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वाराणसी वैभव |
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भोजपुरी लोक साहित्य एवं संस्कृति |
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पहेलियाँ भोजपुरी में पहेली के लिए "बुझौवल' शब्द अत्यधिक प्रचलित है। बुझौवल लोकोक्ति का ही एक उपांग है और लोकमानस मनोरंजन का एक प्रमुख साधन है। पहेलियाँ गहन अनुभव व सूक्ष्म पकड़ शक्ति का परिचायक होती हैं। प्रायः तीक्ष्ण व प्रत्युत्पन्नमति संपन्न व्यक्ति ही पहेलियाँ, चुट्कुले या कहावतें उत्पन्न करते हैं। चलते-फिरते, काम-करते, किसी भी स्थिति में उर्वर मस्तिष्क वाले अनुभवी व्यक्ति एक से बढ़कर एक चूभती ई, सारगर्भित लोकोक्ति बना दःेने का कौशल दिखा सकते हैं। कोई आवश्यक नहीं कि पढ़े-लिखे लोग ही पहेलियाँ बना सकें, गाँव के निरक्षर भट््टाचार्यों में भी ऐसे-ऐसे स्री-पुरुँष मिल जाते जो घर-गृहस्थी का काम करते हुए अवकाश के क्षण जब अपने संगी-साथियों के बीच बैठते हैं, तब तत्क्षण स्वनिर्मित या प्रचलित पहेलियों का सिलसिला शु कर मनोरंजन, हास्य-विलास एवं माथा पच्ची का समा बांध दःेते हैं। इनकी पहेलियों के विषय आस-पास में रेंगती एक चींट्ी से लेकर ऐतिहासिक-पौराणिक कथाओं के अंशों तक और मनोरंजन मात्र से लेकर गूढ़ रहस्यात्मक बातों तक विस्तार पा सकते हैं। जब मन उल्लसित रहता है, तभी पहेलियों का दःौर चलता है। पहेली का अर्थ ही है "रहस्यात्मक गुत्थी'। विज्ञान द्वेारा इस विरा प्रकृति के अनेक रहस्यमय तथ्यों की खोज कर लिये जाने के बावजूद आज भी हमारी जिज्ञासाओं के लिए प्रचूर सामग्रियाँ हमा चारों तरफ बिखरी पड़ी हैं। वैदिक ॠषियों का इस रहस्यमय प्रकृति के प्रति जिज्ञासा और कौतूहल, फिर दःार्शनिकों द्वेारा उस रहस्य की व्याख्या एवं बौद्धिक जिज्ञासा का समाधान, पहेलियों का आदि उपजीव्य रहा है। डॉ. राम स्वर्रूप श्रीवास्तव स्नेही जी बताते कि ""वैदिक युग में अश्वमेध यज्ञ में अ का बलिदःान करने से पूर्व होता और ब्राह्मण में ब्रह्मदःेय (प्रहेलिका) का पूछ्ना अनिवार्य होता था।''(बुन्दःेली लोक साहित्य, पृ. ३५२)। प्राचीन काल में शास्रार्थ की परम्परा से बुद्धि परीक्षण की भावना पहेलियों में मिलती है, स्वयंवरों में भी कठिन से कठिन पहेलियाँ बुझाने के लिए रखी जाती थीं, जो आज भी शादी-विवाह के अवसर पर लोक में प्रचलित हैं। बताया जाता है कि महाकवि कालिदःास का सम्मान पहेलियों का उत्तर दःेने से ही बढा था; अकबर-बीरबल के लतीफे, चुट्कुले और पहेलियाँ आज भी लोकजीवन में प्रसिद्ध हैं। मध्यकाल में अमीर खुसरों पहेलियों के लिए काफी ख्यातिलब्ध थे। उनके द्वेारा रचित अनेक गूढ़ प्रश्नों व पहेलियों का डॉ. ग्रियर्सन ने संग्रह किया था। लखन के तोपखाने में "पहेली खुसरो' शीर्षक हस्तलिखित प्रति, जिसमें लगभग दःो सौ पहेलियाँ हैं, पायी गई हैं। (हिन्ई साहित्य का इतिहास- लक्ष्मी सागर वर्ष्णेय, पृ. ४७)। खुसरो और भारतेन्दःु की मुकरियों में भी पहेली के लक्षण दःेखे जा सकते हैं, जैसे खुसरों की एक मुकरी - सिगरी रैन मो संग जागा। भोर भया तब विछुरन लागा। बाके बिछुरत फा हिया। ए सखि साजन? ना सखि दिया।। अगर उपर्युक्त वार्ता से ""ना सखि दिया'' का लोप कर दिया जाय, तो शेष अंश एक पहेली का ही र्रूप ले लेता है, जिसका उत्तर दःूसरी सखी स्पष्ट करती है। इसी तरह भारतेन् की एक मुकरी लें- सब गुरुँजन को बुरो बतावै, अपनी खिचड़ी अलग पकावै। भीतर तत्त्व न झूठो तेजी, ए सिख सज्जन? नहि अंगरेजी।। हमा इस संकलन में भी इस तरह की मुकरी पद्धति की पहेलियाँ आई हैं। जैसे - सात चलन्तर सत्तर गोड़ गंगा जमुना धइली भोर। हम त पूछ्ीं, ए सखि सैना, इकइस सीस वेआलिस मैना।। इस तरह हम दःेखते कि लोक में प्रचलित पहेलियाँ बहुत प्राचीन काल से ही हमा बीच गंगा की एक धारा की भाँति बहती चली आ रही हैं। इसमें बीच-बीच में कई अन्य नदी-नालों के जल की भाँति प्रबुद्ध वर्ग द्वेारा निर्मित पहेलियाँ जुड़ती गई हैं। हमा बीच आज जो भी पहेलियाँ उपलब्ध हैं, उनमें अधिकांश विभिन्न काल के लोक भाषा कवियों एवं रचनाकारों द्वेारा दी ई हैं। उच्चारण में किेंचित परिवर्तत के बावजूदः इनके अर्थगौरव एवं उपयोगिता की दृष्टि से आज भी कम महत्व नहीं। मध्यकालीन कवि मलिक मुहम्मद जायसी कृत "मसलानामा' की सारी लोकोक्तियाँ लोक जीवन से संग्रहित और आज भी हमा बीच प्रसिद्ध हैं। पं. रामनरेश त्रिपाठी ने पहेलियों के विषय में लिखा है कि - ""गाँव वालों को न सूर मिले न तुलसी, न कबीर न केशव, उन्होंने युगों से चली आती ई ज्ञान की इस घुमावदःार सलोनी नदी को अभी तक सुखने नहीं दिया। ॠग्वेद का यह दःेवता दःेहाती र्रूप में आज भी हमा सामने है। सभ्य और शिक्षित समाज के लिए ग्रामीणों के पास यह अनमोल निधि संचित है।'' (बुन्दःेली लोक साहित्य, पृ. ३८)। पहेलियाँ बुझाने से सिर्फ मनोरंजन ही नहीं होता, बल्कि उससे सामान्य ज्ञान एवं सांसारिक अनुभवों का प्रत्यक्षीकरण भी होता है। सांसारिक जीवन के अनुभवों से गृहीत जट्लि समस्याओं का समाधान पाने हेतु अट्पट्ी एवं चतुराईपूर्ण युक्तियों की विशिष्ट शैली बड़ी आकर्षक होती है। प्रश्नकर्त्ता पहेली को बड़े विचित्र ढ्ंग से प्रस्तुत कर उत्तर दःेने वाले को दिमागी कसरत के लिए विवश कर दःेता है। उत्तर दःेने वाले व्यक्ति को उलाहना भी सहनी पड़ती है, कभी-कभी तो गंभीर चुनौती का सामना भी करना पड़ जाता है। जैसे - ""आठ काठ नौ जोड़ा, जे बुझउअल ना बूझी ओकर बाप घोड़ा।'' आजकल सम्पन्न घराने के पढ़ने-लिखने वाले बच्चों में भी पहेलियाँ बुझाने का प्रचलन है। रेडियो, ट्ी.