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Yugantar |
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नाटकक पर्दा उठा दिऔ ! स्थान : कुमार बाबू गुणेश्वर सिंहक डीह... पार्श्वमे वाग्मतीक कछेड़। बुर्जूघाट : शुभंकरपुर । गोविन्दबाबूक भागिन पं. शशिनाथ झाक छोटछीन वासा । ग्रीलक गेट । पतियानी-जोड़मे झुमैत फूलक गाछ । बराम्दा । बराम्दा पर शीतलपाटी । शीतल पाटी पर मैथिलीक एकान्त साधक - शब्द-साधना आ अक्षर-चेतनाक प्रतीक पुरुष पण्डित गोविन्द झा एकटा पुरान पोथीमे निमग्न । घड़ीमे बजैत रहइक एगारह - जड़ाक भोर माने बितैत रहैक ... प्रणाम-पाती । कुशल-क्षेम । पं. गोविन्द झा - "" कत ' गप्प ? करब बराम्दामे .... एतहि आ कि कोठली.... कोठलीमे ? ''
-""हमर गाम आ जन्म-स्थान थिक इसहपुर-मौजे-सनकौर्थ .... पंचायत सनकौर्थ अथवा विशनपुर पदमौल-मौजे सनकौर्थ टोले रामनगर-प्रसिद्ध इसहपुर, नक्शामे इसुफपुर ।''
-""काश्यप ... इसहपुर हमर पितामहक मात्रिक । हम सब दीप कही.... गोध-नपुर कही- बीचे बाधमे हमर डीह छल - दीप आ बेहटक बीचमे रघुवर झा चभच्चा । प्रख्यात.... हमर प्रपितामहक नाम पर .... रेलवी लाइनक उत्तर । हम एहि चभच्चामे स्नानो कएने छी।''
-""नहि, जाठि नहि छैक । असलमे जाठिसँ विशेष अर्थ लक्षित होइत अछि.... साधारणतः इनार-जलाशय व्यक्तिगत सम्पत्ति । मुदा जखन पोखरिक जाग होइत छैक ... जाठिक स्थापना कएल जाइत छैक तँ ओ पोखरि सार्वजनिक उपयोगक हेतु मानल जाइत छैक । जाठि यज्ञ-स्तूप जकाँ जागक प्रतीक भेल ।''
-"" ई एक प्रकारक सामाजिक मूल्यांकन थिक । सामाजिक मूल्यांकनक आधार पर श्रेणी देल जाइत छलैक । मुदा एहि श्रेणीक कारणे सोति लोकनिमे बड्ड झगड़ा होइत छलना । विशेष रुपें सिद्धान्त क्रमसे-होइत छलनि विशेष रुपें सिद्धान्तक क्रमसे- विवाहसँ पूर्व सिद्धान्त ... सिद्धान्त कत ' होएत ? वरपक्षक दिस - कन्यापक्षक दिस - की बीचोबीच - ई सब झगड़ा होइत छलैक। गोलैसी मचैत छलैक - कुकाव्य आदि बनैत छलैक .... आब सो सब की महाराज महेश्वर सिंहक समयमे सोति लोकनिक श्रेणीक्रम आदि छपलैक .... एना आनो जातिमे देखल जाइत अछि । .... '' -""जेना ....'' -""जेना कान्यकुब्ज .... सरयबपाणि । कान्यकुब्जमे ' विस्वा ' कहल जाइत अछि - श्रेणीकें विस्वा कहल जाइत अछि । कर्णकायस्थमे सेहो एकर प्रचलन अछि । दक्षिण अफ्रीका, बंगाल आदिमे सेहो एहि तरहक उदाहरण उपलब्ध अछि !'' -""स्वदेशी - बिलैती आन्दोलन की थिकैक ?'' -""देखू, सोति समाज खूजल नहि बन्द अछि .... बन्द समाज ... अहुना सनातन धर्ममे अनेक विधि-निषेध । अपन देशमे सबठामक यात्रा प्रशस्त नहि .... विदेशक कोन कथा ? तें महाराज कामेश्वर सिंह जखन १९३३ मे विदेश गेल रहथि तँ सम्पूर्ण श्रोत्रिय समाजे बबन्डर मचि गेल । अनर्थ भेल महारजकें बारल जाए । महाराजक वहिष्कार कएल जाए !'' -""एहिसँ पूर्वआनो महाराज विदेश जएबाक प्रयास कएने रहथि ?'' -""हँ, महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह । महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंहकें प्लूरिसी भ ' गेल रहनि । विचार भेलैक जे विदेशमे समुचित इलाज कराओल जाइनि .. झाँपि-तोपि महाराजकें विदेश ल ' जएबाक विचार भेलनि । मुदा बादमे महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंहक