वाराणसी वैभव

भोजपुरी लोक साहित्य एवं संस्कृति


लोकोक्तियाँ

भक्ति, ज्ञान एवं नीति
खेती-बारी/मौसम
पशु-पक्षी से सम्बन्धित
युग-सन्दःर्भ में

गांजा
गांजा के प्रकार
गंजेड़ियों के शब्द
गंजेड़ियों के कु बोल
गाँजा पीने से हानि

भाँग और विज्या
विज्या/भांग के गुण
विज्या/भांग सेवन के नियम
भँगेड़ी की आसक्ति

सुरती सेवन से हानि
बीड़ी से हानि
मछ्ली के प्रशंसकों के बोल
मछ्ली-विरोधियों के बोल
मिश्रित पदः्बन्ध


लोक-प्रसिद्ध उक्तियाँ लोकोक्तियाँ हैं। सूत्र एवं संक्षिप्त वाक्य में समाये पीढ़ी दःर पीढ़ी के अनुभवों से युक्त इन लोकोक्तियों की भाषा यथार्थ होती है; इनमें आम बोलचाल या दःैनिक व्यवहार में आने वाले शब्द प्रयुक्त होते हैं। इसीलिये लोकोक्तियों को जनता की आवाज भी कहा जाता है। लोकोक्तियों के दःाय में कहावतें, मुहावरे, पहेलियाँ, बच्चों के खेलगीत तथा ज्ञान, भक्ति, नीति आदि से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार के पदः्बन्ध आते हैं; किन्तु शैली, रचना एवं व्यंजना की दृष्टि से उनमें बहुत कु भेदः होते हैं। इस अध्याय में भक्ति, नीति, ज्ञान, लोक व्यवहार इत्यादि से सम्बन्धित पदः्बन्धों को रखा गया है।

भक्ति, ज्ञान एवं नीति :

१. ज्ञानी होना चाहो तो गंगा स्नान करो,
ध्यानी होना चाहो तो धरम को बढ़ावो जी।
जीने को चाहो तो जीवों पर दःया करो,
सत्य बोलना चाहो, इन्द्री वश लाओ जी।
भागने को चाहो, तो भागो बु कामों से,
आने को चाहो, तो श्रीराम शरण आवो जी।
नाचने को चाहो तो रघुनाथ आगे नाच करो,
गाने को चाहो तो श्रीराम लीला गावो जी।

 

२. जसहु न लीन्हों जप-तप न कीन्हों,
जंत्र -मंत्र न चीन्हों, न कहायो बड़ दःानी में।
कीन्हों ना प्रसंग, सतसंग साधु-संतन संग,
निप न दःानी, भय पाप के निशानी में।
विप्र को न माने, वेदः-भेदः न जाने,
दःया धर्म को न माने, र मन के गुमानी में।
तो नाहक नर जन्म लीन्हों, अवनि कर बीच महिं,
बूड़ि क्यों न मरे, उल्लू चुल्लू भर पानी में।

 

३. अंधरन के आगे कहीं र्रूप का दिखाइबे के,
वहिरन के आगे कहीं तान का सुनाइबो,
धोखे दःगाबाजन से प्रीति का लगाइबे को,
सोम्हवन के द्वेार पर जांचबे का जाइबो।
मउगन के आगे मरदःानी करबे का,
लड़ने की कायर से सुजस का पाइबो।
पढ़ता मुनेसर कवि गूंगन से बोलबे का,
खोलिए ना जौहर जहाँ जौहरी न पाइबो।

 

४. जोगी रोगी भक्त बावरा, ज्ञानी फि निखट््टू,
सांसारिक को चैन नहीं, जिमि सराय का ट्ट््टू।

 

५. साधु सज्जन कनक भरा टू जू सौ बार,
दःुर्जन घड़ा कुम्हार के, एके घक्का भड़ाक।

 

६. साई सबको दःेत है, जाको जैसी भाग,
हंस मोती दःेत है, दिया चकोरन आग।

 

७. पिंगल पढ़कर क्या करे, तीन गुन से हीन,
उठकी बैठकी बोलना, लिए बिधाता छ्ीन।

 

८. कर्म कराही ज्ञान घृत, मन मैदःा के सानी,
ब्रह्म जोति जगाइ के अनूप मिठाई छानी।

 

९. संगत के गुन होत है, संगत से गुन जाय,
बांस फांस मिसिरी, एके भाव बिकाय।

 

१०. पगिया बान्हो केस संवारो, तेल लगे जुल्फन में
दःया धर्म ना तन में मुखड़ा क्या दःेखा दःरपन में।

 

११. पाप से धन बढ़त है, पन्द्रह बीस पचीस,
पाप ही से धन घट्त है, नाती पूत सहित।

 

