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वाराणसी वैभव |
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चतुर्दश आयतन यात्रा |
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प्राचीन लिंगपुराण
में इसका एक ही प्रकार का वर्णन
मिलता है, परन्तु काशीखण्ड के अन्तिम
अध्याय में इसके दो अन्य प्रकारों का
उल्लेख है। इस प्रकार, इस यात्रा के
तीन प्रकार प्रचलित है। चतुर्दशायतन
यात्रा में प्रत्येक मास की कृष्णपक्ष की
प्रतिपदा से आरम्भ करके चतुर्दशी
तक एक-एक आयतन का नित्य दर्शन-पूजन
करने का विधान हैं यदि यह न
सम्भव हो तो कृष्णय का भी
चतुर्दशी के दिन पूरी यात्रा करे। "त्रिस्थलीसेतु' के समय (सन १५८५ ई.)
में शिष्ट-सम्प्रदाय शैलेशादि
चतुर्दश आयतनों की यात्रा चैत्र में,
ओंकारादि चतुर्दश आयतनों की
वैशाख में तथा अमृतेशादि चतुर्दश
आयतनों की यात्रा ज्येष्ठ-कृष्ण में
करते थे।
(क) प्राचीन लिंग पुरान १५ में इस यात्रा क्रमबद्ध विवरण है : ठत्रिस्थलीसेतु' में जो उद्धरण दिया हुआ है, उसमें बारहवीं पंक्ति में निवासेश्वर, चौदहवीं पंक्ति में शुक्रेश्वर तथा पन्द्रहवीं पंक्ति में व्याघ्रेश्वर के नाम उल्लिखित हैं (त्रि. से. २६४)। काशीखण्ड में इस यात्रा का जो वर्णन है, वह भी त्रिस्थलीसेतु के पाठ को ही पुष्ट करता है। ठकृत्यकल्पतरु' के इस उद्धरण में लिपि-प्रमाद के कारण कुछ अशुद्धियाँ हो गई हैं, जिनका निराकरण त्रिस्थलीसेतु के आधार पर हो जाता है। ठकृत्यकल्पतरु' में ही पृ. १३५ पर इस सम्बन्ध का जो श्लोक है, उसमें भी ठीक पाठ है:।
आजकल भी यह यात्रा इसी प्रकार होती है, जिसमें शैलेश्वर (मढियाघाट, वरणातट), संगमेश्वर (वरणा-संगम), स्वर्लीनेश्वर (नया महादेव, राजघाट पर), मध्यमेश्वर (मैदागिन से उत्तर), हिरण्यगर्भेश्वर (त्रिलोचनघाट पर), ईशानेश्वर (बाँसफाटक सिनेमा के पीछे की गली में) गोप्रेक्षेश्वर (लालघाट पर), वृषभध्वज (कपिलधारा पर), उपशान्तेश्वर (अग्नीश्वर घाट पक), ज्येष्ठेश्वर (काशीपुरा में) निवासेश्वर (भूतभैरव पर), शुक्रेश्वर (अन्नपूर्णा-मन्दिर के पीछे कालिका गली में), व्याघ्रेश्वर (भेतभैरव) पर), तथा जम्बुकेश्वर (बड़े गणेश के पास) इनका दर्शन-पूजन किया जाता है। काशीखण्ड १७ में चतुर्दश आयतन यात्रा के जो दो अन्य क्रम दिये हैं, उनकी यात्राएं भी प्रचलित हैं : (ख) इसमें पहली में ओंकारेश्वर (कोइलाबाजार), त्रिलोचन (प्रसिद्ध), आदिमहादेव (वहीं पर), कृत्तिवासेश्वर (वृद्धकाल के पास), रत्नेश्वर (वहीं पर), केदारेश्वर (केदारघाट पर), धर्मेश्वर (मीरघाट पर), आत्मावीरेश्वर (संकटाघाट पर), कामेश्वर (मछोदरी के पूर्व); विश्वकर्मेश्वर (हनुमानफाटक के उत्तर), मणिकर्णीश्वर (मणिकर्णिका घाट के पास), अविमुक्तेश्वर (विश्वनाथ के मन्दिर में अथवा ज्ञानवापी मस्जिद की सीढियों के सामने) तथा विश्वेश्वर का दर्शन-पूजन होता है। (ग) ब्रह्मनाल पर अमृतेश्वर, ज्ञानवापी के पूर्व तारकेश्वर (लिंग गुप्त), लाहौरी टोला में धनीराम खत्री के मकान में ज्ञानेश्वर, ललिता घाट पर करुणेश्वर, फूटे गणेश के पास मोक्षद्वारेश्वर, ब्रह्मनाल पर स्वर्णद्वारी में स्वर्गद्वारेश्वर, बालमुकुन्द के चौहट्टा में ब्रह्मेश्वर खोवाबाजार में लांगलीश्वर, दारानगर में वृद्धकालेश्वर, पुलिस लाइन में चण्डीश्वर, गोरखनाथ के टीले पर हरश्चन्द्र काँलेज के पास वृषेश्वर, ज्ञानवापी के उत्तर मन्दिकेश्वर (लिंग गुप्त है), ज्ञानवापी के पास, अथवा मणिकर्णिका घाट पर महेश्वर तथा मणिकर्णिकेश्वर के पास ज्योतिरुपेश्वर का अर्चन-पूजन किया जाता है। पदमपुराण के अनुसार, चतुर्दशलिंग-यात्रा के तीनो क्रमों को एक साथ करने पर यह यात्रा बयालीस लिंगो की यात्रा हो जाती है और इसी नाम से यह आजकल प्रसिद्ध है। इसी प्रकार, ओंकारादि चतुर्दशायतन और तदुपरान्त दक्षेश्वरादि अष्टायतन तथा शैलेशादि चतुर्दशायनतन इनकी इस क्रम से एक साथ यात्रा को काशीखण्ड १८ में छत्तीस लिंगयात्रा कहा गया है। |
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