वी. या अखबार से बच्चों के पहेली कार्यक्रम अक्सर आते रहते हैं। अखबारों में चित्र पहेलियाँ मनोवैज्ञानिक बुद्धि परीक्षण के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। प्रतियोगिता परीक्षाओं में शब्दःचित्र पहेलियाँ दःेकर प्रतियोगियों के मानसिक स्तर का पता लागया जाता है। अतः यह कहा जाय कि ग्राम्य जगत की अपेक्षा नगरीय जीवन में पहेलियों का अधिक प्रचलन होते जा रहा है, तो गलत न होगा। लेकिन ग्राम्य पहेली और प्रतियोगी परीक्षा पहेली अथवा अखबारी पहेली में काफी अन्तर है। एक में जहाँ लोकजीवन की झाँकी मिलती है, वहीं दःूस से सिर्फ बौद्धिक परीक्षण होता है। ग्राम्य पहेलियों में भी कम मानसिक परिश्रम नहीं करना पड़ता। निश्चय ही ग्राम्य पहेलियों का लोक जीवन के रीति-रिवाज, बोल-चाल, रहन-सहन, आस्था-विश्वास एवं परंपरागत कथा प्रसंगों, घट्नाओं, खेती-बारी, घर-गृहस्थी आदि को जानने के ख्याल से अधिक महत्व है। उनमें लोक भाषा के माध्यम से सदियों के जीवन अनुभव संचित हैं। वस्तुतः ये पहेलियाँ हमा पूर्वजों के अनुभव ही हैं, जो हमें विरासत र्रूप में प्राप्त हैं। इन पहेलियों को सजोंकर रखने का काम लोक साहित्य के विद्वेानों ने किया है पर जहाँ से इनका संग्रह किया गया है, वहीं अब इसके प्रति काफी उदःासीनता दिखाई पड़ रही है। दःु:ख है कि लोक जिह्मवा पर नाचने वालीं ये पहेलियाँ अब पुस्तकालयों के दःराज में दीमनों के स्वाद की वस्तु बनती जा रही हैं। प्रस्तुत संकलन में पहेली के अन्य र्रूप "दृष्टिकूट्', "मुकरी' एवं "बुझौवल' के भी कु पद संकलित किये गये हैंं। पहेली के कू पदःों को दृष्टिकू कहा जाता है। यह कथन की एक गूढ़ार्थ शैली है। इसमें श्लेष, यमक आदि अलंकारों के माध्यम से मन्तव्य को गूढ़ बनाये रखने और उत्तरदःाता की बौद्धिक क्षमता का परीक्षण लेने का प्रयत्न किया जाता है। दृष्टिकू को समझने के लिए काव्यशास्र, पौराणिक कथानकों, कवि-समय आदि का सामान्य ज्ञान आवश्यक है। संस्कृत वाङ््मय के बादः आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक के हिन्दी काव्यकारों की कृतियों में भी दृष्टिकू के अनेक पद मिलते हैं। ये पदः विनय, वात्सल्य, ाृंगार, नायिका-भेद आदि तमाम विषयों में परिव्याप्त हैं। वह दःुर्बोध उक्ति, जिसका अर्थ जल्दी प्रक न हो और जिससे बौद्धिक दृष्टि भ्रमित होने लगे, दृष्टिकू है। पहेली का ही एक दःूसरा र्रूप है "मुकरी'। इसमें अप्रस्तुत के विदःग्ध प्रयोग से प्रस्तुत अर्थ को स्थापित किया जाता है। इसमें प्रयोक्ता विषय के प्रति मुकरते हुए अपना मन्तव्य प्रक करता है और उसके मुकरने के तत्काल बादः प्रधान अर्थ या लक्ष्य को भी स्वीकृति मिल जाती है। "बुझौवल', पहेली के इस अंग में "बूझै' आदि क्रियापदःों की प्रधानता रहती है। वण्र्य सांकेतिक भाषा में निहित रहता है। इस पहेली को बुझाने में भी काफी बुद्धि कौशल की अपेक्षा रहती है। प्रस्तुतकर्त्ता के प्रयासों से संकलित पहेलियाँ नीचे दी जा रही हैं, इनमें दृष्टिकूट्, बुझौवल और मुकरी के नमूने भी सम्मिलित - १. त्रिशूल चक्रे न हरो न विष्णु, महाबलिष्ठो न च भीमसेनः। स्वच्छ्न्दःचारी नृपति न जोगी, कान्तावियोगी न च रामचन्द्र:।। (उत्तर : "साँढ़', जिसके कुल्हे पर त्रिशुल-चक्र का चिह्म दःागा जाता है, बलिष्ट तो होता ही है, "गौ' वियोगी तथा स्वतंत्र भ्रमणशील भी होता है)। २. तुला तुला समतूल है, तापर मेख प्रचण्ड। करजोरि सिंहनी अरज करे, कुम्ह छाड़ि केंत।। (तुला राशि के "राम' एवं "रावण', मेष राशि के "लक्ष्मण', सिंह राशि की "मंदःोदःरी', कुम्ह राशि की "सीता'। राम-रावण शक्ति में समान हैं, किन्तु लक्ष्मण के साथ में होने से राम की शक्ति बढ़ जाती है। मंदःोदःरी अपने केंत रावण से विनती कर रही है कि वह सीता को छ्ोड़ दःे)। ३. मीन राशि का मीन बिछ्ौना, वृष बिनु रहा न जाय। तुला दःेख हरखित भये, कन्या दःेख लजाय।। (मीन राशि का "दीपक'; मीन राशि का बिछ्ौना - दीपक रखने का स्थान "दिअरखा', तुला राशि का "तेल', वृष राशि की "बत्ती', कन्या राशि का "पवन')। ४. जामुन अंत न पावहिं, ता संग मचाई रार। ह र न झर गये, तापर लाई नारि।। (जामुनउजिसका अ मुनि; हरे ऊँश्लेषार्थ - हरकर और हरा; मंदःोदःरी-रावण संवादः; जिसका मुनि लोग अन्त नहीं पाते, उसकी औरत को आप हर कर लाये हैं; जिस प्रकार वृक्ष के पत्ते सदःा ह नहीं रहते, झरते भी हैं, उसी प्रकार आप भी झर जायेंगे, नष्ट हो जायेंगे।) ५. अबर पहर्रू जबर चोर, ओ पह के हाथ ना गोर। घर में चोर समइबो ना कइल, सगरी धन राजा के गइल।। (प्रसंग-"सीता-हरण', पहर्रूउ पहरेदःार, अबर पहर्रूउ सीता द्वेारा खींची गई रेखा; जबर चोरउ रावण; चूँकि वह मायावी था, इसलिए उसको हाथ-पैर नहीं था।) ६. कवना मुँह में डाली क्षीर, कवना मुँह में डाली क्षीर। सो ब्राह्मन म जाय, सो ब्राह्मन म जाय। अब का करबो राम, अब का करबो राम। ऐसा कहीं न दःेखा, ऐसा कहीं न दःेखा। (प्रसंग- राजा भोज के दःरबार में एक सुग्गे का पाठ)