१२. धुआँ के धरोहर, ओ बालू के भीत,
मत लगाई ओछ्रन से प्रीत। (ओछ्रनउओछ्, छ्ोटा, नीच व्यक्ति)

 

१३. कोई लठधारी, कोई जट्धारी, कोई दःसो इन्द्रिय घस डारी,
क हो लंदःा, सुनो बेलंदःा, खोपड़ी-खोपड़ी गत नारी। (नाड़ी)

 

१४. करमे खेती करमें नारि, करमे मिले कुटुम इ चार।

 

१५. धन के धमण्ड जरा मन से आप दःूर कीजिए,
दःौलन खाजाना, माल सभी छ्ोड़ जाना है।
हुज्जत लड़ाई कु करने का काम नहीं,
नाहक में हित-मित्र से बैर कर जाना है।
पोथी पुरान वेद शास्र हम दःेख चुके,
खाली सिया राम नाम से ही तर जाना है।

 

१६. कठिन जग हम ठानि लियो, दःरब ना कि हाथ,
पाप से उपहास होइहें, पत मोर राखऽ हो रघुनाथ। (पत
= प्रतिष्ठा)

 

१७. तोहरे राम तो सूझत नाहीं,
दःहिया में जइसे घीव छ्पिल बा, बिना मथले मिलत नाहीं।
मेंहदी में जइसे रंग छ्पिल बा, बिना पिसले निकलत नाहीं।

 

१८. तुलसी तुलसी सब कहे, तुलसी जंगल के घास,
महिमा भए रघुनाथ की, कि हो गए तुलसीदःास।

 

१९. लिखनी, नारी, पुस्तके, परहस्ते नष्ट-भ्रष्टे।

 

२०. मेढ़ा जब पी हट्े, वे ना रह छ्पकन्त,
बैरी जब हँस के बोले, तबे संभारो केंत।
(मेढ़ाउभैंसा, साँढ्, बोका; ये बिना मा नहीं रहते, यदि किसी को दःेखकर, वे थोड़ा पीछ्े हट्ें।)

 

२१. उजला-उजला सब भला, उजला भला न केस,
नारि नवे न रिपु डरे, न आदःर कर नरेश।

 

२२. संगत कीजै बड़न के बनत-बनत बन जाय,
नवकुंजल के सीस पर अजा पत्री खाय। (नवकुंजल= हाथी, अजा = बकरी।)

 

२३. हंस गए सरवर दःह सुगा आम के डाड़, (दःह= नदी)
जाहु विप्र घर आपना, मंत्री काग सिआर।

 

२४. रात अन्हरिया पंथ ना सूझे, खाल ऊँच बराबर बूझे।
मुये करकसा ना ओ कम चाल के ट्ट््टू,
मुये परुँअवा बैल ओ मरद निखट््टू। (परुँआ= आलसी, निखट््= अकर्मण्य)

 

२५. बात के मरदः, रहन के गोरी, दःूध के भैंस, चाल के घोड़ी।

 

२६. बिना गर के गावऽ गीत, भादःो में उठावऽ भीत।
माघ मास में सूते पौवा, क घाघ इ तीनों कौआ।

 

२७. खेत बिगाड़े खरतुआ, सभा बिगाड़े क्रूर।
धर्म बिगाड़े लालची, केंचन हो गए धूर।।

 

२८. ऊँच दःाँत की कामिनी दःूजे के घर जाय।
लोक लाज राखे नहीं, जग में क हँसाय।।

 

२९. घर के खड़ा हर बा चार, घर में गिहथिन, गउ दःुधार।
अरहर दःाल, जड़हन के भात, गागल निमुआ ओ घीव तात। (जड़हन= रोप धान)
खाँड़ दःधि जो घर में होय, बांकी नयन परोसे जोय।
कहे अम्बिका सर्वे झूठा, उहाँ छाड़ि इहवें बैकुण्ठा।

 

३०. उपासल मनइ के बिहान ना होला, ढ्ेर दिन पहुनाइ में मान ना होला।
दःेव -दःेव कइला से दःान ना होला, मुदइ आ रोग कबो बेजान ना होला।
बिना घामी वर्षा के घाम ना होला, सुन के महट्आवेउ अनजान ना होला।

 

३१. भूख ना दःेखे र्रूखा भात, नींद ना दःेखे मुरदःा घाट्।
पिआस ना दःेखे धोबी घाट्, प्रीत ना दःेखे जात कुजात।

 

३२. ठुनमुन ठुनमुन बैल करो, हँसमुख करो नारी,
गोंयड़ा में खेत करो साव करो भारी। (गोंयड़ा= घर के पास)

 

३३. पुरुँआ पछुआ ब बेयार, बिधवा ना करे सिंगार,
क घाघ का करीं विचार, इ बरसीउ करी भतार।

 

