|
वाराणसी वैभव |
|
|
|
भोजपुरी लोक साहित्य एवं संस्कृति |
|
विश्वास/अंधविश्वास
१. ससक
साँप सन्यासी तेली, विधवा नारि
मिले अकेली। २. उत्तर
दःेखे सुनर नारी, ए मृत्यु कहे
पुकारी। ३. रवि
मंगल जो प सेवाती, जो बालक
जनमें आधी राती। ४. अतरल
कतरल छ्पट्ल केस, राह चलत में लागे
ठेस, ५. सोम
शनीचर पूरब न चालू, मंगर बूध उत्तर
दिशकालू। ६. छ्ेड़,
भेड़, गेरुँआ, तेली, बिधवा ना मिले
अकेली। ७.
जोबन से भरपूर सुन्दःरी, कामनी रस
सिंगार, ८.
नीलकेंठ के दःरसन दःहिने, जतरा काल
परसंग। ९. सबसे सगुन इ अच्छा, सनमुख गाय पिआवे बाछा। १०. चलते
समय वस्र जो अट्ँक कर फ जाय। ११. तीन जने जब संगे भयउ, हाथ डोलावत घरे अययू। १२. तीन विप्र कहवाँ, विपत प तहवाँ। १३.
मुस्किल मुस्किल मुस्किल तीन। १. बौड़ेरा उठने पर भूत की कल्पना। २. न न लगे, इसके लिए बच्चे के माथे पर काला ट्ीका करना; सब्जी के खेत में मिट््ट्ी के वर्तन (हांड़ी) को काले तथा सफेद रंग से रंग कर रखना। ३. मछ्ली मारने के पहले पोख की पूजा, जिसमें जीव (सुअर के बच्चे) की बलि दी जाती है। ४. दीपावली की भोर में दःरिद्र खेदःना, हँसुए से सूप पीट्कर। ५. वर्षा के लिए गँवमाल पूजा। ६. ग्रहण लगने पर नदी-स्नान, दःान-पुण्य। ७. लू से बचाव के लिए पॉके में प्याज लेकर चलना, घर के दःरवाजे पर प्याज टाँगना। ८. नदी के ऊँपर नाव या पुल से पार करते समय नदी को प्रणाम करना तथा पैसा फेंकना। ९. नवीन चूल् की पूजा १०. खेत में बीज बोने के समय अथवा खेती का पहला फसल काट्ने के समय खेत में खेतही पूजा, मिट््ट्ी के बर्तन में खीर पकाकर कषि दःेवता को चढ़ाना। ११. विवाह के समय लड़के/लड़की के हाथ में छूरी या कोई लौह अस्र दःेकर मट्कोर के दिन बाहर निकालना। फिर विवाह के दिन स्नान कराने के बादः दःाहिने पैर से, उलट्कर रखे गये मिट््ट्ी के ढ़कने को जिसके नीचे सरसो आदि रखा होता है, फोड़ना। परिछावन के दिन वर के माथे को लोढ़ा से पूजना, नौसे के ऊँपर गीले आ का लड् अच्छ्त छ्ींट्ना। १२. संध्या समय अथवा घर के किसी पुरुँष के भोजन करते समय किसी बाहरी व्यक्ति को जलावन की आग न दःेना। १३. पुत्र-प्रप्ति के निमित्त हुड़के के नचनिये को अपने आंचल पर नचवाना निम्न जाति की स्रियों में प्रचलित। १४. नदी में बुड़वा होने की बात। १५. रात में कौवे का बोलना, घर पर चिल्होर का बैठना, रात में कुत्ते का रोना, यात्रा के समय हाथ से शीशा गिरकर फूट्ना, स्यार का रास्ता काट्ना, आदि अशुभ माना जाता है। १६. नया घर बनाते समय सूप-कूंची अथवा कौवा मारकर टांगना। १७. पूआ-पूरी बनाते समय पास में एक लोटा जल रखना और चूल् के चारों ओर एक रेखा खींचना और जल छ्ड़िकना। १८. दीपक का आग न दःेना। १९. गोहत्या लगने पर भीक्षा मांगकर त करना। २०. शव को फुंकने के स्थान तक जाने वाला