- रावण की माता उलझन में कि रावण के किस-किस मुख में दःूध पिलावें, क्योंकि उसके दःस मुख हैं। - ब्राह्मण हीना, वेद विहीना, कलवा घर खाय, सो ब्राह्मण म जाय। - नव बरिस के मनवा, नब्बे से क विआह। उनकर तिरिया झउँखऽ तारी अबका करबो राम।। (झउँखल उ उहापोह की स्थिति) - दःुनिया पकहर (पवित्र) कहीं न दःेखा। ७. मीन के पे से जन्म भयो, कहलावहुँ मैं केव के सुता, मुनि पार उतारन को मैं गयो, मुनिभोग कियो तजि के ममता, सखी! दःु:ख कैसे कहँू, यह केंत के केंत पिता के पिता। (मछ्ली के पे से मंदःोदःरी का जन्म, वाल्यावस्था में जब वह घा पर थी, दःुर्वासा ॠषि को कामदःेव ने व्यग्र किया, तब मंदःोदःरी ने उक्त जवाब दिया; लज्जा निवारणार्थ कुहासा फैलाकर दःुर्वासा ॠषि ने उसके साथ संभोग किया।) ८. तीन नैन ख चरन, दःो मुख जीभा एक। ता दःेख तिवई डरे, पंडित करत विवेक।। ("शुक्र पर सवार बेंग', तिवईउस्री; बेंग की सवारीउशुक्र; बेंग के चार पैर दःो आँख; शुक्र के एक आँख, दःो पैर; बेंग को जिह्मवा नहीं होती, शुक्र की एक जिह्मवा।) ९. चार चरण नख छानबे, नैन बेआलिस जोय। सो आया रणभूमि में कौन जानवर होय।। ब्रह्मण का "यज्ञोपवीत', चार अंगुल छानबे चहुआ से निर्मित।)
१०. तीस चरण म चलत नहीं, स्त्रवन नैन छ्त्तीस। चार भुजा वृखमान के, नौ मुख दःेत असीस।। ("सूर्य का रथ'; सूर्य के सारथी "कार्तिक', उनको पैर नहीं होता, सूर्य-रथ के सात घोड़े के चौदःह कान एवं चौदःह आँख; सूर्य के दःो पैर, घोड़ों के अट््ठाइस पैर, सूर्य एवं कार्तिक के दःो-दःो आँख कान।) ११. पाँच जन जाने संसार, एकइस ऊँपर माथ हजार। तुलसीदःास क मृदःुबैन, तीन हजार बेआलिस नैन।। उत्तर - एक सुरपति एक दःनुजपति, तीजै सेस महान। चतुरानन और खड़बदःन, ए पाँच जिअ जान।।
सुरपति = इन्द्र, इन्द्र के १००० नेत्र + २ नेत्र + १ सिरदःनुजपति = रावण, रावण के २० नेत्र + १० सिर सेस = शेषनाग, शेषनाग के २००० नेत्र + १००० फण चतुरानन = ब्रह्मा, ब्रह्मा के ८ नेत्र + ४ सिर खड़बदःन = कार्तिकेय, कार्तिकेय के १२ नेत्र + ६ सिर
कुल ३०४२ नेत्र और २१ सिर (माथा)। १२. इ पग चले, चार लट्काए,
तीन मुण्ड दःो नैन। १३. दःसरथ ससुर राम मो सारा, हमही पिता प्रभु पुत्र हमारा। (दःशरथ - सौ सुर (दःेवताओं) के मालिक राम - पू संसार के मालिक।)
१४. सारंग नैनी सारंग बैनी सारंग चली सारंगपुर। हर हार अहार से भें भई, पुचकारत सारंग-सारंग।। (सारंगउ मृग, कोकिला, युवती, दीपक; हरउमहादःेव; हारउसपं; एक मृगनैनी, कोकिला बैनी युवती दीपक लेकर जा रही थी, एक सपं दिखाई पड़ा, इसी बीज दीपक बुझना चाहता है, वह दीपक को पुचकारती है, अर्थात् बुझने से बचाने का उपक्रम करती है।)
१५. चौसठ से चार मिले, बीस र करजोर। संत से संत मिले, बिहँसे सात करोड़।। (दःो स्नेही व्यक्ति मिलते हैं; उनके ३२अ३२ दःाँत प्रसन्नता से चमक उठते हैं; उनके हाथ १०अ१० की बीस अंगुलियाँ मिलती हैं, अर्थात् वे परस्पर प्रणाम की मुद्रा अपनाते हैं, उनके दःो-दःो आँख मिलते हैं, और दःाँत चमक उठता है, फिर इस संत (सज्जन) मिलन का आनन्द अवर्णनीय होता है, रोम-रोम पुलकित हो उठते हैं।
१६. चकती सो वर्रून पर, बगहा पर असवार। पलस सहित दःेवीगंग कहे, सोये राजकुमार।। (चकती उ चक्रसुदःर्शन)
१७. बारि बरोबर बा है, तापर बहत बेआर। रघुवर पार उतारिहो, अपनी ओर निहार।। (बारिउकिनारा, नदी का अरार; बारिउपानी; नदी में पानी पूरा भरा है, बयार बह रहा है, अब (नौका से) पार होना भगवान के भरोसे है।)
१८. हरि बोले ह ही सुने, ह गये ह के पास। ह दःेखत ह ह मिले, तब ह भयउ उदःास।।(हरिउमेढ्क, हरिउसपं; हरिउजल)
१९. ह हरि कहत सकल जग तरे, ह से भें दइब जनि करे। ए ह के लमहर पेट्, करम ज त होखे भेंट्।। (हरिउईश्वर; हरिउसपं; बेंग की उक्ति।)
२०. एक बीर उ रिसियाई दिन भर चले अंगुल भर जाई। अस्सी कोस गंगा के तीर, क दिन में पहँुचल वीर।।
उत्तर- चौबीस पर छ्ब्बीस धरो, ओ पर चार सुजान, चार शुन्य आगे धरो, यही होत प्रमान। २४२६०००००००० दिन।
२१. अस्सी मन के चकरी, ओ पर बइ मकरी। रत्ती रत्ती खाय त क दिन में सपरी।
उत्तर-एकतीस एकतीस एकतीसा, तापर सात सुजान। सात शुन्य जब दःोहिने, इ रत्ती प्रमान। ३१३१३१०००००००००००००० रत्ती, दिन
२२. एक परवल में नौ मन बीआ, नौ सौ बरीस परोरा जीआ। नौ सौ परवल टू रोज, पंडित करो बीआ की खोज।।
उत्तर- चौबीस पर छ्ब्बीस धरो, तापर चार सुजान, सात शुन्य आगे धरो, यही होत प्रमान। २४२४००००००००००० बीआ।
२३. एक बीता लकड़ी बढ़ई के पास, चरखा गर्हले तीन सौ साठ, बारह हेंगा, चौबीस जाठ।
उत्तर- १ वर्ष, ३६० दिन, १२ महिना, २४ पक्ष।
२४. अजब में गजब भइल, बात भइल दःूना। बे बाप के लइका भइल, महतारी के सूना।। बाते बाते बढ़ गइल, बिना बाप के लइका भइल। उहो भइल कहवाँ, ओकर माई ना रहे तहँवा।। (कुश का जन्म)
२५. को नहीं तिरिया कर सके, को नहीं सिन्धु समाय, को नहीं पावक जल सके, किसको काल नहीं खाय?
