वाराणसी वैभव

शव- पूजन : अनोखी परंपरा


वाराणसी की यात्रा करने वाले, धार्मिक जन या पर्यटक जब वाराणसी पहुँचते हैं, तो वे नगर के अनेक धार्मिक स्थानों, मठों, मंदिरों और ऐतिहासिक स्थानों को देख कर अपनी यात्रा सफल मानते हैं। पर्यटक उस समय आश्चर्य- चकित हो जाते हैं, जब काशी की जनता किसी शव को देखते ही ""हर- हर महादेव'' कह कर उसके प्रति आदर प्रकट करने लगती है, झुक कर अभिवादन करती है। इतना ही नहीं, मंदिरों में पूजा करने के लिए जाते हुए, धार्मिक जन, जब बीच मार्ग में किसी शव को देख लेते हैं, तो अपने पास के पुष्प, अक्षत, माला आदि उस शव पर चढ़ा देते हैं। काशी के निवासी हिंदू ऐसा क्यों करते हैं ? इसका उत्तर सर्वसाधारण के पास तो नहीं है। काशी के किसी बड़े- बूढ़े या पंडित से आप इस रहस्य को पूछेंगे, तो संभवतः वे इस संदेह को अवश्य दूर कर सकते हैं।

यह प्रायः बहुत लोग जानते हैं कि काशी में मृत्यु मंगलकारी मानी गयी है। काशी में शवपूजन परंपरा की अपनी अलग कहानी है। काशी में ही अगर कोई हिंदू मर जाता है, तो आप देखेंगे कि मृत्यु के बाद उस शव को स्नान कराया जाता है, स्नान के बाद उसे नूतन वस्र पहनाया जाता है, नूतन वस्र के बाद, धूप, अक्षत, चंदन, माला आदि से उसका पूजन किया जाता है। काशी की देखा- देखी अन्य गाँवों या स्थानों में भी अब ऐसा ही होने लगा है। इसे "देखा- देखी' कहें या लौकिक परंपरा कहें, काशी में है। शव को ले जाते समय ""राम नाम सत्य है'' कहना, लोकपरक और अध्यात्म परक, दोनों है। वस्तुतः शव पूजन परंपरा केवल काशी में ही प्रचलित हुई और काशी के लिए ही इसका महत्व भी है।


शव- पूजन क्यों ?

वाराणसी में ही शवपूजन क्यों होता है ? इसका उत्तर महाभारत के ""संवर्त मरुत्तीय प्रसंग'' में है। शव को स्पर्श करने का विधान लिखा गया है। "सचैल स्नान' करने का विधान लिखा गया है। "सचैल स्नान' का मतलब है कि उस समय शव के शरीर पर जितने भी वस्र हों, उनके साथ ही स्नान कराना चाहिये। शव को स्पर्श करने के बाद प्रायः समस्त हिंदू स्नान अवश्य करते हैं। अतः शव पूजन और हर- हर- महादेव कह कर शव का अभिवादन अपने- आप में कोई विशेष प्रसंग अवश्य छिपाये हैं। महाभारत के संवर्त मरुत्तीय प्रसंग से उपयुक्त शंका का समाधान हो जाता है। वह प्रसंग निम्न प्रकार से है --