३४. रावल, राजपूत, रामजनी, राजा और र्रूप
राह किना घर बसावे, रका दःु:ख।

 

३५. आधी रात के सातू खाय, बिनु नारी ससुरा जाय,
बिना कीच के चढ़े पउआ, क घाघ इ तीनों कउआ।

 

३६. नया जोतिषी बैद्य पुरान, रेख उठन्ते सुभत जवान,
लड़िका ठाकुर बूढ़ दःेवान, काम बिगड़े साँझ बिहान।

 

३७. बिना बैल के क खेती, बिना वर दःेखे ब्या बेट्ी
द्वेार पराये गाड़े थाती, इ तीनों मिल पीट्े छाती।

 

३८. बैल तोनारा, खेत ढ्ेलारा, तिरिया भगठी, पुत्र लुहारा, (लुहारा= लफेंगा)
कर्म फू त प कपारा।

 

३९. बढ़ा बाल, मैला कपड़ा और करकसा नारि,
सोने को धरती मिले, नर्क निसानी चारि।

 

४०. पान पुराना घी नया औ कुलवंति नारि,
चौथा पीठ तुरंग का स्वर्ग निसानी चारि।

 

४१. उड़न बूड़न कूदःन नाहीं, सील के पीसल तिअन नाहीं,
आदि घी ना अन्ते दःही, ता रसोइ के गिरल कहीं।
(उड़न= चिड़िया के मांस, बूड़न= मछ्ली, कूदःन= खंसी के मांस, पीसन= मसाला)

 

४२. गड़न्त में ओल, उड़न्त में बगेरी, चलन्त में रेहु। (उत्तम होते हैं)

 

४३. सब तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार।

 

४४. राग रसोई पागरी, बनत बनत बन जाय
बिगड़त में कु दःेर नहीं, राख भसम होई जाय।

 

४५. गेहँू गोरस गुर एक है, चाहत है सब कोइ,
जाहि विधाता दःाहिने, ता मय्यसर होइ।

 

४६. मनला के मनौती, सनगर के हुँक्का,
बैमान खातिर अदःालत, राड़ खातिर जूता।

 

४७. राजा, धीमड़, वेश्या, पासी,
इ घर खइले जम्हपुर वासी। (इनके यहाँ नहीं खाना चाहिए)

 

४८. फल में पपीता, नारी में सीता अउर ग्रंथ में गीता के बात कु अउर बा।

 

४९. जो न कभी गलती करे, उसे भगवान कहते हैं,
जो गलती करके स्वीकार ले उसे इंसान कहते हैं,
जो अनजान में गलती क उसे हैवान कहते हैं,
जो जानबूझ कर गलती क उसे शैतान कहते हैं।

 

५०. सौख राय के चार इयार, (सौख राय= सुखी व्यक्ति)
बाघ राय, ट्कराय, गरमी, सुजाक राय।

 

५१. नसे, उपासे, मांसे, तीनों सर्दःी नाशै।

 

५२. खा के मूते, सूते बायीं, का के बैद्य बसावे गायीं। (गायीं= गाँव में)

 

५३. आपन कुल ओ विप्र कुल, तस विधवा वो कुँआर,
इससे जो दःगा क डूबे कुल परिवार।

 

५४. केंचन कलस कर गहे, नित उठ बरिसत मेह,
सिर पर जटा दःरिद्र के, बूँद पड़त ना दःेह।

 

५५. बनिया दःाता ठाकुर हीन बैद के बेटा व्याधि न चीन्ह,
पंडित चुप्पा पतुरिया मइल, घाघ क घर पांचों गइल।

 

५६. हँस के बोले, ठुनुक के रोये, राह चले त जूड़ा खोले,
हाथ उठा के क जम्हाई, छ्निार बाजा बजाई।

 

५७. एक जल जल हऽ एक ना गड़ही,
एक नारी ना हऽ एक ना गदःही।

 

५८. जब ब्याह की चाह उठी मन में, तब सोरह, बीस, पच्चीस में कीजै,
तीस भयो तब खीस भयो, चालिस में कभी नाम न लीजै।

 

५९. सौ में सूर हजार में काना, सवा लाख में ऐंचा ताना,
ऐंचा ताना क पुकार, कोइसा से रहिहऽ होशियार।

 

६०. खट् किरवा बन लीलदःाग, ओ कपूत रिसिआय, (खट्मल)
बांझ मेहर का र्रूसना, ट्पका सहा न जाय।

 

६१. गइल पेड़ जहाँ बगुला बइठे, गइल राज जहाँ चुँगला पइठे।

 

६२. कहीं जोगी जोग करे, कहीं क भोग,
कहीं जोगी वैद होखे, कहीं होखे रोग।

 

६३. साँवा खेती बाह बनीजी, भइंस कुरंग बिकाय,
अहिर मित्र ना कीजिए कि अवर जाति मर जाय।

 

६४. मित्र वहीं मर जाय जो वक्त पर काम न आवे,
वंश वहीं मर जाय, जो कुल में दःाग लगावे।

 

६५. आन्हर का जाने कि साँझ ह कि भोर हवे
राह का जाने कि साध हवे कि चोर हवे।

 

६६. मांगो उसी से जो दःे खुशी से, जो क ना किसी से।

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खेती-बारी/मौसम :

१. आवत आदःर ना कियो जात न दीन्हों हस्त,
बीच में माघा ना बरसे त का करि गृहस्त?

