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वाराणसी वैभव |
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भोजपुरी लोक साहित्य एवं संस्कृति |
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बच्चों के खेल- गीत
शहरी और ग्रामीण सांस्कृतिक चेतना में आज भी दःूर के सम्बन्ध दिखाई पड़ते हैं। कारण स्पष्ट है, पाश्चात्य संस्कृति का जितना प्रभाव शहरों पर है, उतना ग्रामीण जन-जीवन पर नहीं। वस्तुतः शहरी और ग्राम्य जीवन में वही अंतर है जो हमें विज्ञान और साहित्य में मिलता है। ग्राम्य संस्कृति यदि ऱ्हदःय प्रधान है तो शहरी संस्कृति बुद्धिप्रधान। यही कारण है कि ग्राम्य जीवन में प्रचलित खेल-गीतों के साथ मनोहारिता एवं भावनात्मकता लिपट्ी ई है। इन खेलों के साथ गीत शब्द का जुड़ जाना ही इस बात का द्योतक है कि ग्राम्य जीवन में अनुराग है, रसात्मकता है। शहरी खेलों के साथ गीत नहीं मिलते, फलतः जो सरसता और आकर्षण ग्रामीण खेलों में उपलब्ध है, उसका शहरी खेलों में प्रायः अभाव पाया जाता है। ग्रामीण जीवन में प्रचलित खेलों के साथ परम्परागत रीति-रिवाज, लोकोक्तियाँ एवं लोक-कथाएँ भी सुरक्षित हैं। उनमें ग्राम्य वातावरण के प्राकृतिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं धार्मिक आदि हर तरह के चित्र मिलते हैं। शहरी जीवन बहुत कु समय के साथ गतिशील है, ग्राम्य जीवन अपनी परम्परागत विरासत को संजोये प्रगति पथ पर आरुँढ़ है। भोजपुरी क्षेत्र (जिला, सारण, गोपालगंज) में ग्रामीण शब्दःों एवं पदः्बन्धों के संग्रह करने के सिलसिले मे हमने पाया कि हमउम्र के लोग जो-जो खेल खेले थे या तत्सम्बन्धी गीत गाए थे उनमें से अधिकांश आज के बच्चों के लिए अज्ञात हो चुके हैं। उन खेल-गीतों के जरिए समाज के बदःलते क्रिया-कलापों के स्तर की पहचान की जा सकती है। गीत गाने या अनुकरण करने की प्रवृत्ति के कारण खेल खेलते समय अनायास तुक मिलाकर अपने पसन्द के गीत गढ़ लेना बच्चों के लिए उनके बुद्धि-चातुर्य के ही द्योतक हैं। भले ही उनके सभी गीतों से कोई सार्थक मतलब न निकलते हों, पर उन गीतों के द्वेारा मनोवैज्ञानिक अनुसंधाता बच्चों के बुद्धि या मानसिक स्तर और उन बच्चों के सामाजिक तथा पारिवारिक रहन-सहन एवं मान्यताओं का पता लगा सकते हैं। बच्चों के बहुत से खेल-गीतों के बनने के पीछ्े कोई न कोई घट्ना अवश्य घट्ति ई रहती है। स्तरीकरण : तीन वर्ष तक के बच्चे न तो गीत गा सकते और न बना ही सकते हैं, अतः उन् खेलाते, खिलाते या सुलाते समय बहनें, मातायें या दःादियाँ जो गीत गाती हैं, उनमें घुघुआ, चिड़िया गीत, चिलरी गीत, मामा या चन्दःामामा गीत, हँसुआ गीत, भैयागीत, मछ्री गीत, कुम्हड़ा गीत आदि आते हैं। तीन वर्ष से सात-आठ वर्ष तक के बच्चे आपस में एक जगह बैठकर जो गीत गाते हैं, उनमें ओका-बोका, अट्कन-चट्कन, चिंउट्ी गीत, पैर का अँगूठा पकड़ कर गाने वाला गीत आदि आते हैं। दःस वर्ष से सोलह वर्ष तक के किशोर/किशोरियों के खेल सम्बन्धी गीत में वर्षा गीत, कबड्डी गीत, उदःुक-बुदःुक, म्याऊँ-म्याऊँ, गोइयांब गीत तथा शपथ धराने, हास्य व्यंग्य करने या चिढ़ाने सम्बन्धी पदःबन्ध प्राप्त होते हैं। शिशु गीत : घुघुआ (कनछ्ेदः) घुघुआ मामा, उपज गइल धाना ए पड़े अइले, बबुआ के मामा कनवा छ्ेदःा दःेहले, बलवा लगा दःेहले दःूनों हाथे लडुंआ धरा दःेहले सम्हरिहे बुढ़िया सम्हरिये बबुआ गिरेला धबाक् । बच्चे पर किसी की न न लग जाए, इसके लिए सामाजिक मान्यता के अनुसार बच्चे के मामा, बच्चे का कर्णछ्ेदःन कराते हैं। इसी विश्वास पर आधारित इस गीत को सुनाते हुए बच्चों को घुधुआ खेलाया जाता है। कर्णछ्ेदःन के बाद घाव की पीड़ा से व्यथित बच्चे को चुप कराने के लिए मामा ने उसके हाथ में दःो लड् थमा दिया। घुघुआ मनेर साढ़े तीन कनवा तेल ओ में आधा बहिये गेल घुघुआ के बहाने इस गीत में तेल की मात्रा एवं उसमें से आधा गिर जाने का दःु:ख भी प्रदःर्शित है। चना मुठी कउड़ी गम्भार, आपन बाल बच्चा सम्हार।