निर्णय बदलि गेलनि ... विदेश जाएब ... सेहो चोरा-नुकाक ' उचित नहि बूझल । मरि गेलाह से कबूल - मुदा विदेश नहि गेलाह ।'' -""अपनेक परिवार स्वदेशी ?'' -""हँ, हमर परिवार पूर्णतः स्वदेशी .... पिता महावैयाकरण दीनबन्धु झाक नेतृत्वमे अनेक दिन बैसक भेल । किछु गोटए नेपाल भागि गेलाह - हमरा लोकनि तीन बरख धरि नेपालमे रहलहुँ ।'' -""तकर बाद ?'' -""तकर बाद पुनः विरोध-वहिष्कार शिथिल पड़ ' लगलैक । सोति समाज राजसत्ता सँ बान्हल - सम्पोषित । धनि दड़िभङ्गा - दोहरी अंगा । महाराज कामेश्वर सिंह प्रगतिशील विचारक रहथि - अत्यन्त शालीनता आ संयमक परिचय देल !'' -""अपने पर केहन प्रतिक्रिया भेल? अपने जे नास्तिक भ ' गेलिऐक तकर यैह सब कारण भेल ?'' -"" नहि, एहि घटनाक हमरा पर कोनो विशेष प्रभाव नहि पड़ल । पिता हमर आदर्श रहथि । प्रेरणापुरुष । बहुत दिन धरि हुनकहि संरक्षणमे सन्ध्यावन्दन-गायत्री जाप एवं शालिग्राम पूजा करैत रही । मुदा जखन हम पटनामे अएलहुँ तँ हमर विचार, चिन्तन आ दृष्टिमे तीव्र परिवर्तन भेल । हम अपन एक रचनामे लिखने छिऐक :"" आब चलत नाहि काज ब्रह्म बनने अओ बाबू रहए देत नहि लोक आब निर्लिप्त लेपिए देत कोओ बलजोरी चानन नहि, लिढिआही पोखरिक थाल ! हम शालिग्राम .... जनौ .... सन्ध्यावन्दन सबटा छोड़ि - छोड़ि मुक्त भ ' गेलहुँ । शालिग्राम जे संग रहैत छलाह - करिआ पाथर विष्णुक विराट पुरुष ... से एक दिन चुप्पे-चाप पटनाक हथुआ स्कूलक मन्दिरमे राखि अबैत रहलहुँ -"" एना किएक कएलिऐक ?"" -"" असलमे हम बुद्धिवादी छी । बौद्ध नहि बनलहुँ । "" जी, अपने प्रबुद्ध मैथिल समाज जकाँ .... मुदा एहि प्रसंग मैथिलीक कविश्रेष्ठ व्यास जी रहस्य-उद्घाटन कएल जे प्रबुद्ध मैथिल समाजक सब क्यो आब खूब पूजा - पाठ करैत छथइ ...... "". गोविन्दबाबू विहुँसैत कहलनि -"" हँ-हँ, ठीके- ठीके कहलनि । आब के सब रहथि से सुनू- परमानन्द बाबू, उमानाथबाबू, अनिरुद्धबाबू, शचीनाथबाबू, देवीनाथबाबू- फेर सनातनी होइत गेलाह । "" हम उत्सुक होइत पुछलियनि - "" की अपने सेहो फेर शालिग्राम पूजा आरम्भ करबैक .... जनौ .... चानन ? "" गोविन्दबाबूक मुखमुद्रापर अडिग संकल्पक रेखा, बजलाह - "" आब की बदलब ? साठि बरखसँ पहिने बदलल से बदलल - आब अस्सीक करीब भेल .... आब अइ पार की ओइ पार ... अब खाक मुसलम्मां होंगे ... ! "" बहुमुखी प्रतिभाक धनी, मैथिली शब्दकोश आ भाषाशास्रक अद्वितीय विद्वान, कट्टर नास्तिक, उर्दू, नेपाली, नेबाड़ी, उड़िआ आ असमीक ज्ञाता पं. श्री गोविन्दझाक जीवन संघर्षपूर्ण रहलनि अछि । - "" अपनेक मूल संघर्ष ... जीवनमे संघर्षक मूल केन्द्र की रहल ? "" गोविन्दबाबूक आकृति निमिष मात्रक लेल छटपटा उठलनि, बैचेन - "" स्टारभेसन ... अर्थ-संघर्ष । घोर अभाव । हमर व्यक्तित्व समझौता क ' नहि सकैत अछि । अपन शर्त पर जिबैत रहलहुँ सबदिन । ई प्रकृति हमरा पिताँस विरासतमे प्राप्त भेल अछि । हमर पिता अपमानजनक परिस्थितिक आभास होइतहिं पाठशालासँ त्यागपत्र दए किछु दिन गामहिमे कपड़ाक दोकान खोलि ले रहथि । दरभंगा महारजसँ विरोध मोल लेल । स्वदेशी -बिलौती ... नेपालमे महापलायन । घऽरक आर्थिक स्थिति क्षत-विक्षत भ ' गेल रहय । व्याकरणाचार्यक डिग्री प्राप्त भेलाक बाद हम जीविकाक तलाश आरम्भ कएल । विवाह वाल्यावस्थामे भ ' गेल रहय । प्रथम पुत्रीक जन्म । विशाल संसारक एकटा छोटछीन हिस्सामे हम संघर्ष आरम्भ कएल ... आब संघर्ष हमर जीवनक हिस्सा भ गेल अछि । अहाँकें बूझल अछि ?"" - "" जी, से की ? "" - "" तखन सुनू "" - "" जी .... "". - "" सरिसवमे अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद्क अधिवेशन भेल रहइक। एहि अधिवेशनमे नाटक विभागक सेक्सनल प्रेसिडेन्टक रुपमे हमरा मनोनीत कएल गेल रहय । बूझल किने ... नाटक विभागक विभागीय अध्यक्ष .... कतेक बड़का सम्मान भेलैक। मुदा हम ओहि अधिवेशनमे उपस्थित नहि भ सकलहुँ । - "" से किएक ? "" गोविन्द बाबू दीर्घ नि :स्वास लैत छथि- पाइ नहि रहय .... कैंचाक अभाव । पटनासँ सरिसव जएबा-अएबाक खर्चा नहि जुटा सकलहुँ । कतेक दु:ख भेल । कतेक छटपटएलहुँ । पैंच हम ल ' नहि सकैत छलहुँ । ककरहु ल ' ग तरहत्थी पसारि सकैत नहि छलहुँ । स्टारभेसन - आर्थिक अभाव - अदम्य संघर्ष । हमर जीवनक केन्द्रमे रहल अछि अर्थ-संघर्ष .... अयाची आदर्श.... याचना नहि, कत्तहु नहि, किन्नहु नहि .... संघर्ष।"" - "" पैंच नहि लेबाक व्रत कहियो टूटल कि नहि ? "" - "" हँ, से एक बेरि टूटल ... टूटल सैह कहू ! अपना लेल नहि, अनका निमित्त ! "" - "" से कोना ?"" - "" एकबेर हड़ताल भेलैक । कोइलखक दयानन्द झा हमर सहकर्मी, कहलनि- बाप रे ! हम हड़ताल पर नहि जाएब । हमर परिवार विलटि जाएत । हम बोल-भरोस देलिएनि - संघर्षसँ फराक जुनि होउ । हम सब छी । देल जएजैत । हड़ताल लम्बा भ गेलैक । दयानन्द झा दउगल अएलाह ... चुल्हा चौकी बन्द अछि ... बच्चा सब बेलल्ल । ... बुन्द भरि दूध नहि ! हमर हाथ खाली । तखन हम परमानन्द बाबूसँ निवेदन कएलियनि । .... अपन गामक वकील साहेब परमानन्द बाबू । पटनाक हाइकोर्टमे रहथि .... यशस्वी । पैंच देलनि तखन दयानन्द झाक कष्टक निवारण भेलनि । ..... अहाँ जनैत छी - हमर केहन हाल छल ? कउखन कोनो वकीस साहेबक ओतऽ असिस्टेन्टक काज क ' रहल छी । हाइकोर्टक वकील रामचन्द्र सिंह - केससँ सम्बन्धित सबटा इन्डेक्स बना दिअनि । कागज-पत्र सरिआ दिअनि .... तखन मासमे 100 रुपया दैत छलाह । कतहु शब्दकोश बना रहल छी- कतहु कोनो लेखन .... आकाशवाणीक निमित्त कार्यक्रम ... "" - "" आ खेत पथार ..... गाम ?"" - "" एक तँ जमीन्दारी उन्मूलनक बाद सबटा खेत-पाथर राइ-छित्ती भ ' गेल । जा धरि बाबू जीबैत छलाह - गाम अवलम्ब ! बादमे जेना होइत छैक नौकरिहाराकें - छोट भाइ माधव मैनेजर भ ' गेलाह । भातिज आबि पटनामे हमर डेरा पर रहि पढ़थि- मुदा कथी ले ' एकसेर चूड़ी गामक उपलब्ध होयत ?"" एकान्त-शान्त दुपहरिया । बुर्जूघाट ... वाग्मतीक कछेड़ । जटाधारी फूलक सोहनगर लय-बद्ध नृत्य - कात्मे गुलावक फूल । बुर्जूघाटमे हम मैथिलीक पुरोधा गोविन्दबाबूक संघर्षपूर्ण व्यक्तित्वक एक-एक कतराकें देखि आत्म-विस्मृत जकाँ भ गेल रही । शुभंकरपुरक बुर्जूघाट ! - "" अपनेपर आरोप लगाओल जाइत अछि जे अपने महन्थ लोकनिक लेल पोथी पर पोथी लिखलहुँ - छद्म लेखन ... एहन कोन विवशता ?"" गोविन्दबाबू गम्भीर होइत कहलनि -"" हँ, ई आरोप हमरा पर लगाओल जाइत अछि । खिधांस भेल । परिचित मित्र, सम्बन्धी सब बजैत छथि । "" -"" जी, एकाध ठाम लिखित आबि गेल अछि .. "" -"" आबि गेल होएत । निम्नमध्यमवर्गीय परिवारक