उत्तर - पुत्र तिरिया नहीं कर से, मन नहीं सिन्धु समाय। धरम न पावक जल सके, नाम को काल नहीं खाय।।
२६. कवन सरोवर बिना बान के, कवन पेड़ बिनु डाल, कवन पखे पंख बिना, कवन मउअत के खाय?
उत्तर - नयन सरोवर बिना बान के, धरम पेड़ बिनु डाल, मनुष पखे पंख बिना, निन्द मउअत के काल।
२७. कवन तपेसवी तप करे, के नित उठ नहाय, के रस के उगले, के रस के खाय?
उत्तर - सुरुँज तपेसवी तप करे, ब्रह्मानित उठ नहाय, इन्द्र रस को ऊँगले, धरती रस को खाय।
२८. केहि कारन धमधूसर मोटा?
उत्तर - करे ना खेती, प ना फेंदः, पर-तिरिया से क ना संग, जुवाबाज ना खेले ढ्ोटा, ए कारन धमधूसर मोटा। (ढ्ोटाउ बालक)
२९. श्याम वरन मुख चंदःन कैसो, रावन सीस मदःोदःर जैसो। हनुमान के बाप से लेहू, राम के बाप से दःेहू। (रावन का दःस सिरअमदःोदःर का एक सिरउ११; प्रसंग-कोई व्यक्ति किसी दःुकान पर उड़दः खरीदःने गया, दःुकानदःार ने एक रुँपया में ग्यारह सेर दःेने को कहा, ग्राहक ने कहा कि तब फट्क कर लेंगे; दःुकानदःार ने कहा कि तब दःस सेर दःेंगे। राम के बापउदःशरथ, अर्थात् दःस सेर)। ३०. पान कसैली चूना-पान, दःू
व्यक्ति के बाइस कान। ३१. एगो आम गिरल, दःेखले आदःमी दःेखल से धइबे ना कइल, धावल से पइबे ना कइल, पावल से खइबे ना कइल, खाइल सेकरा सवा ना मिलल, सवादः मिलल दःोसरा का। (दःो आदःमी उ आँख, धावलउपैर, पावलउहाथ, खाइलउमुँह।)
३२. भाग भाग बिना सिर वाला, ठेहुना पर नाक वाला आवऽता। का कहऽ ता बिना गा़ेड? बिना मुँह वाला कहऽता। (सपं-केंकड़ा की वार्ता; बिना सिर वाला उ केंकड़ा बिना गोड़ वालाउसपं, बिना मँुह के उ घंटा ठेहुना पर नाक वाला उ हाथी।)
३३. हे बुरी कुजात, कुकाठ पर बइठ के, कुजन से कुअन खिआवऽ तारे? (कुजातउधोबी, कुअन्नउकोदःो, कुकाठउ पट्हा, कुजनउगहदःा। कोई व्यक्ति किसी धोबी से वार्तालाप कर रहा है।)
३४. एगो रहले मान उनका साँस न प्रान, छ्ह गो मुँह रहे, बारह गो कान। (मानउहेंगा; चार बैलअदःो आदःमी का मुँहउ६ इन छ्: प्राणियों के दःो-दःो कानउ१२)
३५. सात चलन्तर सत्तर गोड़, गंगा-जमुना धइली भोर। हम त पँूछ्ी ए सखी सैना, एकइस सीस बेआलिस नैना।। (गंगा-जमुनाउ भूख प्यास; धइली भोरउ भूल गया, सात चलन्तरउसात हलवाह, उनके १४ पैर; सात जोड़ी बैल के ५६ पैर, कुल ७० पैर, २१ सिर और ४२ नैन।
३६. बाप के नाम से पूत के नाम, नात के नाम कु और। इ बुझौवल बूझ के साईं उठावऽ कौर।। (जवना रसे हाथी माते, तेली हाँके घानी, तू साईं कौर उठावऽ गोरी ले जास पानी। (कोइंता) उत्तर- बाप के नाम उ महुआ (पेड़), पुत के नाम उ महुआ (फूल), नाती के नाम उ महुअे का फल (कोंइता)। कोंइता का तेल खुमारी लिए होता है। लोक मान्यता के अनुसार यदि इसे हाथी खा ले तो वह मतवाला हो सकता है। ३७. आसमान में तितिल बसे, भुइंया पा अंडा, इ बुझौवल बूझ के गोरी उठावऽ हंडा। (महुआ)
३८. बाप से बढ़ के बेटा भइले, नाती भइले सरदःार। उत्तर - बाप उ दःूध, बेटाउ दःही, नातीउघी। ३९. बनही रहनी बन फुल खइनी, बनही में भइल बिआह। अस गुरुँ के पाले परनी, पीठी लागल सेवार।। (नाव, नौका)
४०. निहुरल निहुरल गोरिया आँगन बहारे, हाथ के लेहली लोई। खट्यिा पर एक बालक रोवे, उ तहार कोई?
