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समय बदल रहा है, बदल रहा है, हमारा समाज। परंतु समाज जितनी तेजी से संस्कारशील हो रहा है, उतनी तेजी से सामाजिक संस्कार की रुढियों से भी वह जुड़ा है। अतः २० वीं शती में भी विधवाओं की करुण कहानी जीवित है।
काशी में मरने पर पुनर्जन्म नहीं होता -- इस विश्वास से हमारे हिंदू समाज के वृद्ध- वृद्धाएँ आज भी काशी में भीड़ लगाते हैं। इन भीड़ों में वृद्धाओं की संख्या ज्यादा है और इनमें भी विधवाएँ सर्वाधिक हैं। संख्या को देखकर यह सोचना गलत होगा कि ये विधवायें स्वतः ही काशीवास के लिए यहाँ भीड़ लगाती हैं। असलियत तो यह है कि काशीवास की इच्छा हर हिंदू के मन में रहती है, परंतु इन वृद्धाओं के काशीवास के पीछे कुछ अन्य कारण विद्यमान हैं, जिसके तहत, वे सब कुछ छोड़, इतनी दूर प्रवास में , प्रायः अकेली चली आती हैं। इन विधवाओं की जिंदगी का यथार्थ से बड़ा गहरा रिश्ता है।
काशी में लगभग हर प्रदेश की विधवाएँ न आयेंगी। पंरतु इनमें दक्षिण- भारतीय विधवायें संपन्न हैं। उन्हें भीख माँग कर दिन गुजारना नहीं पड़ता। कन्नड़, तेलुगू, तमिल विधवायें या तो काशीवास के लिए आती हैं या अब काशी की ही निवासिनी होती जा रही हैं। इसकी संख्या दिनो- दिन घटती जा रही है। इसका कारण यह है कि यद्यपि दक्षिण भारत में उत्तर भारत जैसा वैधव्य पर कठोर अनुशासन है, फिर भी वहाँ विधवायें घर में सम्मान की पात्र हैं, जिसके कारण घर छोड़कर, इतने दूर प्रवास में खतरे की जिंदगी बिताने का प्रश्न उनके सामने कम ही आता है।
पंजाब, हरियाणा, समस्त पर्वतीय प्रदेश, जम्मू- कश्मीर, गुजरात, उड़ीसा आदि प्रदेशों से भी विधवायें काशीवास के लिए नहीं आतीं। इसका कारण यह है कि इन प्रदेशों में विधवाओं को घर में भार- स्वरुप समझा ही नहीं जाता तथा इन प्रदेशों का वैधव्य जीवन भी उतना कठोर नहीं होता, जितना बंगाल, बिहार, भोजपुरी, मैथिल आदि इलाकों का है।
विधवाओं की दिनचर्या
काशी में अधिकांश असहाय विधवायें मंदिर तथा घरों में भीख मांगती हैं, मंदिरों में भजन करती हैं और स्वतंत्र रुप से कुछ काम करके पेट चलाती हैं। ""फिर भी तो पेट नहीं चलता'' छपरा से आयी एक वृद्धा ने कहा। अस्सी, भदैनी क्षेत्रों में अधिकतर भोजपुरी विधवायें रहती हैं, जो भीख मांगती हैं, मठों एवं मंदिरों में भण्डारा खा कर पेट भरती हैं।
टेढ़ी नीम में अन्हड़ी कोठा तथा नीलकण्ठ मुहल्लों के कुछ मकानों के निचले अंधकारमय कमरों तथा खुले बरामदे में, छिन्न- भिन्न कपड़ों एवं कागजों के ऊपर ही उनकी घर- गृहस्थी है। ये अन्नपूर्णा तथा विश्वनाथ मंदिर में भीख मांगती हैं। जो चलने में अक्षम हैं, घर में बैठकर पैकेट आदि बनाती हैं। इनमें से कुछ को ही सरकारी पेंशन मिलती है। श्यामा छात्रावास की तरफ से मैथिल विधवाओं को मासिक सहायता दी जाती है। जून ८२ से आर्थिक अभाव के कारण यह भत्ता भी बंद है। मीरघाट भजनाश्रम में घन्टों भजन करने से कुछ अनाज एवं चावल इन्हें मिल जाता है। कभी इन सभी का अपना घर- वार था। आज वे एकदम अकेली हैं और इस ६०- ७० वर्ष की उम्र में भी एक- एक पैसे के लिए विश्वनाथ गली में तथा कभी घाटों पर यात्रियों के पीछे दौड़- धूप करती हैं। सहरसा से आयी ६७ वर्ष की वृद्धा कहने लगी,""दिन भर तो इस दौड़- धूप में व्यस्त रहती हूँ। रात में सोने पर अतीत के वे दिन याद आते हैं कि मैं भी एक घर की मालकिन थी और मेरे ही निर्देश से गृहस्थी चलती थी। अब तो आँसू बहाने के अलावा कुछ नहीं रह गया। मेरे अति शत्रु को भी वैधव्य न मिले।''