स्वाभिमानी संघर्षधर्मी व्यक्तिकें यैह सब सूनए पड़ैत छैक .... यैह नियति । मुदा अहाँ कहू तँ जे ई बात बजैत छथि- लिखैत छथि से कहियो ई पता लगौलनि जे हनर घरमे चुल्हा कोना जरैत अ ! हमर बच्चा कोना पढ़ैत रहल ? हम दु:ख आ कष्टमे कोना संघर्ष करैत रहलहुँ ? .... अहाँ जनैत छी, अर्थ अभावमे हमर बच्चा सबकें कतऽ पढ़ऽ पड़लैक ? हमरालोकनि सरकारी जमीन पर अपने सँ मिलि क ' फूसक झोपड़ीमे विद्यालय खोलल आ ताहिमे हमर बच्चा सब पढ़थि । हमर जेठ बच्चा अक्कू व्यंगमे ओहि विद्यलयक नाम हमर नाम पर राखि देने रहथि - फल्लाँ झा झोपड़ी महाविद्यालय । "" -"" जी, महंथ लोकनिक लेल पोथीपर पोथी ? "" -""हँ ... ई कुकर्म .... जँ ई कुकर्म थिक तँ हम कएने छी । .... हमरो अन्न चाही । दूध चाही, दबाइ चाही । आइ पाइ रहितय तँ हमहूँ नव धनाढ़य लोकनि जकाँ डोनेशन द ' क ' अथवा बढियाँ स्कूल-कॉलेजमे पढ़ा'क' बच्चा सबकें इन्जीनियर-डाक्टर बना लेने रहितहुँ - मुदा से किएक नहि क ' सकलहुँ ? से हम बच्चाकें झोपड़ी विद्यालयमे पढ़बैत रहलहुँ ... महंथ लोकनिक ... हँ, महंथे लोकनि - व्यंग्य भेलैक ई ... बुझैत छिऐक... स्टारभेशन । हम अपन एकटा कवितामे लीखि देने छिऐक ... बुझल किने श्रम हमर पूजी ... विद्या हमर साधन .... कवितामे लिखने छिऐक - अर्चन नहि, हम करैत छी स्वयं शक्ति केर सर्जन भीख न मंगलहुँ कहियो, कएलहुँ बाहुक बलसँ अर्जन -"" अपनेक व्यक्तित्व पर स्वतंत्रता -आन्दोलनक केहन प्रभाव पड़ल ?"" गोविन्दबाबू हमरा दिस साकांक्ष होइत कहलनि ... "" अहाँके पं. मधुसूदन मिश्रक नाम सूनल अछि ... भट्टपुराक सुराजी गुरुश्रेष्ठ पं.मधुसूदन बाबू ... "" -"" जी .. "". गोविन्दबाबू पीठक आँखिसँ अतीतकें मोन पाड़ैत कहलनि - "" पं. मधुसूदन मिश्रक प्रभाव ... हुनक व्यक्तित्व, चिन्तन, संघर्ष- सभक प्रभाव हमरा उत्प्रेरित करैत रहल, झंकृत करैत रहल । ओ सुराजी छलाह । बनारससँ प्रकाशित ' आज ' ( साप्तहिक ) आ कलकत्तासँ प्रकाशित विश्वमित्र ( साप्तहिक ) हुनका ओतए नियमित रुपमे अबैत छलनि । ओ जखन भाषण करैत छलाह तँ उपस्थित जनसमुदायक हृदय आनदोलित भ' उठैत छलैक ... गंगौलीक पं. चेतनाथ मिश्र बड़का सुराजी रहथि । 'कर्मवीर आश्रम'क स्थापना भेल रहैक । खादीक प्रचार-प्रसार । असहयोग आन्दोलन, ४२क आन्दोलन आदिमे हमहूँ भाग लेने रहि । पिताक अनुशासन .... मुदा तइयो हम स्वराज-आन्दोलनमे भाग लैत रहलहुँ - हमर व्यक्तित्वक चिनगारी-सुराजी लोकनिक साहचर्यमे धधकि उठल ।एक बेरि भूमिगत सेहो रहय पड़ल । -"" अपनेक व्यक्तित्व अनेक घात-प्रत्याघातसँ दुर्धर्ष भेल अछि ...ककरो प्रभाव ? "" -"" ओना तँ हमर पिता आदर्श ... गुरु... प्ररेणा आ तकर बाद सुराजी गुरु मधुसूदन बाबू । अहाँ पुछलहुँ प्रभाव ... से तीन व्यक्तिक .... "" -"" जी, नाम कहल जाए .. "" -"" पहिल राहुल सांकृत्यायन "" -"" किएक ? केहन प्रभाव ? "" -"" संघर्षपूर्ण व्यक्तित्व । पाखण्ड पर प्रहार करबाक सामर्थ्य ।