वाराणसी वैभव

काशी विश्वनाथ मंदिर



तैंतीस करोड़ देवताओं में केवल भगवान शिव ही ऐसे देवता हैं, जिनकी सर्वत्र पूजा होती है। देवता, राक्षस, भूत, किन्नर, मुनि एवं मनुष्य सभी इनके उपासक हैं। इनकी प्रतिष्ठा और महत्ता का आधार इनके चरित्र की उदारता है। इनका चरित्र सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् की त्रिवेणी है, जो सर्वदा लोक कल्याण का उपादान बनी रहती है। भगवान शिव का चरित्र और व्यक्तित्व बहुपक्षीय है। एक ओर वे सकल कला और गुणों से युक्त परमब्रह्म हैं, सभी ईश्वरों के भी ईश्वर है, तो दूसरी ओर वे योगिराज हैं। कामदेव पर उनकी विजय की कथा वस्तुतः एक योगी की काम, क्रोध, मद, लोभ आदि सभी विकारों पर विजय की कथा है।



प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा और स्मरण, इन पाँच तत्वों से निर्मित उनका माहेश्वर योग, योगविद्या का गौरव माना जाता रहा है। वे अनंत काल से एक आदर्श योगी के रुप में प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। एकता की दृष्टि से शिव का महत्व काफी बढ़ जाता है। देश के सभी क्षेत्रों में उनके मंदिरों में भक्तों की अपार भीड़ उनके प्रति अपार श्रद्धा को व्यक्त करती है। अमरनाथ, पशुपतिनाथ तथा कामाख्या में स्थापित शिव मंदिर एकता के प्रतीक स्वरुप आधार स्तंभ बने हुए हैं।

देवाधिदेव महादेव विश्वनाथ की नगरी काशी है। काश ( प्रकाश ) से उद्भूत काशी महामाया की क्रीड़ास्थली है। महामाया आदि शक्ति के ललित विलास ने शव को शिवरुप प्रदान किया। शिव- शक्ति सायुज्य की प्रकाश किरण कला कहलाई। सत्य यह है कि शिव ही सौंदर्य है। प्रकृति सुंदरी विलासमयी हो शिवत्व प्राप्त पुरुष की प्रमोदिनी हुई और यहीं से सृष्टि की सर्जना प्रारंभ हुई।

शिव का ललित स्वरुप कला के माध्यम से भिन्न- भिन्न रुपों में अनेक कला साधको ने अनेक माध्यम से प्रस्तुत किया है। "जो जेहिं भाव नीक तेहि सोई' के अनुसार सभी सर्वोत्तम कला- कृतियाँ शिव का सत्स्वरुप है। इन्हीं कृतियों में शिव- परिवार में ललित भाव का प्रादुर्भाव दर्शाया गया है। काशी के श्री विश्वनाथ मंदिर में ऐसा ही एक स्वयंजात ज्योतिस्वरुप लिंग है। इसके ही दर्शन और अर्चन से भक्त लोग अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के साथ- साथ मोक्ष जैसा अलभ्य फल प्राप्त करने हेतु काशी आते हैं।


विश्वनाथ मंदिर की स्थापना

वाराणसी का श्री विश्वनाथ मंदिर कब अस्तित्व में आया, यह कहना मुश्किल है। इतिहासकारों का कहना है कि यहाँ पहला विश्वनाथ मंदिर ईसा से १९४० वर्ष पूर्व बना था। पिछले दो हजार वर्षों में इसके स्थल में कई बार परिवर्तन हुए। मंदिर के महंतों का कहना है कि शिवलिंग वही पुराना चला आ रहा है। बनारस गजेटियर के अनुसार शहाबुद्दीन गोरी ने राजा जयचंद को परास्त करने के बाद ज्ञानवापी स्थित पुराने मंदिर में लूटपाट की थी। बीच में मंदिर फिर टूटा और अकबर के शासन काल में पण्डित नारायण भ ने टोडरमल की सहायता से ज्ञानवापी में ही, जो भव्य मंदिर बनवाया था, उसे औरंगजेब ने ध्वस्त कर उसके स्थान पर मस्जिद बनवा दी थी। औरंगजेब के आक्रमण के समय पण्डितों ने शिवलिंग को ज्ञानवापी के एक कुँए में डाल दिया था। औरंगजेब के जाने के बाद उसे वर्तमान विश्वनाथ गली में स्थापित किया गया।


