिट््ट्ी का वह पात्र, जिसमें जूठा अन्न रखा जाता है, अथवा जिससे पशु के खाने वाले नाद का पानी साफ किया जाता है।)

५१८. ना उ दःेवी बाड़ी, ना उ कराह बा।

५१९. ना के में दःोष बा, ना के नीमन बा।

५२०. ना चलनी के पानी आई, ना परउस के बरहा बराई। (परउसउएक प्रकार की डाभी घास)

५२१. ना धोबिया के दःोसर खाहिन, ना गदःहवा के दःोसर मउआर।

५२२. ना हिनुए में ना तुरुके में।

५२३. नाग मरलन डोंड़ ट्ीका भइल। (मालिक के स्थाान पर गदःहा)

५२४. नाचे कू तू तान सेकर दःुनिया राखे मान।

५२५. नाचे से कब ले बांचे!

५२६. नाधा त आधा, आधा त साधा।