दिन-राति पढ़ैत-लिखैत रहबाक प्रवृत्ति । जन्मजात विद्रोही । हमरा लागल जेना हम जे आदर्श तकैत छलहुँ से राहुलजी मे भेटि रहल अछि ।.. "". -"" जी, दोसर ?"" -"" दोसर दयानन्द सरस्वती । आडम्बर-चमत्कार सँ अलग ...... शान्त एकान्त स्निग्ध व्यक्तित्व । आर्यसमाजी नहि बनहलहुँ मुदा हुनक सत्यार्थ प्रकाश हमर संघर्ष-पथकँ आलोकित करैत रहल अछि ।.. "". -"" आ, तेसर ? "" -"" तेसर बर्ट्रेन्ड रसेल । "" -"" हुनकासँ कोना परिचय ?"" -"" हुनकासँ नहि ... हुनक पुस्तक ... हुनक विचार ... हुनक चिन्तनसँत परिचय। विशेष रुपसँ हुनक "" -""अपने की बनऽ चाहैत रहिऐक ? की बनि गेलिऐक ?"" विशनपुर पदमौल-मौजे सनकौर्थ, टोले रामनगर, ईसुफपुर प्रसिद्ध इसहपुरमहावैयाकरण पण्डित दीनबन्धु झाक आत्मज व्याकरणाचार्य पं. श्री गोविन्द झाक प्रारम्भिक जीवन बक्र-सरल-त्रिज्या होइत ओझराइत रहलनि । पहिल नौकरी दरभंगा नर्थब्रुक जिला स्कूल दरभंगामे आरम्भ कएल । 15 फरवरी, 1949 कें ई नौकरी छोड़ए पड़लनि- लालपुर- सरोपट्टी सिंहेश्वर स्थान एच.ई. स्कूलमे शिक्षकक कार्य ग्रहण कएल । -""हम .... हम बनऽ चाहैत रहिऐक शिक्षक ... सोझ- सरल शान्तिपूर्ण शिक्षण कार्य हमरा प्रिय रहय । चरित्रवान शिक्षक ... आदर्श विद्यार्थी । आश्रम । अधीतमध्यापित मर्जितं यश : मुदा से भेल नहि, पड़ि गेलिऐक झंझावातमे - आर्थिक अभाव ... जीवन संघर्ष - भूख ... स्टाभेशन !"" -""आ दबल महत्त्वाकांक्षा ? "" -""हँ-हँ, सेहो कहि सकैत छी । लेखनक महत्त्वाकांक्षा ... अपना आपकें अभिव्यक्त करबाक आकंक्षा ! हम सिंहेश्वर स्थानक नौकरी मासाभ्यन्तरे छोड़ि पटना चल जाइत रहलहुँ । नोट करु ... एखनो मोन अछि ओ दिन रहइक 8 मार्च 1950 प्रात : काल हम पटना पहुँचल रही । किछु दिन इण्डियन नेशन, आर्यावर्तमे नौकरी कएल - तकर बाद बिहार सरकारक अनुवाद विभागमे शब्दकोश सहायक पर हमर नियुक्ति भेल। 1978 धरि राज भाषा विभागमे विभिन्न पद पर रहलहुँ । 1978 सँ 1985 धरि मैथिली अकादमीमे उपनिदेशकक पद पर काज कएल "" -""जी, कविश्रेष्ठ व्यासजीक आरोप छनि जे गोविन्दजी उखड़ि जाइत छथि ... से कोन बात पर उखड़ै छिऐ ? ... किएक उखड़ै छिऐ ?"" ई प्रश्न सूनि गोविन्दबाबू विचलित भ' उठलाह, भृकुटि तनि गेलनि शास्रार्थक मुद्रा मे ... फेर मुदा चित्तस्थिर करैत कहलनि -""हँ, उखड़ै छिऐ । ... आब सुनू किएक उखड़ै छिऐ । पटनामे मैथिली अकादमीमे विद्यापति जयन्तीक आयोजन रहइक । तत्कालीन मुख्यमंत्री भागवत झा ' आजाद ' सेहो उपस्थित रहथि । हुनको अवसर देल गेलनि । ओ हिन्दीमे कवितापाठ करब शुरु कएल । हमरासँ नहि रहल गेल - उठिक ' ठाढ़ भ ' गेलहुँ, कहलियनि - मैथिलीमे सेहो सुनाओल जाय । ... आब की छल ? चेतकर बाबूक आँखि रंगि गेलनि, जोरसँ बजलाह - हिन्दीमे किएक नहि पढ़ताह, विद्यापति कोन भाषाक कवि नहि छलाह ? हम विनम्रतापूर्वक कहलियनि- मुदा हम मैथिली अकादमीमे मैथिली कविता सुनबाक अभिलाषासँ उपस्थित भेल रही । ... हमर अभिलाषाक पूर्ति नहि भेल .. हम सभासँ जाइत छी । ... बादमे द्वारि धरि, बराम्दा धरि, सड़क धरि, व्यास ' जी हमरा बुझएबाक प्रयास कएल - मुदा हम साफ कहलियनि - राजसत्ताक लऽग अहाँ सब झुकैत जाउ, हमरा मैथिलीक पताका फहराब ' दिअ । "" गोविन्द बाबू आन्तरिक पीड़ा, दु : ख आ अभिरोषसँ छटपटाइत कहलनि - ""सुनू तखन ... एकटा आर दृष्टान्त ..."" -""जी, कहल जाय .."". -""मैथिली अकादेमी जे कोनो गोष्ठी होइक तँ हम कहियनि जे अध्यक्ष के ? ताहि पर तत्कालीन चेयरमैन मदनेश्वरबाबू बजाथि- हम तं छीहे । ... अरे पदेन चेयमैन छी । अध्यक्ष समारोहक के ? चेयरमैन अध्यक्ष भ' जयताह तँ स्वागताध्यक्ष