 

२. दःक्खिन लडके लडका, उत्तर ठनके दःेव,
भइंस ऊँच छानिए, कह गए सहदःेव।

 

३. सावन पुरवा भादःो पछुआ आसिन ब इशान,
क घाघ घाघिन से कि कहवाँ धरबू धान?

 

४. सावन में पछुआ, सीक डोले त म मरे, गाछ् डोले त ब परे।

 

५. सावन मांह ब पुरवैया, बैला बेंच कीन धेनु गैया।

 

६. दःखिन दिसा लौका लउके उत्तर गरजे दःेव,
इ बरखा बाँव ना जाई, कह गइले सहदःेव।

 

७. रोहिणी रोवे, मिरगिटाह ट्रे, कु दिन अद्रा जाय,
क घाघ घाघिन से जे स्वान भात ना खाय।

 

८. रात में बोले भंडरी, दिन में बोले सियार
क घाघ धाघिन से निश्चित प अकाल।

 

९. शुक्रवार की बदःरी, र शनिश्चर छाय,
क घाघ सुन घाघिनी, बिनु बरसे न जाय।

 

१०. रात निबदःर, दिन में छाया, क घाघ कि बरखा गया।

 

११. गीला खेत जे बोए कोई, ताके बीज न अंकुर होई।

 

१२. नित उठ खेती नित उठ गाय, जे ना दःेखे ओकर घर से जाय।

 

१३. रोहिन में घर रोहा नाहीं।

 

१४. जे न दःे सोना, से खेत के कोना।

 

१५. कहि गइले रावन, केला रोपिहऽ सावन।

 

१६. माघे जाड़ ना पूसे जाड़, जब बयार ब तबे जाड़।

 

१७. आधा माघे कमर कांधे।

 

१८. मैदःे गेहँू, ढ्ेले चना। (गेहँू के लिए महीन मिट््ट्ी और चना के लिए ढ्ेलाह खेत अच्छा होता है)

 

१९. ग के धरीं, ना त आरी पर बइठीं।

 

२०. उत्तम खेती जो हलगाहा, मध्यम खेती जो संगरहा।
जे पूछ्े हर बही कहाँ, बिया डूब गइल जिनकर तहाँ।

 

२१. पनही पहन के हल गहे, सूथन पहन नहाय। (सूथन= साफ, अच्छा कपड़ा)
क घाघ इ तीनों भकुआ, बोझ लिये जो गाय। (गाय= गाना गावे)

 

२२. तीन पानी तेरह कोड़, तब दःेखऽ ऊँखी के पोर।

 

२३. बहुरा से दिन लहुरा, खिंचड़ी से दिन जेठ।

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पशु-पक्षी से सम्बन्धित :

१. कान कसोट्न सोकन बान, तीन छ्ोड़ जनि किनिहऽ आन।
जब दःेखिहऽ बइरिया गोल, उठ-बैठ के करिहऽ मोल।
जब दःेखिहऽ मैना, झ से दीहऽ बैना।

 

२. बैल के चार छ्ो - सींग, पाँव, पँूछ्, कान। (अच्छा)

 

३. माथे महोर (लाल) पों चांवर (चौड़ा)
अपने जाई पड़ोसिन के भी ले जाई। (बैल के पय)

 

४. साठ लगाइ हर बैल कीन लो, बो लो साठी धान।
पहिले खाए चिरइ चुर्रूंग, तब खाए किसान।

 

५. माघ के टूट्ल मरदः, भादःो के टूट्ल बरदः।

 

६. बैल कीनी धामर धूमर, भइस कीनी हाँड़ी
गोर तिरिया से साादी करीं, सेज करी सिंगारी।

 

७. बैल किनी अउवा ढ्ेबर भइंस कीनी पाड़ी,
कुल दःेख के शादी करीं, गोर हो चा कारी।

 

८. न चीन्ह त नाया कीन।

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युग-सन्दःर्भ में :

