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वाराणसी वैभव |
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भोजपुरी लोक साहित्य एवं संस्कृति |
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लोकोक्तियाँ
१. ज्ञानी
होना चाहो तो गंगा स्नान करो,
२. जसहु
न लीन्हों जप-तप न कीन्हों,
३. अंधरन
के आगे कहीं र्रूप का दिखाइबे के,
४. जोगी
रोगी भक्त बावरा, ज्ञानी फि निखट््टू,
५. साधु
सज्जन कनक भरा टू जू सौ बार,
६. साई
सबको दःेत है, जाको जैसी भाग,
७. पिंगल
पढ़कर क्या करे, तीन गुन से हीन,
८. कर्म
कराही ज्ञान घृत, मन मैदःा के सानी,
९. संगत
के गुन होत है, संगत से गुन जाय,
१०. पगिया
बान्हो केस संवारो, तेल लगे
जुल्फन में
११. पाप
से धन बढ़त है, पन्द्रह बीस पचीस,
१२. धुआँ
के धरोहर, ओ बालू के भीत,
१३. कोई
लठधारी, कोई जट्धारी, कोई दःसो
इन्द्रिय घस डारी,
१४. करमे खेती करमें नारि, करमे मिले कुटुम इ चार।
१५. धन के
धमण्ड जरा मन से आप दःूर कीजिए,
१६. कठिन
जग हम ठानि लियो, दःरब ना कि हाथ,
१७. तोहरे
राम तो सूझत नाहीं,
१८.
तुलसी तुलसी सब कहे, तुलसी
जंगल के घास,
१९. लिखनी, नारी, पुस्तके, परहस्ते नष्ट-भ्रष्टे।
२०. मेढ़ा
जब पी हट्े, वे ना रह छ्पकन्त,
२१.
उजला-उजला सब भला, उजला भला न
केस,
२२. संगत
कीजै बड़न के बनत-बनत बन जाय,
२३. हंस गए
सरवर दःह सुगा आम के डाड़, (दःह= नदी)
२४. रात
अन्हरिया पंथ ना सूझे, खाल ऊँच
बराबर बूझे।
२५. बात के मरदः, रहन के गोरी, दःूध के भैंस, चाल के घोड़ी।
२६. बिना
गर के गावऽ गीत, भादःो में उठावऽ भीत।
२७. खेत
बिगाड़े खरतुआ, सभा बिगाड़े क्रूर।
२८. ऊँच
दःाँत की कामिनी दःूजे के घर जाय।
२९. घर के
खड़ा हर बा चार, घर में गिहथिन, गउ दःुधार।
३०. उपासल
मनइ के बिहान ना होला, ढ्ेर दिन
पहुनाइ में मान ना होला।
३१. भूख
ना दःेखे र्रूखा भात, नींद ना दःेखे मुरदःा
घाट्।
३२.
ठुनमुन ठुनमुन बैल करो, हँसमुख
करो नारी,
३३. पुरुँआ
पछुआ ब बेयार, बिधवा ना करे
सिंगार,
३४. रावल,
राजपूत, रामजनी, राजा और र्रूप
३५. आधी
रात के सातू खाय, बिनु नारी
ससुरा जाय,
३६. नया
जोतिषी बैद्य पुरान, रेख उठन्ते सुभत
जवान,
३७. बिना
बैल के क खेती, बिना वर दःेखे
ब्या बेट्ी
३८. बैल
तोनारा, खेत ढ्ेलारा, तिरिया भगठी,
पुत्र लुहारा, (लुहारा= लफेंगा)
३९. बढ़ा
बाल, मैला कपड़ा और करकसा नारि,
४०. पान
पुराना घी नया औ कुलवंति नारि,
४१. उड़न
बूड़न कूदःन नाहीं, सील के पीसल तिअन
नाहीं,
४२. गड़न्त में ओल, उड़न्त में बगेरी, चलन्त में रेहु। (उत्तम होते हैं)
४३. सब तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार।
४४. राग
रसोई पागरी, बनत बनत बन जाय
४५. गेहँू
गोरस गुर एक है, चाहत है सब कोइ,
४६. मनला
के मनौती, सनगर के हुँक्का,
४७. राजा,
धीमड़, वेश्या, पासी,
४८. फल में पपीता, नारी में सीता अउर ग्रंथ में गीता के बात कु अउर बा।
४९. जो न
कभी गलती करे, उसे भगवान कहते हैं,
५०. सौख
राय के चार इयार, (सौख राय=
सुखी
व्यक्ति)
५१. नसे, उपासे, मांसे, तीनों सर्दःी नाशै।
५२. खा के मूते, सूते बायीं, का के बैद्य बसावे गायीं। (गायीं= गाँव में)
५३. आपन
कुल ओ विप्र कुल, तस विधवा वो
कुँआर,
५४. केंचन
कलस कर गहे, नित उठ बरिसत मेह,
५५.