यद्यपि काशीवासी नेपाली विधवायें भी असहाय एवं गरीब हैं, फिर भी इनकी स्थिति कुछ ठीक है। नेपाली समाज की ओर से इन्हें अक्सर सीधा मिलता रहता है। इनका भीख माँगने का तरीका भिन्न है। ये अधिकांश नेपाली मंदिर में भजन करती हैं, मंदिर का काम करती हैं। पुण्यार्थियों की सेवा एवं देखभाल करती हैं। मंदिर के नियमित यात्री इनके इन कार्यों से भली- भांति परिचित रहते हैं। अतः कच्चा अनाज, आटा, चावल आदि इन्हें देते हैं। इस तरह इन विधवाओं को खाने का सामान मिल जाता है।
अनेक नेपाली विधवाओं में कुछ को पेंशन भी मिलती है। नेपाली नवयुवक दौड़- धूप कर पेंशन की व्यवस्था करा देते हैं। मारवाड़ी विधवायें काशी में कम ही हैं। मारवाड़ी समाज संपन्न है। अतः इन्हें भीख नहीं माँगनी पड़ती। कुछ मारवाड़ी विधवाओं को धार्मिक ट्रस्टों से नियमित मासिक वृत्ति भी मिलती है। मारवाड़ी विधवायें, दूसरे मारवाड़ी घरों में खाना बनाने, चौका- बर्तन का काम करती हैं। एक मारवाड़ी मध्यवयस्का विधवा से भेंट हुई। वह एक संपन्न परिवार के बच्चों की देखभाल करती हैं, वहीं उसे रहने और खाने की सुविधा मिल जाती है। अनेक मारवाड़ी विधवाओं के पास उनके अपने बच्चे भी हैं, पंरतु इससे वे परेशान नहीं रहती। मारवाड़ी समाज ही किसी- न- किसी तरह इन असहाय परिवारों की भी देख- रेख करता है।
बंगाली विधवाओं की कहानी
काशी की बंगाली विधवाओं की कहानी एक करुण गाथा है। उनके काशीवास के कारण अन्य विधवाओं से भिन्न हैं। अधिकांश मैथिल तथा भोजपुरी विधवाओं वैधव्य के बाद घर में विवाद या अपनी कोई संतान न होने के कारण, काशी भेज दी गयी थीं। अधिकांश को यही कह कर भेजा गया था कि "काशीवास करो, पुण्य मिलेगा, हम तुम्हें मासिक सहायता दिया करेंगे।' परंतु उन्हें सहायता नहीं मिली। अतः भीख मांगने के अलावा, दूसरा रास्ता नहीं था। दूसरी ओर, बंगाली विधवाओं में अधिकांश ही देश विभाजन का शिकार बन कर काशी आयी हैं। समस्त विधवाओं में बंगाली विधवाओं की संख्या ८० प्रतिशत के अनुपात में है। सभी पूर्व पाकिस्तान से आयी हैं, विभिन्न शरणार्थी शिविरों से होकर यहाँ स्वयं ही विश्वनाथ के चरणों में आश्रय पाने के लिये।
सरकारी विधवा आवास गृह
यहाँ पहले शरणार्थी विधवाओं के लिये दो सरकारी आवास गृह थे। अब दुर्गाबाड़ी स्थित आश्रम ही एक मात्र सरकारी संस्था है। निकट भविष्य में शायद यह भी बंद हो जाएगा। दो साल पहले यहाँ ४१ विधवाएँ थीं। अब २९ रह गयीं हैं। आश्रम दो मंजिला है तथा एक इंस्पेक्टर, दो मेट्रन सहित कुल ६ कर्मचारी हैं। इस आवास गृह की अधिकांश विधवाएँ मध्य प्रदेश के माना शरणार्थी शिविर से आयी हैं। एक दिन इन सभी की अपनी घर- गृहस्थी थी और आज वे