मंजिलिया कहलाता है। रास्ते में "राम नाम सत्य है' बोला जाता है। डोम के हाथ से प्राप्त आग से ही चिता जलाना, श्मशान भूमि पर तुलसी पौधा लगाना। २१. यात्रा पर जाने के समय दःूध, चोखा न खाना। २२. कान पर जनेउ चढ़ाकर शौच या पेशाब करना। २३. भोजन में तीन रोट्ी न दःेना। २४. बच्चे की सुरक्षा के लिए - ढ्ोढ़ी में काजर लगाना, लहसुन हींग के तबीज को काले धागे में पहनाना, मल्लाह के जाल के लोहा का बना छ्ल्ला बच्चे को पहनाना, विचित्र नाम रखना, मनौती करना, सवा वर्ष, ढाई वर्ष या पाँच वर्ष पर किसी दःेवता के सामने उसका मुंडन कराना, तुलादःान करना, झाड़-फूंक आदि। २५. दःक्षिण दिशा में बैठकर भोजन न करना। उत्तर सिरहार करके न सोना। २६. औरत का अपने पति का नाम न लेना। २७. संध्या समय दीपक जलाकर उसे प्रणाम करना। २८. शनिवार, मंगलवार और गुरुँवार को नख-बाल न कट्वाना। एक लड़के वाला पिता सेामवार को हजामत नहीं बनवाता है। २९. नयी रिश्तेदःारी कायम करने हेतु आने वाले मेहमान को दःूध न दःेना, भूजा या र्रूखा भोजन न कराना। ३०. दःूज का चाँद दःेखते समय हाथ में कु द्रव्य रखना। ३१. दःुकान में किसी की न न लगे, इसके लिए सात मीर्च, एक नीबू धागे में गूँथ कर दःुकान के सामने टाँगना (मंगल या रविवार के दिन)। ३२. कनफुकवे गु का चरण धोकर उसका जल पीना। ३३. बिना यज्ञोपवीत हुए छू से दःाढ़ी न बनवाना, नोहरनी से नोह न काट्ना। १. किसी की मृत्यु होने पर श्राद्ध तक घर में सब्जी न छौंकना, पुआ-पकवान आदि न बानाना। किसी शुभ दिन को घर में किसी की मृत्यु होने पर सदःा के लिए उस दिन को शुभ कर्म के लिए वर्जित करना। उत्तर सिरहान करके शव को रखना। चिता में आग लगाने वाले/मुखाग्नि दःेने वाले को सभी बराती अपने अपने हाथ से पंचलकड़ी दःेते हैं। मुखाग्नि दःेने वाला दःक्षिण दिशा में खड़ा होकर इन सभी लकड़ियों को पी शव पर फेंकता है। फूंकने वाले का पहले मुंडन होता है, वह गो-दःान करता है, घैला के जल से स्नान करता है, मारकीन वस्र पहनता है। पचाठी की रस्सी नहीं काट्ी जाती। दःूधा के दिन फुला बुझाया जाता है। शव पंूजने के बाद सभी स्नान करके चलते हैं, किन्तु मुड़कर पी कोई नहीं दःेखता। फूला बुझाने की क्रिया में श्मशान (चीता स्थल पर) ९६ लिखकर, वहाँ मस्तक की हड्डी का डुंकड़ा रखकर उसपर दःूध गिराया जाता है। कु लोग मस्तक की हड्डी पतुकी में रखकर उसे गंगा (नदी) में छ्ोड़ते हैं। शव फूंककर आने के बाद लोहा, आग, पत्थर, हल्दी, दःूब, जल, काँस का बर्तन (धातु) स्पर्श करते हैं, दःाँत से पाँच बार मीर्चा काट्ते हैं। फूला बुझाने के दिन पीपल के पेड़ पर मूंज की रस्सी के सहा भां (छ्ोटा कलश) टांगते हैं, वहाँ ब्राह्मण, हजाम मौजूद रहते हैं। कूस, दिया बत्ती, कसैली, पैसा रखकर मंत्र द्वेारा घं टांगा जाता