बनिया दःाता ठाकुर हीन बैद के बेटा
व्याधि न चीन्ह,
५६. हँस के
बोले, ठुनुक के रोये, राह चले त
जूड़ा खोले,
५७. एक जल
जल हऽ एक ना गड़ही,
५८. जब
ब्याह की चाह उठी मन में, तब सोरह,
बीस, पच्चीस में कीजै,
५९. सौ
में सूर हजार में काना, सवा लाख में
ऐंचा ताना,
६०. खट्
किरवा बन लीलदःाग, ओ कपूत
रिसिआय, (खट्मल)
६१. गइल पेड़ जहाँ बगुला बइठे, गइल राज जहाँ चुँगला पइठे।
६२. कहीं
जोगी जोग करे, कहीं क भोग,
६३. साँवा
खेती बाह बनीजी, भइंस कुरंग
बिकाय,
६४. मित्र
वहीं मर जाय जो वक्त पर काम न आवे,
६५. आन्हर का
जाने कि साँझ ह कि भोर हवे
६६. मांगो उसी से जो दःे खुशी से, जो क ना किसी से। १. आवत
आदःर ना कियो जात न दीन्हों हस्त,
२. दःक्खिन
लडके लडका, उत्तर ठनके दःेव,
३. सावन
पुरवा भादःो पछुआ आसिन ब इशान,
४. सावन में पछुआ, सीक डोले त म मरे, गाछ् डोले त ब परे।
५. सावन मांह ब पुरवैया, बैला बेंच कीन धेनु गैया।
६. दःखिन
दिसा लौका लउके उत्तर गरजे दःेव,
७. रोहिणी
रोवे, मिरगिटाह ट्रे, कु दिन अद्रा जाय,
८. रात में
बोले भंडरी, दिन में बोले सियार
९.
शुक्रवार की बदःरी, र शनिश्चर छाय,
१०. रात निबदःर, दिन में छाया, क घाघ कि बरखा गया।
११. गीला खेत जे बोए कोई, ताके बीज न अंकुर होई।
१२. नित उठ खेती नित उठ गाय, जे ना दःेखे ओकर घर से जाय।
१३. रोहिन में घर रोहा नाहीं।
१४. जे न दःे सोना, से खेत के कोना।
१५. कहि गइले रावन, केला रोपिहऽ सावन।
१६. माघे जाड़ ना पूसे जाड़, जब बयार ब तबे जाड़।
१७. आधा माघे कमर कांधे।
१८. मैदःे गेहँू, ढ्ेले चना। (गेहँू के लिए महीन मिट््ट्ी और चना के लिए ढ्ेलाह खेत अच्छा होता है)
१९. ग के धरीं, ना त आरी पर बइठीं।
२०. उत्तम
खेती जो हलगाहा, मध्यम खेती जो
संगरहा।
२१. पनही
पहन के हल गहे, सूथन पहन नहाय।
(सूथन= साफ, अच्छा कपड़ा)
२२. तीन पानी तेरह कोड़, तब दःेखऽ ऊँखी के पोर।
२३. बहुरा से दिन लहुरा, खिंचड़ी से दिन जेठ। १. कान
कसोट्न सोकन बान, तीन छ्ोड़ जनि
किनिहऽ आन।
२. बैल के चार छ्ो - सींग, पाँव, पँूछ्, कान। (अच्छा)
३. माथे
महोर (लाल) पों चांवर (चौड़ा)
४. साठ
लगाइ हर बैल कीन लो, बो लो
साठी धान।
५. माघ के टूट्ल मरदः, भादःो के टूट्ल बरदः।
६. बैल
कीनी धामर धूमर, भइस कीनी हाँड़ी
७. बैल
किनी अउवा ढ्ेबर भइंस कीनी पाड़ी,
८. न चीन्ह त नाया कीन। १.