उत्तर - भाई ह भतार के जामल, ह सौतिन के बेटा। मोर स्वामी के लइका लागी, हमारो लागी बेटा।। (दःामादः-सास का सम्बन्ध)
४१. चाँदः चले सुर्रूज चले और चले पानी। धरती समेत चले, अहथिर कौन प्रानी।। (दिशा)
४२. एक बाजा अनूप, साल में एक दिन बाजे , अउर दिन चुप। (कार्तिक अमावश्या की भोर में दःरिद्र खेदःने वाला सूप)
४३. दःसभुज ना सोचे दिन-राती, होइ पूत मोर जीउ घाती (केंकड़े का दःस पैर; ग्रामीण मान्यता है कि केकड़ा का विहान (नवजात) केकरा ही खा जाता है।)
४४. पट््ट्ना दःेहरी लखनऊँ, कासमीर सुख दःेत, कर नाट्क नेपल्ल चढ़ी निरखत श्याम निकेत। (श्रीकृष्ण और गोपियाँ) ( हरि! पट्् ना दःे; सखी दःेखो ना (लखो ना) नेपप्ल (नये पल्लव) अर्थात् कदःम्ब की डाल पर चढ़कर बैठा है; शरीर में हवा (कश्मीर की ठंढ्) लग रही है, वह नाट्क कर रहा है।) ४५. पत्नी ले पति पितु गोद में सोई। (हिमांचल पर शंकर-पार्वती का विवाह, वहीं एक रात का शयन)।
४६. जल में पैठ दःान दःेत, दःहिना भुजा उठाय, दःान लेत तुरते मरे, दःानी नरक को जाय। (बंसी, बंसी लगाने वाला (दःानी), दःान पाने वाला- मछ्ली , मछ्ली मारने वाला नरकगामी)।
४७. भला घ पिया कइले चोरी, चिन्हले नारि परिखले गोरी। जइसे राखे तमोली पान, ओहिसे रखिह ऽ पिया के मान।
४८. सुन आसकली, सुन बीसकली, कचनारे किचाइन का? धन बखानी, ए कामिन कि केंगन पे पगधौरा का? कवन अनिआर कवन पनिआर, कवन कुइयाँ जलजुगती? कवन पेन् जग मोतिन माला, मोर पिया लेके सूती? उत्तर - हमहीं अनिआर, हमहीं पनिआर, हमहीं कुइयाँ जल जुगती। हमहीं पेन्ही जग मोतिन माला, तोर पिया लेके सूती।
४९. ए सुगवा तोर हरिहर ठोर, चनन के मुख भरिया, एही बाट्े गोरिया दःेखले! सिर पर लेहले गगरिया?
उत्तर - (गोरी आइ गए झमकाइ गए, रस बूनन भरली गगरिया। सूरज नारायन क्षपित भइले, सुगना लट्के पाकड़ गछ्यिा।) (एक औरत किसी दःूस पुरुँष से फेंसी थी, वह पुरुँष उस औरत से एक कुँए पर मिलने वाला था। औरत ने मिलने का समय दिया था। कुँए के पास पकड़ी के पेड़ पर बैठा सुग्गा ने उस औरत को पानी लेकर जाते हुए दःेखा था, औरत को न पाकर उस पुरुँष ने सुग्गा से पूछा। सुग्गा और उस पुरुँष में वार्ता)। ५०. चार सखियों के बीच वार्ता -
पहली - डोला च गई स्नान, सारी रात मोहे दःेह पिरान, ए सखि ऐसा, पैदःल चले से जीये कैसा? दःूसरी -मूसर शबदःवा सुननी कान, सारी रात मो दःेह पिरान, ए सखि ऐसा, धान कू से जीये कैसा? तीसरी -दःही परोसे गइनी भोर, खोंच गड़ल अंगुरी के पोर ए सखि ऐसा, दःही खाए से जीये कैसा? चौथी - जब मैं पेन्ही दःक्खिनी चीर, सारी रात मो दःेह पिरीर। ए सखि ऐसा, गाढ़ा पेन् से जीये कैसा?
५१. चार सखियाँ पानी भर रही थीं, एक साधु घूमते हुए उधर आया और कहा-
कभी बनाव गहागड्ड, कभी चढ़ाव गहागड्ड कभी पिलाव गहागड्ड, यही है गहागड्ड बालिका, यही गहागड्ड।
एक ने जवाब दिया - लाल गेहूँ लट्प पूड़ी ओ आलू के ठट्् हम बनाई, तू खा फकीरा, तब मचे गहागड्ड। (बाबा ने कहा "नहीं'।)
दःूसरी ने जवाब दिया - लाल पलंग पर सबुज बिछ्ौना ओ तकिये का ठट्् हम सोउ तू सो फकीरा, तब मचे गहागड्ड। (बाबा ने कहा "नहीं'।)
तीसरी ने जवाब दिया - माट्ी के घड़िलवा गंगा-जल पानी, ओ गड़ु़ये का ठट्् हम भरीं तू पी फकीरा, तब मचे गहागड्ड। (बाबा ने कहा "नहीं'।
चौथी ने जवाब दिया - हरी घास के हरी पतैया, ओ गांजा के ठट्् हम ले आईं, तू पी फ़ेकीरा, तब मचे गहागड्ड।
बाबा ने कहा- वही है गहागड्ड बालिका वही गहागड्ड।
५२. एक पाण्डेय जी ने किसी ग्वालिन से दःही खरीदःा और खाने बैठे; खाते समय ग्वालिन ने प्रश्न किया-
बाप के नाम से पूत के नाम, नाती के नाम कु और इ कहानी बूझ के पाण् उठावऽ कवर।
(उत्तर- महुआ का पेड़ (बाप), महुआ का फूल (बेटा) और महुये का फल (कोंइत)-नाती।) फिर पाण्डेय ने प्रश्न किया -
जा के सोर पताले फूट्े, माथे फू भं इ कहानी बूझ के ग्वालिन उठावऽ हंडा।
इस बीच ग्वालिन को खोजते हुए ग्वाला पहुँचा, ग्वालिन के समक्ष समस्या दःेखकर उसने उत्तर दिया-
जा के रस से हाथी माते, तेली पेरावे घानी, तू पाण्डे कवर उठावऽ ग्वालिन उठावस हाँड़ी। (महुआ का फल-कोइंत)
५३. सास ने पतोह से कहा कि दःुकान से दःो पैसे का कपूर लाओ। पतोह के पति का नाम भी कपूर ही था। ग्रामीण संस्कृति में स्री अपने पति का नाम नहीं लेती; उसने दःुकानदःार से कहा - शंख से उ शशिबड़ा, मल्यागि के बास, ए बनिया मो तौल दःे, लेन पाठाई सास।
बनिया ने कहा -
तोर बोल अनमोल सखी, तोसे मोल न लेउ। जा के पूछ्ो सास से, कै घर तौल के दःेउ।। ५४. हमरो के मरलख तहरो के मारी, तो कारन मो मरलख रे। अपने बइ धुईंयाँ रमाई, चेल्हवा मट्की मरलख रे।। (चेरा - मिट््ट्ी का एक जीव, जिसे बंशी में लगाकर मछ्ली मारा जाता है, चेरा मछ्ली संवादः।)