है। उत्तरी पहनकर हाथ में कं में लगा लोहा लेकर कूस की पैंती पहनकर, पांच व्यक्ति घं घुरिया कर (दःाहिने से) पीपल वृक्ष पर घंटा में पानी गिराते हैं, जो पीपल के पेड़ पर पड़े चार अंगुल के मारकीन में तील, अच्छ्त रखते और प्रतिदिन उसी में से घं में डालते हैं। ब्राह्मणों में १२ दिन पर, क्षत्रियों में १३ दिन पर, वैश्यों और शुद्रों में १६ दिन पर कजिया/श्राद्ध/कर्म होता है। दःसकातर (दःस दिन पर) पिण्डदःान होता है, उस दिन पूरा परिवार (पुरुँष वर्ग) मुंडन कराता है। एकादःस के दिन पिण्ड कराकर महापात्र को खिलाया जाता है, दःान होता है, कोई कोई संढ़वाय भी कराता है, १२वें, १३वें या १६वें दिन भोज दिया जाता है। २. चेचक (निकसारी) निकलने पर पीत वर्ण का वस्र नहीं पहनना, किसी को कु न दःेना, सब्जी छौंककर न बनाना, मछ्ली-मांस न खाना, किसी की विदःाई न करना। पानी छ्नाकर गुड़, चावल, काली जी को चढ़ाकर लड़कों में बांट्ना और मैया का गीत गाना। ३. गंगा स्नान से सारा पाप धुल जाने का विश्वास। ४. बोआई के दिन किसी को कु न दःेना, भूजा न भूजना। ५. भूत भगाने के लिए पचारा गीत गाना। ६. रविवार को हल नहीं चलाया जाता। ७. कुँआर लड़का/लड़की को तावे की पहली रोट्ी और चूल् पर से ही भोजन निकाल कर न दःेना। ८. शनिश्चर ग्रह से बचने के लिए, हाथ में लो की अंगूठी पहनना। ९. ताम्बा पहनकर झूठ न बोलना। १०. बीमारी से बचाव के लिए गले में ताबीज डालना। ११. हजाम के द्वेार पर हजामत न बनवाना (इसलिए कि बनवाने वाले का ऐश्वर्य चला जाता है।) १. भुइली लगने पर रोगी के शरीर में सिन्दःुर एवं कड़वा तेल मिलाकर पोंतना और कम्बल ओढ़ाकर सुलाना। २. कट्ने पर इमिरती का पत्ता छापना, गेंदःा फूल का रस गिराना अथवा चूना पोतना। ३. कुत्ता के काट्ने पर प्याज पीसकर क स्थान पर लगाना और सात कुँआ दिखाना। ४. सर्दःी होने पर घोड़सार की हवा सूंघाना। ५. चोट्, मोच लगने पर हल्दी-चूना गर्म कर छापना। ६. कौड़ी छुआने (बाघी/गिल्ट्ी निकलने) पर रेंड के पत्ता में रेंडी तेल लगाकर उसे आग पर सेंककर फूले हुए स्थान पर चिपकाना। ७. बलतोड़ होने पर तीसी पीसकर छापना। (इससे फोड़ा शीघ्र पक कर फू जाता है) ८. हड्डी बिरनी के डंक मारने पर मिट््ट्ी का तेल लगाना। ९. गाय-भैंस के ब्याने पर मसूर का दःाल उसीनकर/उबालकर पिलाना। १०. ज्वर में तुलसी-पत्ता, मरिच, कतरा के सोर, गुमा के पत्ता और नमक का काढ़ा बनाकर पिलाना। ११. कपरबथी में मलयगिरी चंदःन रगड़कर छापना, नौसादःर, चूना मिलाकर सुरकना। १२. दःाँत दः में मदःार का दःूध ई में लेकर रखना। बहुआर का छाल गरम कर, नमक डालकर कुल्ला करना। नमक, हींग, लहसुन, कड़वा तेल गर्मकर, बांस के दःातुन से मंजन करना। १३. कान-दः में कड़वातेल एवं लहसुन गर्म कर डालना अथवा गेंदःा फूल के पत्ता का