हाल-हाल बबुआ कुई में ढ्ेबुआ बाबू अइले खेल के, रोट्ी पकवले बेल के, रोट्ी भइल कॉचे, बाबू लगले नाचे। माँ जब रोट्ी बनाती है तो शिशु भी माँ के पास बैठकर गूँथे हुए आ से थोड़ा नोचकर माँ का अनुकरण करते हुए उससे रोट्ी का शक्ल दःेने लगते हैं, या चिड़िया बनाते हैं। माँ प्यार से शिशु द्वेारा बनाये चिड़िये या रोट्ी को तावे पर सेंकती है, जब वह कच्चा रह जाता है तो बच्चा रोने लगता है। इस कहानी को सुनाकर बच्चे को चुप कराया जाता है। बच्चा जब चुप नहीं होता, तब उसको भरमाने के लिए कभी-कभी पैसा भी दिया जाता है। पहले जब तमहा पैसा चलता था, शायद तभी से यह कहावत प्रचलित ई-""लाल-लाल पैसा त र्रूदःन कैसा?'' जाड़ें के दिन में सुबह धूप में बैठकर दःादी माँ शिशु को खेलाते हुए कहती रामजी रामजी घाम करीं, सुगवा सलाम करीं, तहरो बलकवा के जड़वत बा, पुअरा फूंक फूंक तापत बा। १. आव रे निनिया निनान बन से, बाबू आवेले मामा कीहाँ से, खट्यिा गेनर पट्ना से, सुति रह बाबू अपने से। (गेनरउगुदःरा)
२. सुत-सुत बबुआ कुई में ढ्ेबुआ, बाप गइले नोकरी मातारी असगरुँआ, (असगरुँआउअकेला) आजा आजी चनन के, पितिया सहोदःर के मय खिलौना चानी के बबुआ रे तू कथिके? (कथिके उ किस चीज का) अनन चनन कस्तुरी के।
३. सुत-सुत बबुआ, कनकट्वा आवऽता माई -बाप गइले धान का साँझी बेर अइहें, त भर अंँगना दःुधवा पिअइ साढ़े तीन ढ्कना। कान काट्ने वाले का भय दिखाकर बच्चे को चुप कराया जा रहा है। यहाँ माता-पिता के कृषक जीवन का भी बोध कराया गया है। बच्चा माँ के दःूध के लिए रो रहा है, बहन समझा रही है कि अन्न पैदःा करना भी आवश्यक है। जब वे धान काट्कर लायेंगे तो आँगन भर जायेगा, फिर माँ उसे भरपे दःूध पिलायेगी। ४. आव रे निनिया निनार बन से, बाबू आवे मामा घर से। माई खोजे आरी-बारी, बाप खोजे फुलवारी। बबुआ बा बाबा के चौपारी में, खट्यिा आइ पट्ना से, सुति रह बाबू अपने से।
५. आव रे गुदी चिरैया, बाबू के खेला जो, सोने तो ओठ भरब, गोड़े पैजनिया, खॉड़ा रोट्ी रोज दःेहब ट्किरी महीनवाँ, तोर बचवा जुग-जुग जीओ, बचवा सुता जो। यहाँ पक्षियों के साथ मानव का मधुर भावात्मक सम्बन्ध दिखाया गया है। बच्चे इस गीत को सुनकर फुलकित हो उठते हैं। छ्ो बच्चों के खेल-गीतः बन के चिरइया बन खोतवा लगाय हमर बाबू जाले रखवार फुआ सोहागिन खायेकवा लेके जाय फुआ बीच में खास हमार बाबू गइले रिसिआय अमा सोहागिन दःहली लुलुआय इया सोहागिन ऱ्हदःया लगाय। भोजन खिलाते समय जब इस मर्मस्पर्शी गीत को सुनाया जाता है तब बच्चा बिना आना-कानी किये भोजन करने लगता है। बन के चिरइया बन डुंगरल जाय भर झोरा भूजा लेके बाबू खेले जाय दःे बाबू भूख लागल बा जाये के दःूर होता बड़ी दःेर। बच्चों की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वे खाते समय अपने पास बै बिल्ली कुत्तों को भी अपनी थाली में खाने के लिए आमंत्रित करने लगते हैं। दःेखा जाता है कि एक ही थाली में बच्चा और बिल्ली-कुत्ते सभी खा र हैं। बच्चे की अबोधता को मानवेतर जीव भी बड़ी सहजता से पहचान लेते हैं। यहाँ बच्चा खाने