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वाराणसी वैभव |
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नित्ययात्रा |
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ब्रह्मवैवर्त्तपुराण में इसका विधान यह है कि प्रात: काल उठकर ढुण्ढिराज, भवानी, शंकर, कालभैरव, दण्डपाणि, छप्पन विनायक, आदिकेशव तथा नवचण्डिकाओं को मानसिक प्रणाम करके नित्य कर्म में लगे। बाद में गंगास्नान, सन्धयोपासन, तपंण इत्यादि करके विश्वेेश्वर का स्मरण करता हुआ पूजन-सामग्री लेकर नित्ययात्रा को निकले। सबसे पहले देवी के मण्डप में जाय और वहाँ भवानी का पूजन करे। (भवानी की मूर्ति तथा भवानी-शंकर का शिवलिंग आजकल अन्नपूर्णा-मंदिर से मिले हुए राम-मंदिर में कालीजी और जगन्नाथजी के बीच में है)। पहले मुख्य यात्रा इन्हीं की होती थी, परन्तु अब अन्नपूर्णाजी की होती है। पूजन के पश्चात आठ प्रदक्षिणा करे और स्तुति तथा वन्दना करने की होती है। पूजन के पश्चात आठ प्रदक्षिणा करे और स्तुति वन्दना करने के बाद ढुण्ढिराज का पूजन करें। तत्पश्चात, ज्ञानवापी की प्रदक्षिणा करके वहाँ स्नान करे और दण्डपाणि को प्रणाम करके मुक्तिमण्डप में स्थित देवताओं का पूजन करे (आदित्य, द्रोपदी, विष्णु, दण्डपाणि तथा महेश्वर ये मुक्तिमण्डप के पाँच देवता हैं) इतना करने के बाद विश्वेश्वर के मन्दिर के भीतर जाय और उनका पूजन करे, तदनन्तर उनकी तीन प्रदक्षिणा अथवा मुक्तिमण्डप में उनको पन्द्रह प्रणाम करे। इसके बाद स्वेच्छानुसार अपने काम मे लगे। काशीखण्ड में इस यात्रा का दूसरा क्रम है और उसके दो भाग किये गये हैं। प्रथम भाग को दैनन्दिनी कहा है। इसके अनुसार पहले मुक्तिमण्डप के देवताओं और महेश्वर का पूजन करके ढुण्ढिराज की अर्चना करें और तब ज्ञानवपी में स्नान करके नन्दिकेश्वर, तारकेश्वर, महाकालेश्वर तथा पुन: दण्डपाणि इन पाँच तीर्थों की दःैनन्दिनी पंचतीर्थ-यात्रा पूर्ण करें। तदुपरान्त, विश्वेश्वरी यात्रा करें। पद्मपुराण में तीसरा क्रम है कि प्रात:काल गंगास्नान जहाँ चाहे वहाँ करे, परन्तु मध्याह्म में मणिकर्णिका में स्नान करके विश्वेश्वरी के दर्शनों को जाय और भवानी, दण्डपाणि तथा भैरव का पूजन करे। आजकल बहुधा लोग काशीखण्ड में बताये हुए क्रम से नित्ययात्रा करते हैं और दैनन्दिनी के बाद विश्वेश्वर तथा अन्नपूर्णा का दर्शन करके यात्रा समाप्त की जाती है। यह क्रम पिछले डेढ़ सौ वर्षों से इसी प्रकार होता रहा है, यह प्रमाणित है। परन्तु, एक हस्तलिखित तालिका में इसका दूसरा स्वरुप देखने को मिला है। उसमें निम्नांकित क्रम लिखा है।
यह तालिका जिस कागज पर लिखी है, वह सन् १८३५ ईसवी का बना हुआ है। इस प्रकार यह क्रम भी डेढ़ सौ वर्ष पूर्व प्रचलित था, ऐसा मानना पड़ता है।
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