१. मुखिया हो के का करबऽ जब गाँव के गाँव भकोले बा,
पागल होके का करबऽ जब सनकाह इ संवसे टोले बा।
माथ पीट् के का करबऽ जब सबे समुंदःर सोखे बा,
सोरे आना के लेखा से तेरह आना लोग बोके बा।
माल मुं तर बा, बाकिर चाँप दीहल बा, (मँुहेतर= सामने ही, चाँप दीहल= छुपा दःेना)
बोका लोग खाइ कइसे, मुँह जाब दीहल बा।
बोका लोग के मुँह खुली ना,
ठहरे हुँड़ार चाँपत रही, ड के बोली ना।

 

२. नवका जमाना के नवका छ्वारिक लोके,
नवका पहिरावा के अंडर में वीयर बा।
दःेखनी हजामत, तीन ताला पर चढ़ के,
ऊँपरा सब ट्ीम टाम, निचला सब दीयर बा। (दीयर= उजाड़, खस्ताहाल)
पेट्ीकोट् लेडी बा, लूंगी जनानी छाप,
कान्ह पर के साल स्टुडेन् के निसानी बा।
पाउडर के पोतला से मुँहवा पर पें भइल,
सेंट्ेड , रिफाइन सब बबुअन के लाइन बा।
मुँह के बनाव से बबुनी लोग हार गइल,
दःेखला से बबुये लोग बबुनी से फाइन बा।

 

३. आजकल के पंचपसेरी, बदःलत में नइखे तनिको दःेरी।
जहाँ जेइसन तहाँ तेइसन, इ ना क से पंच केहिसन?
रात -दिन जो घें ममोरी, सबे बोले ओकरे ओरी।

 

४. सास भइली लौंड़ी पतोह मलकाइन
बाप के बेटा कहल ना माने, नया जमाना आइल।

 

५. अंजोरिया के आशा में अन्हरिया अंगेज लहनी,
धी से दःु:ख दः के परहेज लहनी।
बोली मीठ बतासा जइसन चेहरा बा दःेखनउक
कवना लजत पर ए बबुआ भइलऽ चिअरबउक।

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गांजा :

गांजा के प्रकार : मरिचइया, मनिपुरिया, अलीबम, अजमल, चीपड़, बालूचर, गदः्दी, भूसी, सुल्फा। इसमें "भूसी' जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है गांजा का चूर्ण, छ्ंटा हुआ सामान्य माल है, और "सुल्फा' भांग को खूब मलकर तैयार किया जाता है।

गंजेड़ियों के शब्द : गांजा तैयार करने के लिए "अमनियां' कइल, अथवा "लठल' कहा जाता है। गांजा जब कड़ा होता है तब उसे "चूस', मधुर होने पर "मिठास', बेकार हो जाने पर "भकमीला', या "फसल्ली', हल्का होने पर "फींका', अत्यधिक कड़ा होने पर "नट्ीफार', पीने के लिए "चेतावल' या "राग- भोग लगावल' कहा जाता है। गांजा पीने वाले स्वभावतः अधिक भोजन करते हैं, और इसके लिए "ओल्हल' शब्द का व्यवहार करते हैं। गांजा पीकर जब नशेबाज "भकुआ' जाते हैं, तब वे जो निर्गुन छ्ेड़ते हैं, वह कु इस प्रकार का होता है-

फूल लोर्हे गइलीं हो बारी, सारी मोर अंट्केला डार्ही, एकिया हो रामा।

बिना प्रभु सरिया के ना छ्ोड़ावे, एकिया हो रामा।

लोर्हत- लोर्हत हो बारी, चढ़ली पिया के अटारी, एकिया हो रामा।

बिना प्रभु सरिया के ना छ्ोड़ावे, हो रामा।

इसी बीच कोई दःूसरा नसेबाज बोल उठेगा - ""कवन गंजेड़ी गांजा गइले हो सइंया बउरास'।

गंजेड़ियों की बैठक नियमतः तीन समय होती है-सुबह- दःैनिक क्रिया-कर्म से निवृत्त होकर, कूला दःतुवन करके, कु मुख में डालकर पानी पीकर, फिर दःोपहर और पुनः शाम को।

गांजा के सामान में गांजा, सुरती, साफी, चीलम, गुल अैर एक माचिस ही पर्याप्त है। "गुल' के लिए फुस के घर के कोनचा या टा की रस्सी, अथवा फट्े-पुराने चट््ट्ी का उपयोग होता है। गुल-सुलगने को "गुल-गलल' कहते हैं। गंजेड़ी लोग बिना पानी के गांजा मलने पर "र्रूखा' और पानी के साथ मलने पर "उसना' बोलते हैं।

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गंजेड़ियों के कु बोल :

१. गाँजा पीने से क्या नफा, अँखिया लाली दिल सफा।

 

२. गाँजा नहीं कहर है, कलेजा जार दःेता है, आँखों का लहर है।

 

३. गाँजा नहीं गूंजी है, भोजन करने वाला कूँजी है।

 