में आनाकानी कर रहा है, अतः मानवी भाषा में बोलते एक पक्षी से भूजा खाते बच्चे की सरस गीत सुनायी गयी है जिससे वह भोजन कर ले। अरर-मरर पुआ पकनी, चिलरी के खोइंछा में नचनी। आव रे चिलरी खेत खरिहान, भर सूप दःेबहु खेसारी धान। ओही धनवाँ के चिउरा कुइहे, चिउरा कुइहे, वभना बोलइहे। बभना के धीया-पूता, भइल हरखितवा। जीउ हो मुन्ना बाबू लाख बरीसवा। कृषक जीवन, मानवेतर प्राणियों से प्रेम, तथा ब्राह्मण भोज दःेने के सामाजिक रिवाजों को प्रदःर्शित करते इस गीत को दःादियाँ सस्वर गाकर बच्चों को लुभा लेती हैं। चिलरी एक तरह की चिड़िया है, नचनी माथे के बाल में पैदःा होने वाला एक बहुत छ्ोटा जीव है, और खेसारी एक तरह का दःलिहन है। मामा गीत :एक तरेंगन, तरेंगन, मैना गोपाल हर बहे डग-डग माट्ी के ढ्कना, हम ना जइबे मामू के अंगना। मामू के धीया-पूता बड़ बदःमास, धइल ट्ंगरी, ले गइल बाजार। ऊँहा से हम गंगाजी गइनी, गंगा से बालू लइनीं बालू गोंड़वा के दःहलीं, गोंड़वा भूजा दःेहलख। भूजा चरवहा के दःहलीं, चरवहा घास दःेहलख। घास गइया खइलख, गइया दःूध दःेहलख। दःूध बिलइया पीअलख, बिलइया एगो मूसा दःेहलख। मूसा चिल्होरवा लेहलख, चिल्होरिया एगो पाँख दःेहलख। पाँख राजा लेहलख, राजा एगो हाथी दःेहलख। हाथी मामा लेहलख, मामा कानी कउड़ियों ना दःेहलख। मातायें इस गीत को प्रायः तभी सुनाती हैं, जब बच्चा दःेर तक प्रयास के बावजूद नहीं सोता, या कभी-कभी स्वयं मातायें या दःादियाँ फुरसत में रहती हैं। बच्चे की शिकायत है कि उसने राजा से जो हाथी प्राप्त किया उसे मामा ने मुफ्त में ही ले लिया। इस गीत में खेत जुताई, प्राकृतिक उपादःानों तथा मानव एवं मानवेतर प्राणियों के बीच सदःा से र आत्मीय सम्बन्धों पर एक रोचक कहानी गढ़ी गयी है। इस गीत को बच्चे बड़ी उत्सुकता के साथ सुनते हैं। चन्दःा मामा गीत :चन्दःा मामा दःूर के, पुआ पकावे लूर से अपने खाये थाली में, मुन्ना के दःहले प्याली में थाली गइल फूट्, मुन्ना गइल र्रूठ। र्रू हुए बच्चे को मनाकर खिलाने के लिए ये गीत गाये जाते हैं। यहाँ चन्दःा का मानवीयकरण किया गया है। ग्रामीण बच्चे चन्दःा की आकर्षक छ्वि को दःेखकर उसे मामा कहते हैं। चन्दःा मामा आ आवऽ पा आवऽ नदिया किना आवऽ दःूध भात ले ले आवऽ बबुआ के मुँहवा में गुटुक। चन्दःामामा की परछायी जल में दीखती है, माँ जब इस गीत को गाती है तो बच्चा समझ लेता है कि माँ ने चन्दःा को बुला दिया है, चन्दःा के श्वेत स्वर्रूप से दःूध के रंग का साम्य बैठता है, उनसे दःूध भात माँगा जा रहा है, बच्चे के आगे मातायें दःूध भात रखकर ही ऐसा गीत गाती हैं। बच्चा यह समझकर कि चन्दःामामा ने ही उसके लिए दःूध भात भेजा है, खाने लगता है। बच्चे के उचित पोषण के लिए दःूध अत्यधिक आवश्यक है। रामजी के चिरइ रामजी के खेत, खाले चिरई भर-भर पेट्। ईश्वर निर्मित यह संसार फसल के खेत के समान ही है और मानवर्रूपी पक्षी उस खेत के फसल को चँूगने वाले जीव हैं। चान मामा चान मामा, हँसुआ दःऽ हँसुआ का के? खरई कटावे के। खरई का के? गइया के खाये के। गइया का के? दःूधवा दःुहाये के। दःूधवा का के? भउजी के पीये के। भउजी का के? बेट्वा बिआये के। बच्चे को हँसाने-खेलाने के लिए निर्मित इस गीत में मानव और प्रकृति के बीच का भावात्मक सम्बन्ध प्रदःर्शित है साथ ही बच्चों की तरह गर्भवती स्रियों के लिए दःूध की आवश्यकता को भी स्पष्ट किया गया है। बढ़ई गीत : एक बार एक चिड़िया अपने झुण्ड के साथ उड़ते हुए चने के एक खेत में गई। किसान के आने पर अन्य सभी चिड़ियाँ बिना