मुखिया हो के का करबऽ जब गाँव के
गाँव भकोले बा,
२. नवका
जमाना के नवका छ्वारिक लोके,
३. आजकल
के पंचपसेरी, बदःलत में नइखे
तनिको दःेरी।
४. सास
भइली लौंड़ी पतोह मलकाइन
५.
अंजोरिया के आशा में अन्हरिया अंगेज
लहनी, गांजा : गांजा के प्रकार : मरिचइया, मनिपुरिया, अलीबम, अजमल, चीपड़, बालूचर, गदः्दी, भूसी, सुल्फा। इसमें "भूसी' जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है गांजा का चूर्ण, छ्ंटा हुआ सामान्य माल है, और "सुल्फा' भांग को खूब मलकर तैयार किया जाता है। गंजेड़ियों के शब्द : गांजा तैयार करने के लिए "अमनियां' कइल, अथवा "लठल' कहा जाता है। गांजा जब कड़ा होता है तब उसे "चूस', मधुर होने पर "मिठास', बेकार हो जाने पर "भकमीला', या "फसल्ली', हल्का होने पर "फींका', अत्यधिक कड़ा होने पर "नट्ीफार', पीने के लिए "चेतावल' या "राग- भोग लगावल' कहा जाता है। गांजा पीने वाले स्वभावतः अधिक भोजन करते हैं, और इसके लिए "ओल्हल' शब्द का व्यवहार करते हैं। गांजा पीकर जब नशेबाज "भकुआ' जाते हैं, तब वे जो निर्गुन छ्ेड़ते हैं, वह कु इस प्रकार का होता है- फूल लोर्हे गइलीं हो बारी, सारी मोर अंट्केला डार्ही, एकिया हो रामा। बिना प्रभु सरिया के ना छ्ोड़ावे, एकिया हो रामा। लोर्हत- लोर्हत हो बारी, चढ़ली पिया के अटारी, एकिया हो रामा। बिना प्रभु सरिया के ना छ्ोड़ावे, हो रामा। इसी बीच कोई दःूसरा नसेबाज बोल उठेगा - ""कवन गंजेड़ी गांजा गइले हो सइंया बउरास'। गंजेड़ियों की बैठक नियमतः तीन समय होती है-सुबह- दःैनिक क्रिया-कर्म से निवृत्त होकर, कूला दःतुवन करके, कु मुख में डालकर पानी पीकर, फिर दःोपहर और पुनः शाम को। गांजा के सामान में गांजा, सुरती, साफी, चीलम, गुल अैर एक माचिस ही पर्याप्त है। "गुल' के लिए फुस के घर के कोनचा या टा की रस्सी, अथवा फट्े-पुराने चट््ट्ी का उपयोग होता है। गुल-सुलगने को "गुल-गलल' कहते हैं। गंजेड़ी लोग बिना पानी के गांजा मलने पर "र्रूखा' और पानी के साथ मलने पर "उसना' बोलते हैं। १. गाँजा पीने से क्या नफा, अँखिया लाली दिल सफा।
२. गाँजा नहीं कहर है, कलेजा जार दःेता है, आँखों का लहर है।
३. गाँजा नहीं गूंजी है, भोजन करने वाला कूँजी है।
४. गाँजा पी- पी के बलमुआ अँखिया लाल कइले बा।
५. गाँजा है गु ज्ञान के बूट्ी मल-दःल इसे पिया करो, खैनी (सुरती) ख्याल से दिया करो।
६. गाँजा पिये राजा तमाकू पिये चोर, खैनी खाए मूरख थूकेला चा ओर।
७. गाँजा के जे क अदःगोई- बदःगोई, ओकरा वंश में र ना कोई, रहबो करी त लंगड़ा लूला होई।