५५. रात के नाम से दिन के नाम, तवन दःेखनीं रउरे गाँव। सेर तरजुई ले हा बिकाय, तवन दःीं हमारा भेजाय। उत्तर - चमसुर, एक प्रकार का साग, जिसे सब्जी में डाला जाता है, रात में चन्द्रमा, दिन में सूर्य
५६. एक मुसाफिर कह रहा है - ए कोइरिन के छ्ोकरी, राख बैगन के खेत, एक बैगन मो के दःेती, रहता तो दःेस। उत्तर - दःेखत में लहालही, तूरत में कचनार। जा मुसाफिर लौ के अइहऽ, तूरिहऽ फरि-फ फांड़। (मुसाफिर चला गया, इधर युवती उसका इन्तजार करती रही। एक दिन निराश होकर कहा - खेत उठल, खलिहान उठल, उठल खेत के बोझा, जिन मुसाफिर क के गइले, उ ना अइले सोझा।
५७. एक मंुसीजी गवना कराकर आए, घर के सामने पकड़ी का पेड़ लगाए, तब तक किसी केस में पकड़कर जेल भेज दिए गये। बारह वर्ष बाद उनकी औरत (जनाना) ने पत्र लिखा - बरवा फू बरोहिया, आके पकड़ी सभा बइठ कह दीहऽ ओ सामी से कि छ्तिया भंवरा बइठ। सामी (स्वामी) का उत्तर - बर पकड़ी बढ़ल, सुन के खुश भइलीं, छ्तिया पर भंवरा बइठल, सुन के दःुखी भइलीं। इस पत्र -व्यवहार तथा चिंता के विषय में जेलर की औरत को जानकारी ई, उसने मुंसीजी को जेल से बाहर करा दिया, मुंसीजी को रास्ते में एक पनिहारी मिली, उसने कहा - ताजी के चढ़वइया भइया, मोरा अंचरवा के रस लऽ। उत्तर - घोड़वा के मारेब इ आबुक चाबुक, तोहरा के मारेब इ हाथ, तोहरा ले मोर धनि आगर बाड़ी, जोहत होइहें बाट्। पनिहारिन को दःु:ख लगा, कुँए में कूद कर मर गई। मुंसीजी घर पहुँचे, उनकी औरत को खुशी ई, भोजन बनाया और मुंसीजी के सामने भोजन परोस कर लायी, किन्तु थाली में खून दिखाई पड़ा। औरत ने पूछा - रास्ता में रउरा (आप) से के कु कहल ह ऽ! मुंशीजी ने सारा वृतान्त सुनाया।
५८. रिमझिम-रिमझिम दःेव बरीसे, बरखा अति सुहावनी, दःो कुलवंती ना जिसकी, पांव में बाजे पावट्ी।
५९. निहुरल निहुरल पइठल चोर, पहिले मुसलस बेट्वा मोर, बेट्वा मूस बगल तर कीन्ह, तब धन पर धावा दीन्ह। (घर में पतोह का आगमन, सास का बयान)
६०. चार चौकड़ी, चौसठ बाजार, चोसठो बाजार के एक भतार। (चार चवन्नी या चौसठ पैसाउएक रुँपया)
६१. एक चिरैया उट्क-बट्क, नदी किना चरती है, चोंच उसका सोने का, दःूम से पानी पीती है। (दीपक)
६२. जीह काल जीउ गइल, ट्ंगरी गइल आकाश अब का बइठल झंउखऽ तारऽ ब द बतास। (कोई लंगड़ व्यक्ति जा रहा था, आम के पेड़ पर ध्यान गया, आम खाने का मन किया, लाठी चलाकर मारा, लाठी अंट्क गया, वह बैठ गया, इसी पर किसी राही ने उसे संतोष दःेते हुए कहा कि बतासउहवा बहने दःो, लाठी पेड़ से नीचे आ जायेगा।) ६३. तोर संगे भैने मैं ही,
हमरा बाप के साला तेहीं ६४. पी जन्म मो चढ़ि, तापे
चढ़े उसकी माय, ६५. एक ओर लगी एक ओर धाप,
लगी वाला के मुअल बाप। ६६. साज समाज सहित में आवे,
दःेखन लोग मो सब धावे, ६७. एक ओर हँसी, एक ओर ठाठा, धूर कम अठा काठा (कैसे नापा जाय?) (७३ ३ उ २१९ धूर) ६८. चिउरा के चार चोट्, दःही बा खट््टा, क पचे अठारह कठा?(७२ ५ उ १८ काठा, ३६० धूर उ१८ काठा) ६९. जब हम गइनी तहरा घर, तू
गइलऽ ट्र (प्रसंग - माता-बेट्ी वार्ता, छौंड़ी के कवनो इयार रहे, मातारी बेट्ी सुतल रहलीं, छौंड़ी के इयारवा ओरी के खर खींचत रहे, छौंड़ी कहलख मातारी से कि ए माई एक बुझौवल बुझाईं, त बुझावऽ, (उपरोक्त) अर्थात दःूनो मातारी बेट्ी एक ही चरित्र के)। ७०. तकबऽ त ताक लऽ ठेकि नाहीं,
खइ हमार पिया, तू तऽ नाहीं। ७१. के कारन सुन्दःर हाथ जरी? ७२. तहरा मामा के मामा के भगिन दःमाद तोहार के भइले? (बाप, पिता) ७३. हमरा मामा के, इनकर मामा, मामा कहेले। (महतारी-बेटा) ७४. एक स्री ने कहा-बाबू, तोर
मामा आवऽ तारे। ७५. वह कौन प्राणी है, जो सुबह चार पैर से, दिन में दःो पैर से और शाम को तीन पैर से चलता है? (बच्चा, जवान, वृद्ध, बच्चा माँह होकर, युवा खड़ा होकर और वृद्ध लाठी के सहारे)। ७६. वह कौन खेती है, जिसकी सिंचाई जल से नहीं आग से होती है? (मूंज) ७७. जब हम हँसी त पिया रोवे; सुसुक-सुसुक मोर मँुहवे टोवे (पैर में फटा बिवाय) ७८. दःस गोड़ ई पोंछ्ड़ा, तीन
सीस मुख चार, ७९. तीतर के दःो आगे तीतर, तीतर
के दःो पी तीतर, ८०. सास ननद पतोह भौजाई,
तीन रोट्ी में कैसे खाई? ८१. बाप, बेटा, तीन कोठरी,
अलग-अलग कैसे सोयें? ८२. तीन अक्षर का वह कौन सा शब्दः
है, जिसका पहला अक्षर काट्ने से ८३. सब दिन ब थोड़ा-थोड़ा, सावन मास ब जोरा, क्या है? (मोरी/पनाला) ८४. का हारान (हैरान) भइल
बानी ए सियार गोसाईं ८५. चलत में लमर-झमर, पीतर
के पीतम्बरी, ८६. झाझर माझर केतू, अन्दःर आकर
दःेखू, ८७. लाल मटुक मुर्गा नहीं,
सबुज रंग नहीं मोर ८८. नाय क ढ्कर-ढ्कर नदी
गोंगिआला, ८९. करिया गाय करीमन बाछा,
बाछा र अहीर के पाछा। ९०. बारह मास पिया संग रहनी, अब हम परनी अकेली (सपं का केंचूल) ९१. तरका के माजा कि ऊँपर का