दःाना चूगे उड़ गईं, किन्तु वह किसी प्रकार एक चना अपनी ठोढ़ में लेकर आ सकी। उसे दःो दःल करने के लिए उसने जांता में डाल दिया, किन्तु वह चना, जांत के फ कील/खूं में अंट्क गया और काफी प्रयास के बाद भी नहीं निकला; तब उक्त चिड़िया बढ़ई के पास गई फिर आगे क्या हुआ, दःेखें निम्नलिखित पद्य में - बढ़ई-बढ़ई तू खूँटा चीरऽ खूंटा में मोर दःाल बा का खाऊँ का पिऊँ, कहाँ ले परदःेस जाऊँ? बढ़ई ने उत्तर दिया- तुम्हा एक दःाल के लिए मैं खूंटा चीरने जाऊँ? जाओ मे पास समय नहीं है, इसके बाद वह चिड़िया लोहार के पास गई- लोहार-लोहर तू बढ़ई डॉट्ऽ बढ़ई ना खूँटा ची खूँटा में मोर दःाल बा का खाऊँ, का पिऊँ, कहाँ ले परदःेस जाऊँ? लोहार के इनकार के बाद वह चिड़िया राजा के पास गई- राजा-राजा तू बढ़ई डाँट्ऽ बढ़ई ना खूँटा चिरे, खूँटा में मोर दःाल बा... राजा के बाद वह रानी के पास गई - रानी, रानी तू राज बुझावऽ (राजा के समझावऽ) राजा ना बढ़ई डाँ बढ़ई ना खूँटा चीरे, खूंटा में मोर दःाल बा... रानी के भी इनकार करने पर वह चिड़िया सपं के पास गई- सरप-सरप तू रानी डंसऽ रानी ना राजा बुझावे राजा ना बढ़ई डाँ बढ़ई ना खूँटा चीरे, खूँटा में मोर दःाल बा... सपं के भी इनकार करने पर वह चिड़िया लाठी के पास गई फिर अन्त में अग्नि के पास गई। अग्नि ने चिड़िया की प्रार्थना सुनी और लाठी को जलाने के लिए अपनी लप फैलायी। फिर लाठी ने सपं को एवं सपं ने रानी को, रानी ने राजा को, राजा ने लोहार को और लोहार ने बढ़ई को धमकाया; तब बढ़ई ने आकर खँूटा से चने का दःाल बाहर निकाला। इस कथात्मक गीत को सुनाते समय दःादी माँ बच्चे को यही संदःेश दःेना चाहती है कि अपने लक्ष्य को पाने के लिए उक्त चिड़िया की तरह मनुष्य को भी प्रयत्नशील होना चाहिए और कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य नहीं छ्ोड़ना चाहिए। यह गीत ५ से १० साल तक के बच्चे अधिक रुँचि के साथ सुनते हैं, इसे सुनकर उनके मन में चिड़िया के संघर्ष के प्रति बहुत गहरी सहानुभूति जगती है और वे अग्नि की प्रशंसा करते हैं। उन् यह भी सीख मिलती है कि जीवन में कभी हार नहीं माननी चाहिए, कोई न कोई सहायता करने वाला अवश्य मिल जाता है। रामजी-रामजी हँसुआ पइलीं उ हँसुआ का के? खरवा कटावे के। उ खरवा का के? बंगला छ्वावे के। उ बंगला का के? गोरुँवा ढुकावे के। उ गोरुँआ का के? चोतावा पुरावे के। उ चोतवा का के? अँगना लिपावे के। उ अॅगना का के? गहँुआ सुखावे के। उ गहँुआ का के? अट्वा पिसावे के। उ अट्वा का के? पूड़िया पकावे के। उ पूड़िया का के? भउजी के खाये के। उ भउजी का के? बेट्वा बिआये के। उ बेट्वा का के? टाल गोली खेले के। टाल गोली टू गइल, बबुआ र्रूठ गइल।
कुम्हड़ा गीत : (हास्य) दःाइ-दःाइ एगो कोहड़ा दःऽ, ले जइबू कइसे? "डगराइत-डगराइत' चिरबू कइसे, "चर-चर' निर्हबू कइसे?, "डुंबुर-डुंबुर'', खइबू कइसे? ""गुबुर-गुबुर'', सुतबू कहाँ?, ""चुल्ही के दःुआरी'', ओढ़बू कथी?, ""सूप'' ""दःेखऽ बिलाई के र्रूप''। गोलाकार वजनी कुम्हड़ा झमड़े पर फैलकर फलने वाला एक प्रकार की सब्जी है। उसके बहाने ""दःाई तथा किसी स्री'' के बीच मजाकिया वार्तालाप कराया गया है। ओका-बोका तीन तरोका, लउआ लाठी चचन काठी, चनवा के नाव का?, "रघुआ', खाले का? "दःूधभात', सुतेले कहाँ? "पकवा इनार में', ओढ़ेले का?, "सूप', दःेखऽ "बिलायी के र्रूप'। बच्चे अपने पंजे को केकड़े के पैर का शक्ल बनाकर एक जगह रखते हैं। कोई लड़का उन पंजों की गिनती करता है। गिनती में जिस पंजे पर सूप आता है वह बिलायी की