रस, पीपल के पत्ते के रस में मिलाकर डालना। १४. पे दः में हींग, प्याज का रस एवं हुक्के का पानी पिलाना। १५. हड्डी बिरनी के काट्ने पर लोहा से रगड़कर, नाद के पानी से धोना। १६. बासी पानी जो पिये, हरे भून के खाय। क महादःेव पार्वती से, ता घर बैद्य न जाय। अमावश्या, ज्योति पर्व के दिन : पहले सात दीपक - धरती, ब्रह्म, गंगाजी, अन्नपूर्णा, नयनमाता (कुआँ), सूर्य एवं महादःेव के नाम जलाया जाता है। चतुर्दःशी के दिन जम्हुआ (यम) का दीया जलाया जाता है। दीपक ले जाने वाला पी मुड़कर नहीं दःेखता। अमावश्या के दिन नया बर्तन, वस्र उपयोग में लाया जाता है। दीपक - खाद रखने वाले गड् पर आंगन में दीपक के नीचे ढ़कने में कोई अन्न रखा जाता है। फिर शुद्ध जल गिराया जाता है। गाय, बैल या बाछ्ी के गोबर से गोधन की आकृति बनाई जाती है। उसमें गोधन, गोधिनी, घर, जाँत-ढ्ेंकी, ओखल, मूसल, नादः, घोठा, आदि की आकृति बनायी जाती है। परिवा (अमावश्या के दःूस दिन) बैल से वह आकृति खनवायी जाती है, बैल बछ्ड़े को नहलाकर नया पगहा लगाया जाता है। उस दिन पशु से कोई काम नहीं लिया जाता। परिवा के दःूस दिन गोधन की पूजा होती है, उसी दिन कुँवारी कन्यायें पीड़िया लगाती और एक माह तक गीत मंगल गायन के बाद उसे नदी में बहा दःेती हैं। पूर्णिमा के दिन चकवा-चकई दःहवाया जाता है, तुलसी-पौध के पास १५ दिन तक (अमावश्या से पूर्णिमा तक) दीपक जलाया जाता है। जच्चा-बच्चा के सम्बन्ध में : अलवात - शिशु के जन्म से एक माह तक स्री अलवात कहलाती है। लरकोरी - छ्ह महीने तक अलवात स्री लरकोरी कहलाती है। सउरी - जिस कोठरी में शिशु जन्म लेता है, वह कु दिन तक सउरी कोठरी कही जाती है। जाबड़ - शिशु जन्म के समय माता के शरीर में लगी गंदःगी, रक्त-पानी आदि। पुरइन - बच्चा जन्म लेते समय शरीर से निकला खून, लेदःा-पानी। खेड़ी जुड़ाना - लड़का होने पर १२ दिन पर और लड़की होने पर ६ दिन पर खेड़ी जुड़ाया जाता है। इस विधान में कट्हल के पत्ता पर रोट्ी, रसियाव रखा जाता है और एक छ्ोट्ी गुड़ही बनाकर उसमें थोड़ा दःूध रखा जाता है, बच्चे के पीने के लिए प्रतीकात्मक र्रूप में। दःूध थोड़ा ही रखा जाता है, यह मानकर कि अधिक दःूध बच्चे को पचेगा नहीं। सास या दःेवरानी लड़के को तेल मालिस करती है। इस अवसर पर औरतें गीत भी गाती हैं। छ्ठियार - जन्म से ९ दिन बाद बच्चे का और ६ दिन बाद बच्ची का छ्ठियार होता है। बच्चे के लिए कट्हल के ९ पत्तों पर ९ रोट्यिाँ और बच्ची के लिए ६ पत्तों पर ६ रोट्यिाँ रखी जाती हैं। शिशु को काजल लगाया जाता है। बुआ, बहिन, नेग माँगती हैं। बच्चे को काजल लगाकर, उसे साफ कपड़े में लपे कर दीप के समक्ष औंधे मुँह सुलाया जाता है और बच्चे के स्वास्थ्य एवं दीर्घायु के लिए कामना की जाती है। दीपक आ का बनाया जाता