के माजा, ९२. माट्ी के बछ्र्रू, का के गाय,
दःू जास त छानल जाय, ९३. मुअलकी क जिअलकी से, तू
मत इ हमरा के ९४. हाथी घोड़ा पानी पिये, सीक न समाय। (भैंस की चंूची) ९५. बड़ नीमन बड़ सुकवार, बीच में चीरल दःुनो ओर बार (आँख) ९६. चाल सुभाव ना छूट्े, टाँग उठा के मूते। (कुत्ता) ९७. अमीरों की शान, गरीबों का गुजर। (खादी कपड़ा) ९८. सोखता है खून, मगर रहता है सादःा। (खदः्दःरधारी नेता) ९९. बीसों सर का लिया, मरा न खून हुआ। (नाखून) १००. करव से किया चितान, भोम्ह दःेख डं फहरान। (कुम्हार द्वेारा चाक को नचाना) १०१. करव से कइले चितान,
दःूनो हाथ गुलगुली धइले, जे-जे मन
भइल, ते-ते कइले। १०२. छाती से छाती मिले, मिले
छ्ेद से छ्ेदः। १०३. तावा ऊँपर ताई, दःूनों गोड़ फैलाई, गने-गने नाई। (जाँत में अन्न पीसने की क्रिया) १०४. एक कहानी मैं कहूँ, सुन ले
मे पूत। १०५. उ बिलाई के हरिहर पोंछ् (मूली) १०६. बाप जनमही के रहले पूत पिछुआरा गइले। (आग और धुँआ) १०७. एक लेखा एक बेटा, एक लेखा छ्। १०८. एक लेखा एको ना, एक लेखा
नव। १०९. एक गा अगरधत्ता, ओकरा सोर
न ऊँपर पत्ता। (आकाश बंंवर) ११०. एक पेड अगरधत्ता ओकरा फूल के ऊँपर पत्ता। (गुमा) १११. धामिन क धमर धमर
गेहुँअन फोंफिआला, ११२. जब रहनी बारी कुँआरी,
तब खइनी मुअड़ी के मार ११३. हरदी के गाबगूब पीतल के
लोटा, ११४. घा कुघा घड़ा ना बूड़े,
हथिया खड़े नहाय, ११५. एक ढ्कना पानी, आधा सोना आधा चानी। (अंडा) ११६. दिन में सइयाँ, रात में भसुर, राह दःूनों के एके ससुर। (बहनोई-सारिन) ११७. नारी एक पुरुँख ढ्ेर, सबसे मिले एके बेर। (केंधी) ११८. एक गोड़ के गइया, गोड़ के दःुहनिहार। (उत्तर - तरकुल, पासीै।) ११९. क झग सुनऽ मनबोध , कवना जंत के मुँह में गोर। (अइंठा) १२०. चार गोड़ के चम्पा चमेली, सुब साम नहाय। दःाल भात के कवर न जाने, कांचे रोट्ी चबाय। (चउकी - बेलन) १२१. कोठी-काठी घुमती है, दःूध-दःही खाती है। (बिल्ली) १२२. ट्नाट्न कटोरा फू गइल,
कोई जो वाला नाहीं, १२३. अंजन चिरई, विरंजन गाछ्, डोले चिरई त बोले गाछ्। (सरसो का पौधा) १२४. ऐंडी के दःमदःुम चाकर पतइया, फ के लट्पट्, फर गइल मिठइया। (केला का पौधा) १२५. जमीन के रंग? (पीअर) १२६. सब पत्तन में पत्ता बड़, हवा
लगे बोले खड़खड़। १२७. धानापुर से मा आया,
कठौतिया घा पर बैठा है, १२८. चार अडंगडं, चार अमृत
भोजन, १२९. सब कोई चल गइल बुढ़वा लट्क गइल। (ताला) १३०. नन्ही चुक गुड़ही, छुलुक पानी। ओ में से निकले लाल भवानी। (बरी) १३१. ऊँपर टाट्ी, नीचा टाट्ी, बीच में बाड़ू ब के काकी। (बेरहिन रोट्ी) १३२. धरती में फूल उगे, बादःल में रेखा, हाय परान छुट्े, कबहँू ना दःेखा। (जोन्ही) १३३. करी करझिंगनी, पेटाढ़ी में लुकाले, लाख रुँपया दःाम लागे, तबो ना बिकाले। (आँख) १३४. हेती चुकी घुंचली मेंे जीरा भरी, बाबू रतन जी के दःाँते धरी। (अमर्रूदः) १३५. सनकेसी के गाछ्, नब्बे बढ़ई नब्बे लोहार, तबो ना कट्े, सनकेसी के गाछ्। (परछाई) १३६. हेती चुकी सास, सथवे खास। (मक्खी) १३७. का के कजरौटा बेट्ी,
इंगुर के ट्हकार। १३८. सात खण्ड के पोखरा, ओहि में जामें राजा तूर, पहिले लगे बतिया, तब लागे फूल। (दीपक) १३९. एक चिरई ओट्नी, काठ पर बइठनी, काठ खाले गुबुर-गुबुर हगे भुरकुसनी। (आरी) १४०. एक चिरइया ऐसी, दःरिआव
किना बैठी, १४१. अकट्ें बकट्ेंट्, लकड़िए पर घेंट्। (भंटा, बैगन) १४२. ट्ेढ़ा ट्ेढ़ी बकुला, डगरिया
धइले जाला, १४३. एक हाथ के भालू मियाँ, नव हाथ के डोर। (सूई) १४४. फ ना फुलाय, ढाका भर तुराय। (पान के पत्ता) १४५. कोठा पर केंगना, झलक मारे अंगना। (दीपक) १४६. कटोरा पर कटोरा, भीतर बाप से भी गोरा। (नारियल) १४७. नाधल भइंसा घर-घर घूमे। (तराजू) १४८. हरी थी मन भरी थी, राजा के बाग में दःुसाला ओढ़ कर खड़ी थी। (मकई का बाल) १४९. दःउड़ल दःउड़ल जाइले, टाँग उठा के
नाइ ले, १५०. झुलेले बारहमासा, मत करऽ सिआर भाई आसा। (अंडकोष) १५१. लाल छ्ड़ी भुईं में गड़ी। (ईंख) १५२. ऊँपर चीकन-चाकन, नीचे घउसा। (नारियल जटा) १५३. लाल गाय खर खाय, पानी पिये मर जाय। (आग) १५४. ऊँपर कांट्-कट्ैला, नीचा
झांट्-झट्ैला, १५५. ओठी पर कोठी, कोठी पर
पेहान, १५६. दःुखउए कब?, आधा गउए तब, नीमन लगुए कब? संवसे गउए तब। (चूड़ी पहनते समय) १५७. ऊँच मउगी के चूंच ना, भीत करेज ना। (डेहरी) १५८. चा ओर बार, बीच में दःुआर। (आँख) १५९. आठ काठ नौ जोड़ा, जे बुझौवल ना बूझी ओकर बाप घोड़ा। (गोहरा) १६०. एक बीता लगाइले, संवसी दःेह हिलाइले। (दःतुअन) १६१. एती चुकी खरहा के लुप चुप कान, ओ पर ला ले नौ मन धान। (बहँगी) १६२. लाल ढ़कना, करपाल ढ़कना, खोल ढ़कना, पहुँचाव पट्ना। (डाक विभाग की पत्र-पेट्किा) १६३. उनका अँगना गइनी, कपार फोर दःेहली। (सिन्दःुर लगावल) १६४. हेती चुकी बाली मियाँ, उनके नकवे ट्ेढ़। (चना) १६५. हेती चुकी लइका, भर पाकि पइसा। (मिर्चा) १६६. हेती चुकी फुदःकी फुदःकत जाव, संवसे गाँव लूट्त जाव। (आग) १६७. ट्प से ट्पाक से कपार काहे