संज्ञा प्राप्त करता है। अट्कन-चट्कन :अट्कन-चट्कन दःही चटाकन, बन फूले बनइला, सावन में करइला, सावन गइले चोरी, धर कान ममोरी चिंउट्ी हो चिंउट्ी! चिंउट्ी के झगरा, छ्ोड़इ चिंउट्ी, चिंउट्ी गइली चोरी, धर कान ममोरी। ये दःोनों गीत प्रायः एक ही तरह के हैं। बच्चे एक जगह बैठकर एक दःूस का कान पकड़ कर इस तरह के गीत गाया करते हैं। बच्चे पैर का अँगूठा पकड़कर गाते - राजा के रजइया, भैया के दःुपट््टा, घींच मार-घींच मार, मुसरी के बच्चा, तार काट्े तरकुल काट्े, का बन खाजा, हाथिया के घुघुआ लट्कि अइले राजा। दःो तीन शिशु एक जगह आमने-सामने बैठकर एक दःूस का कान पकड़ते और झूम-झूम कर गाते - चिंउटा हो चिंउटा, मामा के घइलवा का फोरलऽ हो चिंउटा। (घइलवा उ घड़ा) १. चिउंट्ी हो चिउंट्ी, मामा के घइलवा काहे फोरलू हो चिउंट्ी। २. काने सूई, हो काने डोरा फुदःुक। ३. के जाई र्रूसे? ४. रामजी के चिरई रामजी के खेत, खाले चिरई भर भर पेट्। ५. बबुआ गइले कलकत्ता, उपर से बम गिरल, बुबुआ लापाता। ६. ढ्मििरी ढ्मििरी ढ्ंग, बकरी के तीन ट्ंाग, फट्। ७. थूक-थूकारी चल सवा सेर के बरारी। चकवा चकई खेल (हाथ जोड़कर नाचने का खेल) चक डोले चक महल डोले, खैरा पीपर कभी ना डोले। किशोर /किशोरियों के खेल गीत : जब वर्षा नहीं होती, फसल सूखने लगते और अकाल पड़ने की आशंका रहती है तब ग्रामीण लड़के गाँवों में घूम-घूम कर दःरवाजे-दःरवाजे पानी गिराकर उसमें लोट्ते हैं। विश्वास है कि इससे वर्षा के दःेवता इन्द्र खुश होकर पानी बरसाते हैं। इस अवसर पर गाया जाने वाला गीत - हाली-हाली बरखऽ इनर दःेवता, पानी बिना परल अकाल हो राम। चॅवर सूखल चॉचर सूखल, सूखल भइया के धान हो राम। बच्चे यह तुकबन्दी भी गाते हैं- एक पइसा के हरदी बूनी बरसो जलदी। एक मुट््ठी सरसो, झमर-झमर बरसो। कभी-कभी जब अतिवृष्टि होने लगती है और लोग उससे उबने लगते तब बच्चे निम्नलिखित तुकबन्दी गाते - आइल बूनी बरखा बिलाई ब के चरखा। एक पइसा के लाई महावीर के चढ़ाईं बरखा ओन्हई बिलाई। यहाँ ""चरखा लगना'' मुहावरा है, अर्थ है - बेचैनी, परेशानी। बहुत से लड़के परस्पर हाथ पकड़कर पंक्ति में खड़ा हो जाते हैं। एक किना का लड़का दःूस किना के लड़के से प्रश्न करता है, फिर प्रश्नोत्तर का क्रम जो चलता है, वह इस प्रकार होता है - राजा! का पाजा? (काउ क्या, पाजाउ प्रजा) खेत केतना? "बिगहा पच्चीस' मोर पिछुअरवा के घुमेला? "राजा के सिपाही' राजा का मंगलेहंऽ? "इक्री-बिक्री केवल के फूल', राजा कहें कि बतिये तूर, राजा से कह दीहऽ, अभी फुलाइले बा। इसके बाद उत्तर पाने वाले लड़का का अन्य लड़कों का हाथ पकड़े हुए दःूस छ्ोर के दःो लड़कों के बीच से निकलने का प्रयास करता है, फिर धक्का-मुक्की होती है, एक भागता है, शेष पकड़ने दःौड़ते हैं। उदःुक-बुदःुक तमा सलाइ, तमा फू रहन जाई, कर्रूआ तेल, मजीर के बत्ती, सीख सदःर, पानी के बदःर, भेम रची, फुच्ची। दःस संख्यावाची इस गीत से कोई स्पष्ट अर्थ नहीं निकलता, पर बच्चों के खेल में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। इस गीत को गाते समय बहुत से किशोर एक-दःूस का हाथ जोड़कर पंक्तिबद्ध खड़े रहते हैं। उदःुक-बुदःुक से लेकर फुच्ची, अर्थात् दःसवें संख्या तक वाले साधु होते हैं। पंक्ति में कम या अधिक बच्चों के होने पर इस गिनती को पुनः दःुहराया जाता है, फुच्ची के बाद वाला लड़का चोर होता है, फिर खेल शु होती है, वह चोर अन्य लड़कों का पीछा करता है, खड़े किसी लड़के को दःेने पर उसकी चोर संज्ञा स्पर्श किये गये लड़के को मिल