४. गाँजा पी- पी के बलमुआ अँखिया लाल कइले बा।

 

५. गाँजा है गु ज्ञान के बूट्ी मल-दःल इसे पिया करो, खैनी (सुरती) ख्याल से दिया करो।

 

६. गाँजा पिये राजा तमाकू पिये चोर, खैनी खाए मूरख थूकेला चा ओर।

 

७. गाँजा के जे क अदःगोई- बदःगोई, ओकरा वंश में र ना कोई, रहबो करी त लंगड़ा लूला होई।

 

८. एक चिलम में ऐसी तैसी, चिलम में ताजा, तीन चिमल में गांजा-गूंजी, चार चिलम में राजा।

 

९. गाँजा-गूंजी में एक आदःमी, घट्ले-बढ़ले आदःमी, ब प त तीन आदःमी।

 

१०. जे न पिये गाँजे की कली, ओ लड़का से लड़की भली।

 

११. बम शंकर दःुस्मन साले को तंग कर।
बम चंडी अगरधत्ता, मारो दिल्ली लूटो कलकत्ता।
बम शंकर कैलासपति बेर्हा परस लाखपति।

 

१२. बम शंकर तन गनेस, माल भेजऽ हर हमेश।
बम शंकर लहरी, गाँजा भेजऽ एक डेहरी।
शम्भो कैलास के राजा, दःम लगा जा।

 

१३. बम शंकर भूल न जाना, काशी छ्ोड़कर दःूर न जाना।

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गाँजा पीने से हानि :

गांजा पिये गु ज्ञान घट्त है, माल घ कु अन्दःर का,

सूख -पाक कर लक्कड़ भए मँुह भए जैसे बन्दःर का,

गाँजा के पीना छ्ोड़ दःो ए गँजेड़ी भैया।

सांझ-सबेरे तोह कारन आवे सबै पिवैया,

बाह -बाह कर खूब सराहे, फोक के पिवैया,

गाँजा के पीना छ्ोड़ दःो ए गँजेड़ी भैया।

दःस-दःस चीलम गाँजा पीवे, कु ना करे कमैया,

दःमा -खाँसी जोर क तो कहते बप्पा-दःैया,

गाँजा के पीना छ्ोड़ दःो ए गँजेड़ी भैया।

गाँजा पी के दःेह बिगाड़े भइले सूख खट्ैया,

अलख लगा के दःम लगावे, खोंखे बूढ़े भैया,

गाँजा के पीना छ्ोड़ दःो ए गँजेड़ी भैया।

गहना-जेवर बान् धइले बेचले खेती-बरिया,

बाप दःादःा के नाम डूबवले, गांजा के पिवैया,

गाँजा के पीना छ्ोड़ दःो ए गँजेड़ी भैया।

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भाँग और विज्या :

भाँग के लिए एक उत्कृष्ट शब्दः "विज्या' भी प्रचलित है। किन्तु "भाँग' और "विज्या' में अन्तर है। "भाँग' में सिर्फ भांग का पत्ता होता है, परन्तु "विज्या' में अनेक तरह के पदःार्थ पड़ते हैं; जैसे- पुराने भाँग का पत्ता, जिसे छाँव में सुखाकर रखा गया हो, काहू, कुल्फा, कासनी, पोस्ता, खीरा का बीज, छाँव में सूखा हुआ गुलाब का फूल, धनिया, मीर्च, इलायची (छ्ोट्ी), सौंफ। इसे सील पर खूब बारीक पिसा जाता है। भँगेड़ियों का मानना है कि इसकी अच्छ्ी पिसाई का यही प्रमाण है कि लोर्हा को उठाया जाय तो वह भाँग से चिपक कर सील को भी उठा ले। ऐसी पिसाई साधारण व्यक्ति द्वेारा संभव नहीं। इसके लिए पहलवान शरीर चाहिए। इतनी अच्छ्ी पिसाई में कम से कम २ घं का समय तो लगेगा ही। फिर इस भांग या विज्या का गोला खांय या इसे घोलकर पीयें। इसे और उत्तम बनाने के लिए इसमें सूखा फल- किसमिस, पिस्ता, बादःाम, आदि भी डाला जाता है। मिश्री के साथ दःूध में घोलने पर इसकी गुणवत्ता में चार-चाँद लग जाती है। कहा भी गया है -

ले भंग दःूध में घोला, तो भंग बना अनमोला।
खा भंग नहा के गंग, जमा जंग, दिखा कुंडी सोटा-लोटा।
मन मैल मिट्े, तन तेज बढ़े, रंग भंग का गोला।

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विज्या/भांग के गुण :