बाद में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने उसी शिवलिंग के ऊपर कीमती लाल पत्थरों से ५१ फुट ऊँचा भव्य मंदिर बनवाया और इसके बाद ही सन् १८३९ ई. में सिख जाति के मुकुटमणि पंजाब केशरी स्वर्गीय महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के ऊपरी हिस्से को स्वर्ण मण्डित ( लगभग ८७५ सेर शुद्ध सोना ) कराके मंदिर की शोभा बढ़ा दी। इसके बाद जिन मुसलमान शासकों ने प्राचीन मंदिर को तोड़ा था, उन्हीं ने वर्तमान मंदिर के सिंहद्वार के सामने नौबतखाना बनवा दिया, जहाँ अब मंदिर की सुरक्षा हेतु पुलिस चौकी स्थापित कर दी गयी है। लगभग ५० वर्ष पूर्व तक यहाँ नौबत बजने के अलावा विजातीय लोग दर्शन किया करते थे। इस स्थान से काफी बड़ी संख्या में अंग्रेज दर्शन किया करते थे और उपहार तथा दक्षिणा दिया करते थे। सम्राट जार्ज पंचम से लेकर, प्रत्येक वायसराय ने विश्वनाथ का दर्शन किया था। लार्ड इरविन ने भी चाँदी के पूजापात्र भेंट किये थे।




ज्योतिर्मय शिवलिंग

काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भ द्वार के भीतर जाते ही चाँदी के ठोस हौदे के बीच सोने की गोरी पीठ पर ज्योतिर्मय काशी विश्वेश्वर लिंग का अलभ्य दर्शन मिलता है। शिवलिंग के अरघे में कितना सोना लगा है, इसका प्रमाणिक विवरण सन् १९३५ में रामेश्वर प्रेस काशी से छपी पुस्तक "श्री विश्वनाथ मंदिर' के श्री विश्वनाथ संस्था खण्ड के पृष्ठ ९- १० पर उल्लिखित है, जो निम्न है--

जिस सोने की जलहरी ( गोरी पीठ ) पर बाबा विश्वनाथ सदा विराजमान रहते हैं, उसके निर्माणार्थ श्री पुरुषोत्तम दास गोपाल मल खत्री ने वर्ष १९२८ में लगभग ५ किलो ८५० ग्राम सोना दिया था। श्री साधुराम तुलाराम गोयनका, कलकत्ता निवासी ने लगभग एक किलो १५० ग्राम सोना दिया था। श्रीयुग स्वामी वामदेव जी महाराज, निवासी त्रिचना पल्ली ने लगभग ४ किलो ८५० ग्राम सोना अर्पित किया था।


प्रतिवर्ष श्री विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार रंगभरी एकादशी, दीवाली के बाद अन्नकूट तथा महा शिवरात्रि पर होता है। इसमें रंगभरी एकादशी का जो श्रृंगार होता है, वर्ष भर फिर कभी देखने में नहीं आता है। मूर्ति द्विभुजी है, दाहिने हाथ में दुष्ट दलन त्रिशूल और बाएँ में अभय की घोषणा करने वाला श्रृंड्ग हैं। एक मुख, त्रिनेत्र भगवान के दर्शन होते हैं। मस्तक से गंगा बहती न आती है। बायें गिरि राज नंदिनी पार्वती और दोनों के बीच बालक रुपी गणेश जी बैठे दिखायी देते हैं। बांकी उत्सवों की मूर्ति पंचमुख, चतुर्भुज, त्रिनेत्र और राजवेश से सुसज्जित हैं। दो भुजाओं में दुष्ट दमन के लिए अस्र धारण कर राजा विश्वनाथ दोनों भुजाओं से भक्तों को अभयदान करते दिखाई देते हैं।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के भीतर और बाहर और भी अनेक देव- मूर्तियाँ हैं, जिनका परिचय इस प्रकार है :- विश्वनाथ मंदिर के पश्चिम जो मण्डप है, उसके बीचो- बीच वेंकटेश्वर की लिंग मूर्ति है। दक्षिण ओर के मंदिर में अविमुक्तेश्वर लिंग है। सिंह द्वार के पश्चिम सत्यनारायणादि देव विग्रह हैं। सत्यनारायण मंदिर के उत्तर शनेश्वर लिंग है। इनके समीप दण्डपाणीश्वर पश्चिम के मण्डप में ही हैं। इसके उत्तर एक कोठी में जगत्माता पार्वती देवी की दिव्य मूर्ति है। इसी दालान के अंतिम कोने में श्री विश्वनाथ जी के ठीक सामने माँ अन्नपूर्णा विराजमान हैं।