के ? आब ताहि पर व्यास जी टोकथि - गोविन्द जी अहाँ अनेरे उखड़ि जाइत छी । ... एकटा आर दृष्टान्त लिअ ... चेतना समितिमे विचारगोष्ठीक आयोजन रहइक । खगेन्द्र ठाकु हिन्दीमे पढ़ए लगलाह । हमरासँ नहि रहल गेल - कहलियनि - मैथिलीमे पढ़ल जाए ... मैथिलीमे अपनेकें मैथिली अबैत अछि तखन चेतना समितिमे मैथिलीमे किएक नहि पढ़ब ? मुदा खगेन्द्र ठाकुर पढ़ैत रहलाह - हिन्दीमे पढ़ैत रहलाह - फलता : हम गोष्ठीक वहिष्कारक घोषणा । ... आब कहू अपन मातृभाषाक सम्मान आ स्वाभिमानक रक्षाक निमित्त जँ हम बजलहुँ तँ उखड़ि गेलहुँ.... असलमे, एहन परिस्थितिमे हमरा निर्भीकता आबि जाइत अछि ... तकरा लोक उखड़ब कहैत छथि । "" बुर्जूघाटक एहि छोटछीन वासा पर महावैयाकरण पण्डित दीनबन्धुझाक सुपुत्र व्याकरणाचार्य पं. गोविन्द झा शीतलपाटी पर बैसल छथि । मूलत : कवि ... -""अपने जे कविता लीखल से कोन दु : खसँ, सुखसँ, संघर्षसँ ? "" -"" ने कोनो दु : ख, ने कोनो सुख, ने कोनो संघर्ष- हम जे कविता लिखलहुँ से प्रात :स्मरणीय सरसकवि ईशनाथ झाक साहचर्यसँ ... ओना कविताक आरम्भ समस्यापूर्तिसँ भेल । असलमे मैथिल महासभाक अधिवेशन भेल रहैक मधुबनी मे - समस्यापूर्ति क दंगल माइक पर - आर केओ ... आर केओ - हाथ उठाउ, मात्र तेरह बरखक हमर अवस्था- समस्या रहइक ' नीक कहाएब ' - हम ओतहि किछु पाँती जोड़ि सुनौलिऐक - जँ निज उद्यमसँ दिनराति पहाड़हुकें लघु बूझि ढहाएब । तँ ध्रुव निश्चय सत्य सुनू अओ मैथिल बान्धव नीक कहाएब ।। -""प्रतियोगितामे हारलहुँ कि जितलहुँ ?"" -""प्रथम स्थान प्राप्त भेल ।"" -""जी, तकर बाद ? "" -""तकर बाद तँ नशा भ ' गेल । मधुबनी अधिवेशनक विवरणिकामे नाम छपल ... देखि मुग्ध भेलहुँ । .. आज (साप्ताहिक) मे एक गोट कविता पठौलिऐक हिन्दीमे - जागरण - देशजागरसँ संबंधित - मुखपृष्ठपर छपि गेल - जाग रे ! चिरसुप्त चेतन जाग- मूल मैथिलीमे रहैक - बादमे ई कविता प्राय : पुरना मिथिलामिहिरमे छपलैक ।"" -""अपने कोन-कन कविसँ प्रभावित होइत रहलहसुँ अछि ? "" -""देखू, सरसकवि ईशनाथबाबूक प्रभाव सर्वाधिक रहल ... तत्कालीन हिन्दी कविलोकनिक प्रभाव सेहो पड़ल ।"" -""जेना ......"". -""जेना निराला, दिनकर, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रा देवी चौहान, बच्चन । एहिमे बच्चनक कविता हमरा विशेष झंकृत कएलक । बच्चनक कविताक प्रसादगुण, शब्द-प्रभाव, लय छन्द हमरा झुमा जाइत छल । कतेको कविता हमरा स्मरण अछि औखन ... एकटा विदेशी कविताक अनुवाद कएने छथि बच्चनजी - केहन दिव्य छैक .."". -""जी, से सुनाओल जाय .."". -"" कतहु-कतहु विसरि गेल छी ... तथापि सूनू ... मैंने पूछा मलयानिल से जो अनियन्त्रित रहता है जीवनमें सच्चे सुखका मैं कैसे पा सकता आनन्द और सुनो यह मूल समीरण कानों में क्या कहता है ? बढ़े चले तुम, बढ़े चलो तुम जैसे बहता मैं स्वच्छन्द मुदा मम मैथिली मे सर्वाधिक प्रभावित होइत रहलहुँ सरसकवि ईशनाथ बाबूसँ ! ..."". -""से, केहन प्रभाव ?"" -""देखू ईशनाथबाबू ओहि समयमे सम्पूर्ण मैथिली काव्य-लहरिक केन्द्र भ ' गेल रहथि । भाव, भाषा, पदलालित्य, छन्द, संगीत आ सबसँ बेशी जखन ओ कविता सस्वर पढ़थि तँ सम्पूर्ण पंडाल थपड़ीसँ अनुगुंजित भ ' जाइक ।