जाती है। फिर उस नये चोर को सभी लड़के - ""फलां (नाम रखकर) चोर, लकड़ी बिन-बिन क अँजोर'' कहकर भागते हैं और वह चोर लड़का पीछा करता है। अर्द्धवृत्ताकार खड़े लड़कों में एक किना के लड़के से दःूस किना के लड़के के बीच प्रश्नोत्तर होता है - तहार घोड़ी का खाले?, ""घास खाले घसूमर खाले, तितिली के छाल खाले'', बुलबुलायीं कि जाई? ""जाईं''। तब फिर प्रश्नकर्त्ता अन्य लड़कों का हाथ जुड़ाये अन्तिम दःो लड़कों के जुड़े हाथ के नीचे से निकलता है और घोराबन्दी होती है। घे के बीच वाला लड़का अन्य लड़कों का पीछा करता है। गोइयां ब : यह खेल भी लगभग उपर्युक्त दःो खेलों की तरह ही है। वृत्ताकार बैठे लड़कों के केन्द्र में एक, और एक बाहर खड़ा रहता है। बाहर वाला खंखारता है, तब फिर दःोनों में प्रश्नोत्तर होता है - हमरा बारी के खंखारे? ""राजा कोतवाल'', राजा का मंगलेहं? ""अकन चाउर बकन चाउर, मंगले ह सबूजवा आम'', ""नइखे'', कोठिला झारऽ। इतना कहने पर सा लड़के कोतवाल का पीछा करने दःौड़ते इन खेल गीतों से सामाजिक रीति-रिवाज आदि का पता तो लगता ही है, साथ ही ठेठ ग्रामीण शब्दःों की भी जानकारी मिलती है, जिनमें समाज का बिम्ब जीवन्त है। इन खेल-गीतों के अतिरिक्त अब भी गाँवों में जो खेल प्रचलित हैं, वे निम्नलिखित हैं। इनमें प्रायः गीतों के विधान नहीं पाये जाते या पाये जाते भी तो हमा संग्रह में नहीं आ सके - खेल का बोल - अट्क, बट्क, बेल, बिच्छ्ी, हड्डी, सुस्ती, जमुना खपड़े की गोल चप्पी को एक पैर पर खड़ा होकर एक ही पैर के पंजे से मारते हुए अट्क से लेकर बेल तक आते हैं। बीच्छ्ी में पैर नहीं पड़ेगा, उछ्ल कर हड्डी में जाना है। पुनः एक पैर से चप्पी को मारकर सुस्ती में जाना है और वहीं दःोनों पैर रखकर सुस्ताना है। पुनः लंगड़ा बनकर जुमना में जाते और अब उल्टा लौट्ते हैं। इस खेल में खास बात एक पैर का व्यायाम है। लंगड़ा पैर नीचे नहीं आने पर जीत मानी जाती है। जीतने वाला जमुना में खड़ा होकर आँख मूँदःकर पी की ओर चप्पी फेंकता है। इस खेल को प्रायः बच्चियाँ खेला करती हैं। बगछू-बग : इस खेल में भी लंगड़ा होकर, अर्थात एक पैर से चप्पी मारते चलना है। विशेषता यह है कि एक ही श्वाँस में पू को को पार करना है। रुँकने का स्थान सुस्ती है। सुस्ती से शु होकर लंगड़े पैर सुस्ती में ही आना है। यह खेल भी प्रायः बच्चियों का है। कित-किती : लंगड़ा होकर एक पैर से चप्पी मारते और कितकिती बोलते हुए कोठा एक से शु कर सुस्ती में आना है। सुस्सी में दःोनों पैर रखकर आराम करना है। यह खेल भी बच्चियों का है। बिच्छ्ी : किसी भी लड़के को राय से बिच्छ्ी बना दिया जाता है। उसके नाक पर बाल रगड़ कर उसे बिच्छ्ी का तमगा दःे दिया जाता है। उसके हाथ में एक डं रहता है। वह डं लेकर अन्य लड़कों का पीछा करता है, शेष भागते हैं। जो लड़का बिच्छ्ी का नाक दःेगा, उसे बिच्छ्ी नहीं मारेगी। अइहऽ हो भें मामा, तहरा खेत में गो पड़ल बाड़े सन। बालू के ढ्ेर पर बैठकर लड़के अंजुरी में बालू लेकर अंगुलियों को ढ्ीला कर बालू गिराते और उपर्युक्त पंक्ति बोलते हैं। भेंड़ा बालू का एक प्रकार का कीड़ा है। उस कीड़े के मिल जाने पर उसे अंजुरी में बालू सहित लेकर बच्चे खेलाते हैं। यह खेल ज्या रेतीले स्थानों, यथा नदी किनारे होता है, जहाँ बच्चे बकरी या भेंड चराने जाते हैं। खपड़े की पाँच चप्पी तर-ऊँपर सजा दिया जाता है। लड़कों का दःो समूह होता है। एक समूह का कोई लड़का एक निश्चित स्थान से इस चप्पी पर गेंदः फेंकता है। दःूस समूह वाले उस