मंदिर की मौजूदा व्यवस्था

विश्वनाथ मंदिर की पंरपरागत व्यवस्था भी मंदिर की सुरक्षा एवं सुव्यवस्था के लिए काफी समय से अनुपयोगी समझी जाती रही है और उसमें सुधार की माँग समय- समय पर उठती रही है। १९८३ ई. में मंदिर में हुई लंबी चोरी के बाद इसकी व्यवस्था राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गयी और राज्य सरकार ने इसका प्रबंध अपने हाथ में ले लिया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने गत २४ जनवरी को एक अध्यादेश जारी किया। अध्यादेश के अंतर्गत मंदिर के स्वामित्व के लिए बनाये जाने वाले ट्रस्ट में कुल १५ सदस्यों का प्राविधान किया गया। न्यास मण्डल के अध्यक्ष भूतपूर्व काशी नरेश होंगे तथा उनके सदस्यों में श्रृंगेरी के शंकराचार्य, उत्तर प्रदेश सरकार के वित्त सचिव, सांस्कृतिक कार्य विभाग के सचिव व निदेशक, समाज कल्याण विभाग के सचिव, वाराणसी के आयुक्त एवं जिलाधिकारी तथा संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति शामिल हैं। इसके अलावा तीन हिंदू व दो अनुभवी मंदिर प्रबंधक भी उसमें शामिल किये गये हैं। न्यास के सचिव ही अधिशासी अधिकारी होंगे, जो सरकारी अधिकारी होगा। राज्य सरकार ने एतदर्थ मंदिर के न्यास को ११ लाख रुपये की निधि भी उपलब्ध करायी है।

अध्यादेश में न्यास परिषद् को अधिकार दिया गया है कि वह मंदिर में किसी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान, समारोह आदि के लिए फीस निर्धारित करें। अध्यादेश में मौजूद किसी निर्देश का उल्लंघन करने पर ६ मास तक की कैद या १ हजार रुपया जुर्माना या दोनों की व्यवस्था है। इसके अलावा न्यास परिषद को मंदिर और उसके सभी प्रकार की संपति, दस्तावेज, भौतिक पदार्थ पर कब्जा लेने और रखने का भी अधिकार है। इन उपबंधों का उल्लंघन करने, प्रतिरोध या अवरोध उत्पन्न करने वालों को सजा और जुर्माने की भी व्यवस्था है।

राज्य सरकार द्वारा श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का अधिग्रहण कर लेने से आम जनता को महंतों के एकाधिकारवाद की प्रवृत्ति से निश्चित रुप से राहत मिली है तथा मंदिर में ही रही ज्यादती, दुर्व्यवस्था पर भी अंकुश लगा है। राज्य सरकार मंदिर से प्राप्त होने वाली आय को मंदिर के पुनर्निर्माण एवं सुधार हेतु व्यय करेगी, ताकि इस प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा हो सके।

वाराणसी वैभव

 


Top

Content Prepared by Sunil Jha 

Copyright © IGNCA

All rights reserved. No part of this may be reproduced or transmitted in any form or by any means, electronic or mechanical, including photocopy, recording or by any information storage and retrieval system, without prior permission in writing.