टी डी आई एल
यूनिकोड मे प्रस्तावित परिवर्तन
वैदिक कोड समुच्चय
मशीन आधारित अनुवाद
की-बोर्ड अभिविन्यास
सूचना प्रौद्योगिकी शब्दावली
समाचार पत्रिका विश्वभारत
सम्मेलन कार्यशिविर सूची
सम्मेलन कार्यशिविर प्रस्तुतियाँ
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

 


 

सूचना के आदान प्रदान के लिए भारतीय लिपि कोड (इस्की)



सत्तर के दशक से ही इलेक्ट्रॉनिकी विभाग और राजभाषा विभाग की विभिन्न समितियाँ विभिन्न कोडों एवं कुँजीपटलों का विकास कर रही हैं जो भारतीय लिपियों की समान ध्वन्यात्मक संरचना के कारण उनकी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें । पहले के प्रयास आस्की (एएससीआईआई) कोड को अक्षुण्ण नहीं रख सके । भारतीय मानक ब्यूरो का आई एस 13194 :1991 मानदण्ड पहले के आई एस मानदण्ड के अनुरूप है ।यह सूचना के आदान-प्रदान के लिए 8 बिट कोडवाला अक्षर समूह है । यह उन सभी कम्प्यूटर एवं संचार मीडिया में उपयोग के लिए बनाया गया है जो 7 अथवा 8 बिट अक्षरों का उपयोग करते हैं । 8 बिट परिवेश में निम्नतर 1 और 8 अक्षर आस्की के रूप में विख्यात सूचना के आदान प्रदान के लिए 7 बिट कोडवाले अक्षर समूह के समान है जिसे IS 10315:1982 के रूप में परिभाषित किया गया है । उच्चतर 128 अक्षर प्राचीन ब्राह्मी लिपि पर आधारित 10 भारतीय लिपियों की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं । 7 बिट परिवेश में एसआर् नियंत्रण कोड का उपयोग इस्की कोड समूह के चयन के लिए किया जा सकता है । नियंत्रण कोड एसओ का उपयोग आस्की कोड समूह के पुनःचयन के लिए किया जा सकता है ।

समान इंस्क्रीप्ट कुँजीपटल अधिचित्र से सभी 10 भारतीय लिपियों का टंकण संभव है । यह अधिचित्र किसी भी वर्तमान अंग्रेजी कुँजीपटल पर काम करता है । अंग्रेजी और इंस्क्रिप्ट अधिचित्र का बारी-बारी से उपयोग कैप्सलॉक कुँजी के जरिए किया जा सकता है। इंस्क्रीप्ट कुँजीपटल में स्वर एवं व्यंजन वर्णों की तार्किक एवं सहज व्यवस्था की गई है । यह वर्णों के ध्वन्यात्मक गुणों एवं उपयोग की सापेक्षिक बारम्बारता पर आधारित है । इससे कुँजीपटल को सीखना न केवल बहुत आसान हो जाता है बल्कि कोई व्यक्ति सभी भारतीय लिपियों में टाप भी कर सकता है ।

इस्की कोड तालिका ब्राह्मी आधारित भारतीय लिपियों में अपेक्षित सभी अक्षरों का परा-समूह है । वर्णों की ध्वन्यात्मक प्रकृति के कारण न लिपियों के कुँजीपटल का अनुकूलतम अधिचित्र बनाना संभव है । लिपियों में अंतर मुख्यतः उनके लिखित रूप में ही है । जहाँ विभिन्न संयोजन नियमों का उपयोग किया जाता है ।

सभी भारतीय लिपियों के लिए एक समान कोड एवं कुँजीपटल के होने के कारण अनेक लाभ हैं । इस्की कोड का उपयोग किया जाता है, उसका उपयोग किसी भी भारतीय लिपि में किया जा सकता है । सके फलस्वरूप सकी व्यवसायिक व्यवहार्यता बढ़ जाती है । सके अतिरिक्त, केवल प्रदर्श मोड में परिवर्तन करने से ही विभिन्न भारतीय भाषाओं में तुरंत लिप्यांतरण हो जाता है । 8 बिट वाला इस्की कोड में मानक आस्की कोड के गुण रहते हैं जबकि भारतीय लिपि के कुँजीपटल के ढाँचे का डिजाइन मानक अंग्रेजी कुँजीपटल पर तैयार किया गया है ताकि भारतीय लिपियों को भी उसी पर चलाया जा सके । विशेषता के कारण यदि विद्यमान अंग्रेजी कम्प्यूटर एवं सॉफ्टवेयर में 8 बिट अक्षर वाले कोड हैं तो भारतीय लिपियों का उपयोग भी संभव हो जाता है ।. इस्की कोड (सूचना के आदान-प्रदान के लिए भारतीय लिपि कोड) मानक अंग्रेजी कोड के साथ चलता है । समें मूल वर्णमाला एक ऐसे क्रम में व्यवस्थित है जो अधिकांश भारतीय शब्दकोशों के अनुरूप है ।