है और उसमें सरसो का तेल या घी डाला जाता है। छ्ठियार आकृति - लरकोरी की कोठरी के दीवाल पर गोबर पिण्ड से छ्ठियार की आकृति बनायी जाती है। सामान्यतः छ्ो चौकोर आकृति के बीच में गोबर के अनेक पिण्ड क्रम से दीवाल पर चिपका दिये जाते और उसे सिन्दःुर से ट्कि दिया जाता है। पसनी - लरकोरी औरत की कोठरी के दःरवाजे पर अलाव जलाया जाता है ताकि अशुद्ध हवा कोठरी में प्रवेश न करे। लरकोरी औरत घर के अन्दःर आते वक्त उस अलाव में अपना पैर सेंकती है। इसी अलाव को पसनी कहा जाता है। प्रथम स्नान - लरकोरी औरत को पहला स्नान कराते समय उसके मुख में अजवाइन डाल दिया जाता है; कोठरी के बाहर निकलते समय उसके हाथ में कोई लौह पदःार्थ छूरी, खुरपी, हँसिया, जो भी मिल जाय, रहता है; स्नान कराने से पहले उसके शरीर पर सरसों का बुकवा लगाया जाता है, फिर साबुन से स्नान कराया जाता है। स्व वस्र पहनाकर उसे चटाई या पुआल पर बैठाया जाता है और उसके नख का जाते हैं। इस सफाई उपक्रम के बाद उसे हलवा खाने को दिया जाता है। ओछ्वानी - बच्चा जनने के बादः स्री शरीर से कमजोर होती है। शरीर से काफी रक्त निकला रहता है। अतः उसका स्वास्थ्य ठीक करने के लिए अनेक प्रकार की आयुर्वेदीय जड़ी-बूट्यिों तथा मेवों का मिश्रण, जिसे ओछ्वानी कहते हैं, नित्य पीसकर कु दिनों तक उस स्री को दिया जाता है। उसके साथ दःूध, घी, हल्दी एवं हींग का विशेष प्रबन्ध रहता है। उत्सव - शिशु के जन्म के समय बच्चे की फुआ, बहिन या चाची थाली बजाती (पुत्र होने पर); बच्चा निर्भय रहे, इसके लिए उसकी माँ की अँजुरी में कोई अन्न- धान, गेहँू आदि रखकर चमइन उसे लोकाती (उछालती) है। अँजुरी लोकाने का यह विधान जच्च-बच्चा के प्रथम स्नान के दिन किया जाता है। नार काट्ना - प्रसव के बाद बच्चे का नाल जो माता से जुड़ा रहता है उसको काट्ना, नार काट्ना कहा जाता है, इसे साफ ब्लेड से काटा और साफ कपड़े या धागे से बाँधा जाता है। यह नाल काट्ने का कार्य ग्रामीण क्षेत्रों में चमइन किया करती है। गर्भवती स्री के लिए "गोड़ भारी होना' और प्रसव के समय दःर्दः होने को "बेदःन/बेधन' कहा जाता है। पुत्र जन्म के समय सोहर गीत गाया जाता है। झाड़-फूंक/ओझौती : गर बान्हो गरबन्धन बान्हो,
सवा लाख बिखठाई बान्हो अधकपारी : ए पार गंगा ओ पार जमुना शिव, तू काशी जइबऽ,
काशी जइबऽ नरक में परबऽ। सीस करम, बीख हरन, दःेश कौरुँ
बखानिए।
|
|
|
|
|
|
|
Content given by BHU, Varanasi
Copyright © Banaras Hindu University
All rights reserved. No part of this may be reproduced or transmitted in any form or by any means, electronic or mechanical, including photocopy, recording or by any information storage and retrieval system, without prior permission in writing.