एक बार राजा मरुत्त को एक यज्ञ करने की इच्छा हुई। राजा मरुत्त अपने गुरु बृहस्पति को तदर्थ निमंत्रण देने गये। वृहस्पति जी उस समय कहीं अन्यत्र यज्ञ कराने में लगे थे। अतः उन्होंने राजा मरुत्त को वापस लौटा दिया। राजा मरुत्त को विमुख लौटते देख, बीच मार्ग में ही नारद जी मिल गये। नारद जी ने उदास मन वाले राजा से उदासी का कारण पूछा। राजा ने वृहस्पति द्वारा उनके यज्ञ को न संपादित कराने का कारण बता दिया। नारद जी ने कहा, ""राजन् ! उदास होने की आवश्यकता नहीं है। आप वृहस्पति जी के कनिष्ठ भ्राता संवर्त जी से मिलें। वह आप का यज्ञ अवश्य करा देंगे।'' राजा ने संवर्त जी के निवास स्थान के बारे में पूछा, तो नारद जी ने बताया "राजन्' वह एक स्थान पर नियत रुप में नहीं रहते। वह सर्वदा एक बार भगवान शंकर का दर्शन करने काशी पहुँचते हैं। विचित्र वेश में रहते हैं। आसानी से पहचान में नहीं आते। भगवान विश्वनाथ का दर्शन करके, तुरंत काशी से बाहर हो जाते हैं। पर फिर भी उनका विशेष पहचान है। ""जो मानव विश्वनाथ जी की ओर जाता दिखाई पड़े और बीच मार्ग में, किसी शव को देख कर झुक कर नमस्कार करके, यदि वहीं से वापस हो जाये, तो समझ लेना कि वही संवर्त ॠषि है।''

नारद जी ने मरुत्त राजा को यह भी समझाया,""तुम उन्हें पहचान कर, उनके पीछे लग जाना और जब एकांत मिले तो हाथ जोड़कर अपनी मनोकामना बता देना। अनुनय- विनय करने पर वह यज्ञ कराने के लिए अवश्य तैयार हो जायेंगे।''

नारद जी राजा को समझा कर अदृश्य हो गये। राजा मरुत्त काशी के लिए प्रस्थान कर दिये। राजा ने अपनी बुद्धि से काम लिया। राजा मरुत्त ने एक दिन काशी के मुख्य द्वार पर एक शव को उठा कर रख दिया। बहुत सबेरे एक अवधूत मुख्य द्वार से काशी में प्रवेश करने लगा। उस अवधूत को द्वार पर ही एक शव का दर्शन हो गया। वह अवधूत शव को साष्टांग प्रणाम करके, कई स्रोतों से स्तुति करके वापस होने लगा। राजा मरुत्त ने समझ लिया कि यही संवर्त ॠषि हैं और वह ॠषि के पीछे चल दिये। आगे- आगे ॠषि और पीछे- पीछे राजा। 

ॠषि को कुछ आहट मालूम हुई। उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा। अपने पीछे एक मनुष्य को आते देख ॠषि को भला न मालूम हुआ। वह राजा की ओर धूल, माटी फेंकने लगे। राजा नारद जी द्वारा प्रशिक्षित थे। वह कहाँ डरने वाले थे। अवधूत जी ने राजा को वापस करने का बहुत प्रयास किया, किंतु राजा उनके पीछे चलते ही चले गये। अवधूत वेश में छिपे ॠषि संवर्त जी ने पूछा,""तुम क्यों मेरे पीछे चल रहे हो। राजा मरुत्त ने सारी बातें निवेदन के स्वर में कह दी। राजा के अनुनय पर संवर्त जी यज्ञ कराने के लिए तैयार हो गये और राजा मरुत्त का यज्ञ पूरा हो गया।

उपयुक्त उपाख्यान से यह ज्ञात होता है कि राजा मरुत्त के पहले से ही काशी में ""शव'' का अभिवादन और पूजन होता था। जाबालि उपनिषद् में भी काशी में शव- पूजन परंपरा का प्रसंग मिलता है। जाबालि उपनिषद् से ही अवगत होता है कि काशी में मरने पर ""शव'' शिव के समान हो जाता है। शव शिव के समान क्यों हो जाता है ? इसका उत्तर भी है, जीव को मरते समय काशी में ही शिव ""तारकमंत्र'' का उपदेश करते हैं। "तारक मंत्र' का उपदेश पाकर जीव को ब्रह्म ज्ञान हो जाता है। ""ब्रह्मज्ञान'' प्राप्त कर लेने पर जीव ""मोक्ष'' का अधिकारी हो जाता है। मोक्ष प्राप्त करके जीव ""शिव'' के समान ही हो जाता है। अतः"शिव के समान काशी में मरने वाले ""शव'' को लोग हर- हर- महादेव कह कर, नमन करते हैं, अभिवादन करते हैं और पूजा करते हैं।

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Content Prepared by Sunil Jha 

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