१०० रु. सरकारी पेंशन पर दिन गुजार रही हैं। वे स्वयं ही अपना बाजार करती हैं और खाना पकाती हैं तथा विभिन्न रुढियों से ग्रस्त हैं।
जो बंगाली विधवायें स्वतंत्र रुप से रहती हैं, उनकी दशा भी अत्यंत दुखदायी हैं। ये मंदिर में भीख मांगती, घर- घर रसोई बनातीं और धूपबत्ती के कारखानों में काम करती हैं। चौंसट्टी
मंदिर, केदार मंदिर, शीतला मंदिर में ये अधिकांशतः न आती हैं।
हमारे समाज में हिंदू विधवाओं का स्थान मनुष्य जाति से नीचा है, जिसका बोध विशेषकर बंगाली विधवाओं के जीवन को देखने से स्वतः ही मन में होता है। जिन विधवाओं से मैं मिली, उनमें से शायद ५ %
ही घर से आते समय अपने साथ सामान या पैसा लेकर आ पायी हों। अधिकांश खाली हाथ, अकेली, एक नये परिवेश में, अनजान शहर में जीवन बिताने चली आयी थीं। दो- तीन ऐसी वृद्धाएँ भी मिलीं, जो आज इस जीवन संध्या में भी अपनी कुल- लज्जा को स्मरण कर रो पड़ीं।
मंदिर में भीख माँगती हुई एक वृद्धा कहती है, ""कभी मैं भी भिक्षा दिया करती थी और आज एक- एक पैसे के लिए मैं दूसरों की दया की मुहताज हूँ।''
यहाँ ४५%
विधवायें घरेलू काम- काज किया करती हैं। कुछ को धार्मिक ट्रस्ट एवं भूतपूर्व महाराजा, महारानियों की ओर से सहायता दी जाती है। रामकृष्ण मिशन कुछ विधवाओं को १० रुपया प्रतिमास तथा रामकृष्ण एवं शारदा माता के जन्म दिन पर कंबल बाँटता है। फिर भी अधिकांश इस तरह की सहायता से वंचित हैं। उनके लिए एक मात्र भरोसा हैं, बाबा विश्वनाथ का। घर में बैठकर काम करना भी अक्षम विधवाओं के लिए मुश्किल है। फिर परिश्रम जितना होता है, उस हिसाब से मजदूरी नहीं मिलती है। भोजपुरी महिलायें कुछ छोटे- मोटे सामान भी बेचती हैं।
मीरघाट, अहिल्याबाई घाटों में दो- तीन महिला घाटियाँ मिलेंगी। ७० वर्षीया मीरघाट की अन्नपूर्णा देवी पिछले २० साल से यहाँ काम कर रहीं हैं। अपने पुरुष सहयोगियों से यह परेशान रहती हैं, परंतु करें भी क्या ? चुपचाप अत्याचारों को सहती जाती है।
विधवाओं को अब सरकारी पेंशन मिलती है। उत्तर प्रदेश सरकार ने विधवाओं को दो तरह की पेंशन प्रदान की है। एक तो वृद्धावस्था पेंशन, जो १०० रु. प्रतिमाह के हिसाब से तीन माह के अंतर पर दिया जाता है। ६० वर्ष के उपर की वृद्धाओं को यह पेंशन मिलती है। दूसरी तरह की पेंशन ६० वर्ष से उम्र वाली उन विधवाओं को मिलती हैं, जिनकी मासिक आय १०० रुपये से कम हो।
हमारे हिंदू समाज में विधवाओं के प्रति सवर्त्र उपेक्षा का भाव विद्यमान है। यदि ऐसा न होता, तो उनकी आज सम्मानजनक स्थिति होती। मदर टेरेसा के मन में इनके प्रति स्वस्थ भाव था। हनुमान घाट स्थित उनका आश्रम अक्षम- लाचारों का आश्रय- स्थल है। यहाँ बिना किसी
भेदभाव के अनाथ, अपाहिज रोग पीड़ित वृद्ध- वृद्धाओं को स्थान दिया जाता है। यहाँ उन्हें सब कुछ मुफ्त मिलता है। आश्रम में ही अपना अस्पताल है, जहाँ पर इलाज होता है। यहाँ इन लोगों पर धर्म की कोई पाबंदी नहीं है।
काशी इन विधवाओं के दिन प्रायः पूजा- पाठ, गंगा- स्नान, दर्शन आदि में ही बीत जाते हैं। परंतु क्या वे सुखी हैं ? यह उनकी मुख- मुद्राओं को देखकर जाना जा सकता है।
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