विज्या जो पीवे सिंह को पछाड़ डाले,

स्वानहु जो पीवे तो मा गजराज को,

बनिया जो पीवे तो को किला ढा करे,

सुरमा जो पीवे तो चो क राज पर,

कामिनी जो पीवे तो केंत संग केलि करे,

केंतहु जो पीवे तो चाहत सुख-साज को,

कहत है निपट्-निरंजन विज्या में एता गुण,

बगुला जो पीवे तो उड़ाय मा बाज को।

मरिच मसाला सौंफ कासनी मिलाय, भांग खाय, अनेक रोग को उबारती,

जारती जलंदःर, भकेंदःर, कटोदःर, बबासीर सन्निपात विदःन विदःारती,

कहे शिवरामदःास खाज को खराब करी, छ्कि छ्ै छ्जन, असुर को निकालती,

पिनस प्रमेह विष बावन तरह के रोग, कमर दःरद को गरद कर डारती।

विज्या/भांग सेवन के नियम :

चार महीना घोर-घार, आठ महीना गोली,

जब मिआज मस्त होवे, सुनी आत्मा के बोली-

पहिल पहरवा जे नर पीवे, कर गंगा स्नान,

आसन मा सिंहासन बइ कर शम्भू के ध्यान,

सुनो भाई भांग के लक्षण।

दःूसर पहरवा जे नर पीवे, कर रोट्ी के आस,

रोट्ी पर जब रोट्ी तूरे, जस चिड़िया पर बाज,

सुनो भाई भांग के लक्षण।

तीसर पहरवा जे नर पीवे, कर सभा के आस,

बीच सभा में गरजन लागे, जस जंगल के बाध,

सुनो भाई भांग के लक्षण।

चउथ पहरवा जे नर पीवे, कर सेज्या के आस,

चारों पाँव खटाख बोले, जस घोड़े का टाप,

सुनो भाई भाँग के लक्षण।

भाँग का सेवन करने वाला व्यक्ति काफी भोजन करता है, क्योंकि उसकी पाचन-क्रिया दःुरुँस्त रहती है। इसीलिए कहा गया है-""भँगिया जनि दःे गँवारन के बटुली के भात संघारन के''। भाँग लेने के बाद दिशा की तैयारी हो जाती है- ""भाँग के गोला पे में, हाथ के लोटा खेत में।''

भँगेड़ी की आसक्ति :

कहे अड़भंगी दःास सुनऽ हो जोगी जी बात,

भंगिया के पानी मोके नित उठ आनि दःऽ।

भंगिया के अंजन-मंजन, भंगिए के मुख-मंजन,

भंगिया के पेड़ा जलपान के मंगाई दःऽ।

भंगिये के दःाल-भात, भंगिये के बारा-बरी,

भंगिया के सुअन जलपान के मंगाई दःऽ।

ए ही थोड़ा बात के निहोरा करीं बार-बार,

थोड़ा सा भाँग मोरा झोरी में भराई दःऽ।

सुरती सेवन से हानि :

१. सुरती मुख गंध दःेत, सुरती मुख सुरत लेत,
सुरती की गरमी दःो नयन में समातु है।
सुरती से हानि होत, सुरती से निन्दःा होत,
सुरती बिनु सभा बीच मन पछ्तातु है।
कहे साधु सरन मानो, सुरती अशुभ जानो,
दःुनिया के गलीजन में सुरती बोआतु है।

 

२. सुरती में इनकर मनवा बसल बा,
खाए के सुरती, माँगे के भीख
ना दःेला पर सुरती, इ पा ले बीख
इनका हरदःम घट्ल बा।
सुरती में इनकर मनवा बसल बा।

 

३. सुरती आइल सुर्रूजपुर से र जगत में छाय,
जेकरा तन पर बस्तर ना से सुरतिया खाय।

 

४. सुरती क कि सुनर नारि, पहिले लेउ करेजा जारि।
दःुसरे नैन जोत ह लेव, तीस जल्दी बूढ़ क दःेव।
चौथे क एक ऐब हमार, जे माँगे से हाथ पसार।
पांचवे जात-पात ना पूछ्े, चिकनो जगह पर पच-पच थूके।

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बीड़ी से हानि :

कहिले से सुनऽ सुनऽ, छाडऽ बीड़ी से इयारी,

चाउर चना कीने तहार बीड़ी के बेपारी।

डेहरी में खुलल बा दःूसरो दःुआरी,

बीड़ी दःेला, कोमलऽ करेजवा के जारि।

अउरी में लुतिया से ज सुनर सारी,

लिखतऽ में कलम हमार दःेत बा हुँकारी।

बारऽ बारऽ कहता अमिका सिंह पुकारी।

मछ्ली के प्रशंसकों के बोल :

रो के मुण्ड में प्रयाग बसत है, पों बसत है काशी,

कांट्े -कां दःेवानां, पत कव एकादःसी।

चेल्हवा चहँु तीरथ भरम रही, सिधरी शिवलोक के ध्यान धरी,

ट्ेंगर से प्रभु ट्ेक लिया, मुंगरी रथ साज विमान चली।

हरदी मरिचा पिस मेथी के फोरन, तेल जरी,

भाई -बन्धु सब बइठ के बरनत, जेंवत में सब दःेह तरी।

मछ्ली महारानी, तो कहाँ ले बरनों !