८. एक चिलम में ऐसी तैसी, चिलम में ताजा, तीन चिमल में गांजा-गूंजी, चार चिलम में राजा।
९. गाँजा-गूंजी में एक आदःमी, घट्ले-बढ़ले आदःमी, ब प त तीन आदःमी।
१०. जे न पिये गाँजे की कली, ओ लड़का से लड़की भली।
११. बम
शंकर दःुस्मन साले को तंग कर।
१२. बम
शंकर तन गनेस, माल भेजऽ हर हमेश।
१३. बम शंकर भूल न जाना, काशी छ्ोड़कर दःूर न जाना।
भाँग के लिए एक उत्कृष्ट शब्दः "विज्या' भी प्रचलित है। किन्तु "भाँग' और "विज्या' में अन्तर है। "भाँग' में सिर्फ भांग का पत्ता होता है, परन्तु "विज्या' में अनेक तरह के पदःार्थ पड़ते हैं; जैसे- पुराने भाँग का पत्ता, जिसे छाँव में सुखाकर रखा गया हो, काहू, कुल्फा, कासनी, पोस्ता, खीरा का बीज, छाँव में सूखा हुआ गुलाब का फूल, धनिया, मीर्च, इलायची (छ्ोट्ी), सौंफ। इसे सील पर खूब बारीक पिसा जाता है। भँगेड़ियों का मानना है कि इसकी अच्छ्ी पिसाई का यही प्रमाण है कि लोर्हा को उठाया जाय तो वह भाँग से चिपक कर सील को भी उठा ले। ऐसी पिसाई साधारण व्यक्ति द्वेारा संभव नहीं। इसके लिए पहलवान शरीर चाहिए। इतनी अच्छ्ी पिसाई में कम से कम २ घं का समय तो लगेगा ही। फिर इस भांग या विज्या का गोला खांय या इसे घोलकर पीयें। इसे और उत्तम बनाने के लिए इसमें सूखा फल- किसमिस, पिस्ता, बादःाम, आदि भी डाला जाता है। मिश्री के साथ दःूध में घोलने पर इसकी गुणवत्ता में चार-चाँद लग जाती है। कहा भी गया है -
भाँग का सेवन करने वाला व्यक्ति काफी भोजन करता है, क्योंकि उसकी पाचन-क्रिया दःुरुँस्त रहती है। इसीलिए कहा गया है-""भँगिया जनि दःे गँवारन के बटुली के भात संघारन के''। भाँग लेने के बाद दिशा की तैयारी हो जाती है- ""भाँग के गोला पे में, हाथ के लोटा खेत में।''
१. सुरती
मुख गंध दःेत, सुरती मुख सुरत लेत,
२. सुरती
में इनकर मनवा बसल बा,
३. सुरती
आइल सुर्रूजपुर से र जगत में छाय,
४. सुरती
क कि सुनर नारि, पहिले लेउ करेजा
जारि।
१. कुल
बांके तिरिया सोहे, दःूध बांके
पारी,
२. बर
बीस बीस बीसा, वर ताक एके
दिशा
३. प्रीतम
बसे पहार पर, मैं जमुना के तीर,
४. धिरिक
पिआ जिअना कि साग रोट्ी तिअना,
५. छ्ोट्ी
चुकी खिरकी चन्दःन छ्रिकी, झिर-झिर बहे
बेयार
६. सुतल
रहलीं अमवा तर, महुआ तर गोर,
७. भदई
के चिउरा, भंइसी के दःही,
८. चमथा
के मार्हा चमथा के दःही,
९. खिंचड़ी के चार इयार, दःही, पापड़, घी, अंचार। |
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Content given by BHU, Varanasi
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