फोरुँए रे। १६८. आँख में पाँख जामे, जौ-गेहूँ के आरी। (तीसी) १६९. दःेह क कसमस, लट्कल ठोरी, ट्ींगा से पानी गिरे, गेंठा अंट्के पूरी। (कोल्हू, तेल, खली) १७०. का के कठम्मर बेट्ी
निकलेली दःुआर, १७१. हेती चुकी झार फ हजार, रोज-रोज सुगवा रो-रो जाय। (मिर्चा) १७२. ए कठबेंगुची, बोलत कठोर
वा, अइसे-अइसे जग कूप, दःेखल हमार
वा। १७३. डूबे गइनी, डूब नू गइनी। ना डुंबतीं त डूब नू जइतीं। (धोबिन-पंड़ित के बीच सेक्स-समबन्ध) १७४. एक पेड़ में अंडा, एक गरम एक ठंडा। (सूर्य-चांदः) १७५. अइंठल-जोइंठल दःमदःार, बारह ट्ंगरी चार कपार। (मो से पानी खींचना, दःो बैल और दःो आदःमी) १७६. आगे-आगे भगिनी आवे,
पीछ्े-पी भइया, १७७. एक चिरइया अ ओकर पांख
दःूनो पट्, १७८. किसी पुरुँष के साथ एक औरत थी। किसी अन्य औरत ने उस औरत से पूछा - वह (पुरुँष) आप के कौन हैं? , उत्तर मिला - "इनकर सास, हमार सास, महतारी-बेट्ी ह लो'। (अर्थात वह औरत उस पुरुँष का पतोह थी।) १७९. साग-पात निर केवल, सास के भाई पतोह के लागस दःेवर। १८०. आँख दःुनो मुलुर-मुलुर
कान दःुनो नाहीं, १८१. बन में ओखर टाँगल बा। (कट्हल) १८२. नैना तुझे पट्क कि
चूर-चूर होइ जाय। १८३. वा निरन्तर बरखा काल,
घोड़ कुहुके लरिका बाल। १८४. खुदःा का काम एक गा में दःू आम। (बैजा, स्तन) १८५. ललकी गइया बड़ मरखइया, ओकर दःुधवा बड़ मिठैया। (मधमुक्खी) १८६. तोरा पुरुँस ना मोरा
जोय, जवन कर कि लइका होय १८७. एक पैसा का घड़ी कीना, ट्यिुर
का कर चैन (कीनाउखरीदःा) १८८. ऐसा चोरी करता है, खुदःा नहीं जानता है। १८९. लता लतर वाइल, कदःमा फर गइल, सांझ भइल झर गइल। (बाजार) १९०. बुढ़िया मर गइल पाँचो अंगुरिया ध गइल। (चिपरी) १९१. जनमे के ट्ेढ़ी-मेढ़ी दःुनो
ओर बार, १९२. जेतना डर बघवा के ना, ओतना डर ट्पिट्पिवा के। (धोबी का गदःहा भुलाइल) १९३. कांच कसैली कच-कच करे,
कांच कपारो घीव १९४. अमर पर कमर पितमर पर
छाया, १९५. खैर सुपारी चूना पान, दःूनो बेकत के बाइस कान। (बेकनउव्यक्ति) १९६. छ्ोट्ी-मोट्ी दःेवी मैया,
दःूनो काने सोनवा, १९७. नीचा से निकले सनासनी,
ऊँपर घनाघनी फ पसेरी एहिसन, १९८. एक पेड़ कस्मीरा, कु लौंग
फ कु जीरा, १९९. चार खण्ड के पोखरा, ओहिमा
राजा तूर २००. सात सतहवा ऊँगल
तिनडेढ़िया गइल दःूर २०१. हेती चुक इयाँ, पट्क दःेब
भुइयाँ २०२. बारह बरिस रहनी नैहर में,
तब ना बढ़वनी केस, २०३. माड़ो गए, दःुलहा मर गए
कन्या भइ एहवाती, २०४. ऊँपर के खाईं नीचा के फेंक दःीं, नीचा के खाईं ऊँपर के फेंक दःीं। (छुहड़ा, बादःाम) २०५. दःस भुज ना सोचे दिन-राती, होइ पुत्र मोर जीउघाती। (केंकड़ा) २०६. चल सखी जहवाँ नदी-नारा
होखे, पानी ना होखे तहवाँ २०७. दःेखनी ए छौंड़ी तोर भतार, कमर में बिस्ट्ी, ट्ीकल कपार। २०८. कौन र्रूप पति ने नहीं दःेखा - (विधवा र्रूप) २०९. एक गइनी दःूकठ गइनी, गइनी
कलकत्तवा। २१०. भइंस चढ़े खजूर पर
लप-लप गुलर खाय, २११. सब जने के एके जगह । (लहसुन) २१२. माथे मोट्री मुँ लकड़ी। (चूल्हा) २१३. लबर-लबर डालेनी, फुला के निकालेनी। (रोट्ी) २१४. एक म कि दःस? (एक आदःमी दःस व्यक्ति के परिवार को खिलाता है) २१५. हाँ-हाँ-हाँ-हाँ, हाथ गोड़ दःू
माहाँ २१६. बादःर से बदःरी भए, कमरी से
भए लोई, २१७. एक ना नारंगी, वह भी
ना कहावे २१८. झग दःादःा खड़े खेत में बटुए
में रखते माल, २१९. ला बैठा चले घा पे
चोरी करने माल, २२०. हेती चुके डेंड़ा डरार बान्हेला। (सूई) २२१. भुजवा खइले मउनिया फेंक दःेहले। (बेल/सिरफल) २२२. हेती चुकी र्रूखी, रहरिया में ढूकी। (खुरपी) २२३. बुद्धि के गा कहाँ होला? (सत्संग, स्कूल) २२४. ए तर वाला! त का ऊँपर
वाला? २२५. बाप, बेटा, तीन कोठरी। हरेक में बराबर-बराबर, सोना है, कैसे सोयेंगे? (बाबा, बाप, बेटा) २२६. तीन अक्षर के मेरा नाम, करता हूँ मैं को में काम। (कलम) २२७. हती चुकी चुकिया में तीन बचवा, दःखिन पछ्मि के घाम लागी उड़ी बचवा। (रेंड़ी) २२८. हती चुकी गाजी मिया
हतवत पोंछ्। २२९. लाल इंगरौट्ी, करिया घेंट्ी, बूझऽ हो महतारी बेट्ी। (जामुन) २३०. कपड़े का अन्त गुलनार में रंगा गया, उस कपड़े का नाम बताओ। (चिरकु लाल, गुलनारउलालरंग) २३१. लाल लगाया, उ निकाला, कहाँ पढ़े हो, सिलाट्ै की किताब में। (गेहूँ, आटा, सिलालैट्उचक्की) २३२. एक हाथ के डंडा, जब बुढ़वा हाथ चलाई तब लागी ठंडा। (पंखा) २३३. सब फूल में अच्छा कौन? (कपास - जन्म से मरन तक साथ दःेता है)। २३४. लकड़ी में कौन लकड़ी जो मरने तक काम दःेता है। (बांस, जन्म के समय सूप में बच्चा आता है)। २३५. कच्चा खाओ, पक्का खाओ, |