जखन ओ ' अन्तर मे हाहाकार भरल, नहि वाणी मे साहस ओ बल ' सस्वर पढ़य लागथि तँ हमरा सन-सन श्रोता रस मुग्ध ....... उन्मादक स्थितिमे पहुँचि जाइत छलाह ।"" -"" अपने कहल जे सरस कवि मैथिली काव्य-लहरिक केन्द्रमे छलाह, से कोना ?"" -""अधिकांश तत्कालीन कवि सरसकविक देखादेखी, कविता लिखैत छलाह ... आ जे हुनक लोकप्रियता सँ ईर्ष्या करैत छलाह से हुनका खसएबाक षड्यन्त्र मे लागल रहैत छलाह - तें कहलहुँ सरसकवि काव्य-लहरिक केन्द्रमे रहथि !"" -""अपनेकें ईशनाथबाबूसँ केहन सम्पर्क ?"" -""हमर ओ काव्य-गुरु छलाह .... संयोग एहन भेलैक जे बिठ्ठोक बदरी बाबू, हाटीक बल्लभबाबू आ नवटोलक ईशानाथबाबू निर्णय लेलनि जे संस्कृत नाटकक अनुवाद कएल जाए । ई गप थिक प्राय : 1945-46 क । तावत सरस कवि प्रोफेसर नहि भेल रहथि। इहो निर्णय भेलैक जे अनुवादक उपरान्त परस्पर देखाबी । हमरे ओतऽ हमर बाबूक अध्यक्षतामे गोष्ठी चलैत छलैक । भाइजी (कविवर जीवनाथबाबू) सेहो समय-समय पर सम्मिलित होइत छलाह - तातिल सबमे । अनुवादक क्रममे सरसकवि ईशनाथबाब सबसँ आगॉ बढि कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलक अनुवाद मैथिलीमे कएल । जखन गोष्ठी चलैक हमरा ओतऽ ..... हमर बाबूक अध्यक्षतामे तँ हमहूँ मन्त्रमुग्ध भेल सूनल करी । बादमे हम अपन रचित कविता ल ' क ' ईशनाथ बाबूक ओऽ नवटोल पहुँचि जाइ ... कविता सुनथि ... मात्सर्य आ करुणाक प्रतीक - साक्षात सरस्वतीक वरद पुत्र-अपराजेय शिक्षक .. हमर कविता-तरुकें सिंचित कएल .. हमरा अंगुरी पकड़ि-पकड़िक ' कविताक कलाक ज्ञान देल । "" -""तँ ई कहल जाए सकैत अछि जे अपने ईशनाथ-दग्ध कवि छी !"" -""निश्चय । पूर्णतः सत्य । नाटक धरिमे हम हुनकासँ प्रभावित ।"" हमरा आश्चर्य होइत अछि । साहित्यक तीर्थ नवटोलक सरसकविक स्मृतिरक्षाक हेतु साहित्य अकादमी अथवा मैथिली अकादमीमे कोनो विशिष्ट लेखन- आयोजन, स्मृति-संध्या गोष्ठी आदि किएक ने भेल ? हम गोविन्दबाबू दिस अभिमुख होइत पुछलियनि - ""अपने तँ विभिन्न रुपमे साहित्य अकादमी आ मैथिली अकादमी आदिसँ सम्बन्धित रहलहुँ अछि, सरसकविक स्मृति-रक्षामे एहन उदासीनता किएक ? "" गोविन्दबाबू व्यथित होइत कहलनि - "" हँ, ई भेलैक अछि ... ई उदासीनता आ उपेक्षा अनुचित । हमरा लगै-ए हुनक तिरोधानक बाद हुनक विरोधी सरसकविक मूर्तिभंजन मे लागि गेलाह अछि - ई नहि होएबाक चाही । ओना ओ कालजयी कवि -हुनक स्मृति निरन्तर बनल रहतैन्हि । "" -"" अपने कवितामे लीखल ' नूतन स्वर ' लए अएलहुँ ... केहन नूतन स्वर ?"" -""नूतन स्वर अछि पुनर्जागरणक, साम्राज्यवादक विरोध आ परिवर्तनक नूतन स्वर.."". -""परिवर्तन तँ विकास आ विनाश दुहूक सूचक थिक ।"" -"" नहि, हम व्यवस्था-परिवर्तनक स्वर लय अएलहुँ । हम लिखने छिऐ - चमकल विद्रोहक वहिन प्रबल आन्दोलित भेल मही मण्डल लए निज गण सब रचइत ताण्डव हम नचइत हर भए अएलहुँ हम नूतन स्वर लए अएलहुँ -""अपने बादमे ' यात्री ' जीक कवितासँ प्रभावित भ ' गेल रही ।"" -""नहि, किन्नहु नहि, कदापि नहि, कत्तहु नहि । सात्रीक कोनो प्रभाव नहि ।"" -""अपने पर आरोप लगाओल जाइत अछि जे मंच पर अपनेकें कविता पढ़ल नहि होइत अछि ?"" -""अओ, ई के आरोप लगौलनि अछि .... अच्छा जे बजैत-लिखैत छथि-बाजथु-लीखथु । ... असलमे कवितापाठमे जे अभिनय-कला चाही से हमरा नहि अछि । ... मुदा ई किएक आरोप लगबैत छथि जे हमरा