गेंदः को रोकने का प्रयास करते हैं। यह क्रिके खेल जैसा ही होता है। गेंद से लगकर यदि चप्पी (गोट्ी) गिर जायेगी तो चप्पी गिराने वाला समूह विपक्ष से अपना बचाव करते हुए उस चप्पी को पुनः सीधा करने का और विपक्ष समूह गेंद लेकर उस पर चलाने का प्रयास करेगा। विपक्ष से बचकर चप्पी सीधा कर दःेने पर उसे गिराने वाला समूह विजयी होगा और खेल जारी रखेगा। चप्पी पर बिना लगे गेंद को पकड़ लेने अथवा चप्पी गिराने वाले समूह पर गेंदः से प्रहार कर दःेने वाले समूह को खेलने का मौका मिल जाता है। कबड्डी : अदःल-गदःल घोड़ कुदःौवल, महानदी पाँव पिये, रेशम जोगी राजा, इरिच मिरिच मिरचाई के पत्ता, चल कबड्डी आल-ताल, घंुघुरी घोड़े के नाल मर गइले जवाहर लाल, जिनकर मोछ्यिा लाले लाल, लाले लाल। कबडेन डेना-कबड़ेन डेना, हनुमान के बच्चा तीन जना। कबड्डी कहकर दःौड़ने वाला लड़का अपने को हनुमान का बच्चा कहकर ""बलशाली होने का'' धौंस दिखा रहा है। हनुमान के तीन लड़के नहीं, माना जाता है कि एक ""मकरध्वज'' थे, जो अहिरावण के अंगरक्षक थे। कबड़ी कबडुंआ, बाप तोर नेटुआ माई तोर इन, कतेक दःूर जायीं? इस कबड्डी गीत में दःूस दःल के लड़के को माता के इन (जादःू-टोना करने वाली औरत) और बाप को नट् बता कर पकड़ने की चुनौती दी गई है। १. ए बनवारी खोलऽ केवारी, तहरा घर में लहँगा सारी। २. चल कबडिया आरा, सनतावन गोली मारा कोई नाम लिया हमारा, कोई नाम लिया हमारा। ३. उजर बकरी चितरी कान, चलबे बकरी पुरबी बान? ४. चल कबड्डी आवऽतानी, तबला घुड़कावऽतानी तबला के पइसा, ले चल बगइचा। ५. कबड्डी आइले, तबला बजाइले तबला के पइसा लाल बगइचा, मन्नू धोबी अहिर के बच्चा। ६. एक मुट््ठी गरई छ्ल-छ्ल करई, कवनो वीर हमार गट््टा ना धरई। ७. आवऽतानी कबड्डी डेरइह मति हो, हाथ गोड़ टूट्ी कपार जनि फूट्ी। ८. कबड्डी में लबदी पताल घर भुआ, मालिन बिट्यिा खेलेली जुआ, खेलेली जुआ...। ९. चल कबडिया आरा, सुलतानगंज में मारा, कोई नाम लिया हमारा। १०. तीसी-तेल बबुर के लासा, लासा ऊँपर तीर कमान कबड्डी खेलो पक्का जवान, पक्का जवान...। ११. एक कौड़ी एल बेल, मा कौड़ी फू बेल, कौड़ी झनक बेल, कौड़ी झनक बेल, ...। १२. चल कबड्डी बारह बजी...। १३. आम छू आम छू, चिनिया बादःाम छू। १४. घो-घो रानी, कितना पानी। १५. तीसी तेल बबुर के छ्त्ता ,छ्त्ता ऊँपर तीर कमान कबड्डी खेले पक्का जवान, पक्का जवान...। दःोल्हापाती, थाड़ी-ट्ीका, झूला, सत लकड़िया, बिच्छ्ी, पचगोट्यिा, बिलाई-छानल, डंडा-पेस, गुलबाजी, सोलह-गोट्यिा आदि, ये साहसिक और परिश्रमयुक्त खेल हैं। बेटा-बेट्ी और घो-घो रानी (नदी या पोख में स्नान करते समय के खेल) तथा तिलवा-तिलई, अंजोरिया में घीव-खिचड़ी, आँख-मुन्नौवल, चकवा-चकई, कनझिट््टो, माट्ी-माट्ी, थ्री-सिक्स, लट््टू, अलदः-गदःल, इरिच-मिरिच, जूट्मार (कौड़ी), गुल्ली-डण्डा, ट्ीसो (शीशे की गोली से खेल), सींकगरी (डुंगरौना), घरौंदःा, बुढ़िया-रेड्डी, कित-किती, बगछू-बगछू, भंटा-लुकौवल, गबदःहिया-लदःान, भेंड़ा-खेल, थापा, हाड़ा-बिछ्ी, लंगडी, गम्हार, राजा-धुधका आदि कम परिश्रम पर बुद्धि-चातुर्ययुक्त खेल हैं। पुराने खेल जिनमें प्रायः अधिकांश आज लुप्त हो चुके हैं, इस प्रकार - इया-ढ्ेकार, पक्की गुलेर, चिल्होरिया-कटोरिया, संतर-पउअल, तिलवा-तिलई, गोइयाँ-चढ़मार, छौंकी-चित्त, गपटाइ-छ्टाई, बेलफार, गदीना, बीबी-खेल, लाल-लाल खेल, केमचा, आदि। इस तरह के सैकड़ों खेल ग्राम्य जगत में प्रचलित हैं। आज जबकि जीवन में खेल को बहुत महत्व दिया जा रहा है, प्राचीन ग्रामीण खेलों