जिन रात दिन गंग नहाई,

परबत तोड़ हिलोरत चलत, धीमड़ जाल पसार के मारत।

घर -घर से निकली युवती, सब काँख तर छ्ीप जाँति के आयों,

लहसुन मरिचा इ के कड़ु़आ तेल में छ्ेंवकैहों,

ताको खाय से का न कुल परिवार तरि जइहों !

सिधरी से सिद्ध होत है गरई ज्ञान के मुण्ड।

जो चाहे बैकुण्ठ को, सो खाए रो के मुण्ड।

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मछ्ली-विरोधियों के बोल :

रो के मुंडी, मोय के पेट्, दःही के ऊँपर गूड़ के हेठ।

कासी करव इ के, को ग दःान,

तिलभर मछ्री कारने, सकलो नरक निधान।

मीन मांस जो कर अहारा, चौसठ जनम गिद्ध अवतारा।

किस मास में क्या सेवन क्या परहेज?

चइत चिउरा, बैसाखे तेल, जे लहसुन असाढ़े बेल।

सावन साग, भादःो दःही, कुआर करैला, कार्तिक मही।

अगहन जीरा, पूसे धना, माघे मिसिरी, फागुन चना।

चइत चना, बैसाखे बेल, जेठ सयन, असाढ़े खेल।

सावन हरा, भादःो चीत, कार्तिक मूली, कुआर मींठ। (चीत= चिरैता)

अगहन माह खाओ तेल, पूस में करो दःूध से मेल।

माघ मास घीउ खींचड़ खाए, फागुन उठके प्रात नहाय।

(चैत्र में नीम खाने का भी विधान है)।

राम राम लड्डू, गोपाल नाम घीव,

ह नाम मिसिरी घोर-घोर पीव।

स्थान-विशेष के सम्बन्ध में

चम्पारन के धनहर खेती, एक से एक रो के पेट्ी (रो के पेट्ी = उपजा खेत)

चम्पारन में भात बने ला, बटुला छ्ोड़ बटुली महके ला।

चम्पारन में थाना बगहा, तहाँ न लागे माल के पगहा,

रेल के सिलप उ बनेला, चम्पारन के लोग हँसे ला।

धूपसागर-धूपसागर अंगुठी के नगीना,

जे आवे एक दिन खातिउ रह जाय महीना।

(धूपसागर बिहार के गोपालगंज जिले का एक गाँव है)

दःरबे दःरभंगा, असबाबे ट्ेकारी, (दःरबे= द्रव्य, असबाबे= अस्र-शस्र, ट्ेकारी= एक राज्य)

दःरबे दःरभंगा, राज में बेतिया, बनिया में हथुआ, लोहा में तमकुही।

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मिश्रित पदः्बन्ध :

१. कुल बांके तिरिया सोहे, दःूध बांके पारी,
कौल बांके मदःर सोहे, चाल बांके घोरी । (कौल
= बात के पक्का)

 

२. बर बीस बीस बीसा, वर ताक एके दिशा
वर गले वैजन्ती माला, वर घेर चांदःनी चमके,
सात भइया के चौदःह लाठी।

 

३. प्रीतम बसे पहार पर, मैं जमुना के तीर,
अब तो मिलना कठिन है, पाँव पड़ा जंजीर।

 

४. धिरिक पिआ जिअना कि साग रोट्ी तिअना,
धिरिक पिआ के दःार्ही, लइका रोई बारी।

 

५. छ्ोट्ी चुकी खिरकी चन्दःन छ्रिकी, झिर-झिर बहे बेयार
ए सइयाँ मो जाड़ लगे कि चादःर दःीं ओढ़ाय।
चादःर ह तोर ऐसी-तैसी चोलिया बुट्ेदःार
ए घरी के कारन गोरिया हो गइल जुलाब।

 

६. सुतल रहलीं अमवा तर, महुआ तर गोर,
झनर -झनर मोर झबिया करे, हम जानी ह मोर।
दिया बार छ्ोट्ी ननदी, महलिया पइसे चोर।

 

७. भदई के चिउरा, भंइसी के दःही,
खइला पर मन क दिअ में रहीं।

 

८. चमथा के मार्हा चमथा के दःही,
एहिसन मन क चमथे में रहीं (चमथा-दःरभंगा जिले में)

 

९. खिंचड़ी के चार इयार, दःही, पापड़, घी, अंचार।



वाराणसी वैभव

 


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