मंच पर कविता पाठ नहि करए अबै-ए । हम जखन ' रुपलालबाबूक बड़का टरक ' आ उबर-खाभड़ सड़क ' अपन कविताक पाठ मंच पर करैत छी तँ सम्पूर्ण पंडाल थपड़ी सँ गुंजित होइत रहैत अछि। अनर्गल आरोप ... ईष्यापूर्ण अपलाप ... सर्वथा असत्य ! सर्वथा असत्य !!"" विश्नपुर पदमौल-मौजे सनकौर्थ, टोले रामनगर, ईसुफपुर प्रसिद्ध इसहपुर हेमांगदराय लौकित पंचम श्रेणीक श्रोत्रिय ब्राह्मण पं. श्री गोविन्द झा आब एहन-सहन आरोप सुनि मर्माहत भ ' उठैत छथि । हमरा दिस अभिमुख होइत कहलनि - "" साप-विच्छूक मंत्र पढ़ै बला ' कवि सबकें मंचपर कविता पढ़ ' अबैत छन्हि, गद्यकें कविता नामक बनाक ' रुग्ण स्वरसँ बाँच बला ' कें कविता पढ़ ' अबैत छनि आ हमरा कविता पढ़ ' नहि अबैत अचि- कहू तँ केहन अनर्गल आरोप ... ई आरोप भेलैक .. आरोप ! "" हमरा आभास भेल एहि वासामे गोविन्द बाबू एसकरे छथि ... "" अपनेक भोजन ? "" -""भोजनतँ हम सब दिन जकाँ दस बजे क ' लेने छी । एकटा विद्यार्थी रहैत छथिन ... हँ, तखन चाह ... ?"" -"" जी, हम चाहक व्यवस्था क ' दैत छी ।"" ज्ञात भेल गृहपति शशिनाथबाबू कोनो बल्लभाचार्यक अधिवेशनमे माण्डवी गेल छथि । गोविन्द बाबू कहलनि - "" हमरो आमन्त्रण छल । पाँचो आंगुर घीमे रहैत । ..से, दरभंगामे ' कल्याणी कोश ' क लोकापंण मे फँसि गेलहुँ । "" हमर भगिनी श्रीमती पद्माझा दू कप गरम-गरम लीफक चाह द गेलीह तँ हमरालोकनिक सासमे सास आएल । ... नीरव, शान्त-एकान्त, शुभंकरपुरक बुर्जुघाटमे रौद आब क्रमश : पिरौंछ होब ' लागल रहैक । जड़कालामे दिन जल्दी-जल्दी बितैत छैक। दिन रहइक मंगल, तारीख रहइक 30 नवम्बर, सन् 1999 । गोविन्दझाक दुइ गोट कथा संग्रह ' सामाक पौती ' ओ नखदपंण प्रकाशित अछि। सामाक पौती चालीस बरखक अभ्यन्तरमे लिखल हिनक अठारह गोट कथाक संग्रह थिक .... नखदपंण मात्र पाँच बरखक अवधिमे रचल गेल हिनक तेरह गोट कथा सभक संग्रह अछि । ' सामाक पौती ' पर 1993 क साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान कएल गेल छैन्हि । - "" अपने कें साहित्य अकादमी पुरस्कार विलम्बसँ प्राप्त भेल ... तकर की कारण ? "" -""तकर तँ एक प्रमुख कारण जे बहुत दिन धरि हमर कोनो पोथी प्रकाशित नहि भेल ... हम सम्पादन ... अनुवाद ... शब्दकोश आदिमे लागल रहलहुँ । सामाक पौती प्रकाशित भेल तँ ताहि पर पुरस्कार भेटल ।"" -""मुदा किछु गोटेक आरोप छन्हि जे पहिल खेप जे अपनेक पोथी रिजेक्ट भ ' गेल तँ अपनेकें क्रोध आ विरक्ति भ ' गेल रहय ।"" -""ई सब अफवाह थिक । केहन विरक्ति ? कथीक क्रोध ? .. हँ, तखन एक हिन्दी संस्थाक बैसकमे हम हिन्दीमे बजलहुँ तँ लोक गोलं मचा देलक जे गोविन्दबाबूकें पुरस्कार नहि भेटलनि तँ क्रोधमे छथि । एकटा बात आर भेलैक । एकटा मैथिली पत्रिकामे हमर इन्टरव्यू बहरायल । ओहिमे हम कहलिऐक किछु आ छपलकैक किछु । हमर बात सम्पूर्णतामे नहि छपल ताहिसँ लोककें भ्रम भ ' गेलैक । ओहि इन्टरव्यूक कारणे किछु गोटे छद्मनामसँ पोस्टकार्ड पर गारि लीखिक ' पठबैत गेलाह - कायरतापूर्ण आक्रमण करैत गेलाह ।"" -""अपने परिवार पुरस्कार ग्रहण करबाक हेतु दिल्ली गेल रहिऐक ? "" -""नहि, हमर आंगनसँ ओहेन रुचि नहि ... रुगण ! चलब-फिरब कठिन तें एकसरे गेलिऐ. !"" -"" पुरस्कार ग्रहण करैत काल केहन अनुभव कएलिऐक ?"" -""रोमांच भ ' |