को उपेक्षित किया जाना, उनके विकास के विषय में न सोचा जाना दःु:खद है। धीरे-धी इन खेल-गीतों के साथ हमारी खेल संस्कृति भी धूमिल पड़ती जा रही है। आज ग्राम्य जीवन पर शोध भी हो र हैं, पर उनमें मौलिकता का अभाव दीखता है, क्योंकि कोई परिश्रम करना नहीं चाहता। आवश्यकता है, शोधार्थी गाँवों में घूम-घूमकर, पूछ्-ता कर इन चीजों को एकत्रित करें और उनकी उपयोगिता का विश्लेषण करें। यह खेल युवाओं का है। इसे खुले मैदःान में खेला जाता है। इसमें दःो समूह होता है। एक स्थान पर एक मोट्ी रेखा खींच दी जाती है। उस रेखा के दःोनों ओर दःोनों समूह खड़ा हो जाता है। एक-एक कर दःोनों ओर से एक-एक युवक परस्पर हाथ मिलाते और अपनी ओर खींचते हैं। इसमें पैर से परस्पर लंगड़ी मारने और अपनी ओर खींच लेने का प्रयास किया जाता है। खींच लेने वाला विजेता होता है। यह शारीरिक व्यायाम वाला एक महत्वपूर्ण खेल है। इसमें धूल से परहेज नहीं की जाती। किसी एक पक्ष का कैप्ट्ेन लड़का अपनी दःोनों मुट््ठी बांधकर आगे करता है, एक मुट््ठी में केंकड-पत्थर रहता है, जिसे बिना दिखाये रखा गया होता है, मुट््ठी आगे कर वह बोलता है - आंकड़ गोट्ी पाकल पान, खोल मुट्रठी पहलवान। (आंकड़उकेंकड़) दःूस पक्ष का कैप्ट्ेन लड़का अपने अनुमान से केंकड़ वाली मुट््ठी की ओर संकेत करता है। यदि उसका अनुमान सही हुआ, तो खेल की पारी उसकी। अन्यथा मुट््ठी बाँधने वाले पक्ष की। आधुनिक खेलों की भाषा में इसे टॉस जीतना भी कह सकते हैं। हास्य व्यंग्य : १. "बुढ़वा बेइमान माँगे करइला के चोखा' २. इ बुढ़िया जहर के पूड़िया, ना माने मोर बतिया रे। पक्की सड़क पर मोट्र दःउड़ावे, बइठल दःेखावे बतिसिया रे। ३. चलनी के चालल दःुलहा, सूप के फट्कारल हे। ४. कनिया हे, दःूगो धनिया दःऽ, लाल मिर्चा के फोरन दःऽ अपने खइलू पेड़ा, भतार के दःहलू चेरा? ५. दःेहात में अभी भी डोली और पालकी पर नौसे (दःुलहा) और कनिया को ढ्ोने की प्रथा है। माना जाता है कि बड़े सौभाग्य से जिंदःगी में एक बार कहरिये के केंधे पर चढ़ने का मौका मिलता है। कहार जब डोली में दःुलहिन की विदःाई कराकर गाँव से रास्ते गुजरता है तो बच्चे हँसी-मजाक में कहते - कनिया बहुरिया लाल गोदःना, बरवा बोलावे चल अंगना। रहर में रहरी हजार रहरी, डोली के कनिया हमार मेहरी। ६. पंडित जी पन डोल-डोल, पइसा मिले गोल-गोल। ७. पंडीजी-पंडीजी पाव लागिले, रउआ छ्ोट्की पतोहिया के ले भागिले। ८. मिसिर करस घिसिर-घिसिर, वाणी हाथ कटारी वाणी विलइया भागल जाले, मिसिर के महतारी। ये लोग स्कूल के शिक्षक हैं, किसी कारणवश अपने विद्यार्थियों को डराते-धमकाते तब लड़के इस तरह की व्यंग्योक्तियां छ्ोड़ते हैं। ९. श्री सुपुता, आँख डेढ््, कान डेढ़, आंख काहे चुपता?
१. चाकू चना खेलीले, मजूर के चाउर छॉट्ीले। छाँ -छाँट् धरीले, भइया के खिआइले। भइया गइले पट्ना, ले अइले ककना। दःेखी ए आइ माई, भउजो के ककना। २. दःाल दःदःरी मरीच दःदःरी, बाबा पोखरिया में बड़ मछ्री। कोल-कोलवांसी, भादःो मासी दःेखी तहार बिआह केने होई? दःाग लगे हुए ट्किो आम के बीज को चिट्की से दःबाकर एक लड़का दःूस को उपर्युक्त पदःबन्ध द्वेारा सम्बोधित करते हुए उछालता है। वह बीज जिस दिशा में गिरता है, मान लिया जाता है कि उसी दिशा में लड़के की शादी होगी। बगुला-बगुला कहाँ जा तारे? ""मकई के खेत में'', सेर भर सतुआ ले ले जो, गंगा में दःहवले जो। गंगा में के खँूट्ी-खाट्ी, लो के मचान, सबकर किरिया उतरि भगवान।
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