चूँकि प्रदर्शन पूर्णतः संरचना व प्रक्रियाविधि पर निर्भर करता है, इसलिए लिपि में प्रचलित विभिन्न शैलियों में उसी पाठ को देखना संभव है । अस्पष्टता हटाने के लिए वर्णों (विशेषक चिह्नों) पर अतिरिक्त प्रतीकों का उपयोग करते हुए रोमन लिपि में पाठ का लिप्यांतरण संभव है । रोमन पाठ में आध्यक्षर वर्णों को बड़े स्पष्ट अक्षरों में परिवर्तन करना भी संभव है ।

इस्की कोड सारणी





इंडियन स्क्रिप्ट कोड फॉर लैंग्वेज पेजिंग (आई.एस.सी.एल.ए.पी)



आई.एस.सी.एल.ए.पी दो बाइट का कोड है जिसका प्रयोग 7 बिट (जैसे पी.ओ.सी.एस.ए.जी., एफ.एलई.एक्स) तथा 8 बिट (जैसे आर.डी.एस.) पेजिंग परिवेश में किया जा सकता है । इस्की, इंडियन स्क्रिप्ट कोड फॉर (इन्फॉर्मे शनइंटरचेंज), भारतीय लिपियों के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (आई.एस. 13194:1991) द्वारा मानकीकृत उपयोगी वर्णों के सुपरसैट को परिभाषित करता है । इन वर्णों के स्क्रीन पर प्रदर्शन या मुद्रण से पहले इनकी कोडिंग के लिए संदर्भ आधारित पूर्व संसाधन की आवश्यकता होती है । पेजिंग उद्योग को पेजर में केवल प्रदर्शन के अनुप्रयोग के लिए एक सरल कोड की आवश्यकता थी ।पेजर में प्रयुक्त अधिकांश माइक्रोनियंत्रकोश में आस्की कोड के लिए उपयुक्त संसाधन क्षमता या कोड स्पेस नहीं होती । इनमें अलग से कैरेक्टर जेनेरेटर रोम का प्रयोग किया जा सकता है जिसमें चीनी भाषा में आवश्यक हजारों कैरेक्टरों (वर्णों) को स्टोर किया जा सकता है । चीनी कैरेक्टर सैट की तरह 'आई.सी.एस.एल.ए.पी' कैरेक्टर सैट में प्रत्येक भारतीय लिपि के लिए कई हजार कैरेक्टर हैं। इन्हें अंग्रेजी कैरेक्टरों की तरह एक के बाद एक रखा जा सकता है । आई.सी.एस.एल.ए.पी कोड स्की कोड की तरह संदर्भ संवेदी नहीं है, परन्तु ससे आधुनिक लिपियों में प्रयुक्त इस्की कैरेक्टरों के लगभग सभी संयोजकों को प्राप्त किया जा सकता है । 'स्कलाप' कोड का विकास अप्रैल 1996 में, ब्राह्मी आधारित भारतीय लिपियों के लिए इलेक्ट्रॉनिकी विभाग, आकाशवाणी (शोध एवं विकास) नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर तथा भारतीय मानक ब्यूरो के सहयोग से टेलीकॉम इंजीनियरिंग केन्द्र (दूरसंचार विभाग) द्वारा किया गया था । भारत में लिपियों के दो परिवार हैं - एक प्राचीन ब्रह्मी लिपि पर आधारित तथा अन्य फारसी-अरबी लिपि पर आधारित । ब्राह्मी लिपि (400 ई.पू.) में ध्वन्यात्मक वर्ण थे । व्यंजनों में 'अ' स्वर निहित था । विभिन्न स्वरों को दिखाने के लिए उनके साथ स्वर चिह्न जोड़े जाते थे । दो व्यंजनों के बीच आने वाले 'अ' स्वर के लोप की स्थिति में, दोनों व्यंजनों के संयुक्त रूप प्रचलित थे । ब्राह्मी में नासिक्यता को प्रकट करने के लिए 'अनुस्वर' का प्रयोग किया जाता था ।


Best Viewed in IE 5.5 & above
सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा व्यवस्थित